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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
Book
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IV

     प्रथम प्रश्न यह है कि यह मान्यता मौलिक है अथवा भारत के इतिहास में कालातीत में जड़ दी गई। सामान्यतः यह मत प्रकट किया जाता है कि यह एक मूलभूत सिद्धांत है। सर्वप्रथम धर्मसूत्रों में इस विषय पर प्रकाश डाला गया है जो सर्वप्रथम विधिग्रंथ हैं। उनका संकेत है कि यह विकास सही नहीं है। वेदों की संशयहीनता के संबंध में गौतमधर्म सूत्र ने निम्नांकित नियम प्रतिपादत किए हैं:

vedon ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Hindi Book Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar     "वेद पवित्र विधान के उद्गम हैं" 1.1

     "और उनकी परम्पराएं तथा रीतियां जो (वेदों को ) जानते हैं" - 1.2

     "यदि समान (अधिकारों वाली) शक्तियों के बीच संघर्ष हो किसी एक का अनुसरण करें, सुखी रहें"- 1.4

     वशिष्ठ धर्म सूत्र का वचार इस प्रकार है:

     "पवित्र विधान पाठों और ऋषि परम्पराओं से निर्धारित किए गए हैं"- 1.4.

     "(नियमों के अनुसार) निश्चय न हो पाने पर इन (दो सूत्रों) शिष्टों की सत्ता सर्वोपरि है। "- 1.5.

     "जो कामनारहित हैं शिष्ट (कहलाते हैं)- 1.6.

     बौधायन का मत निम्न प्रकार है : ( प्र 1 अध्या 1 कंडिका 1 )

     1. प्रत्येक वेद में पवित्र नियमों की शिक्षा है।

     2. हम उसके अनुसार व्याख्या करेंगे।

     3. ( पवित्र विधान) की शिक्षा परम्पराओं में है। (स्मृति का दूसरा स्थान है। )

     4. शिष्टों के व्यवहार का तीसरा स्थान है।

     5. शिष्ट निःसंदेह (वे हैं) जो निस्पृह 'ईर्ष्या से मुक्त' दर्प से मुक्त, मात्र दस दिन के लिए अन्न- संग्रह से संतुष्ट होते हैं, लोभ से मुक्त, पाखण्ड, अज्ञान, स्वार्थ, अनिश्चय बुद्धि तथा क्रोध से रहित हैं।

     6. जो शिष्ट (कहलाते हैं) जिन्होंने पवित्र विधान के अनुसार वेद-वेदांग का अध्ययन किया है, जो जानते हैं कि इनसे किस प्रकार संदर्भ लिए जाएं, मान्य पाठ से भावानुकूल साक्ष्य प्रस्तुत कर सकें। "

     7. उनके विफल हो जाने पर न्यूनतम दस सदस्यों की सभा (विधान के विवादित प्रश्नों पर निर्णय दें।)

     8. अब वे उद्धृत करते हैं (निम्नांकित मंत्र ) : "चार पुरुष, उनमें से प्रत्येक किसी वेद मीमांसा का ज्ञाता हो, वेदांग को जानता हो, जो पवित्र विधान का वाचन करें, एवं विभिन्न तीन सिद्धांतों के अनुयायी, तीन ब्राह्मणों की मिलकर एक सभा बनती है, जिसमें न्यूनतम दस सदस्य हों। "

     9. इसमें पांच अथवा तीन अथवा एक निर्विवाद व्यक्ति हो सकता है जो (सम्बद्ध प्रश्न पर) पवित्र विधान के अनुकूल निर्णय करें। किन्तु एक हजार मूर्ख मिलकर भी निर्णय नहीं कर सकते।

     10. काष्ठ निर्मित हाथी, चमड़े से बना मृग, अशिक्षित ब्राह्मण इन तीनों में कुछ नहीं होता, ये दर्शनीय पदार्थ हैं।

     आपस्तम्ब धर्म सूत्र द्वारा लिया गया दृष्टिकोण स्पष्ट है जो निम्न सूत्र से लिया गया है:

     "हम सब बताएंगे कि गुणकर्म क्या है? जो दैनिक जीवन के व्यवहार का अंग बनते हैं।" 1.1.

     "इन अधिकारों (उपरोक्त कर्तव्य पालन के) को सहमति (समझौता) कहते है। जो विधि को समझते हैं। 1.2.

     "और (शीर्ष अधिकारी) मात्र वेद हैं।" 1.3.

     धर्मसूत्रों का विवेचन प्रकट करता है कि वेदों की संशयहीनता की मान्यता एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। इससे प्रदर्शित होता है कि विवाद की बात पर इनमें से किसे संशय-रहित माना जाए? 1. वेद, 2. परंपरा (स्मृति), 3. शिष्टों के व्यवहार, 4. सभा में समझौता; ये चार अधिकार केन्द्र थे। यह समय वशिष्ठ और बौधायन के धर्मसूत्रों का काल था। गौतम के काल में ही वेदों की एकछत्र सत्ता स्थापित हुई। एक ऐसा समय भी था जब सभा का निर्णय सत्ता का केन्द्र था। यह बौधायन का युग था । अंत में विवेचन से यह भी प्रकट होता है कि एक ऐसा समय था जब वेदों को अधि कार संपन्न ग्रंथ नहीं माना जाता था, बल्कि सत्ता का केन्द्र विद्वानों की सभा का निर्णय हुआ करता था। यह काल था, जब आपस्तम्ब¹ ने अपने धर्मसूत्रों की रचना की अर्थात् ईसा से 600 से लेकर 200 वर्ष पूर्व² तक ।

     इस प्रकार यह स्पष्ट है कि वेदों को जानबूझकर सनातन बनाने का प्रयास किया गया। जिनको पहले ऐसा नहीं माना जाता था। अब प्रश्न यह है कि वे कौन-सी परिस्थितियां और क्या इरादे थे, जिनके अनुसार ब्राह्मणों ने यह प्रचारित किया कि वेद एकछत्र और परमसत्ता के केन्द्र हैं।

     वेदों की सनातनता से दूसरा सम्बद्ध यह है कि ब्राह्मणों ने भेदभाव क्यों बरता और वेदों के कुछ अंशों तक ही संशयहीनता का सिद्धांत क्यों लागू किया? पूरे वैदिक साहित्य को इस श्रेणी में क्यों नहीं रखा? इस प्रश्न को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि वैदिक साहित्य का क्या अर्थ है? "वैदिक साहित्य" शब्द का प्रयोग दो अर्थों में है। उसके अंग हैं- (1) संहिता (2) ब्राह्मण, (3) आरण्यक, (4) उपनिषद और (5) सूत्र । जब इसका विस्तृत अर्थ किया जाता है तो इसमें दो अंग और जुड़ जाते हैं। (6) इतिहास, और (7) पुराण ।

     पहली बात ध्यान में रखनी चाहिए कि एक समय था जब यह सारा साहित्य एक ही श्रेणी में आता था और इनके बीच उद्घाटित अथवा लौकिक, अलौकिक अथवा मानवीय, तथा प्राधिकृत अथवा अप्राधिकृत के आधार पर कोई भेद नहीं था। यह बात शतपथ ब्राह्मण से स्पष्ट है, जो कहता है:

     "पुरुष प्रजापति की इच्छा हुई कि "मेरी अभिवृद्धि हो, मेरा विस्तार हो" । वे समाधिस्थ हो गए, उन्होंने घोर तप किया। इस तप से उन्होंने त्रिदेव विज्ञान - प्रज्ञा की रचना की। यह उनका आधार बना। उन्होंने कहा- 'प्रज्ञा ब्रह्मांड का मूल्य है'। वेदों के ज्ञान के पश्चात् पुरुष को आधार मिला कि प्रज्ञा उसका मूल है। इस आधार पर प्रजापति ने घोर तप किया। (9) उन्होंने वाच से जल कर रचना की। उसके विस्तरण से जल "अप्प" कहलाया। उसकी सर्वत्र व्यापकता से वह " वारि" बना। ( 10 ) उन्होंने चाहा, "मेरा जल से विस्तार हो" । इस त्रिवेद विज्ञान से वे जल से प्रविष्ट हुए, तब एक अण्डज उभरा। उन्होंने उसे प्राणवान किया और कहा, "भव भव पुनर्भव"। तब प्रज्ञा का जन्म हुआ। त्रिवेद विज्ञान। फिर पुरुष ने कहा, 'प्रज्ञा ब्रह्मांड की प्रथम सृष्टि है। ' पुरुष के समक्ष सर्वप्रथम प्रज्ञा की रचना हुई। इसलिए यह उसका मुख बनी। इस प्रकार आगे वह कहते हैं "वह अग्नि के समान है क्योंकि प्रज्ञा अग्नि का मुख है।"


1. आपस्तम्ब धर्मसूत्र में वेदों के प्रसंग से भ्रम नहीं होना चाहिए। आपस्तम्ब वेदों की सत्ता स्वीकार नहीं करता। उसमें वेदों का ज्ञान परिषद की सदस्यता की अर्हता भर है जिसकी मान्यता ही वैध है।
2. मैक्समूलर के अनुसार यह सूत्रों का युग है। आपस्तम्ब प्राचीनतम है।



     "आर्द्र काठ से उपजी अग्नि उससे उठे भिन्न-भिन्न धुंए । उनकी श्वास प्रक्रिया से महान ऋग्वेद बना, यजुर्वेद बना, सामवेद बना, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विज्ञान, उपनिषद, श्लोक, सूत्र विभिन्न प्रकार के भाष्य बने । यह सब उसका श्वास बने । "

     परन्तु जब ब्राह्मणों ने संशय - रहित होने के सिद्धांत को स्थापित करने का मन बनाया तो उन्होंने वैदिक सहित्य को दो भागों में विभक्त कर दिया। 1. श्रुति और 2. अश्रुति। प्रथम विभाजन में उन्होंने आठ अंगों में से केवल दो को श्रेष्ठ रखा। संहिता और ब्राह्मण, शेष को उन्होंने अश्रुति घोषित कर दिया। यह बताना संभव नहीं कि यह अंतर कब उत्पन्न हुआ परन्तु यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण है कि किस आधार पर यह भेद किया गया। आरण्यक और उपनिषद् क्यों छांट कर बाहर कर दिए गए ? पहले समझा जा सकता है कि इतिहास और पुराणों को श्रुति से क्यों वंचित किया गया? जिस समय यह भेद किया गया, तब वे इतने आरम्भिक और अविकसित थे कि उन्हें शायद ब्राह्मणों में सम्मिलित कर लिया गया।

     साथ ही यह बात भी समझ में आती है कि आरण्यकों का श्रुति के अंग के रूप में उल्लेख क्यों नहीं किया गया? ब्राह्मणों के अंग थे और शायद इसी कारण यह उल्लेख करना अनावश्यक था कि यह श्रुति का अंग है, उपनिषद और सूत्रों का प्रश्न एक पहेली ही बना हुआ है। इन्हें श्रुति से अलग क्यों रखा गया? परन्तु सूत्रों का मामला अलग है। वे श्रुति की श्रेणी से निश्चित रूप से विलग कर दिए गए जिसको समझना बुद्धि से परे है। यदि यह बात तर्कसम्मत है कि ब्राह्मणों को श्रुति में सम्मिलित किया जाना चाहिए, उसी कसौटी पर यह बात खरी नहीं उतरती कि सूत्रों को शामिल क्यों न किया जाए? जैसा कि प्रोफेसर मैक्समूलर कहते हैं:

     "हम इस बात को समझ सकते हैं कि किस प्रकार कोई देश अपनी राष्ट्रीय काव्य रचना का श्रेय किसी अलौकिक पुरुष को दे सकता है? विशेष रूप से तब जबकि उस काव्य में देवों को सम्बोधित प्रार्थनाएं और मंत्र समाविष्ट हों। परन्तु ब्राह्मण ग्रंथों के गद्य-साहित्य के विषय में यह कहना कठिन है। ब्राह्मण ग्रंथ स्पष्ट रूप से मंत्रों की अपेक्षा बाद की रचनायें हैं। इसी कारण इन्हें श्रुति में समाहित किया गया होगा कि इनकी सामग्री ब्रह्मज्ञान युक्त है। ब्राह्मण-ग्रंथों के अधिकांश दावों के बारे में यह कल्पना की गई। होगी क इसकी रचना दैवी है, जिनका उद्गम सामान्य पद्य अथवा मंत्र नहीं हो सकते । किन्तु हमें इस तर्क को मान्यता देने की आवश्यकता नहीं, जिसके कारण ब्राह्मण-ग्रंथों ने अपने को मंत्र - रचना के समकालीन माना है। इसका कोई कारण समझ में नहीं आता कि ब्राह्मण-ग्रंथों और मंत्रों का रचनाकाल अधिक प्राचीन है। तो हम इस सहज विचार को क्यों अस्वीकार कर दें कि यदि सूत्रों और भारत के लौकिक साहित्य की तुलना की जाए तो उनका महत्व समान बनता है। ऐसी घटना सामान्य है जहां पवित्र ग्रंथों का यह नियम है कि बाद की रचनाओं को प्राचीन रचनाओं से जोड़ दिया जाता है, जैसा कि ब्राह्मण-ग्रंथों के साथ हुआ। किन्तु हम कठिनाई से ही यह कल्पना कर सकते हैं, जब तक कोई पक्ष इन तिरस्कृत रचनाओं के सिद्धांत विशेष की प्रामाणिकता अमान्य घोषित करने के लिए प्रयत्नशील न हो, पुराने अंशों को पवित्र रचनाओं से हटा दिया जाए और उन्हें बाद की रचनाएं बना दिया जाए। सूत्रों के परवर्ती साहित्य में ऐसा कुछ नहीं है। ऐसी कल्पना का कोई आधार नहीं है। हमें ब्राह्मण और मंत्रों की अपेक्षा उनके परवर्ती होने के सिवाय ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि सूत्रों को श्रुति न बनाया जाए। क्या ब्राह्मण ग्रंथकारों को स्वयं ज्ञात था कि ऋषियों की अधिकांश रचनाओं और ब्राह्मण ग्रंथों के उद्भव तक युगों बीत चुके थे? इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक है, किन्तु जिस दुस्साहस के साथ भारत के ब्रह्मज्ञानियों ने ब्राह्मण-ग्रंथों को वही पद और मंत्रों के समान उनका काल-निर्धारण किया, उससे यह प्रकट होता है कि इसका कोई विशिष्ट कारण रहा होगा कि सूत्रों को उतनी ही पावनता और प्रामाणिकता न दी जाए। "

     तीसरा प्रश्न उन परिवर्तनों से संबद्ध है जिसके अनुसार श्रुति और उनकी संशयहीनता की श्रेणी निर्धारित हुई। मनु ने 'ब्राह्मणों' को श्रुति की श्रेणी से अलग¹ कर दिया जैसा कि उसकी स्मृति से स्पष्ट है:

     "श्रुति का अर्थ है, वेद और स्मृति का अर्थ है विधान इनकी विषय- सामग्री पर तर्क नहीं किया जा सकता क्योंकि इनमें कर्त्तव्य-बोध है। वे ब्राह्मण, जो बुद्धिवादी लेखों पर आधारित हैं, वे ज्ञान के इन दो स्रोतों की निंदा करेंगे, उन्हें संशयवादी और निंदक जानकर बहिष्कृत किया जाए। जो कर्त्तव्य-बोध चाहते हैं, उनके लिए श्रुति सर्वोच्च सत्ता है। "


1. इसमें विवाद हो सकता है कि वेद में ब्राह्मण को सम्मिलित किया गया है, जो तथ्य भी है। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मनु ने स्मृति का प्रयोग प्रतिबंधित रूप में किया, जिससे कि ब्राह्मण बाहर रहा। इसे इस तथ्य से भी बल मिलता है जैसा कि मनुस्मृति में ब्राह्मण का कोई संदर्भ नहीं है सिवाय एक स्थान पर (4.100) जहां वह कहता है कि केवल मंत्र के भाग के अध्ययन की जरूरत है।



     चौथा प्रश्न पुराणों के उस दावे से संबंधित है, जो पुराणों को रचना की दृष्टि से वेदों से उच्च स्थान देता है। वायु पुराण का कथन¹ है:

     "सर्वप्रथम सभी शास्त्र, पुराण ब्राह्मण के मुख से प्रस्फुटित हुए। तदुपरान्त उनके मुख से वेद।" मत्स्य पुराण वेदों से केवल पूर्ववर्ती होना ही घोषित नहीं करता बल्कि वह उनकी गुणवत्ता, सनातनता और स्वर के साथ पहचान को भी श्रेष्ठ मानता है । पहले केवल वेदों को इन गुणों से सम्पन्न कहा गया था। वह कहता² है:

     "सर्वप्रथम, अविनाशी पितामह (ब्रह्मा) उत्पन्न हुए, फिर वेद, उसके अंगोपांग तथा उनके पाठ के विभिन्न साधन जन्मे और प्रकट हुए। ब्रह्मा ने जिन शास्त्रों का प्रस्फुटन किया उनमें सहस्त्रों कोटि मंत्रों के विस्तृत आयाम वाले शाश्वत ध्वनि जनित शुद्ध शास्त्र, पुराण प्रथम जो शुरू के जाप से जन्मे, फिर वेदों का उद्गम हुआ। तभी मीमांसा और न्याय और अन्य प्रमाण जन्मे 5. उनसे (ब्रह्मा) जो वेदों के अध्ययन में आस्थावान थे, संतति के इच्छुक थे उनके मानस पुत्र जन्मे। वे इस कारण मानस-पुत्र कहलाए कि सर्वप्रथम उनके मानस से प्रस्फुटित हुए थे। "

     भागवत पुराण वेदों के समान प्रामाणिकता का दावा करता है-

     "ब्रह्मरात्र का निर्णय है कि पुराण भागवत कहलाता है, जो वेदों के समान है। " ब्रह्मवैवर्त पुराण ने स्पष्टतः दावा किया है वह वेदों से श्रेष्ठ है। वह कहता है:

     "जिस श्रद्धेय ऋषि के विषय में आपने प्रश्न किया है और जो आपकी इच्छा है, पुराणों का सार अति विख्यात ब्रह्मवैवर्त पुराण है जो समस्त पुराणों और वेदों की त्रुटियों का परिष्कार करता है इस को मैं जानता हूं।"

     इस निरूपण से वेदों के संबंध में अनेक पहेलियां उपजती हैं। यह तीन पहेलियां तो हैं ही कि .... ब्राह्मण इस बात पर क्यों बल देते हैं कि वेदों की सत्ता सनातन है, कि वे अपौरुषेय और बिना किसी देवता के उत्पन्न हुए और वे संशय-रहित हैं। इसके अतिरिक्त, वेदों के विषय में एक और पहेली है कि एक समय वेदों की कोई सत्ता नहीं थी और ना ही वे संशय-रहित थे। ब्राह्मणों को इस बात की आवश्यकता क्यों अनुभव हुई कि उन्हें संशय - रहित घोषित करें। ब्राह्मणों ने सूत्रों को श्रुति की श्रेणी में क्यों विलग किया? ब्राह्मणों ने वेदों के संशय-रहित होने के सिद्धांत को क्यों किनारे कर दिया और पुराणों को वह स्थान दे डाला?


1. म्यूर द्वारा संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 47 पर उद्धत ।
2. वही. पृ. 28