हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अब हम स्मृतियों पर आते हैं। मनुस्मृति में वेदों की उत्पत्ति के विषय में दो सिद्धांत हैं। एक स्थल पर कहा गया है कि वेदों का कर्त्ता ब्रह्मा है।
“हिरण्यगर्भ उसी ब्रह्मा ने सभी के नाम कर्म तथा लौकिक व्यवस्था को पहले वेद शब्दों से जानकर पृथक् पृथक् बनाया उस ब्रह्मा ने इन्द्रादिदेव, कर्म, स्वभाव, प्राणी - अप्राणी, पत्थर आदि साध्यगण और सनातन यज्ञ की सृष्टि की। उस ब्रह्मा ने यज्ञों की सिद्धि के लिए अग्नि, वायु और सूर्य से नित्य ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद को क्रमशः प्रकट किया।
एक अन्य स्थान पर यह माना गया लगता है कि प्रजापति वेदों के सृष्टा हैं जो निम्नलिखित से प्रकट हैं:
"प्रजापति ने तीन वेदों से तीन अक्षर लिए अ, उ, म साथ ही भू, भुवह, और स्व लिया। उसी परम पुरुष प्रजापति ने तीन वेदों से कुछ अंश लिए सावित्री (अथवा गायत्री) आरम्भ में शब्द तत् लिया तीन अविनाशी अंशों (भू भुवहस्व) से बना ओउम और गायत्री के तीन चरण ब्रह्मा का मुख माने जाते हैं। "
यह जानना भी रोचक है कि पुराणों ने वेदों के विषय में क्या कहा है? विष्णु पुराण कहता है:
"ब्रह्मा ने अपने पूर्वी मुख से गायत्री को बनाया, ऋग् मंत्रों, त्रिवृत समरथांतर तथा यज्ञ और अग्निस्तोम को रचा। अपने दक्षिणी मुख से उन्होंने यजुस मंत्रों को उत्पन्न किया। त्रिष्टुप छंद, पंचदश स्रोम, बृहत् साम और उकथ्य की रचना की। पश्चिमी मुख से साम छंदों और जगति मंत्रों को रचा, सप्तदश स्रोम, वैरूप और अतिरात्र की रचना की। अपने उत्तरी मुख से उन्होंने एकाविंश और अथर्वन् अपतोर्यमन की अनुष्टुप और विराज छंदों में रचना की । "
भागवत पुराण का मत है:
"एक बार चतुर्मुख सृष्टा के मुख से वेदों का प्रस्फुटन हुआ जबकि वे समाधि में लीन थे। मैं सम्पूर्ण विश्व की पूर्ववत रचना कैसे करूं .......... उन्होंने अपने पूर्वी तथा अन्य मुखों से स्तुति, यज्ञ, मंत्रों और प्रायश्चित सहित ऋक्, यजुस, साम अथर्वन की सृष्टि की। "
मार्कण्डेय पुराण का मत है-
"1. ब्रह्मा के पूर्व मुख का अगोचर प्रस्फुटन हुआ, उससे एक विभाजन अंडज से समृद्ध ऋचाएं उपजीं, 2. जो पाटल के पुष्प समान, मेधावी परस्पर विभाजनीय होते हुए भी गुथी हुई और रजस गुणों के सदृश्य । 3. उनके दक्षिण मुख से उन्मुक्त यजुस ऋचाएं फूटीं। कुंदन वर्ण और विभक्त, 4. परम ब्रह्मा के पश्चिमी मुख से साम मंत्र और छंद निस्रत हुए, 5 और 6. वेदों (ब्रह्मा) के उत्तरी मुख से श्यामल मधुमक्खियां और काजल जैसे वर्ण का अथर्वन प्रकट हुआ, जिसकी प्रवृति एक बार भयावह और अभयावह, सम्मोहन को निष्प्रभावी करने में सक्षम निर्विकार और अंधकार दोनों गुणों से युक्त और सुरम्य तथा वपरीत, 7. ऋक् के मंत्र राजसी गुण सम्पन्न यजुस के सात्विक, साम के तामसी और अथर्वन के तामसिक तथा सात्विक दोनों गुण हैं । "
हरिवंश, ब्रह्मा और प्रजापत दोनों सिद्धांतों का पक्षधर है:
"विश्व के विस्तार हेतु ब्रह्मा समाधिस्थ हो गए, चन्द्रमा से ज्योति पुंज निस्रत कया, गायत्री के हृदय में प्रवेश किया, उसके नेत्रों के मध्य में प्रविष्ट होते हुए उससे तब एक नर रूप चतुष्पद की सृष्टि की, जो ब्रह्मा की तरह द्युतिमान्, अकथनीय, अजर-अमर, अविकारी और निर्गुण, विलक्षण प्रतिभा संपन्न, चंद्र किरनों की तरह निर्मल, प्रदीप और अक्षर युक्त था। परमेश्वर ने ऋग्वेद की रचना की, साथ ही अपने नेत्रों से यजुस, अपनी जिह्वा से सामवेद और अपने मत्सक से अथर्वन रचा। इन वेदों ने अपनी सृष्टि के साथ ही अपना आकार (क्षेत्र) ग्रहण कर लिया। उसमें वेदों की प्रवृत्तियां उत्पन्न हो गईं, क्योंकि उन्हें विंदांती प्राप्त हुई। तब इन वेदों ने पूर्व स्थित अनादि-अनंत ब्रह्म (पावन - विज्ञान) का सृजन किया, स्वमेधा जनित गुणों से दिव्य ब्रह्माण्ड रूप धारण किया । "
यह प्रजापति को सृष्टा स्वीकार करता है। यह कहता है कि जब परमपुरुष ने अपने मुख से ब्रह्मांड और हिरण्यगर्भ की रचना की और अपने को विखण्डित करने की इच्छा की उन्हें संदेह था कि यह कैसे होगा।
हरिवंश आगे कहता है:
“जब वह इस प्रकार प्रतिबिम्बित हो रहे थे, तो उनके मुख से ओ३म शब्द निकला। जो पृथ्वी, वायु और आकाश में प्रतिध्वनित हुआ । जब देवाधिदेव ने इसका बार-बार उच्चारण किया तो उनके चित् से मस्तिष्क का सत्व सक्रिय हुआ। उनके हृदय से वषट्कार उद्धेलित हुआ। तब पवित्र और परमोत्कर्ष व्याहृतियां भू, भव, स्व से महान स्मृति बनी, जो पृथ्वी, वायु और आकाश से ध्वनि रूप में परिवर्तित हुई । तब देवी उत्पन्न हुई, श्रेष्ठतम छंद बने। चौबीस पदीय (गायत्री ) की रचना हुई । दैवी शब्द तत् से परमेश्वर ने सावित्री रची। तब उसने ऋक्, साम, यजुर्वेद और अथर्वन आदि वेदों, उनकी प्रार्थनाओं और संस्कारों की रचना की । "
वेदों की सृष्टि के संबंध में ग्यारह विभिन्न व्याख्याएं हैं: 1. पुरुष के रहस्यात्मक यज्ञ से, 2. स्कंभ से, 3. उनके प्रत्यंगों से जैसे उनके केश और मुख, 4. इन्द्र से, 5. काल से, 6. अग्नि, वायु और सूर्य से 7. प्रजापति के विस्तारण और जल से, 8. ब्रह्मा की श्वास से, 9. परमेश्वर द्वारा मानस सागर की खुदाई से 10 प्रजापति की दाढ़ी से 11. वाच के प्रस्फुरण से।
एक साधारण से प्रश्न का इस तरह को बढ़ाचढ़ाकर भ्रामक उत्तर एक पहेली है। इन सब प्रश्नों का उत्तर देने वाले ब्राह्मण हैं। वे सभी वैदिक परम्परा के दास हैं। वही प्राचीन धार्मिक कथाओं के संरक्षक हैं। वे इस सीधे सवाल का फिर ऐसा बेसिर पैर का अस्पष्ट उत्तर क्यों देते हैं ?