हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
परिशिष्ट - 1
वेदों की पहेलियां
वेद हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ हैं। उनके संबंध में अनेक प्रश्न उठते हैं। उनकी उत्पत्ति कहां से हुई? उनका सृष्टा कौन है? उनकी सार्वभौमिकता क्या है ? ये कुछ प्रश्न हैं।
हम पहले प्रश्न से आरम्भ करते हैं। हिंदुओं के अनुसार, वे सनातन हैं जिसका अर्थ है, वे अनादि अनंत है, जब कि अथर्ववेद से यह कथन मेल नहीं खाता है। फिर इसका कोई औचित्य नहीं। अथर्ववेद कहता है : ¹
“काल से ऋक् ऋचाएं प्रस्फुटित हुई और यजु काल से उपजा । " किन्तु और भी विचार उपलब्ध हैं जो इससे बिलकुल भिन्न हैं।
अथर्ववेद से लेकर यह ध्यान देने योग्य है कि वेद में इस विषय पर दो अन्य प्रसंग हैं। इनमें प्रथम बहुत विवेकपूर्ण नहीं है। वह यह है :²
"बता वह स्कंभ कौन है? जो आदि ऋषियों, ऋक, साम यजु, पृथ्वी और ऋषियों का पालक है ..... 201 बता वह स्कंभ कौन है जिससे ऋक (ऋचाएं) प्रस्फुटित हुईं, जहां से वे यजुस में समाहित हुए, जिससे साम मंत्र उत्पन्न हुए अथर्वन और आंगिरस की वाणी क्या है?"
अथर्ववेद में जो दूसरा भाष्य आया है, उसके अनुसार वेद इन्द्र³ से प्रस्फुटित हुए।
ऋग्वेद का भाष्य पुरुष सूक्त में उपलब्ध है। इसके अनुसार एक विराट यज्ञ हुआ जिसमें एक रहस्यमय जीव "पुरुष" की बलि चढ़ाई गई। उस "पुरुष" की बलि से तीन वेद ऋक्, साम और यजु का आविर्भाव हुआ।
1. अथर्ववेद, 19.54.3
2. म्यूर द्वारा संस्कृत टैक्स्ट में उद्धृत, भाग 3, पृ. 3
3. वही।
यह सामग्री लेखक की प्रस्तुत अंग्रेजी पुस्तक के अध्याय 2 से 6 के अंतर्गत आ चुकी है। अंग्रेजी में इकसठ टकित पृष्ठ प्राप्त हुए थे जिनका संशोधन नहीं किया गया था। यह सामग्री टकित कार्बन कापी का अनुवाद है। संपादक
सामवेद और यजुर्वेद में वेदों की उत्पत्ति का प्रसंग नहीं है।
इसके पश्चात् के ब्राह्मण ग्रंथों में शतपथ ब्राह्मण, तैत्तरीय ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण और कौषीतकि ब्राह्मण में ऐसे प्रयास दृष्टिगोचर हैं जिनमें वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या की गई है।
शतपथ ब्राह्मण में कई व्याख्याएं है। यह वेदों की उत्पत्ति का श्रेय प्रजापति को देता है। उसके अनुसार प्रजापति ने अपने तप से जगत, धरती, वायु और आकाश बनाए। उन्होंने इन तीनों में ऊष्मा संचारित की। इस ऊष्मा से तीन तेज उत्पन्न हुए। अग्नि, वायु और सूर्य। उसके ताप से तीन वेद उत्पन्न हुए । अग्नि से ऋग्वेद, वायु से ययुर्वेद और सूर्य से सामवेद ।
ऐतरेय और कौषीतकि ब्राह्मण की भी यही व्याख्या है। शतपथ ब्राह्मण¹ ने प्रजापति से वेदों की उत्पत्ति बताई है। भाष्य के अनुसार प्रजापति ने जल से तीन वेद बनाए। शतपथ ब्राह्मण कहता है-
"पुरुष प्रजापति की इच्छा हुई, "मेरी अभिवृद्धि हो, मेरा विस्तार हो"। वे उपासना में बैठ गए, उन्होंने घोर तप किया। इस तप से उन्होंने सर्वप्रथम पवित्र ज्ञान, त्रिवैदिक विज्ञान की रचना की। यह उनका आधार बना। उन्होंने कहा " प्रज्ञा ब्रह्माण्ड" का मूल है। " वेदों के ज्ञान के पश्चात् पुरुष को आधार मिला क्योंकि प्रज्ञा उनका मूल है। इस आधार पर प्रजापति ने घोर तप किया। उन्होंने वाक् (वाणी) से जल का निर्माण किया। उसके विस्तारण से जल अप्प कहलाया । उसकी सर्वत्र व्यापकता से वह "वारि" बना। उन्होंने चाहा, मेरा जल से विस्तार हो। इस त्रिवेद विज्ञान से वे जल में प्रविष्ट हुए। तब एक अण्डज उभरा। उन्होंने उसे प्राणवान किया और कहा- 'भव भव पुनर्भव। जब प्रज्ञा का जन्म हुआ । त्रिवेद विज्ञान। फिर पुरुष ने कहा प्रज्ञा ब्रह्मांड की प्रथम सृष्टि है। पुरुष के समक्ष सर्वप्रथम प्रज्ञा की रचना हुई, इसलिए यह उसका मुख बनी। उसे वेद ज्ञाता की संज्ञा दी गई। इस प्रकार आगे वे कहते हैं। वह अग्नि के समान है क्योंकि प्रज्ञा अग्नि का मुख है । "
"क्योंकि अग्नि आर्द्र काष्ठ से उत्पन्न हुई थी। उससे भांति-भांत के धूम्र उभरे। वह परमात्मा का श्वास है, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्व, आंगिरसों, इतिहास, पुराण, विज्ञान, उपनिषद्, श्लोक, सूक्त, विभिन्न राजाओं के भाष्य ये सब उसका श्वास हैं। "
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 8
शतपथ ब्राह्मण में तीसरी व्याख्या है: ¹
"मैंने तुझे सागर में स्थापित किया, वहीं तेरा आसन है। मस्तिष्क सागर है। मानस सागर से वाच द्वारा भगवान ने बेलचे से त्रिवैदिक विज्ञान को खोदकर निकाला। तत्पश्चात् इस मंत्र का उच्चारण किया। प्रज्ञावान देवता जाने, इस आहुति सामग्री को उन्होंने कहां रखा? जिसे ईश्वर ने तेजधार बेलचे से खोदकर निकाला था। मस्तिष्क समुद्र है। वाच तीव्र बेलचा है। त्रिवैदिक विज्ञान समिधा है। इस संदर्भ में मंत्र को उच्चारा। वह मस्तिष्क में समा गया। "
तैत्तरीय ब्राह्मण की तीन व्याख्याएं है। वह कहता है, वेदों के कर्त्ता प्रजापति हैं। वह कहता है प्रजापति ने राजा सोम को बनाया और तत्पश्चात् तीन वेदों की रचना की गई² । इस ब्राह्मण की दूसरी व्याख्या³ का प्रजापति से कोई तात्पर्य नहीं। इसके अनुसार:
"वाच अविनाशी है। वह पूजा में प्रथम प्रसूत है। वेदों की जननी और अमरता का केन्द्र बिन्दु। हममें आनंद स्रजित कर वह यज्ञ बन जाती है। रक्षा की देवी सरस्वती में मेरे आह्वान को सुनने को उद्यत हो । मेधावान ऋषि, मंत्रों के सृष्टा, देवगण जिनका अनुग्रह तप और कठोर उपासना से प्राप्त करते हैं। "
इस सबके ऊपर तैत्तरीय ब्राह्मण तीसरी व्याख्या देता है। वह कहता है कि वेद प्रजापति की दाढ़ी से उत्पन्न हुए।
उपनिषदों में भी वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या की गई है।
छांदोग्य उपनिषद की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण के समान है। अर्थात् ऋग्वेद अग्नि से उत्पनन हुआ, यजुर्वेद वायु से और सामवेद सूर्य से उत्पन्न हुआ ।
बृहदारण्यक उपनिषद ने जो शतपथ ब्राह्मण का अंग है, अलग कथा कही है:
“प्रजापति द्वारा जिनका मृत्यु या यम के साथ तादात्म्य है वाच की रचना कही गई है और उसके माध्यम से आत्मा के साथ वेदों सहित सभी तत्वों का सृजन हुआ। उसी वाच और आत्मा से उसने सबका सृजन किया चाहे वह ऋग्वेद हो, यजुस, साम, छंद, यज्ञ या विभिन्न जीव-जंतु हों। "
"तीन वेद तीन तत्व हैं, वाच, मानस और श्वास वाच ऋग्वेद है, मानस यजुर्वेद है और श्वास सामवेदा"
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट भाग 1, पृ. 9-10
2. म्यूर, खंड 1, पृ. 8
3. वही पृ. 10