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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
Book
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III

     वेदों की सत्ता क्या है? हिंदुओं में इसके संबंध में दो भिन्न मान्यताएं हैं। पहली यह कि वेद सनातन हैं। इस मान्यता की विवेचना न कर हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं क ऐसे मत का औचित्य क्या है? यदि हिंदुओं को विश्वास है कि वेद विश्व के प्राचीन रचित ग्रंथ हैं तो इस पर कोई विवाद नहीं कर सकता। परन्तु इस अद्भुत विचार को युक्तिसंगत ठहराने का कोई आधार नहीं है कि ये अनादि हैं। एक बार यह प्रमाणित हो जाने पर कि ऋषि वेदों के सृष्टा हैं तो यह प्रमाणित करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती कि वेदों का आरम्भ उस काल से मेल खाता है, जब ऋषि हुआ करते थे। यह कहने से कि ऋषि वेदों के सृष्टा हैं यह मान्यता अनर्गल है कि वेद सनातन हैं।

vedon ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Dr Babasaheb Ambedkar     इस मान्यता को जीवित रखने के लिए जो तर्क दिए गए हैं वे भी हास्यास्पद ही हैं।

     सर्वप्रथम, यह उल्लेखनीय है कि यह मान्यता निराधार है कि वेदों की रचना परमात्मा ने की है। यह विश्वास नैयायिकों ने जमाया । परन्तु ऐसा लगता है कि पूर्व मीमांसा के प्रणेता जैमिनि के विचारों की हिंदुओं में मान्यता है और वे इस बात के पक्ष में नहीं हैं। मीमांसकों का यह उद्धरण उल्लेखनीय है ।

     “किन्तु (मीमांसक पूछता है) अमूर्त परमेश्वर ने किस प्रकार वेदों को अभिव्यक्त किया? जिसका तालु और उच्चारण का अन्य अंग नहीं है। इस कारण यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसने शब्दों का उच्चारण किया होगा। यह प्रयास ( नैयायिक का उत्तर) मान्य नहीं है। क्योंकि परमेश्वर अमूर्त है फिर भी अपने भक्तों को कृतार्थ करने हेतु वह रूप धारण कर सकता है, इस प्रकार यह तर्क कि वेद पौरुषेय नहीं है खण्डनीय है।

     “मैं अब (मींमासक कहता है) कि इन संदेहों का निराकरण करता हूं कि इस पौरुषेयत्व का क्या अर्थ है, जिसे प्रमाणित करना है। इसका तात्पर्य है, (1) किसी पुरुष द्वारा उत्पत्ति, जैसे हमारे द्वारा वेदों की उत्पत्ति, जब हम इनका दैनिक पाठ करते हैं अथवा (2) इसकी अभिव्यक्ति की दृष्टि से क्या यह कोई व्यवस्था है, जो ज्ञान अन्य साक्ष्यों से ग्राह्य है, जैसे कि हमने स्वयं ग्रंथों की रचना की है। यदि पहले अर्थ को ग्रहण किया जाए तो कोई विवाद नहीं होगा। यदि दूसरे भाव को ग्रहण किया जाए तो मेरा प्रश्न है कि क्या इस कारण वेदों को प्रामाणिक माना जाए कि हमें इनसे आभास होता है अथवा (क) इस कारण कि यह दैवी वाक्य है। अथवा (ख) यह अगम ज्ञान है। प्रथम विकल्प (क), कि वेदों की प्रामाणिकता इसलिए है कि यह व्याख्या मात्र है यदि मालतीमाधव अथवा अन्य निरपेक्ष रचनाओं के कथन को देखा जाए तो यह सही नहीं हो सकता क्योंकि यह सिद्धांत निरापद नहीं । यहीं दूसरी ओर आप कहते हैं। (ख) वेदों की सामग्री अन्य प्रामाणिक ग्रंथों से भिन्न है, इससे भी दार्शनिक सहमत नहीं होंगे क्योंकि वेद वाक्य, वह वाक्य है जिसे अन्य साक्ष्यों से प्रमाणित नहीं किया जा सकता। अब यदि यह स्थापित किया जा सके कि वेदवाक्य मात्र उसी को प्रमाणित करता है, जो अन्य साक्ष्यों से प्रमाणिक है तो हम उसी दलदल में फंस जाएंगे, जैसे कोई व्यक्ति कहे कि उसकी माता एक बंध्या नारी थी । और यदि हम यह स्वीकार कर लें कि परमेश्वर ने कोई स्वरूप धारण किया होगा तो यह मान्य नहीं होगा क्योंकि बिना किसी तत्व के उन्होंने ऐसा कुछ व्यक्त किया हो, जो अतीन्द्रिय हो। यह संभव नहीं, वह भी जब तक कोई देशकाल परिस्थिति न हो। न ही यह सोचा जा सकता है कि उनके नेत्र तथा दूसरी इन्द्रियों में ऐसे ज्ञानप्रसार की कोई शक्ति थी। पुरुष केवल वही जान सकता है जो उसने साक्षात् देखा है।

     किसी सर्वज्ञ रचयिता की कल्पना से असहमत यही गुरु (प्रभाकर) ने कहा है । " जब किसी सर्वज्ञ को चुनौती दें जिसने किसी तत्व के संपूर्ण रूप को देखा हो तो वह कल्पना बहुत ही धुंधली अथवा अति सूक्ष्म होगी क्योंकि कोई भी इन्द्रिय अपने निश्चित धर्म से विरत नहीं हो सकती, जैसे श्रवणेद्रिय किसी स्वरूप को देख नहीं सकती। इस प्रकार वेदों की सत्ता किसी इहलौकिक ज्ञान से संपन्न नहीं है जो किसी संपूर्ण अमूर्त अरूप देवता से प्राप्त हुआ हो । "

     नैयायिकों के मत को निरस्त करने हेतु जैमिनि ने उपरोक्त तर्क प्रस्तुत किए हैं। तदुपरांत जैमिनि पूर्व मीमांसा में सकारात्मक तर्क देते हैं कि वे किसी भी प्रकार ब्रह्म वाक्य नहीं है किन्तु उससे भी श्रेष्ठ हैं। उनका कथनः

     "परवर्ती सूक्तियों में उद्घोषित किया गया है कि ध्वनि का संयोजन और उसका अर्थ सनातन है। वह चाहते हैं कि प्रमाणित करें कि यह (संयोजन) की सनातनता शब्द की सनातनता अथवा स्वर पर निर्भर है, हम प्रश्न के प्रथमांग से आरंभ करते हैं अर्थात् उस सिद्धांत से कि ध्वनि सनातन नहीं है । "

     “कतिपय अर्थात् नैयायिक कहते हैं कि ध्वनि एक रचना है क्योंकि हम जानते हैं कि यह प्रयासोत्पन्न है, यदि यह सनातन होती तो ऐसा न होता।"

     "कि अपने संक्रमण स्वभाव के कारण यह सनातन नहीं है अर्थात् यह एक क्षण में ही विलीन हो जाती है"। क्योंकि इसके संबंध में हम क्रिया को 'निकालना' कहते हैं अथवा हम ध्वनि निकालते है।

     "क्योंकि विभिन्न व्यक्तियों को इसकी अनुभूति तत्काल होती है और परिणामतः श्रवणेन्द्रिय के तत्काल सम्पर्क में आती है दूरस्थ और निकटस्थ । यदि यह सनातन और एकमेव होती तो ऐसा न होता । "

     "क्योंकि ध्वनि के मूल और संशोधित दो रूप होते हैं "दधि अत्र" और " दधी अत्र" के रूप में प्रस्तार के नियम से मूल ध्वनि ह्रस्व 'इ' दीर्घ 'ई' में बदल जाती है। इस प्रकार जिस तत्व में परिवर्तन हो जाता है, वह सनातन नहीं है । " क्योंकि यदि अधिक संख्या में व्यक्ति समवेत ध्वनि करते हैं तो उनका विस्तार हो जाता है। फलतः मीमांसकों का सिद्धांत तथ्यहीन हो जाता है। जो कहते हैं कि ध्वनि मानव - प्रयत्न से प्रकट ही की जाती है, उत्पन्न नहीं की जाती क्योंकि सहस्रों वक्ता भी उसके अर्थ में विस्तार नहीं कर सकते, उसके स्वर का ही विस्तार करते हैं। जैसे एक सहस्र दीपक भी एक घड़े के आकार का विस्तार नहीं कर सकते।"

     मीमांसकों के इस सिद्धांत के विरुद्ध, इन आपत्तियों का निम्न सूत्रों के द्वारा उत्तर दिया है कि ध्वनि प्रकट की जाती है और उसके उच्चारण उसे उत्पन्न नहीं कर सकते:

     “परंतु दोनों सिद्धांतों के अनुसार यथा जो स्वीकार करता है कि ध्वनि की उत्पत्ति होती है और दूसरे के अनुसार जो कहते है कि वह मात्र प्रकट की जाती है, दोनों के अनुसार वह क्षणिक है। परन्तु इन दोनों मतों के अनुसार अभिव्यक्ति का सिद्धांत अगले मंत्र से प्रकट है, जो यथार्थ है । " काल विशेष में सनातन ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती है। उसका कारण है कि कर्ता और कर्म का सम्पर्क नहीं बन पाता। ध्वनि शाश्वत है। उदाहरणार्थ - क्योंकि हम एक स्वर "क" से अवगत हैं जो हमें प्रायः सुनाई पड़ता है क्योंकि यह सहज प्रक्रिया है तो हमें उसकी सहज कल्पना होती है। नीरवता में जब किसी वक्ता के मुख से वायु का संयोजन और वियोजन होता है तो उससे वातावरण तरंगित होता है और इस प्रकार ध्वनि का आभास होता है जो सदैव विद्यमान रहती है। चाहे उसका आभास न भी होता हो उसके संचरण पर आपत्ति का यह उत्तर है।

     "ध्वनि करना" का अर्थ है एक क्रिया अथवा "उच्चारण "। जैसे सूर्य का दर्शन एक साथ अनेक व्यक्ति करते हैं, वैसे ही ध्वनि भी एक साथ अनेक व्यक्तियों द्वारा सुनी जाती है। ध्वनि सूर्य की भांति सर्वव्यापी है । यह कोई सूक्ष्म तत्व नहीं है। इसलिए सभी को समान रूप से ग्राह्य है चाहे कोई निकटस्थ हो अथवा दूरस्थ । "

     "सूत्र 10 में वर्णित है कि "इ" स्वर "ई" में परिवर्तित हो जाता है। वह “इ” का रूपांतरण नहीं है बल्कि "ई" एक भिन्न स्वर है। परिणाम निकलता है कि ध्वनि का रूपांतरण नहीं होता। "

     "जब कई व्यक्ति समवेत स्वर में बोलते हैं तो कोलाहल ही बढ़ता है, स्वर वही रहता है। कोलाहल का अर्थ है भिन्न-भिन्न दिशाओं से वायु के संयोजन - वियोजन का एक साथ कानों में प्रवेश इसी कारण उसका विस्तार होता है। "

     "ध्वनि सनातन होनी चाहिए क्योंकि वह अन्य लोगों तक अर्थ प्रेषित करती है। यदि वह सनातन न होती तो जब तक श्रोता उसका भाव जानता, तब तक वह उपस्थित ही न रहती और इस प्रकार श्रोता भाव-ग्रहण करने से वंचित रह जाता क्योंकि वह उपस्थित ही नहीं रहती।"

     "ध्वनि सनातन है क्योंकि वह सदैव सही और समान होती है और अनेक व्यक्ति उसे एक साथ समान रूप से सुनते हैं और यह नहीं माना जा सकता कि वे सभी गलती करें।"

     “यदि 'गौ' (गाय) शब्द को 10 बार दोहराएं तो श्रोता कहेंगे कि दस बार “गौ” कहा गया है। वे यह नहीं कहेंगे कि "गौ" की ध्वनि के दस शब्द कहे गए हैं। इस प्रकार यह ध्वनि की शाश्वतता का एक और प्रमाण है । "

     "ध्वनि सनातन है, क्योंकि हमारे पास यह मानने के लिए कोई आधार नहीं है कि इसका क्षय हो जाता है जैसा कि सूत्र 20 में।"

     “परन्तु यह कहा जा सकता है कि ध्वनि वायु का रूपांतरण है क्योंकि इसका उद्गम वायु का संयोजन है क्योंकि शिक्षा (वेदांग) का कथन है कि ध्वनि के अनुरूप हवा निकलती है और इस प्रकार यह वायु से उत्पन्न होती है। इसलिए सनातन नहीं हो सकती । "

     इस आपत्ति का निराकरण सूत्र 22 में किया गया है:

     “ध्वनि वायु का रूपांतरण नहीं है। यदि ऐसा होता तो श्रवणेंद्रिय के समक्ष कोई संगत तत्व न होता । "

     इस न्यायबद्ध सार को देखते हुए कि " ध्वनि सनातन है और वेद के शब्द भी ध्वनि हैं, इस कारण वेद भी सनातन हुए" हम तर्कों की कीचड़ में फंसना नहीं चाहते। आश्चर्य यह है कि ब्राह्मणों ने वेदों के सनातन होने का यह सिद्धांत क्योंकर प्रचारित किया? अपने सिद्धांत के समर्थन में उन्होंने ऐसे अनाप - शनाप तर्क क्यों गढ़ डाले? ब्राह्मणों ने यह स्वीकार क्यों नहीं कर लिया कि वेद ब्रह्मवाक्य नहीं है ?