Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar - हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 56 मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
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सत्रहवीं पहेली

चार आश्रम उनका कारण और परिणति


     समाज को चार वर्णों में विभाजित कर डालना ही हिंदू समाज की एक मात्र विशिष्टता नहीं है। आश्रम धर्म भी एक अन्य है फिर भी इन दोनों में एक अंतर है। वर्ण धर्म समाज के संगठन का सिद्धांत है। दूसरी ओर आश्रम किसी के व्यक्तिगत जीवन को विनियमित करने का सिद्धांत है।

Char Ashram Unka Karan aur Parineeti - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     आश्रम धर्म के अनुसार व्यक्ति का निजी जीवन चार चरणों में विभाजित किया गया है। 1. ब्रह्मचर्य आश्रम, 2. गृहस्थाश्रम, 3. वानप्रस्थ आश्रम और 4. संन्यास आश्रम | ब्रह्मचर्य का सरलार्थ और भावार्थ है- अविवाहित स्थिति। इसका भावार्थ है- गुरु के पास विद्याध्यन करना। गृहस्थाश्रम का अर्थ है- वैवाहिक और पारिवारिक जीवन । संन्यास का तात्पर्य है- सांसारिकता का परित्याग। यह संसार के वीतराग की स्थिति है। वानप्रस्थ आश्रम - गृहस्थ एवं सन्यास के मध्य की स्थिति है। इसके अधीन यह समाज का अंग होता है किन्तु समाज से दूर रहता है। इसके नाम के अनुरूप अरण्य - निवास करना होता है।

     हिंदुओं की मान्यता है कि समाज के कल्याण के लिए वर्ण-धर्म की भांति आश्रम-धर्म का पालन भी अनिवार्य है। वे दोनों को संयुक्त नाम देकर वर्णाश्रम धर्म कहते हैं। ये दोनों मिलकर हिंदू समाज की कठोर मर्यादाएं निर्धारित करते हैं। इससे पूर्व कि हम इसके तात्पर्य, विशदस्वरूप और इसकी उत्पत्ति पर विचार करें, यह ठीक रहेगा कि हम आश्रम - धर्म को समझ लें। आश्रम - धर्म दिर्शन का साधन है।

     इस सन्दर्भ में मनुस्मृति¹ से कुछ प्रासंगिक अंश पुनः प्रस्तुत हैं:

     "गर्भ धारण के आठ वर्ष पश्चात् उपनयन संस्कार कराया जाए। क्षत्रिय का गर्भधारण के ग्यारह वर्ष पश्चात्, किन्तु वैश्य का बारह वर्ष उपरांत।"


1. मनुस्मृति, अध्याय 2. पू. 36


यह 18 पृष्ठों की पाण्डुलिपि है। यह टकित प्रथम प्रति है जिसमें थोड़ा अंश लेखक की हस्तलिखित लिपि में है। - संपादक


     “कोई द्विज यदि वेदाध्ययन नहीं करता है और अन्य (सांसारिक ज्ञान) के अध्ययन में रत रहता है तो वह शीघ्र ही, अपितु अपने जीवन काल में ही शूद्र की स्थिति प्राप्त करता है और उसके बाद उसकी संतति भी । "¹

     "गुरु के अधीन तीन वेदों के (अध्ययन) का व्रत छत्तीस वर्ष तक धारण किया जाए अथवा इसर्वे अर्द्धांश अथवा चतुर्थांश अथवा जब तक उनका पूरा ज्ञान न हो जाए, यह व्रत रखा जाए। "

     "जो उचित क्रम से तीन वेदों, अथवा दो अन्यथा एक का भी अध्ययन, बिना नियमोल्लंघन, कर लेता है, वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे² । "

     “विद्यार्थी, गृहस्थ, एकांतवासी और तापस इनकी चार स्थितियां हैं। इन सबका उद्गम गृहस्थ है। "

     “किन्तु सभी (अथवा) कोई भी नियम, जिसका विधानानुकूल पालन किया गया हो, ब्राह्मण को उच्च स्थिति प्रदान करता है । "

     “और वैदिक नियमानुसार और स्मृति के अनुरूप गृहस्थ को उन सबमें श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि वह अन्य तीनों का सहायक हैं ³। "

     “कोई द्विज स्नातक जो नियमानुसार गृहस्थ धर्म निभा चुका हो वह दृढ़ संकल्प करे कि वह अपनी इन्द्रियों का दमन करेगा, अरण्य में रहेगा (निम्नलिखित नियमों का अनुसरण करेगा)।"

     “जब कोई गृहस्थ यह देखे कि उसकी त्वचा में झुर्रियां पड़ने लगी हैं और उसके बाल पकने लगे हैं और उसके पुत्रों को पुत्र (पौत्र) हो गए हैं तब वह वन को प्रस्थान करे⁴ । "

     "परन्तु इस भांति अपने जीवन का तीसरा भाग वनों में व्यतीत के उपरांत चौथे पन में, वह सभी सांसारिकताओं का परित्याग कर तापस का जीवन बिताए । "

     "तापस रूप में जो क्रम से चरणों में यज्ञ पूर्ण करके, इन्द्रियों का दमन करके, क्लांत हो जाता है (भिक्षादान और भोजन करा कर ) वह मृत्यु उपरांत सुख भोगता है । "

     “जब वह तीनों ऋणों से उऋण हो जाता है तो मोक्ष के लिए सुरति लगाए, जो उऋण हुए बिना मुक्ति चाहता है, उसका पतन होता है। "


1. मनुस्मृति, अध्याय 2 168
2. वही अध्याय 3 1-2
3. वही, अध्याय 4 87-9
4. वही अध्याय 4 1-2


     “नियमानुसार वेदाध्ययन, पवित्र विधानुसार पुत्रवान होकर, योग्यतानुसार यज्ञ करके वह अपना ध्यान मोक्ष पर लगाए। "

     “कोई द्विज जो वेदाध्ययन बिना, पुत्रवान हुए बिना, यज्ञ के बिना मोक्ष चाहता है, उसका पतन होता है।¹ "

     इन नियमों से यह स्पष्ट है कि मनु के अनुसार आश्रम- धर्म के तीन रूप हैं। प्रथम यह कि यह शूद्रों और महिलाओं के लिए नहीं है। द्वितीय यह कि ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। ऐसे ही गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास अनिवार्य नहीं है। तृतीय यह कि इनका निर्धारित क्रम से पालन किया जाए। प्रथम ब्रह्मचर्य, द्वितीय गृहस्थ, तृतीय वानप्रस्थ और चतुर्थ संन्यास। कोई एक को लांघकर दूसरे आश्रम में नहीं जा सकता।

     व्यक्तिगत जीवन में नियोजित अर्थ-व्यवस्था के लिए बताई जाने वाली इस आश्रम प्रणाली पर विहंगम दृष्टि डालने पर कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं। वेदों के संदर्भ में आश्रमों का यह सिद्धांत अज्ञात है। वेदों में ब्रह्मचारी का उल्लेख है, परन्तु ब्रह्मचर्य को जीवन का प्रथम और अनिवार्य सोपान बनाए जाने का कोई प्रसंग नहीं है। ब्राह्मणों ने व्यक्तिगत जीवन में ब्रह्मचर्य को अनिवार्य क्यों बनाया? आश्रम धर्म के संबंध में यह प्रथम भ्रांति है।

     दूसरा प्रश्न यह है कि मनु ने व्यक्ति के लिए, एक ही क्रम में आश्रम प्रणाली क्यों रखी? इसमें संदेह नहीं रहा है कि एक समय ऐसा था, जब कोई ब्रह्मचारी तीनों में से कोई सा भी आश्रम अपना सकता था। वह गृहस्थ बन सकता था अथवा गृहस्थ बने बिना संन्यासी भी बन सकता था। यह तुलना करें कि धर्मसूत्र इस विषय में क्या कहते हैं?

     वशिष्ठ धर्म सूत्र² का मत है:

     “चार सोपान हैं: विद्यार्थी, गृहस्थ, एकांतवास और तापस। "

     "जिस व्यक्ति ने एक दो अथवा तीन वेदों का अध्ययन विद्यार्थी धर्म का उल्लंघन किए बिना किया है, वह जिस आश्रम में जीवन बिताना चाहे, बिता सकता है। '

     गौतम धर्म सूत्र³ का मत है:

     "कोई (बताता है कि) वह (जिसने वेदाध्ययन किया है) किसी भी आश्रम का चयन कर सकता है। "

     धर्मसूत्रों के विचार जानने पर यह स्पष्ट है कि एक समय था, जब गृहस्थाश्रम वैकल्पिक था। ब्रह्मचर्य के पश्चात् कोई वानप्रस्थ अथवा संन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकता था। मनु ने विकल्प क्यों समाप्त किया और गृहस्थ को क्यों अनिवार्य बनाया? उन्होंने वानप्रस्थ से पूर्व गृहस्थ को और संन्यास से पूर्व वानप्रस्थ को अनिवार्य क्यों घोषित किया ?


1. मनुस्मृति, अध्याय 6, 33-37
2. मनुस्मृति, अध्याय 7 श्लोक 1, 2, 3
3. वही अध्याय 3 श्लोक 1 और 2


     गृहस्थाश्रम के पश्चात् जीवन के दो सोपान हैं, वानप्रस्थ और संन्यास प्रश्न यह है कि मनु ने यह आवश्यक क्यों माना कि गृहस्थाश्रम के पश्चात् दो आश्रम और रखे जाएं ? संन्यास आश्रम ही क्यों पर्याप्त नहीं ? वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के लिए निर्धारित नियम कुछ इतने समान हैं कि असमंजस होता है।

     मनु ने वानप्रस्थ और संन्यास की जो तुलनात्मक संहिता बनाई है, उसकी सारणी निम्नांकित है: