Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar - हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 52 मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
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सोलहवीं पहेली

चातुर्वर्ण्ये - क्या ब्राह्मण अपनी उत्पत्ति से परिचित हैं ?

     प्रत्येक हिंदू का यह मूल विश्वास है कि हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था दैवीय है। इस दैवीय व्यवस्था के तीन आधार हैं। प्रथम, समाज चार वर्णों में विभक्त है- 1. ब्राह्मण, 2. क्षत्रिय, 3. वैश्य और 4. शूद्र । द्वितीय, चारों वर्णों की स्थिति एक-दूसरे से जुड़ी है। उसमें चरण-दर-चरण असमानता है। ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि है। क्षत्रिय ब्राह्मणों के नीचे हैं, परन्तु वैश्यों और शूद्रों से ऊपर हैं। वैश्य ब्राह्मणों और क्षत्रियों से नीचे हैं, परन्तु शूद्रों से ऊपर हैं। शूद्र सबसे नीचे हैं। तृतीय, चारों वर्णों का व्यवसाय निश्चित है। ब्राह्मणों का व्यवसाय अध्ययन-अध्यापन है, क्षत्रियों का कार्य लड़ना है। वैश्यों का कार्य व्यापार है और शूद्रों का शारीरिक श्रम से तीनों वर्णों की सेवा करना है। यह हिन्दुओं की वर्ण-व्यवस्था कहलाती है। यह हिंदूधर्म की आत्मा है। वर्ण-व्यवस्था को छोड़कर हिन्दुओं में ऐसा कुछ नहीं है, जिसमें वे अन्य धर्मों से भिन्न हों। इस कारण यह आवश्यक है कि इस बात का विवेचन किया जाए कि वर्ण-व्यवस्था का प्रचलन कैसे हुआ ?

Chaturvarnye - Are Brahmins aware of their origin - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     इसकी उत्पत्ति की व्याख्या के लिए हमें हिन्दुओं के प्राचीन शास्त्रों का मंथन करना होगा कि वे इस विषय में क्या कहते हैं?

I

     यह अच्छा होगा कि सर्वप्रथम वेदों के विचारों को देखा जाए। इस विषय पर ऋग्वेद के दसवें मण्डल के नब्बेवें श्लोक में इस प्रकार कहा गया है:

     1. “पुरुष के एक सहस्त्र शीश हैं, एक सहस्त्र चक्षु, एक सहस्त्र चरण। वह पृथ्वी पर सर्वत्र परिपूर्ण व्यापक है। उसने दस अंगुलियों से हर छोर से समस्त भूमंडल को आच्छादित कर रखा है।" 2. “पुरुष स्वयं सम्पूर्ण (ब्रह्मांड ) है जो वर्तमान है। (जो भावी है) वह अमरता का स्वामी है, भोजन से उसका विस्तार होता है। 3. उसकी महानता ऐसी है और पुरुष सर्वश्रेष्ठ है। सारी सृष्टि उसका क्षेत्र है और उसका तीन चौथाई अविनाशी अंश अंतरिक्ष में है। 4. पुरुष का तीन चौथाई अंश उर्ध्व है, उसका एक चौथाई अंश यहां पुनः विद्यमान है, फिर उसका सर्वत्र विलय हो गया। उन सभी पदार्थों में जो भक्षण करते हैं और भक्षण नहीं करते। 5. उससे विराज उत्पन्न हुआ और विराज से पुरुष। जन्म लेते ही वह धरती से आगे बढ़ गया, आगे भी और पीछे भी। 6. जब देवी ने पुरुष की आहुति से यज्ञ किया, वसंत उसका घी था, ग्रीष्म लकड़ी और शरद समिधा । 7. यह बलि पुरुष जो सर्वप्रथम जन्मा, उन्होंने बलि घास पर जला दिया। उसके साथ देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने आहुति दी। 8. इस ब्रह्मांड यज्ञ से दही और मक्खन उपलब्ध हुए। इससे वे नभचर और थलचर बने जो वन्य और पालतू हैं। 9. ब्रह्मांड यज्ञ से ऋग्वेद और सामवेद की ऋचाएं निकलीं, छंद और यजुस निकले। 10. उससे अश्व जन्मे और दोनों जबड़ों वाले सभी पशु जन्मे, मवेशी जन्मे और उसी से अजा मेष जन्मे। 11. जब (देवों के) पुरुष को कितने भागों में काटकर विभाजित कर दिया। उसका मुख क्या था? उसकी कितनी भुजाएं थीं? (कौन से दो तत्व) उसकी जंघाएं और चरण बताई गई हैं। 12. ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्य उसकी भुजाएं बनीं, जो वैश्य (बना) वह उसकी जंघाएं थीं, शूद्र उसके पैरों से उत्पन्न हुए । 13. उसकी आत्मा (मानस) से चन्द्रमा, उसके चक्षु से सूर्य, उसके मुख से इन्द्र और अग्नि, उसके श्वास से वायु बनी। 14. उसकी नाभि से मारुत बना, उसके शीर्ष से आकाश बना, उसके चरणों से धरती उसके कर्ण से दिशाएं और इस प्रकार विश्व बना। 15. जब देवता यज्ञ कर रहे थे, उन्होंने पुरुष को एक बलि-जीव के रूप में बांधा। इसके लिए सात छड़ियों की, सात टुकड़ों की समिधा चढ़ाई गई। 16. इस यज्ञ में देवताओं ने आहुति दी। ये प्रथम अनुष्ठान थे। इन शक्तियों ने आकाश से कहा पूर्व साध्य, देवतागण कहां हैं। "


यह 33 पृष्ठों का टकित आलेख है। संशोधन लेखक ने स्वयं किए हैं। सभी पृष्ठ अलग-अलग थे और टैग से बंधे थे। शीर्ष पृष्ठ लेखक ने हाथ से लिखा है। संपादक


     इस मंत्र वृंद का सर्वविदित नाम “पुरुष सूक्त" है और यह जाति और वर्ण-व्यवस्था का शास्त्रीय सिद्धांत माना जाता है।

     अन्य वेदों में इस सिद्धांत की कहां तक पुष्टि की गई है ?

     सामवेद के मंत्रों में पुरुष सूक्त सम्मिलित नहीं किया गया, न इसमें वर्ण व्यवस्था की कोई अन्य व्याख्या की है।

     यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं, 'श्वेत' और 'कृष्ण'।

     कृष्ण यजुर्वेद में तीन संहिताएं और मंत्रों का समूह है। ये हैं कठ संहिता, मैत्रायणी संहिता और तैत्तिरीय संहिता ।

     श्वेत यजुर्वेद में मात्र एक संहिता है वाजसनेयी संहिता |

     कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी और कठ संहिताओं में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का कोई संदर्भ नहीं है, न उसमें वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल बताने का कोई प्रयास है।

     कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता और श्वेत यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता में वर्ण-व्यवस्था के संबंध में कुछ संकेत हैं।

     वाजसनेयी संहिता में वर्ण व्यवस्था के आरंभ के संबंध में केवल एक प्रसंग है। दूसरी ओर तैत्तिरीय संहिता में दो प्रसंग हैं। इन दोनों प्रसंगों के संदर्भ में दो बातें उल्लेखनीय हैं। प्रथम यह कि इन दोनों में रंच मात्र भी साम्य नहीं है। वे नितांत भिन्न हैं। दूसरे यह कि एक में तो श्वेत यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता से पूर्णतः साम्यता है। तैत्तिरीय संहिता का मूल पाठ निम्न प्रकार से है जिसे स्वतंत्र व्याख्या कहा जा सकता है-

     "वह (वृात्य) भावावेश से भर उठा तब राजन्य प्रकट हुआ। "

     “जिसके घर यह जाने वाला वृात्य अतिथि रूप में आता है, उसे वह (राजा) स्वयं से श्रेष्ठ जानकर उसका सम्मान करें। ऐसा करके वह राजपद अथवा अपनी सत्ता पर आघात नहीं करता। उससे ब्राह्मण प्रकट हुआ और क्षत्रिय । उन्होंने कहा “हम किस में प्रवेश करें आदि"

     वाजसनेयी संहिता में सम्मिलित व्याख्या जो तैत्तिरीय संहिता¹ से साम्य रखती हैं, इस प्रकार हैं-

     “उसने एक के साथ स्तुति की। प्राणी बने, प्रजापति राजा थे। उन्होंने तीन के साथ स्तुति की, ब्राह्मण की रचना हुई। ब्राह्मणस्पति शासक थे। उन्होंने पांच के साथ स्तुति की, विद्यमान पदार्थ उत्पन्न हुए। ब्राह्मणस्पति शासक थे। उन्होंने सात के साथ स्तुति की, सात ऋषिगण उत्पन्न हुए। धातृ शासक थे। उन्होंने नौ के साथ स्तुति की, पितृ उत्पन्न हुए । अदिति स्वामी थे। उन्होंने ग्यारह के साथ स्तुति की, ऋतुएं उत्पन्न हुई। आर्तव स्वामी थे। उन्होंने तेरह के साथ स्तुति की, मास उत्पन्न हुए। वर्ष राजा था। उन्होंने पन्द्रह के साथ स्तुति की, क्षत्रिय उत्पन्न हुआ । इन्द्र राजा थे। उन्होंने सत्रह के साथ स्तुति की, पशु उत्पन्न हुए। बृहस्पति राजा थे। उन्होंने उन्नीस के साथ स्तुति की, शूद्र और आर्य (वैश्य) उत्पन्न हुए । दिवस और रात्रि शासक थे। उन्होंने इक्कीस के साथ स्तुति की अविभाजित खुरधारी पशु उत्पन्न हुए। वरुण राजा थे। उन्होंने तेईस के साथ स्तुति की, लघु पशु उत्पन्न हुए । पुशान राजा थे। उन्होंने पच्चीस के साथ स्तुति की, वन्य जीव उत्पन्न हुए। वायु राजा थे। (ऋ. वे. 10.90,8) उन्होंने सत्ताईस के साथ स्तुति की धरती और स्वर्ग विलग हुए। वसु, रुद्र और आदित्य उनसे विलग हो गए, वे राजा थे। उन्होंने उन्तीस के साथ स्तुति की, वृक्ष उत्पन्न हुए। सोम राजा थे। उन्होंने इकत्तीस के साथ स्तुति की प्राणी उत्पन्न हुए। मास के पक्ष राजा थे। उन्होंने इकत्तीस के साथ स्तुति की, विद्यमान पदार्थ शांत हो गए । प्रजापति परमेष्ठी राजा थे। "


1. खण्ड, 4. प्रपाठक 3. श्लोक 10


     यहां यह उल्लेनीय है कि न केवल ऋग्वेद और यजुर्वेद में ही असमानता है, बल्कि यजुर्वेद की दो संहिताओं में ही, वर्णों की उत्पत्ति जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विषमता है।

     अब हम अर्थर्ववेद पर आते हैं। इसमें भी दो व्याख्याएं हैं। उसमें पुरुष सूक्त सम्मिलित है। यद्यपि, जिस क्रम में ऋग्वेद के मंत्र हैं, वह वैसा नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अथर्ववेद पुरुष सूक्त से संतुष्ट नहीं है। इसकी अलग व्याख्या भी है। एक व्याख्या निम्नलिखित¹ है:

     “सर्वप्रथम ब्राह्मण उत्पन्न हुआ। उसके दस सिर और दस मुख थे। उसने सर्वप्रथम सोमपान किया, उसने विष को प्रभावहीन किया ।

     “देवता राजन्य से भयभीत थे, जब वह गर्भ में था। उन्होंने उसे बंधन - ग्रस्त कर दिया जब वह गर्भ में था। परिणामस्वरूप, वह राजन्य बंधनयुक्त उत्पन्न हुआ। यदि वह अजन्मा निर्बंध होता तो वह अपने शत्रुओं का वध करता। राजन्य, कोई अन्य जो चाहे कि वह बंधन मुक्त उत्पन्न हो और अपने शत्रुओं का हनन करता रहे तो उसे वे एन्द्र ब्राहस्पत्य आहुतियां दें। राजन्य के लक्षण इन्द्र जैसे हैं और ब्राह्मण बृहस्पति है। ब्राह्मण के माध्यम से ही कोई राजन्य को बंधन मुक्त कर सकता है। स्वर्णबंध, एक उपहार, स्पष्ट रूप से उसे बंधन से मुक्त करता है । "

     एक अन्य व्याख्या, उन व्यक्तियों का उल्लेख करती है, जो मनु की संतति है, उनका निम्नांकित उद्धरण² में उल्लेख है:

     "प्रार्थनाएं और मंत्र पहले इन्द्र की उपासना में उस उत्सव में संकलित हुए जिसे अथर्वन, पिता मनु, और दधीचि ने सुशोभित किया । " हे रुद्र यज्ञ से पिता मनु ने जो सम्पदा अथवा सहायता ग्रहण की, तेरे निर्देश में हमें वही सब प्राप्त हो । "

     “आपके वे पवित्र उपचार, हे मरुत। वे जो बहुत मांगलिक हैं, हे शक्तिशाली देव। वे जो बहुत लाभप्रद हैं, जिनको हमारे पिता मनु ने पसंद किया है, रुद्र के वे वरदान और सहायता, हमें प्राप्त हों।"

     "जो प्राचीन मित्र दैवी शक्ति से सम्पन्न था। पिता मनु ने उसके प्रति देवों की सफलता के प्रवेश द्वार की भांति मंत्र रचे थे। "


1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृष्ठ 21-22
2. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृष्ठ 162-65


     “यज्ञ मनु हैं, हमारे पालक पिता "

     "देवों, तुमने हमें उत्पन्न किया, पोषित किया और हमारे प्रति अनुग्रह किया; हमें पिता मनु के मार्ग से विचलित न करो। "

     "वह (अग्नि) जो मनु की संतति के बीच देवताओं के उद्बोधक स्वरूप निवास करता है, वह इनका भी स्वामी है।"

     “अग्नि, देवताओं सहित और मनु की संतान सहित मंत्रोच्चार से विविध यज्ञ कर रहे हैं, आदि “तुम देवों, वज और ऋभुगण जैसे देवों को प्रसन्न करते हो। मानुष की संतति के बीच शुभ दिन देवताओं के मार्ग से हमारे यज्ञ में आओ ।"

     “मनुष - जन ने यज्ञ में अग्नि उद्बोधक की स्तुति की। "

     “मनुष्यों के स्वामी अग्नि ने जब भी कृतज्ञ मानुष-जन के आवास को प्रदीप्त किया, उसने राक्षस जन को मार भगाया । "

     इस संदर्भ में स्थिति के निरूपण के लिए एक क्षण रुक कर विचार करते हुए यह बात बिल्कुल स्पष्ट होती है कि चार वर्णों की उत्पत्ति के विषय में वेदों में कोई सर्वसम्मति नहीं है। किसी अन्य वेद ने ऋग्वेद की पुष्टि नहीं की है कि ब्राह्मण प्रजापति के मुख से उत्पन्न हुए, क्षत्रिय भुजाओं से वैश्य जंघाओं से और शूद्र पैरों से ।