हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पन्द्रहवीं पहेली
ब्राह्मणों ने अहिंसक देवता के साथ रक्त पिपासु देवी का विवाह क्यों किया ?
जब ब्राह्मणों ने मांस-मदिरा का सेवन आरम्भ कर दिया तो उन्हें पुराणों में पशुबलि की वकालत करने में कोई संकोच नहीं हुआ। एक पुराण का विशेष उल्लेख करना आवश्यक है। है। वह है काली पुराण । यह पुराण स्पष्ट रूप से देवी काली की पूजा को प्रचारित करने के लिए लिखा गया था। इस पुराण में एक अध्याय का नाम ही 'रुधिर अध्याय' है।
मैं रुधिर अध्याय का सारांश देता हूं। इस अध्याय¹ में शिव ने तीन पुत्रों बेताल, भैरव और भैरों को निम्न प्रकार से सम्बोधित किया है:
'मेरे पुत्रों! देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए सम्पादित होने वाले संस्कार और नियमों के विषय में, मैं तुम्हें बताता हूं।'
'वैष्णवी तंत्र में जो प्रावधान किया गया है, उनका सभी अवसरों पर सभी देवताओं को बलि चढ़ाकर पालन किया जाए।'
'पक्षी, कच्छप, घड़ियाल, मीन, वन्य जंतुओं की नौ प्रजातियां, भैंसा, वृषभ, बकरा, नेवला, जंगली सुअर, दरियाई घोड़ा, मृग, बारहसिंगा, सिंह, बाघ, मनुष्य और बलिदाता का स्वयं का रक्त चण्डिका देवी और भैरों की पूजा के उचित पदार्थ हैं।'
'बलि चढ़ाने से ही राजाओं को सुख, स्वर्ग और शत्रु विजय प्राप्त होती है।'
'देवी, मछली और कच्छप के चढ़ाने से एक माह की अवधि के लिए खुश रहती है और मगरमच्छ से तीन मास तक वन्य जंतुओं की नौ प्रजातियों से देवी नौ महीने प्रसन्न रहती है और इस अवधि में यह भक्त का कल्याण करती है। गौर, नीलगाय के रक्त से एक वर्ष और मृग तथा जंगली सुअर से बारह वर्ष तक संतुष्ट रहती है। सरभ का रक्त देवी को पच्चीस वर्ष तक संतुष्ट रखता है, भैंस तथा दरयाई घोड़े का रक्त एक सौ वर्ष और बाघ का भी इतने ही वर्ष संतुष्ट रखता है। सिंह और बारहसिंगा और मानव-जाति का रक्त एक हजार वर्ष तक प्रसन्न रखता है। इनके मांस से भी उतनी ही अवधि तक संतुष्टि होती है, जितने दिन इनके रक्त से। अब दरियाई घोड़े और मृग के मांस तथा रोहू मछली के चढ़ावे का फल सुनो। '
1. इस अध्याय का डब्लू. सी. ब्लैकियर ने अंग्रेजी में अनुवाद किया था, जो एशियाटिक अनुसंधानों में प्राप्य है।
यह अंग्रेजी में सोलह पृष्ठों की लेखक द्वारा संशोधित सामग्री प्राप्त हुई है जो पूर्ण प्रतीत होती है। संपादक
“मृग और दरियाई घोड़े के मांस से देवी पांच सौ वर्ष तक और रोहू मछली तथा बारहसिंगे से मेरी प्रिया (काली) तीन सौ वर्ष तक संतुष्ट रहती है । "
'आठों पहर में दो बार पानी पीने वाली रेवड़ की प्रमुख कृशकाय बच्चों वाली इकरंगी बकरी बधिनासा कहलाती है। वह सर्वोत्तम हव्य और कव्य हैं।'
"नीली ग्रीवा, लालशीर्ष, श्याम टांगों और श्वेत पंखों वाला पक्षी भी वर्धुनासा कहलाता है। वह पक्षीराज है और मेरा तथा विष्णु का प्रिय है। "
'निम्नांकित विधि से दी गई मानव बलि से देवी एक हजार वर्ष तक प्रसन्न रहती है और तीन मनुष्यों की बलि से एक लाख वर्ष तक मेरे रूपधारी कामाख्या, चण्डिका और भैरव मनुष्य के मांस से एक हजार वर्ष के लिए संतुष्ट हो जाते हैं। रक्त का अर्घ्य पवित्र मंत्रों में अमृत बन जाता है, कामाख्या को शीश अर्पित किया जाए तो वह अति प्रसन्न होती है। जब ज्ञानी देवी को चढ़ावा चढ़ाऐं तो रक्त और शीश अर्पित करें और जब अग्नि को आहूति दें तो मांस डालें। '
'भक्त इस बात से सचेत रहें कि अशुद्ध मांस अर्पित न किया जाए क्योंकि वे स्वयं शीश और रक्त को अमृत मानते हैं। '
'बेल पर लगने वाला फल, गन्ना, नशीली मदिरा, सड़ाई हुई मदिरा भी अन्य आहुतियों के समान माने जाते हैं और देवी को उतने काल तक प्रसन्न रखते हैं जैसे कि बकरी की बलि से । '
'बलि के लिए चन्द्रहास सर्वोत्तम हथियार है, छुरे का स्थान दूसरा है जबकि कुदाली एक निकृष्ट साधन है।'
'इन शास्त्रों के सिवाय बलि के लिए बरछी अथवा बाण का प्रयोग न किया जाए क्योंकि उस बलि को देवी स्वीकार नहीं करती और बलिदाता का मरण हो जाता है, जो अपने हाथों बलि के पशु अथवा पक्षी का शीश मरोड़ देता है, वह भी उतना ही पापी है, जितना ब्रह्म-हत्यारा, उसे भारी दुःख झेलने पड़ते हैं।
ज्ञानी को इस उद्देश्य से बनी कुल्हाड़ी को मंत्रों से पवित्र करके प्रयोग करना चाहिए जैसा कि दुर्गा और कामाख्या के विषय में विशेष रूप से उल्लेख है।
'काली का नाम दो बार लिया जाए फिर कहा जाए 'देवी ब्रजेश्वरी लाव्हा दंदयी नमः' ये शब्द इस प्रकार उच्चारे जायं " जय ! काली! काली जय! देवी! दामिनी देवी लौह खड्गधारी...." फिर वह कुल्हाड़ी अपने हार में ले और निम्नांकित काल रात्र्य मंत्र से फिर अग्नि चेतन करें।
'बलिदाता कहे : हरंग-हिरंग, काली, काली' भयंकर दांतों वाली देवी, खा, काट, अनिष्ट हर, कुल्हाड़ी से काट, झुक झपट रक्त पी, उठा उठा। इस प्रकार काली वंदना काल रात्र्य मंत्र कहलाती है।
'इस मंत्र से किया गया वार काल रात्र्य कहलाता है। काल रात्रि ( अंधकार की (देवी) स्वयं बलिदाता के शत्रु का संहार करती हैं। '
'बलिदाता को पूर्व निर्देशानुसार बलि देनी चाहिए और बलि-पशु से निम्न प्रकार कहें।' 'प्राणी कर्त्ता की सृष्टि है, वह आत्म- बलिदान करे। इसलिए मैं तेरा जीवन लेकर बिना पाप किए तेरा बलिदान कर रहा हूं।'
'बलिदाता उस देवता का नाम ले, जिसके लिए बलि दी जा रही हो। वह प्रयोजन बताए, जिसके लिए बलि दी जा रही है और उपरोक्त मंत्र के साथ बलि चढ़ा दे । उसका मुख उत्तर को हो चाहे पहले किसी अन्य दिशा में भी हो, बलिदाता अपना मुख उत्तर में रखे और बलिपात्र को पूर्व दिशा में रखें' बलि चढ़ाने के बाद उसमें 'नमक जरूर मिलाया जाए और पूर्वोक्त के अनुसार रक्त भी ' ।
'जिस पात्र में रक्त अर्पित किया जाए, वह भक्त की परिस्थिति के अनुकूल हो सकता है। सोने का, चांदी का, तांबे का पीतल का, दोना अथवा मृदापात्र, बलि में प्रयुक्त होने वाले काष्ठ भी मान्य हैं।'
'वह लौह-पात्र अथवा पशुओं की खाल या वृक्ष - छाल, जस्ता या शीशे के बर्तन में भेंट न किया जाए, श्रब और श्रच अथवा भूमि पर भेंट न चढ़ाई जाए । घट का प्रयोग भी निषिद्ध है। रक्त धरती पर न उडेला जाए, वह पात्र उपयोग में लाया जाए, जिसका प्रयोग अन्य अवसरों पर देवताओं को भोग लगाने के लिए किया जाता है। जो व्यक्ति सम्पदा चाहता है, वह इन पात्रों का उपयोग करें। मानव रक्त केवल धातु अथवा मिट्टी के बर्तन में चढ़ाया जाए। पात्रों के द्रोण अथवा वैसे ही पात्रों में न चढ़ाया जाए। '