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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
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II

     वेदों का रचयिता कौन है? हिंदुओं का विश्वास है कि वेद दैवी रचना है। तकनीकी शब्दावली में वेद अपौरुषेय हैं, अर्थात् मानवेंतर हैं।

vedon ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     इस विश्वास का साक्ष्य क्या है? प्राचीन संस्कृत साहित्य में एक रचना है अनुक्रमणी । वैदिक साहित्य के विभिन्न अंगों का इसमें व्यवस्थित संकेत हैं। प्रत्येक वेद की एक अनुक्रमणी है। कहीं-कहीं एक से अधिक भी हैं। ऋग्वेद की सात अनुक्रमणी उपलब्ध हैं। इनमें से पांच शौनक की, एक कात्यायन की और एक किसी अज्ञात लेखक की तैयार की हुई है। यजुर्वेद की तीन हैं। इसकी तीन शाखाओं में से प्रत्येक की एक है। ये हैं, आत्रेयी, चारण्या और मध्यांदिन । सामवेद की दो अनुक्रमणी हैं। एक का नाम आर्शेय ब्राह्मण है और एक का नाम परिशिष्ट है। अथर्ववेद की एक अनुक्रमणी है। इसका नाम बृहत सर्वानुक्रमणी है।

     प्रो. मैक्समूलर के अनुसार सबसे पूर्ण अनुक्रमणी कात्यायन की ऋग्वेद के लिए सर्वानुक्रमणी है।

     इसकी महत्ता इस कारण है कि 1. इसमें प्रत्येक मंत्र का प्रथम शब्द दिया है, 2. मंत्रों की संख्या है, 3. संकलनकर्ता ऋषि, उसकी परम्परा का नाम, 4. देवता का नाम और 5. प्रत्येक छंद का नाम दिया है। सर्वानुक्रमणी के संदर्भ से यह आभास मिलता है कि विभिन्न ऋषियों ने मंत्रों की रचना की और उनका सम्पूर्ण संकलन ऋग्वेद बना। ऋग्वेद की अनुक्रमणी के अनुसार यह साक्ष्य मिलता है कि यह वेद पौरुषेय है। अन्य वेदों के विषय में भी यही निष्कर्ष हो सकता है।

     अनुक्रमणी यथार्थ है। यह ऋग्वेद के मंत्रों से पता चलता है जिसमें ऋषि अपने को वेदों का संयोजक मानते हैं। कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:

     "कण्वों ने तुम्हारे लिए प्रार्थना की, उनकी स्तुति सुनो "

     “हे इन्द्र! अश्वों के सारथी अपने प्रभावोत्पादकता हेतु गौतम का मंत्र सुनो "

     "तेरे तेजवर्धनार्थ हे ऐश्वर्यवान अश्विन ! मानस द्वारा प्रभावोत्पादक मंत्रों की रचना की गई है। "

     “हे अश्विन! यह सार्थक उपासना मंत्र तेरे लिए गृत्समद ने उच्चारा है।"

     "हे इन्द्र ! तू प्राचीन है, जो अश्वों को जोतता है, तेरे लिए गौतम के वंशज नोधाओं ने नया मंत्र रचा है। "

     “सो हे पुरोधा! प्रश्रय हेतु गृत्समद ने मंत्र रचा है, जैसे मनुष्य निर्माण करता है।"

     "ऋषियों ने इन्द्र के लिए एक प्रभावोत्पादक रचना की है और प्रार्थना की है। "

     हे अग्नि ! यह मंत्र तेरे लिए रचा है अपनी गउओं और अश्वों का सुख भोग | "

     “हमारे पता इन्द्र के मित्र अयाश्य ने सप्त शीर्ष पवित्र सत्यज इस चौथे महान मंत्र का आह्वान किया है। "

     “हम रहुगणों ने मधुभाषी अग्नि के लिए मंत्रोच्चार किया है। उसका गुणगान करते हैं।"

     "सो आदित्यो, अदितयों और सत्ता सम्पन्न गण प्लाति पुत्र ने तुम्हारी स्तुति की है। गया ने स्वर्गीय देवों की प्रशस्ति गाई है। "

     “इसी को वे ऋषि पुरोहित यज्ञकर्ता कहते हैं, स्तुति गायक, मंत्रोच्चारक कहते हैं। वही (अग्नि के ) तीन शरीरों को जानता है। वही वरदानों की पूर्ति करने वाला प्रमुख है।"

     अनुक्रमणिकाओं के अतिरिक्त और भी साक्ष्य हैं, जिनसे पता चलता है कि वेद अपौरुषेय नहीं हैं। ऋषि वेदों को मानवकृत और ऐतिहासिक रचना मानते हैं। ऋग्वेद के मंत्र पूर्ववर्ती और तत्कालीन मंत्रों के बीच भेद करते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं: "

     अग्नि जिसकी पूर्ववर्ती और साथ ही वर्तमान ऋषि भी स्तुति करते हैं, देवों को इधर आमंत्रित करेगी।"

     "पूर्ववर्ती ऋषि ने संकटमोचन हेतु तेरा आह्वान किया । "

     "मुझ वर्तमान ऋषि की ऋचाएं सुनो, इस वर्तमान (ऋषि) की । "

     “इन्द्र! तू पूर्ववर्ती ऋषियों के लिए एक आह्लाद था, जिन्होंने तेरी अर्चना की।

     जैसे पिपासु के लिए जल । इस मंत्र द्वारा मैं तेरा पुनः पुनः आह्वान करता हूं।"

     "पूर्ववर्ती ऋषयों, देदीप्यमान मुनियों ने बृहस्पति के सम्मुख आह्लादपूर्ण स्वर में प्रस्तुत किया।”

     " हे माधवन किसी पूर्ववर्ती या परवर्ती पुरुष आवा वर्तमान पुरुष में इतना पराक्रम नहीं।"

     "क्योंकि ( इन्द्र के) पूर्ववर्ती आराधक हम हो सकते हैं, वे निष्कलंक, अप्राप्य और अनाहूत थे।"

     "हे शक्तिमान देव! इस हेतु लोग तेरे आराधक हैं, जैसे कि पूर्ववर्ती मध्य युगीन और परवर्ती तेरे मित्र थे और हे परम आहूत, सभी वर्तमान वय वालों की सोच”

     "इन्द्र के लिए हमारे पूर्व पिता सात नवगव ऋषि अपने मंत्रों में भोजन की याचना करते हैं।”

     "हमारे नवीनतम मंत्र से गौरवान्वित हो, क्या आप हमें सम्पदा और संतत सहित भोजन देंगे?"

     ऋग्वेद के गहन अध्ययन से पता चलेगा कि उसके पुराने और नए मंत्रों के बीच अंतर है। उनमें से कुछ निम्न प्रकार है:

     “हमारे नवीनतम मंत्र से गौरवान्वित हो, तुम हमें सम्पदा और संतति सहित भोजन प्रदान करो। "

     " हे अग्नि ! तूने देवताओं के मध्य हमारी नवीनतम मंत्र आहुति की घोषणा की थी । "

     "हमारे नवीन मंत्रों से तेरा वेग बढ़ेगा। नगर विध्वंसक पुरंदर हमें प्राणवान आशीर्वाद दें। "

     “शक्ति पुत्र अग्नि को मैं एक नवीन ऊर्जावान मंत्र अर्पित करता हूं जो भाव - वाणी के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। "

     “जो नवीन अभिव्यक्ति अभी प्रस्फुटित हुई है, उसके द्वारा मैं शक्तिमान संरक्षक को मानस रचना प्रदान करता हूं।"

     "हमारी सहायता हेतु गर्जन करने वाले पुंगव नया मंत्र तुझे उद्बोधित करे।”

     “मैं पूर्वजों की भांति नवीन मंत्र द्वारा तुझे उत्प्रेरित करना चाहता हूं।"

     “तेरी स्तुति में जो नए मंत्र रचे हैं, उनसे तू संतुष्ट हो।"

     "हे सोभारी, इन युवा शक्तिमान देदीप्यमान, और बुद्धिमान देवों के लिए नए मंत्रों का उच्चारण कर ।"

     "गर्जन करने वाले वृत्रहंता इन्द्र ! हम अनेक ने तेरे लिए कई मंत्र रचे हैं, जो सर्वथा नवीन हैं। "

     “मैं इस प्राचीन देव को सम्बोधित करूंगा, मेरी नई स्तुति, जिसकी उसे इच्छा है उसे वह सुने।"

     "हम अश्वों, पशुधन और सम्पदा की कामना से तेरा आह्वान करते हैं। "

     इतने साक्ष्य प्रस्तुत करने पर यह सिद्ध होता है कि वेदों की रचना मनुष्य ने की है जबकि ब्राह्मणें ने कंठशक्त से यह प्रचारित किया कि वेद मानव-रचित नहीं हैं जो एक पहेली है। ब्राह्मणों द्वारा यह प्रचार किस उद्देश्य से किया गया ?