Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar - हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 53 मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 53 of 92
25 ऑगस्ट 2023
Book
5,7,2,1,,

II

     अब हम ब्राह्मण साहित्य पर आएं और देखें कि इस प्रश्न पर वे क्या कहते हैं ?

     शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या इस प्रकार है:¹

Chaturvarnye - kya Brahman apni utpatti se parichit hai - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     “प्रजापति ने” “भू” जपते हुए यह पृथ्वी बनाई, “भुव:" के साथ वायु बनाई, " स्वाहा " के साथ आकाश बनाया। ब्रह्मांड का इस संसार से सह-अस्तित्व है। अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। " भू" कहकर प्रजापति ने ब्राह्मण उत्पन्न किया, “भुवः " से क्षत्रिय, “स्वाहा” से विस बनाया। अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। भू कहकर प्रजापति ने स्वयं को उत्पन्न किया, भुवः कहकर संतति रची। “स्वाहा " से पशु उत्पन्न हुए। यह विश्व स्व, संतति और पशु है, अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। "

     शतपथ ब्राह्मण की एक अन्य व्याख्या² है। यह निम्नांकित है:

     “भाष्यकार के अनुसार यहां ब्रह्मा अग्नि रूप में विद्यमान थे। जिसमें ब्राह्मण वर्ण का रूप है। पहले यह एक मात्र ( ब्रह्मांड ) थे। एक रहते उनकी वृद्धि नहीं हुई । उन्होंने शक्ति से एक श्रेष्ठ क्षात्र (क्षेत्र) उत्पन्न किया अर्थात् देवताओं में वे जिनमें शक्ति है ( क्षत्राणि), इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, परजन्य, यम, मृत्यु ईशान इस प्रकार क्षात्र से श्रेष्ठ कोई नहीं। इसलिए ब्राह्मण राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय से नीचे बैठते हैं। वह क्षत्रिय की गरिमा स्वीकार करता है। ब्रह्मा, क्षत्रिय का उदगम है। इस प्रकार, यद्यपि राजा की श्रेष्ठता है अंत में वह उद्गम हेतु ब्राह्मण के आश्रय में जाता है। वह अति दयनीय बन जाता है। उसी के समान जिसकी श्रेष्ठता आहत होती है। 24. उसका विस्तार नहीं हुआ। उसने विस् उत्पन्न किया। देवताओं की इस श्रेणी में वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव, मारुत आते हैं। 25. उसकी वृद्धि नहीं हुई। उसने शूद्र- द्र-वर्ण पूशान उत्पन्न किया। यह पृथ्वी पूशान है। सो वह सभी का पोषण करती है। 26. उसकी वृद्धि नहीं हुई, उसने शक्ति से एक विलक्षण रूप उत्पन्न किया। न्याय (धर्म) यह शासक है (क्षात्र) अर्थात् न्याय। इस प्रकार न्याय से श्रेष्ठ कुछ नहीं। इसलिए निर्बल बलवान से त्राण को न्याय मांगता है, जैसे एक राजा से। यह न्याय सत्य है। परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति के विषय में, वे कहते हैं- “ यह सत्य बोलता है, क्योंकि उसमें दोनों गुण 'हैं।' 27. यह ब्रह्म, क्षात्र, विस् और शूद्र हैं। अग्नि के माध्यम से देवताओं में वह ब्रह्मा बन जाता है, मनुष्यों में ब्राह्मण । (दैवी), क्षत्रिय के माध्यम से (मनुष्य) एक क्षत्रिय, (दैवी) वैश्य से एक (मनुष्य) वैश्य, (दैवी), शूद्र के माध्यम से एक (मनुष्य) शूद्र बनता है। अब वह देवों में अग्नि और मनुष्यों में ब्राह्मण है, और वे वास के इच्छुक हैं।"


1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृष्ठ 17
2. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृष्ठ 20


     तैत्तिरीय ब्राह्मण में तीन व्याख्याएं हैं। प्रथम इस प्रकार है : ¹

     यह समस्त (ब्रह्मांड) ब्रह्मा द्वारा रचित है। मनुष्य कहते हैं कि वैश्य ऋक, ऋचाओं से बना है। वे कहते हैं यजुर्वेद के गर्भ से क्षत्रिय उत्पन्न हुआ है। सामवेद से ब्राह्मण प्रकट हुआ। यह शब्द प्राचीन है, घोषित प्राचीन ।

     दूसरी कहती है :²

     "ब्राह्मण, वर्ण देवों से प्रकट हुआ, शूद्र असुरों से "

     तीसरी इस प्रकार है:³

     "वह शुष्क भोजन से स्वेच्छा से दुग्ध की आहुति दे । शूद्र दुग्ध की आहुति न दें क्योंकि शूद्र शून्य से जन्मा है । वे कहते हैं कि जब शूद्र दूध चढ़ाता है, वह आहुति नहीं है। शूद्र अग्निहोत्र में दूध से आहुति न दे क्योंकि वे इसे शुद्ध नहीं करते। जब उसे छान लिया जाये, तब वह आहुति है । "

     अब ब्राह्मणों के साक्ष्य को देखें; वे पुरुष सूक्त का कहां तक अनुमोदन करते हैं? उनमें से कोई नहीं करता ।


1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृष्ठ 17
2. वही, पृ. 21
3. वही, पृ. 21


III

     अगली बात यह देखनी है कि वर्ण-व्यवस्था के संबंध में स्मृतियों की क्या व्याख्या है। उसका ज्ञान आवश्यक है। मनु ने इस संबंध में कहा है¹:

     "उस (स्वयंभू) ने इच्छा करके और अपनी देह से विभिन्न जीवों की रचना के मनोरथ से पहले सागर की सृष्टि की और उसमें एक बीज छोड़ दिया । 9. यह बीज एक स्वर्णिम अंडज बन गया। सूर्य के आकार का; उससे वह स्वयं ब्रह्मा बनकर उत्पन्न हुए, सारे संसार का जनक। 10. जलधि नाराः कहलाया क्योंकि वह नर से उत्पन्न हुआ था और क्योंकि यह उनकी प्रथम क्रिया थी, इसलिए वे नारायण जाने जाते हैं। 11. वे अजर अगोचर, विद्यमान और अविद्यमान कर्ता पुरुष से उत्पन्न हुए, इसलिए जगत में ब्रह्मा कहलाए। 12. एक वर्ष तक अंडज में रहकर महिमामय पुरुष अपनी ध्यानावस्था से युग्म बन गए। "

     “कि विश्व में प्राण प्रतिष्ठा हो, उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रि, वैश्य और शूद्रों की रचना की जो उनके मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से उत्पन्न हुए। 32. अपनी देह को दो भागों में विभक्त कर परमात्मा (ब्रह्मा) एक अंग पुरुष और दूसरा अंग नारी बन गया उसमें उन्होंने विराज की सृष्टि की। 33. हे श्रेष्ठ द्विजो, जानो कि मैं ही वह पुरुष विराज स्वयं समस्त संसार का रचयिता हूं। 34. प्राणियों की उत्पत्ति हेतु मैंने कठोर उपासना की और सर्वप्रथम दस महर्षि, महान ऋषि, जीवों के स्वामी बनाए। 35. यथा मरीचि, अत्रि, आंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेतस, वशिष्ठ, भृगु और नारद की रचना की। 36. उन्हें महान शक्ति प्रदान की, सात अन्य मनु, देवता और देवियां और अपार शक्तिमान महर्षि उत्पन्न किए। 37. यक्ष, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, अप्सरा, असुर, नाग, सरिसृप, विशाल पक्षी, और भिन्न-भिन्न पितर, 38. बिजली, गगन गर्जन, मेघ, शकुन अपशकुनकारी ध्वनियां, धूम्रकेतु और विभिन्न - विभिन्न तारागण, 39. किन्नर, कपि, मीन, विविध पक्षी, पशु, मृग, मानव, वन्य पशु और दो जबड़ों वाले पशु। 40. विशाल और लघु आकार के रेंगने वाले जीव मुख, जुएं, मक्खियां पिस्सू, डांस, वन मक्खी, और विविध अचर पदार्थ 41. इस प्रकार अपने प्रयत्नों और अपने तपोबल से प्रत्येक जीव के पूर्व कर्मों के अनुसार समस्त चर-अचर जगत का सृजन किया । "

     मनु ने अपनी 'स्मृति' में उन आधारभूत कारणों के विषय में एक अन्य मत प्रकट किया है, जिनके परिणामस्वरूप मनुष्यों को चार श्रेणियों² में विभाजित किया गया है:


1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृ. 36-37
2. वही, पृष्ठ 41


     “अब मैं संक्षेप में बताता हूं कि किस क्रम से अपने गुणानुसार आत्माएं अपनी स्थिति को पहुंचती हैं। 40. सत्व सम्पन्न आत्माएं देवता बन जाती हैं, , रजोगुणयुक्त मनुष्य बनते हैं, जबकि तमोगुण वाली वन्य जंतु होती हैं- यह तीन गतियां हैं। 43. हाथी, अश्व, शूद्र और प्रताणनीय म्लेच्छ, सिंह, बाघ और सूकर की मध्यम अंधकार स्थिति को प्राप्त होते हैं। 46. राजा, क्षत्रिय, राज पुरोहित और वे व्यक्ति जिनका मुख्य व्यवसाय वाद-प्रतिवाद है वे दुर्वासना की मध्य स्थिति को प्राप्त होते हैं। 48. भक्त, तापस, ब्राह्मण, विमानारूढ़ देवतागण, तारामंडल, दैत्यों में न्यूनतम सदगुणी होते हैं। 49. अग्निहोत्री, ऋषि, देवतागण, वेद, दिव्य ज्योर्तिपुंज, वर्ष, पितृगण, साध्यगण द्वितीय प्रकार के सदगुण युक्त होते हैं। 50. स्रष्टा ब्रह्मा, सदाचारिता, जो महान् (महत्) है, जो अव्यक्त है, उसमें सर्वाधिक सद्गुण विद्यमान होते हैं। "

     हां, मनु ऋग्वेद को मान्यता प्रदान करते हैं परन्तु उनके विचारों की तुलना करना व्यर्थ है। उसमें, मौलिकता का अभाव है। वह ऋग्वेद के ही अनुगामी हैं।