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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
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     “अश्वमेध यज्ञ को छोड़कर अश्व की बलि देना अनुचित है । गजमेध के अतिरिक्त हाथी की बलि भी अनुचित है। राजा यह देखें कि इन अवसरों को छोड़कर यह बलियां न दी जाएं। किसी भी दशा में ये देवियों को न चढ़ाए जाएं। अवसर पड़ने पर अश्व के स्थान पर जंगली सांड चढ़ाया जा सकता है । "

     "ब्राह्मण देवी को कभी सिंह अथवा बाघ या अपने रक्त की बलि न दें, न ही नशीली शराब चढ़ाएं। यदि कोई ब्राह्मण सिंह, बाघ अथवा मानव की बलि चढ़ाता है तो वह नरक जाएगा और जितने समय धरती पर रहेगा, दुःख दारिद्र भोगेगा।'

Hindu dharm ki paheli Riddle of Hinduism by Dr B R Ambedkar

     ‘यदि कोई ब्राह्मण अपना रक्त अर्पित करता है तो वह ब्रह्म हत्या के समान है और यदि वह मादक मदिरा चढ़ाता है तो वह ब्राह्मण नहीं रहता । '

     'कोई शास्त्री मृग न चढ़ाए यदि वह चढ़ाता है तो ब्रह्म हत्या का भागी होता है। जहां कहीं सिंह, बाघ और मानव - बलि की आवश्यकता हो तो तीन कार्य किए जाएं। सिंह, बाघ और मानव की मक्की या जौ के गीले आटे की आकृतियां बना ली जाएं, उनकी बली इसी प्रकार चढ़ाई जाए जैसे जीवित प्राणियों की चढ़ाई जाती है। कुल्हाड़ी मंत्रोचार के साथ चलाई जाए। '

     यदि कई पशुओं की बलि देनी हो तो केवल दो अथवा तीन को ही देवी के समक्ष लाना पर्याप्त है जो सभी की उपस्थिति मानी जाएगी। हे भैरव ! मैंने तुम्हें उत्सव की सामान्य बातें बता दी हैं और यह भी बता दिया है कि बलि कैसे हो और किन अवसरों पर कौन से मंत्र पढ़े जाएं।

     जब देवी भैरवी, या भैरव को भैंस की भेंट चढ़ाई जाए तो बलिपशु के समक्ष निम्नांकित मंत्र पढ़ा जाए:

     'हे भैंस, जिस रीति से तू घोड़े का नाश करती है, जिस रीति से तू चंडिका तक जाती है, तू मेरे शत्रु का उसी प्रकार विनाश कर और मुझे समृद्ध बना। '

     "हे मृत्यु के युद्धाश्व! श्रेष्ठ और अविनाशी स्वरूप मुझे चिरायु कर और विख्यात कर हे भैंस, तुझे नमन !

     "अब मानव रक्त की भेंट चढ़ाने संबंधी विवरण सुनो।

     "मानव की बलि पवित्र पूजा स्थल पर अथवा श्मशान में दी जाए। पूजा उपरोक्तानुसार श्मशान क्षेत्र में या कामाख्या मंदिर अथवा पहाड़ी पर की जाए । अब उसकी विधि सुनो।

     "श्मशान मेरा रूप है और यह भैरव कहलाता है। इसमें एक दिशा होती है, जो तंत्र-स्थल कहलाती है। पूजा इन दो दिशाओं में होती है। तीसरे को हरूका कहते हैं।

     मनुष्य की बलि पूर्वी दिशा में दी जाए जो भैरव के लिए पवित्र है। शीश दक्षिणी दिशा में चढ़ाया जाए, जो कपाल भूमि कहलाती है और भैरवी के लिए पवित्र है। रक्त पश्चिमी दिशा में अर्पित किया जाए जिस पर हरूका प्रभुत्व होता है।

     सम्पूर्ण पूजा विधि और पवित्र स्थान पर किसी व्यक्ति की बलि चढ़ाते समय, बलि चढ़ाने वाले द्वारा इस बात का ध्यान रखा जाए कि वह बलि- पशु पर नजर गड़ा कर न देखें।

     अन्य अवसर पर भी बलि चढ़ाने वाला बलि- पशु पर दृष्टि न गड़ाए बल्कि सिर निगाह हटाकर चढ़ाया जाए।

     “बलि-प्राणी देखने में अच्छा हो, पूजा के साथ उसे तैयार किया जाए। वांछित विधियां सम्पन्न की जाएं, जैसे एक दिन पूर्व मांस रहित पवित्र भोजन कराकर और उसकी पूजा करके उसे पुष्पहार पहनाया जाए और चंदन से सुगंधित किया जाए।

     "फिर उसका मुख उत्तर की ओर रखें, बलि- पशु के विभिन्न स्वामी देवों की पूजा की जाए। फिर नाम पुकार कर बलि - पशु की पूजा की जाए।

     "इस प्रकार बलिदाता बलिपात्र की पूजा करें, वे मंत्र उच्चारे जो इस अवसर के लिए उपयुक्त हैं और जिनका पूर्व उल्लेख किया जा चुका है।

     "किसी चौपाए पशु अथवा मादा पक्षी की या किसी स्त्री की बलि न चढ़ाएं, इस प्रकार बलिदाता नरक में जाता है। यदि पशु-पक्षी पर्याप्त संख्या में हैं तो मादा की बलि दी जा सकती है, किन्तु मनुष्यों के संबंध में क्षम्य नहीं ।

     "किसी ब्राह्मण अथवा चाण्डाल की बलि न दी जाए, न राजकुमारों की संतान की ही और न युद्ध में विजेताओं की न ब्राह्मण और क्षत्रिय की संतान की, न संतानहीन भ्राता, न पिता की, न विद्वान की और न ही किसी अनिच्छुक व्यक्ति की । जो ऊपर गिनाए जा चुके हैं, उनके अतिरिक्त अज्ञात नाम के पशु-पक्षियों की बलि भी अनुकूल है। यदि उपरोक्त में कोई उपलब्ध नहीं है तो उनके स्थान पर गधे अथवा ऊंट की बलि दी जा सकती है। यदि अन्य पशु उपलब्ध है तो बाघ, ऊंट और गधे की बलि से परहेज किया जाए।

     "जब बलिपात्र की पूजा कर ली जाए, चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो अथवा पक्षी, तो पूर्वोक्त के अनुसार बलिदाता निर्धारित मंत्र का पाठ करें और देवता का आह्वान करते हुए बलि चढ़ा दें।

     "मनुष्य का सिर देवी के दक्षिण में रखा जाए और बलिदाता देवी के सम्मुख खड़े होकर उनका आह्वान करें। पक्षी का रक्त बायीं और चढ़ाया जाए और पूजा करने वाले व्यक्ति के अंगों का रक्त सामने चढ़ाया जाए। मांसाहारी पशु अथवा पक्षियों के सिर से निकलने वाले रक्त रूपी अमृत जल जीवों के रक्त को बाएं हाथ से अर्पित करें।

     मृग कच्छप दरियाई घोड़े और शशक का रक्त, सिर और मछली सामने चढ़ाई जाएं।

     सिंह - मस्तक और दरियाई घोड़े का शीश और रक्त देवी के पीछे न चढ़ाया जाए, बल्कि दाएं, बाएं और सम्मुख चढ़ायें।

     समर्पण दीप या तो दाएं हाथ में रखें अथवा सम्मुख किसी भी दशा में, बाएं हाथ में नहीं। सुगंधि बाईं ओर की जाएं या समक्ष किन्तु दाईं ओर नहीं । सुगंध, पुष्प और आभूषण सम्मुख रखे जाएं। जो विधि बताई है, उसका पालन किया जाए। अन्य पेयों के पश्चात् बाईं और मदिरा चढ़ाई जाए।

     “यदि प्रेत-आत्माओं की पूजा नितांत अनिवार्य हो तो पहले वर्ग के तीन व्यक्तियों को पीतल-पात्र में नारियल का पानी, अथवा ताम्रपात्र में शहद दिया जाए। दैवी विपदा के समय भी, पहले तीन वर्गों के व्यक्ति मादक मदिरा भेंट चढ़ाएं जो पुष्पों से बनी नहीं होनी चाहिए अथवा दमपुख्त भोजन न परोसा जाए। राजकुमार, मंत्रीगण, अमात्य और कलाल धन-सम्पदा के लिए मानव बलि चढ़ाएं।

     "यदि राजकुमार की सहमति के बिना मानव बलि चढ़ाई जाती है तो बलिदाता पाप करता है। युद्ध के अवश्यंभावी भय की दशा में बलि केवल राजकुमार या मंत्रियों द्वारा चढ़ाई जाए। किसी और के द्वारा नहीं ।

     "मनुष्य को बलि से एक दिन पूर्व मंत्र सुना कर और दैवी गंध से तैयार किया जाए और उसके शीश को कुल्हाड़ी से छुआएं । कुल्हाड़ी पर चंदन का लेप करें। फिर कुछ चंदन कुल्हाड़ी से छुड़ाएं और बलि - पात्र की गर्दन पर मलें ।

     "फिर अम्बे अम्बिका आदि का मंत्र पढ़ें रौद्र और भैरव मंत्र पढ़ा जाए। इस प्रकार शुद्ध किए गए मनुष्य की देवी स्वयं रक्षा करेंगी, उसे कोई व्याधि नहीं होगी । शोकादि से उसका मानस भी विचलित नहीं होगा। उसके किसी परिजन की मृत्यु से भी उसकी शुचिता भंग नहीं होगी।

     "बलि पात्र को रस्सी बांधकर और मंत्रों से रक्षित कर उसके सिर पर वार किया जाए और उसे सावधानीपूर्वक देवी को चढ़ाया जाए। यह बलियां शत्रुओं की संख्या के अनुपात में हों, फिर शत्रु विनाश के लिए मंत्र के साथ शत्रु की आत्मा उसमें डालकर कुल्हाड़ी से बलि-पात्र का सिर काटा जाए। बलि चढ़ जाने के बाद वह शत्रु का विनाश करेगी।

     "पूजा के घोषित उद्देश्य के लिए ऐसे व्यक्ति का रक्त लिया जाए, जिसका शरीर और मन स्वच्छ तथा शुद्ध हो, भय मुक्त हो। उसे कमल-दल में भर कर मंत्रोचार के साथ चढ़ाया जाए।

     "रक्त यदि छुरे या कुल्हाड़ी से चीरा देकर निकाला जाता है तो यह शस्त्र के अनुपात के अनुसार सुखद होता है।

     “बलि चढ़ाने वाला कमल-दल में उपस्थित रक्त की एक चौथाई मात्रा चढ़ाए परंतु किसी भी दशा में इससे अधिक नहीं होना चाहिए, शरीर का भाग आवश्यकता से अधिक नहीं काटा जाना चाहिए। जो अपना रक्त अथवा मांस स्वेच्छा से अर्पित करे। मांस के लिए वह अलसी, मांस, तिल अथवा मदिरा प्राप्त करे। "

     जो इन नियमों के अनुसार बलि देता है, उसका मनोरथ पूरा होता है। काली पुराण, धर्म का यह उपदेश देता है: