हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
IV
यह अच्छा रहेगा कि हम रामायण और महाभारत से इस मत की तुलना करें।
रामायण का कथन है कि चारों वर्ण, मनु की संतान हैं, दक्ष की पुत्री और कश्यप¹ भार्या।
“सुनो, मैं तुम्हें बताता हूं। सर्वप्रथम प्रजापतियों ने प्रारंभ किया जो सबसे पूर्व समय में जन्मे थे। सर्वप्रथम कर्दम थे, फिर वोकृत, शेष, समस्रेय, शक्तिमान बहुपुत्र, स्थाणु, मरीचि, अत्रि, प्रबल क्रतु, पुलस्त्य, आंगिरस, प्रचेतस, पुलह, दक्ष, फिर वैवस्वत, अरिष्टनेमी और गौरवमूर्ति कश्यप जो अंतिम थे। दक्ष प्रजापति की साठ कन्याएं बताई जाती हैं। उनमें से अदिति, दिति, दनु, कालिका, ताम्र, क्रोध, मनु और अनलाइन आठ सुन्दर कन्याओं का विवाह कश्यप से हुआ। प्रसन्न होकर कश्यप ने कहा- “तुम मेरे समान पुत्र उत्पन्न करो, तीनों लोकों का पोषण करो। अदिति, दित्ति, दनु, और कालिका तत्पर हो गईं किन्तु अन्य तैयार न हुईं। अदिति से तैंतीस देवता उत्पन्न हुए। आदित्य, वसु, रुद्र और दो अश्विनी पुत्र । कश्यप पत्नी मनु से मनुष्य जन्मे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । ब्राह्मण का जन्म मुख से हुआ, क्षत्रिय का वक्ष से, वैश्य जंघाओं से, शूद्र चरणों से जन्मे । ऐसा वेद कहते हैं । अनला से शुद्ध फलों वाले वृक्ष उत्पन्न हुए।" आश्चर्य! नितात आश्चर्य कि वाल्मीकि ने चार वर्णों की रचना प्रजापति के स्थान पर कश्यप से बताई। स्पष्ट है कि उनका ज्ञान सुनी-सुनाई बातों तक सीमित था। यह स्पष्ट है कि उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि वेद क्या कहते हैं।
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृ. 116-117
अब महाभारत चार स्थानों पर चार भिन्न-भिन्न व्याख्याएं देता है। प्रथम इस प्रकार है:
“महान् ऋषियों की भांति भव्यता से जन्मे प्रचेता के दस पुत्र गुणवान और पवित्र प्रतिष्ठित हुए और उनसे पूर्ण गौरवशाली प्राणी उनके मुख से प्रज्ज्वलित होने वाली अग्नि से स्वाहा हो गए। उनसे दक्ष प्रचेतस जन्मे और विश्व के जनक दक्ष से ये जगत। विरनी के सहवास से मुनि दक्ष को अपने समान एक सहस्र पुत्र पुत्र प्राप्त हुए जिन्हें नारद ने मोक्ष का मार्ग बताया और सांख्य का अनुपम ज्ञान दिया। संतति वृद्धि के मनोरथ से दक्ष प्रजापति ने पचास पुत्रियां उत्पन्न कीं। उनमें से दस धर्म को दे दीं। तेरह कश्यप को, सत्ताइस काल नियंता इन्दु (सोम) को ..... अपनी तेरह में से सर्वश्रेष्ठ पत्नी दक्षयानि से मारीचि पुत्र कश्यप को इन्द्र के पश्चात् अपनी शक्ति में अद्वितीय आदित्य तथा वैवस्वत प्राप्त हुए। वैवस्वत से शक्तिमान पुत्र यम वैवस्वत उत्पन्न हुआ। मार्तण्ड, (सूर्य, वैवस्वत) को बुद्धिमान और वीरपुत्र मनु उत्पन्न हुए और प्रसिद्ध यम उसका (मनु) अनुज प्राप्त हुआ। बुद्धिमान मनु धार्मिक था जिसने एक प्रजाति चलाई। इस प्रकार उससे जन्मे ( परिवार) मनुष्य, मानव जाति कहलाई । हे राजन! उससे ब्राह्मण क्षत्रियों के साथ उत्पन्न हुए। "
यहां प्रतिपादित सिद्धांत ठीक वैसा ही है जैसा कि रामायण में भिन्नता मात्र इतनी है कि महाभारत में मनु को चार वर्णों का प्रणेता कहा गया है और दूसरे, इसमें यह नहीं कहा गया है कि चार वर्ण, मनु के चार अंगों से उत्पन्न हुए।
महाभारत की दूसरी व्याख्या¹ ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के समान है। वह इस प्रकार है:
"राजा ऐसे व्यक्ति को अपना राज पुरोहित नियत करे जो दुष्टता का प्रतिरोधी हो । इस विषय में वे यह प्राचीन कथा सुनाते हैं, जिसमें इला पुत्र मातृस्वन (वायु) और पुरुरवा का संवाद सन्निहित है। पुरुरवा ने कहा: “तुम मुझे बताओ कि कब ब्राह्मण, कब अन्य तीन जातियां उत्पन्न हुईं और कब श्रेष्ठता ( प्रथम की) स्थापित हुई ? मातृस्वन ने उत्तर दिया- " ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ, उसकी भुजाओं से क्षत्रिय, उसकी जंघाओं से वैश्य जबकि इन तीन वर्णों की सेवा हेतु उसके चरणों से चतुर्थ वर्ण शूद्र उत्पन्न हुआ। जन्मते ही ब्राह्मण धर्मतत्व की रक्षार्थ धरती पर भूतजात का स्वामी बन गया। फिर सृष्टा ने पृथ्वी का शासक क्षत्रिय उत्पन्न किया। प्रजा की संतुष्टि को दण्ड धारण हेतु द्वितीय यम उत्पन्न किया और ब्रह्मा का यह आदेश था । इन तीन वर्णों को वैश्य धन-धान्य उपलब्ध कराए और शूद्र सेवा करें।" जब इला पुत्र ने पूछा: "वायु! मुझे बताओ, अपनी धन-सम्पदा सहित यह पृथ्वी किस के अधिकार में है, ब्राह्मण के अथवा क्षत्रिय के?" वायु ने उत्तर दिया, "अपनी ज्येष्ठता के आधार पर पृथ्वी पर विद्यमान समस्त सम्पदा का स्वामी ब्राह्मण है, जो कर्त्तव्य-विधान में पारंगत है, उन्हें यह ज्ञात है। ब्राह्मण जो खाता है, पहनता है, लुटाता है, वह उसी का है। वह सभी जातियों में श्रेष्ठ है। प्रथम जन्मा और सर्वश्रेष्ठ । जिस प्रकार कोई स्त्री अपना पति (पहला) छिन जाने पर अपने देवर, जेठ को दूसरा पति बना लेती है, उसी प्रकार विपत्ति में ब्राह्मण पहला आश्रय है और इसके बाद कोई और " ।
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड ।
महाभारत के शांति पर्व में तीसरी व्याख्या दी गई है : ¹
भृगु ने उत्तर दिया इस प्रकार ब्रह्मा ने पहले अपनी शक्ति से प्रजापतियों के समान भव्य सूर्य और अग्नि को रचा। तब स्वामी ने सत्य, धर्मनिष्ठा, कठोर - भक्ति, सनातन वेद गुणकर्म, और स्वर्ग (प्राप्ति हेतु ) की शुद्धता की सृष्टि की। उसने देवता, दानव, गंधर्व, दैत्य, असुर, महाराग, यक्ष राक्षस, नाग, पिशाच और मानव, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्ण प्राणी रचे । ब्राह्मण का वर्ण गौर, क्षत्रिय का लाल, वैश्य का पीत और शूद्र का काला बनाया। तब भारद्वाज ने प्रतिवाद किया: " यदि हर जाति के चार वर्ण (रंग) उसका परिचायक हैं तो इससे पहचान में भ्रांति होती है। लालसा, क्रोध, भय, लोभ, संताप, कुंठा, भूख, क्लांति, हम सब में समान हैं। तब जाति किस से निर्धारित होती है? स्वेद, मूत्र, मल, श्लेष्मा, पित्त और रक्त सब में समान हैं ( सभी में शारीरिक विकार हैं) तब जाति किस से निर्धारित होती हैं? अवर्णित चल और अचल पदार्थ हैं, इनका वर्ण कैसे निर्धारित होता है " ? भृगु ने उत्तर दिया, "जातियों में कोई अंतर नहीं है। '
शांति पर्व में ही चौथी व्याख्या दी गई है। वह कहती है:
भारद्वाज ने फिर पूछा परम श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि, मुझे बताएं वे क्या गुण हैं कि जिन से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बन जाता है?" भृगु कहते हैं, "जो शुद्ध है, प्रसव तथा अन्य संस्कारों से पवित्र हैं, जिसको वेदों का सम्पूर्ण अध्ययन है, संस्कारों को शुद्धतापूर्वक पूर्णता से अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं, जो चढ़ावे से बचे पदार्थ ग्रहण करते हैं, अपने धर्म-गुरु से सम्बद्ध हैं, सदैव धर्मपरायण हैं और सत्य को समर्पित हैं - - ब्राह्मण कहलाते हैं। उसमें सत्य के दर्शन होते हैं। जिसमें सत्य, उदारता, अनाक्रामकता, उपकारिता, सादगी, धैर्य और कठोर भक्ति परिलक्षित हैं--ब्राह्मण हैं। जो राजपद के कर्त्तव्य का पालन करता है, जिसे वेदाध्ययन का व्यसन है और जो आदान-प्रदान से प्रसन्नता अनुभव करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है। वह जो लगनपूर्वक पशुपालन करता है, जिसको कृषि कार्यों में रुचि है, जो शुद्ध है और वेदों के अध्ययन में पारंगत है- वह वैश्य है। वह जो हर प्रकार के भोजन व्यसनी है, सभी कार्य करता है, जो अस्वच्छ है, जिसने वेदों का परित्याग कर दिया है, जो पवित्र कर्म नहीं करता, परम्परा से शूद्र कहलाता है और यह ( जो मैंने बताया) शूद्र के लक्षण हैं और यह एक ब्राह्मण में नहीं मिलते ( ऐसा ) शूद्र शूद्र ही रहेगा जो ब्राह्मण ( ऐसा करता है) ब्राह्मण नहीं होगा।"
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 139-40
एक स्थान को छोड़कर अन्यत्र महाभारत वर्ण-व्यवस्था की वैदिक उत्पत्ति का समर्थन नहीं करता ।