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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
Book
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     वेदों की सत्ता के विषय में दूसरी मान्यता यह है कि वे मात्र पावन और पवित्र ही नहीं हैं बल्कि वे संशय-रहित हैं।

     यह समझना कठिन है कि ब्राह्मणों ने वेदों को संशय-रहित बताने के प्रयास क्यों किए ?

     नियमों के संदर्भ में वेदों में कोई अटल भाव नहीं है। वेदों में धर्म कौ नैतिक भावना प्रदान नहीं की। वेदों के तीन अंशों को मुश्किल से ही नैतिक परिधि में ढाला जा सकता है।

     पहला यम-यमी संवाद है जो भाई-बहन थे :

vedon ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Book by dr Bhimrao Ramji Ambedkar     “यमी ने यम से कहा कि मैं तुझे प्रणय- निमंत्रण देती हूं। हम अविरल पारावार से निकल कर इस भूखंड के सूनेपन में अकेले हैं, तू मुझे अपना प्रणय सुख दे ।" यम को बहन से सहवास करने की इच्छा नहीं थी, उसने कहा, "तेरा प्रिय तुझसे प्रणय का इच्छुक नहीं है क्योंकि हम दोनों सहोदर हैं।" तब यमी बोली, "सभी अनश्वर संसार का आनन्द लूटते हैं। नश्वरों को यह सुख उपलब्ध नहीं होता । तू मुझसे वैसे ही संसर्ग कर जैसे विधाता ने अपनी पुत्री से किया था। तू मेरी देह से वही आनन्द लूट।" यम ने पलटकर उत्तर दिया “जो अतीत में हो चुका है, हमें वैसा नहीं करना चाहिए क्योंकि हम सत्यवादी हैं। असत्य कैसे कहेंगे?" यमी आतुर थी। वह बोली, "जो परम स्वरूप है, उसी देव ने गर्भ में ही हमारी रचना मिथुन- युगल के रूप में की है, भला उसी इच्छा के विपरीत कोई जा सकता है ! धरती और आकाश हमारा मिलन देखने को आतुर हैं।" यम सहमत नहीं हुआ। आरम्भ की बात कौन जानता है और कौन बता ही सकता है? परन्तु यमी का मन नहीं मान रहा था। उसने फिर कहा, “मेरी इच्छा तुमसे सहवास की हो रही है। तू उसे पूरा कर मैं अपने प्रियतम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करती हूं। हमारा मिलन होना ही चाहिए, वैसे ही जैसे रथ के दो पहिए होते हैं। "यम ने यमी को समझाया" परमात्मा ने धरती पर अनेक जीव बनाए हैं, तू मेरे सिवाय किसी को भी अपना ले और उसी प्रकार चल जैसे रथ के दो पहिए चलते हैं। फिर यम ने यह भी समझाया कि अब वह समय आ गया है। कि बहन उसी को पति चुनेगी, जो उसका भाई नहीं होगा। इसलिए हे शुभे, किसी अन्य का हाथ थाम और आनन्द ले।" यमी ने कातर होकर कहा, "क्या वह भी कोई भाई है जिसकी बहन को कोई नाथ न हो। क्या कोई ऐसी बहन होगी जसे ऐसे दुर्भाग्य का सामना करना पड़े। मेरी उत्कट इच्छा है तू उसे पूरा कर आ और मुझमें एकाकार हो जा।'' यम अटल रहा और दो टूक उत्तर दिया, "मैं तुझसे कभी सहवास नहीं करूंगा। जो बहन से संसर्ग करता है, वह पापी कहलाता है। मेरे सिवाय किसी अन्य से देह - सुख प्राप्त कर तेरे भाई का ऐसा करने का कोई विचार नहीं है।" यमी ने अंत में दुखी मन से कहा, "यम, तू बड़ा निर्बल हृदय है। तू मेरे मन की, मेरे मानस की स्थिति नहीं समझता । क्या तुझसे कोई नारी ऐसे लपटेगी, जैसे घोड़े से तंग लिपटता है, अथवा जैसे कसी वृक्ष से कोई लता लिपट जाती है।" "यम ने अंत में कहा, तू भी किसी अन्य पुरुष के साथ वैसे ही लिपट जा जैसे वृक्ष से लता लिपट जाती है। उसका प्रणय प्राप्त कर, वह भी तुझसे वैसे ही मिलन को आतुर हो, तक तू अतीव सुख पा।" यम ने उसका और भी शुभ चाहा, उसने कहा:

     "राक्षस हंता अग्नि हमारी प्रार्थना स्वीकार करे, दुरात्मा से त्राण दे, जो व्याधि के रूप में तेरे भ्रूण को आक्रांत कर सके, जो अंतः काष्ठ की भांति तेरे गर्भाशय को निरस्त करे। "

     "अग्नि देव हमारी अर्चना को स्वीकार करें, नरभक्षियों को नष्ट करें जो व्याधि के रूप में तेरे गर्भाशय पर दुष्प्रभाव डालते हैं, जो अंतःकाष्ठ की भांति तेरी कोख को रीती कर सकते है। "

     "दुरात्मा से हमें त्राण दे, जो पुंसत्व का हरण करते हैं। गर्भ ठहरते ही उसे विस्थापित करते हैं, जो नवजात शिशु का हनन करना चाहते हैं । "

     "हमें दुरात्मा से त्राण मिले जो तेरी जंघा को विलग करता है, जो पति-पत्नी के बीच बाधा बनता है, जो तेरी कोख में प्रविष्ट होता है। बीज - हरण करता है। हमें उस दुरात्मा से त्राण मिले, जो भ्राता, अथवा पति इतर प्रियतम के रूप में तुझ तक पहुंचता है और गर्भपात करना चाहता है । "

     "हमें दुरात्मा से त्राण मिले जो तुझे नींद या अंधेरे में छल लेता है, तुझ तक आकर गर्भपात कर देता है।"

     वेदों में दो चीजें हैं, पहली यह कि उनमें ऋषियों की आशाएं और आकांक्षाएं समाविष्ट जैसा कि म्यूर ने कहा है:

     "इस पूरी रचना का स्वरूप और इनसे प्राप्त प्रमाणों के अनुसार जिन परिस्थितियों में ये रचे गए, उनसे पता चलता है कि आदि कवियों के सहज रूप में व्यक्तिगत अभिलाषा और मनोभावों का प्रकटीकरण था जिन्होंने सर्वप्रथम इन्हें गाया था। इनमें आर्य ऋषियों ने अपने प्राचीन देवताओं की तरह-तरह से स्तुति गाई और उन्हें संतुष्ट होने का आह्वान किया। ऐसे अनेक वरदान मांगे, जिनकी मानव मात्र को लालसा होती है, जैसे स्वास्थ्य, सम्पदा, चिरायु, पशुधन, संतति, शत्रु-विजय, पाप- - मुक्ति और शायद स्वर्ग सुख भी।”

     यही दृष्टिकोण निरुक्त के लेखक यास्क का भी है, जो कहते हैं:

     ("पूर्वोक्त खंड में चार प्रकार की ऋचाएं हैं) (क) जो देवता की अनुपस्थिति में संबोधित हैं, (ख) जिसमें उसको समक्ष जानकर संबोधन किया गया है, (ग) जिसमें आराधक को उपस्थित और आराध्य को अनुपस्थित माना गया है। वे अत्यधिक हैं। (घ) जबकि, जो स्वगत हैं, वे विरले ही हैं। ऐसा भी हुआ है कि देवता की प्रशंसा बिना वरदान की कामना के लिए की गई है। जैसे कि मंत्र (ऋग्वेद) 1.32 " मैं इन्द्र के शौर्य का वर्णन करता हूं।" आदि। फिर बिना स्तुति किए वरदान की कामना की गई है, जैसे “मैं अपने चक्षुओं से अच्छा देखूं, मेरा मुख कांतिमान हो और कानों से भली भांति सुनूं।” ऐसा अथर्ववेद (यजुर) और बलि सूत्रों में बार-बार कहा गया है। फिर इसमें हम शपथ और शाप भी पाते हैं। (ऋग्वेद 7.104,15) "यदि मैं यातुधान हूं तो आज ही मैं मर जाऊं" आदि। फिर हम पाते हैं कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों को दर्शाने वाले मंत्र (ऋग्वेद दस, 1292) तब मृत्यु नहीं थी न अमरत्व आदि । कुछ परिस्थितियों में विलाप भी उपलब्ध है, जैसे कि मंत्र (ऋग्वेद दस, 95,14) “रूपवान देवता प्रस्थान करेगा और अब कभी नहीं लौटेगा आदि। कहीं लांछन और प्रशंसा है, जैसा कि (ऋग्वेद, दस, 1176) " वह व्यक्ति जो अकेला खाता, अकेला पाप-कर्म करता है आदि" । द्यूतक्रीड़ा के विषय में मंत्र है (ऋग्वेद 10, 34, 13 ) जिसमें द्यूतक्रीड़ा की निंदा की गई है और कृषि कार्य की प्रशंसा । इस प्रकार जिन उद्देश्यों से ऋचाओं की सृष्टि हुई, वे विविध प्रकार की हैं। "


सूक्त 12 ( 155वां  )


     देव, राजयक्षमा का उपचार है: ऋषि है कश्यपपुत्र विव्रीहन; छंद अनुष्टुप है।

     1. मैं तेरी आंखों, तेरे शीर्ष, तेरी नासिका, तेरे कर्ण, तेरी ठोड़ी, तेरी मानस, तेरी जिव्हा का रोगहरण करता हूँ।

     2. मैं तेरी ग्रीवा, तेरी शिराओं, तेरी अस्थियों, तेरे संधिक्षेत्रों, तेरे बाहुओं, तेरे स्कंधों और तेरी कलाइयों का रोगहरण करता हूँ।

     3. मैं तेरी अंतड़ियों, तेरी गुदा, तेरे उदर, तेरे वृषक, तेरे यकृत और तेरे अन्य अंगों का रोगहरण करता हूँ।

     4. मैं तेरी जंघाओं, तेरे घुटनों, तेरी एड़ियों, तेरे पैर के पंजों, तेरी कटि, तेरे नितम्बों और तेरे गुप्तांगों का रोगहरण करता हूँ।

     5. मैं तेरे मूत्रमार्ग, तेरे मूत्राशय, तेरे बालों, तेरे नखों और तेरी पूरी देह का रोगहरण करता हूँ।

     6. मैं तेरे प्रत्येक अंग, प्रत्येक बाल, प्रत्येक जोड़, जहां भी वह उत्पन्न हो, तेरी पूरी देह का रोगहरण करता हूँ।

     जैसा कि प्रोफेसर विल्सन समझते हैं, ऋग्वेद ( सबसे विशाल ग्रंथ ) में छलनी से मुश्किल से कोई ऐसा उदाहरण मिलेगा जिससे प्रकट होता हो कि उसमें कोई सैद्धांतिक अथवा दार्शनिक विवेचन है। उसमें विभिन्न परवर्ती सिद्धांतों का संकेत ही नहीं, उसमें पुनर्जन्म की ओर भी कोई इंगित नहीं है, न इससे संबद्ध किसी अन्य सिद्धांत का, न ही विश्व की बार-बार सृष्टि का । आर्यों के सामाजिक जीवन पर प्रकाश डालने के लिए वेदों में पर्याप्त सामग्री मिलती है। इसके लिए वे उपयोगी हो सकते हैं। यह आदिम जीवन का चित्रण है। उनमें प्रगति का कोई प्रसंग नहीं, उनमें दोष अधिकांश और गुण न्यूनतम है।

     वेदों के सार और विषयवस्तु को देखते हुए यह आश्चर्यजनक है कि ब्राह्मण क्योंकर इस अंधविश्वास को संशय-रहित मानते हैं।

     यदि मंत्र - सृष्टा ऋषि स्वयं दावा करते तो संशय-रहित होने के सिद्धांत का कोई औचित्य ठहराया जा सकता था । किन्तु यह स्पष्ट है कि ऋषियों ने ऐसा आडम्बर नहीं रचा। इसके विपरीत उन्होंने कई बार जिज्ञासा- स्वरूप अपनी अज्ञता को स्वीकार किया है। ऋग्वेद के निम्नांकित मंत्र उनकी भावना के प्रतीक हैं:

     'अज्ञ हूं, मेरे मानस (ज्ञान) से परे हैं, मैं देवताओं का अज्ञात आवास जानना चाहता हूं, ऋषि ने अपना जनेऊ बछड़े के खुर तक खींचा।" [6. अज्ञ (हूं) मैं उन ऋषियों से पूछता हूं जिन्हें इस विषय में ज्ञान है, अनजान (मैं पूछता हूं कि मैं जानूं कि अजन्मों के रूप में क्या है जो इन छह लोकों को कैसे सँभालते हैं? ] 37. मुझे पता नहीं कि मैं ऐसा हूं, मुझे आश्चर्य होता है कि मेरा ज्ञान सीमित है, जब बलि से प्राप्त प्रथम पुत्र (सत्य) मुझे प्राप्त हुआ, तब मैं उस शब्द का आनन्द लेता हूं।”

     "वन क्या थे, वृक्ष क्या थे, उन्होंने जिससे स्वर्ग और पृथ्वी बनाई, जो अब तक अक्षय विद्यमान हैं, कितने दिन, कितने प्रातः बीत चुके हैं?"

     "इन दोनों स्वर्ग और धरा में से कौन पहला है? कौन अंतिम है? ये कैसे उत्पन्न हुए? हे ऋषि, कौन जानता है?"

     “कितनी अग्नियां हैं? कितने सूर्य हैं? कितने सवेरे हैं? कितने जल हैं? पिता, मैं तुमसे उपहास नहीं कर रहा हूं। मैं ऋषि सचमुच पूछ रहा हूं जिससे मैं जान सकूं।" 5. “वहां किरणें तिर्यक फैलती हैं, यह नीची हैं अथवा ऊंची? वहां जनन शक्ति थी और महान शक्तियां थीं प्रयत्न स्वाध्याय नीचे है या ऊपर 6. कौन जानता है यह किसने बनाया है? यह सृष्टि कब हुई ? कहां से आई? परमात्मा इस ब्रह्मांड की सृष्टि के पश्चात् जन्मा और कौन जानता है यह कब रची गई ? क्या किसी ने इसकी रचना की? अथवा नहीं? जो सर्वोच्च स्वर्ग में रहता है, उसने यह ब्रह्मांड रचा। वह सचमुच जानता है अथवा नहीं?"

     इस अमोघता या संशयरहित सिद्धांत के बारे में कुछ अन्य बिंदु भी हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है।