हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
V
आइये अब यह देखें कि वर्ण-व्यवस्था के संबंध में पुराण क्या कहते हैं?
हम विष्णु पुराण से आरम्भ करते हैं। चार वर्णों की उत्पत्ति पर विष्णु पुराण में तीन सिद्धांत हैं। एक में यह आरोप मनु के सिर जाता है। विष्णु पुराण का मत है:
"ऐहिक अण्डज से पूर्व देव ब्रह्मा हिरण्यगर्भ विश्व के शाश्वत नियंता, जो ब्रह्मा के तत्वरूप थे, जिसमें दिव्य विष्णु सन्निहित थे, जो ऋक, यजुस, साम, और अथर्ववेद के रूप में जाने जाते हैं, विद्यमान थे। ब्रह्मा के दाएं अंगूठे से प्रजापति दक्ष उत्पन्न हुए, दक्ष की पुत्री अदिति थी, उससे वैवस्त उत्पन्न हुआ, उससे मनु प्रकट हुआ। मनु के पुत्र थे इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रमसु, नाभागनिदिष्ट, करुष और पृषघ्र । कुरुष से करुषगण महाशक्तिवान क्षत्रिय उत्पन्न हुए । निदिष्ट का पुत्र नाभाग वैश्य बना।"
यह व्याख्या अपूर्ण है। इसमें मात्र क्षत्रिय और वैश्यों की उत्पत्ति बताई गई है। उसमें ब्राह्मण और शूद्र की उत्पत्ति की कोई व्याख्या नहीं है। विष्णु पुराण में एक और भिन्न कथन है। उसके अनुसारः
"पुत्र कामना में मनु ने मित्र और वरुण की आहुति दी किन्तु होत्री पुजारी द्वारा मंत्र के गलत उच्चारण कर दिए जाने पर एक पुत्री हुई। उसका नाम इला था। तब मित्र और वरुण की कृपा से मनु से उसे सुद्युम्न नामक पुत्र का जन्म हुआ। परन्तु महादेव के कोप के कारण वह भी नारी रूप में परिवर्तित हो गया। वह नारी सोम पुत्र बुध के आश्रम के निकट विचरती रही । बुध उस पर आसक्त हो गया और उन दोनों से एक पुत्र उत्पन्न हुआ- पुरुरवा । जन्म के उपरान्त उस देवता की जो ऋक, यजुस, साम और अथर्ववेद मानस आहुति से उत्पन्न हुआ, जो यज्ञ-पुरुष का रूप है उसकी ऋषियों ने पूजा की जिन का मनोरथ था कि सुद्युम्न अपना पुरुषत्व पुनः प्राप्त कर लें। देवताओं की कृपा से इला फिर सुद्युम्न बन गया।
"विष्णु पुराण के अनुसार अत्रि ब्रह्मा का पुत्र और सोम का पिता था, जिसे ब्रह्मा ने पादपों ब्राह्मणों और तारों का स्वामी बनाया। राजसूर्य यज्ञ के पश्चात् सोम मदांध हो गया और देवताओं के गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का अपहरण कर के ले गया, जिसके लिए उसकी भर्त्सना की गई। ब्रह्मा, देवताओं और ऋषियों ने बृहस्पति की पत्नी लौटाने का अनुनय-विनय भी की। किन्तु उसने उसे नहीं लौटाया । सोम का पक्ष उष्ण- गण ने लिया जबकि ऑगिरस के शिष्य रुद्र ने बृहस्पति की सहायता की। दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ जिसमें देवता और दैत्यों ने क्रमशः दोनों पक्षों में युद्ध किया। ब्रह्मा बीच में पड़े और सोम को विवश किया कि वह बृहस्पति को उसकी पत्नी लौटा दें। इस बीच वह गर्भवती हो गई और एक पुत्र बुध को जन्म दिया। बहुत अनुरोध करने पर उसने स्वीकार कर लिया कि सोम ही बुध का पिता है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, पुरुरवा मनु की पुत्री इला और बुध का पुत्र था ।
“पुरुरवा के छह पुत्र थे। उनसे ज्येष्ठतम अयुस था । अयुस के पांच पुत्र थे । नहुष क्षत्रवृद्ध, रम्भ, रजि अनेनस।”
'क्षत्रवृद्ध का पुत्र था सुनहोत्र जिसके तीन पुत्र कास, लेस और गृत्समद थे। अंतिम पुत्र से शौनक उत्पन्न हुआ जिसने चार वर्ण बनाए । कास का एक पुत्र था कासिराज, उसका भी पुत्र था दीर्घतमस क्योंकि धन्वंतरि दीर्घतमस था ।
तीसरे कथन के अनुसार¹ वर्ण-व्यवस्था के जनक ब्रह्मा थे। वह इस प्रकार हैं:
नेत्रेय² कहते हैं: तुमने मुझे मानव सृष्टि के संबंध में बताया; अब हे ब्राह्मण ! मुझे विस्तार से बताओ कि ब्रह्मा ने इसकी सृष्टि किस प्रकार की? मुझे बताओ, उसने कैसे और किस गुण से वर्ण बनाए और ब्राह्मण तथा अन्य के कार्य कौन-कौन से हैं? पराशर ने उत्तर दिया 3. अपने विचार के अनुसार ब्रह्मा की कामना जगत सृष्टि की हुई । जिनमें सत्व होता है वे उनके मुख से उत्पन्न हुए, 4. जिनमें रजोगुण होता है, वे उसके वक्ष से जन्मे, जिनमें रजोगुण और तमोगुण होता है, वे उनकी जंघाओं से जन्मे । अन्य उनके चरणों से उत्पन्न हुए जिनके मुख्य लक्षण हैं कलुष । इससे वर्ण-व्यवस्था बनी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, जो क्रमशः मुख, वक्ष, जंघा और चरणों से बने हैं। "
विष्णु पुराण में ऋग्वैदिक सिद्धांत को सांख्य दर्शन का अनुमोदन प्राप्त है।
हरिवंश पुराण में दो सिद्धांत आते हैं। एक³ के अनुसार वर्णों की उत्पत्ति मनु की एक संतान से हुई:
गृत्समद का पुत्र शुनक था, उससे शौनक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उत्पन्न हुए।
“विताठ पांच पुत्रों के पिता थे । वे थे सुहोत्र, सुहोत्री, गया, गर्ग और कपिल । सुहोत्र के दो पुत्र थे, कासक और राजा गृत्समति । उसके पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य थे । "
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1 पू. 61-2
2. विष्णु पुराण वार्तालाप के रूप में है जिसमें शिष्य मैत्रेय प्रश्न पूछता है और ऋषि पराशर उसके प्रश्नों का उत्तर देते हैं।
3. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृ. 227
दूसरे आख्यान के अनुसार उनकी उत्पत्ति विष्णु से हुई जो ब्रह्मा से प्रकट हुए थे और प्रजापति दक्ष बन गए। यह इस प्रकार है:¹
"जनमेजय² कहता है: “हे ब्राह्मण, मैंने ब्रह्मयुग (वर्णन) सुना है जो आदि युग था । मेरी भी कामना है क्षत्रिय युग के विषय में सारगर्भित और विस्तार से अनेक प्रेक्षणों के आधार यज्ञ के सोदाहरण उल्लेख का सम्पूर्ण विवरण दें। वैशंपायन ने उत्तर दिया, “मैं उस युग के विषय में बताता हूँ जिसका यज्ञों के कारण आदर है और जो मुक्ति में अनेक कर्मों की विशिष्टता से सम्पन्न है, जिसका आदर तब के मनुष्यों के कारण किया जाता है । मुक्ति के लिए अबाध धर्म किए जाते थे । ब्रह्म के प्रति चित्त की एकाग्रता थी और संयम था। ब्राह्मणों के उद्देश्य महानतम थे। ब्राह्मण अपने व्यवहार से गौरवान्वित और मर्यादित थे। संयम का जीवन व्यतीत करते थे। बाह्मणों के अनुसार अनुशासन था, वे अपने कर्त्तव्यपालन में त्रुटिहीन थे। उनका ज्ञान अथाह था। वे मननशील थे। तब सहस्रों युग व्यतीत होने पर ब्राह्मणों की सत्ता शिखर पर थी । तब ये मुनि इस विश्व के विलयन में सम्मिलित हुए। ब्रह्मा से विष्णु प्रकट हुए। इन्द्रिय ज्ञान से परे हो गए और ध्यानस्थित हो गए। दक्ष प्रजापति बन गए और अनेक प्राणियों की सृष्टि की। ब्राह्मण को रूपराशि (चन्द्रमा को प्रिय) और अक्षय बनाया गया। क्षत्रियों को नश्वर तत्वों से रचा। एकांतरण से वैश्य बने और धूम्र परिष्करण से शूद्रों को बनाया गया। जब विष्णु वर्गों पर विचार कर रहे थे तो ब्राह्मण को गौर, लाल, पीत तथा नीले रंग से बनाया गया। इस प्रकार विश्व में मानव वर्णों में विभाजित हो गये। उनकी चार पहचान हुई, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। एक स्वरूप अनेक कार्य। दो पैरों पर चलने वाला अत्यंत आश्चर्यजनक शक्तिमान और अपने व्यवसाय में पारंगत तीन उच्च वर्णों के संस्कारों का वेदों में निध रिण हुआ। प्राणियों की योगावस्था से ब्रह्मा प्रकट हुए। विष्णु जैसी उसी ध्यानावस्था से- भगवान प्रचेतस (दक्ष) अर्थात् महान योगी विष्णु अपनी मेधा एवं ऊर्जा से ध्यानावस्था से कर्मक्षेत्र में उतरे। उन्मूलन से शूद्र उपजे; वे संस्कार रहित हैं इस कारण वे शुद्धि संस्कारों में सम्मिलित नहीं हो सकते, न पवित्र विज्ञान से उनका संबंध है, वैसे ही जैसे ईंधन के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है और लुप्त हो जाती है। उसकी यज्ञ में कोई आवश्यकता नहीं। इसी प्रकार धरती पर घूमने वाले शूद्र हैं। कुल मिला कर (बलि देने के अतिरिक्त किसी उपयोग के नहीं)। अपने जन्म के कारण, उनका जीवन शुद्धता से वंचित रखा गया है और उनकी अनावश्यकता वेदों में नियत है। "
भागवत पुराण³ में भी वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या है। इसका कथन है:
“कई सहस्र वर्षों के उपरांत अपने कर्मों और प्रकृतिक गुणों से विद्यमान आत्मा ने जल पर उतराते अण्डज को जीवरूप प्रदान किया। फिर पुरुष ने उसका विखण्डन कर उससे एक सहस्र जंघाएं, चरण, भुजाएं, चक्षु, मुख और शीर्ष प्रकट किए। विश्व व्यवस्थापक ने अपने सहयोगी ऋषियों के साथ विश्व की रचना की। उन्होंने अपनी कटि से सात अधो भुवन रचे और ऊर्ध्व मूल से और सात उर्ध्व भुवनों की रचना की। ब्राह्मण पुरुष का मुख था, क्षत्रिय उसकी भुजाएं, वैश्य उसकी जंघाओं से उपजे और शूद्र उस देव पुरुष के चरणों से जन्मे । पृथ्वी उनके पैरों से बनी, वायु उनकी नाभि से। उनके हृदय से स्वर्ग और उनके वक्ष से महालोक बने । "
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 152-53
2. हरिवंश पुराण जनमेजय और वैशंपायन के बीच संवाद है।
3. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 156
अब अंत में वायु पुराण देखें। यह क्या कहता है? इसके अनसुार मनु ने वर्ण-व्यवस्था रची।
गृत्समद का पुत्र शुनक था । उससे शौनक जन्मा। उसी के परिवार में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उत्पन्न हुए द्विज मानव विभिन्न कर्मों के साथ जन्मे।
VI
कैसी अव्यवस्था है? ब्राह्मण चार वर्णों की उत्पत्ति के विषय में एकरूपता और ठोस प्रमाण क्यों नहीं प्रस्तुत करते ?
वर्णों की सृष्टि के विषय में एकमत नहीं है। ऋग्वेद का कथन है कि चार वर्ण प्रजापति ने बनाए। वह यह नहीं बताता कि कौन से प्रजापति ने। हम यह जानना चाहते हैं कि किस प्रजापति ने वर्ण बनाए क्योंकि प्रजापति अनेक हैं। यह मान भी लें कि प्रजापति ने बनाए तो भी सहमति नहीं है। एक का कहना है कि ब्रह्मा ने बनाए, दूसरे का मत है कश्यप ने तीसरे का विचार है मनु ने बनाए ।
इस प्रश्न पर कि सृ ष्टा ने जो भी वह रहा हो, कितने वर्ण बनाए, जिनमें समानता नहीं। ऋग्वेद के अनुसार वर्ण चार थे। परन्तु अन्य अधिकारी विद्वान कहते हैं केवल दो वर्ण बनाए गए। कुछ का विचार है ब्राह्मण और क्षत्रिय और कुछ मानते हैं ब्राह्मण और शूद्र ।
संबंधों के विषय में, सृष्टा के मनोरथ के प्रश्न पर ऋग्वेद चारों वर्णों में एक के बाद एक असमानतों का नियम निर्धारित किया है जो वर्ण विशेष के उद्गम अंग के महत्व के अनुसार श्रेष्ठ या हीन है। जबकि श्वेत यजुर्वेद, ऋग्वेद के सिद्धांत से सहमत नहीं। ऐसे ही उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराण भी कहते हैं, किन्तु हरिवंश पुराण विस्तार से बताता है कि शूद्र द्विज हैं।
ऐसा लगता है कि इस कुटिलता का कारण चातुर्वर्ण्य की कहानी को सनातन रूप देना है जिसे ब्राह्मणों ने स्थापित परम्पराओं के विपरीत ऋग्वेद से जोड़ दिया ।
उद्देश्य क्या था ? ब्राह्मणों का इस सिद्धांत रचना के पीछे क्या प्रयोजन था ?