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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 28 of 92
25 ऑगस्ट 2023
Book
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     महाभारत के ही अनुशासन पर्व में युधिष्ठर और भीष्म का संवाद आया है। युधिष्ठर भीष्म से महादेव के गुणों के विषय में जिज्ञासा करते हैं। भीष्म का उत्तर इस प्रकार था:

braahmanon ne devataon ka utthaan - patan kyon kiya - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     "मैं महादेव की लीलाओं और गुणों की व्याख्या करने में असमर्थ हूं, जो अनीश्वर हैं, वे अगोचर हैं, वह ही ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के जनक हैं, जिनकी देवताओं में ब्रह्मा से लेकर पिशाच तक उपासना करते हैं, वे अमृत तत्व हैं और वही पुरुष हैं। ऋषि उनकी उपासना करते हैं और योगमंत्रों में स्तवन किया गया है। वे सत्य के सूक्ष्म तत्व हैं। वे अजर-अमर ब्रह्म हैं। वे विद्यमान भी हैं और अविद्यमान भी। उन्होंने शक्ति से आत्म-तत्व प्राप्त किया है और वे देवाधिदेव और प्रजापतियों के स्वामी हैं। मेरे जैसा मानव जो माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ है और जो मृत्यु को प्राप्त होने योग्य है, वह 'भव' के गुणों का क्या बखान कर सकता है। उसका वर्णन तो मात्र नारायण कर सकते हैं। विष्णु मेधावी हैं, सर्वगुण सम्पन्न हैं, दुर्जेय हैं, दिव्य दृष्टि हैं, दिव्य शक्ति हैं, यद्यपि रुद्र के लिए उनकी भक्ति भगवान कृष्ण ने भी की है। बद्री में महादेव से कृष्ण ने सर्वस्व प्राप्त किया। माधव ने एक हजार वर्ष तक शिव की उपासना में तप किया परन्तु इहलोक में महेश की कृष्ण द्वारा आराधना की जाती है। ऐसे कृष्ण, जब प्रजावृद्धि चाहते हैं, तो वे देवाधिदेव आदि के नाम का जाप करते हैं। "

     कृष्ण की उपस्थिति में युधिष्ठिर और भीष्म का यह संवाद चलता है। भीष्म उत्तर देने के उपरांत कृष्ण को महादेव की श्रेष्ठता बताते हैं और यह आश्चर्य है कि यह महानतम देवता कृष्ण बिना किसी हिचक और विरोध के यह सब मान लेता है और कहता है:

     "वास्तव में, ईश (महादेव) के गुण-कर्मों को कौन जान सकता है। हिरण्यगर्भ में विराजमान देव, न इन्द्र के साथ महान ऋषि, न आदित्यगण, जो सूक्ष्मतम के ज्ञाता हैं यह नहीं जान पाए, तब भला शेष ऋषिगण और मनुष्य यह कैसे समझ पाएंगे। असुरों के हंता इस देवाधिदेव के गुणों का मैं बखान करूंगा, जो सब धार्मिक अनुष्ठानों के स्वामी हैं। "

     यहां यह स्पष्ट है कि कृष्ण अपने को शिव से हीन समझते हैं। साथ ही शिव जानते हैं कि कृष्ण का महान देवता पद से पतन हो चुका है, बराबरी की तो दूर रही सौप्तिक पर्व में महादेव अश्वत्थामा¹ को बताते हैं :

     “मेरी कृष्ण ने विधिवत् पूजा की है, जो कार्यकुशल है, सत्यता के साथ, पवित्रता, ईमानदारी, उदारता, अत्यंत सरलता, अनुष्ठान, धैर्य, बुद्धि, आत्मसंयम, निष्ठा और विचारपूर्वक । आज से कृष्ण से अधिक और कोई मुझे प्रिय नहीं है। "


1. म्यूर द्वारा उद्धृत (पृ. सं. नहीं दी गई ) ।


     शिव ही क्या, हर देवता से श्रेष्ठतम कृष्ण, जो वास्तव में परमेश्वर थे, यहां शिव के मात्र अनुयायी बना दिए जाते हैं जो मामूली सा वरदान मांगते फिरते हैं।

     कृष्ण के पतन की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। उन्हें और भी अपमान सहन करने पड़ते हैं। कृष्ण शिव के मुकाबले अपना दर्जा नीचे स्वीकार कर लेते हैं। यहां तक कि वे उपमन्यु के अनुयायी बन जाते हैं जो कि महान् शिव भक्त हैं। कृष्ण उससे शैवमत की दीक्षा ग्रहण करते हैं। कृष्ण स्वयं कहते हैं:

     “शास्त्रानुसार” आठवें दिन उस ब्राह्मण (उपमन्यु) ने मुझे दीक्षित किया। मैंने सिर का मुंडन कराया, घी से विलेपन किया, बाहों में कुश दूर्वा ग्रहण की, कटि तक अधोवस्त्र धारण किए। कृष्ण तब प्रायश्चित करते हैं और महादेव के दर्शन करते हैं।

     क्या ईश्वर जैसी पदवीं प्राप्त देवता का इससे अधिक पद में पतन और कहीं दृष्टिगोचर होता है? कृष्ण जो परमेश्वर कहे जाते हैं, जिनकी शिव से तुलना की जाती है, वे एक मात्र परमेश्वर नहीं थे और बाद में तो वे ईश्वर रहे भी नहीं। वे शिव के भक्त बन गए और उपमन्यु जैसे साधारण ब्राह्मण से शैवधर्म की दीक्षा भी ली।

     जहां तक राम का प्रश्न है, ये भी वैसे ही नामधारी कृत्रिम भगवान हैं जैसे कि श्रीकृष्ण । राम को तो आभास भी नहीं था कि वह परमेश्वर हैं। जब लंका में सीता रावण- विजय के बाद उनके पास आई और जब उनसे सीता के विषय में बात की गई तो राम को सीता की पवित्र्ता पर संदेह हुआ। वे बड़े दुखी हुए। रामायण में यह प्रसंग इस प्रकार है:

     "इसी समय यक्षराज कुबेर, पितरों सहित यमराज देवताओं के स्वामी सहस्त्र नेत्रधारी इन्द्र, जल के अधिपति वरुण, त्रिनेत्रधारी तेजस्वी वृषभवाहन के स्वामी महादेव, संपूर्ण जगत के स्रष्टा ब्रह्मा, वेद के ज्ञाता, (स्वर्ग से राजा दशरथ) जो सभी सूर्यतुल्य देदीप्यमान् विमानों से लंकापुरी में पधारे राघव (राम) के समक्ष प्रकट हुए। भगवान श्रीराम उनके सामने हाथ जोड़े खड़े थे। वे श्रेष्ठ देवता आभूषणों से अलंकृत अपनी विशाल भुजाओं को उठाकर उनसे बोले, "राम, आप सम्पूर्ण विश्व के सृष्टा, ज्ञानियों में श्रेष्ठ और सर्वव्यापक हैं। फिर इस समय अग्नि में प्रविष्ट सीता की उपेक्षा कैसे कर रहे हैं। आप समस्त देवताओं में श्रेष्ठ विष्णु ही हैं, इस बात को कैसे नहीं समझ रहे हैं। पूर्वकाल में वसुओं के प्रजापति जो ऋतधाम नामक वसु थे। वे आप ही हैं। आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयं प्रभु हैं। रुद्रों में आठवें रुद्र और साध्यों में पांचवें साध्य भी आप ही हैं। आश्विन आपके कान हैं, और सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं। "

     "शत्रुओं को संताप देने वाले देव, सृष्टि के आदि, अन्त और मध्य में आप ही दिखाई देते हैं। फिर आप सीता की एक साधारण मनुष्य की भांति उपेक्षा कर रहे हैं।" उन लोकपालों के ऐसा कहने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ राम ने आश्चर्यचकित हो उन श्रेष्ठ देवताओं से कहा:

     "देवगण! मैं तो अपने को मनुष्य, दशरथपुत्र राम ही समझता हूं। देवगण बताएं, मैं कौन हूं और कहां से आया हूं।"

     ऐसा कहने पर ब्रह्मा जी ने राम को कहाः

     “सत्यपराक्रमी, आप मेरे सत्य वचन सुनें। आप दिव्य शक्तियों से अभिभूत हैं। आप चक्र धारण करने वाले सर्वसमर्थ नारायण देव हैं, एक दाढ़ वाले पृथ्वी- धारी वाराह हैं तथा देवताओं के भूत एवं भावी शत्रुओं को जीतने वाले हैं। आप अविनाशी परब्रह्म हैं। सृष्टि के आदि, मध्य और अंत में सत्य से विद्यमान हैं। आप ही लोकों के परम धर्म हैं। आप ही विश्वकसेन (विष्णु), चतुर्भुज, आप ही धनुर्धारी हैं। आप ही सारंग, हृषीकेश, अन्तर्यामी, आदि पुरुष और पुरुषोत्तम हैं। आप किसी से पराजित नहीं होते। आप अपराजेय खड्गधारी विष्णु एवं महाबली कृष्ण हैं। आप ही देव सेनापति तथा परम सत्य हैं। आप ही बुद्धि, सत्व, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह तथा सृष्टि एवं प्रलय के कारण हैं। आप ही उपेन्द्र (वामन) और मधुसूदन हैं। इन्द्र को भी उत्पन्न करने वाले महेन्द्र और युद्ध का अन्त करने वाले शांतस्वरूप पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षिगण आपको शरणदाता तथा शरणागत वत्सल बताते हैं। आप ही सहस्त्रों शाखारूप सींग तथा सैकड़ों विधिवाक्य रूप मस्तकों से युक्त वेदरूप महावृषभ हैं। आप ही तीनों लोकों के आदिकर्ता और स्वयंप्रभु (परम स्वतंत्र ) हैं। आप सिद्ध और साध्यों के आश्रय तथा पूर्वज हैं यज्ञ, षट्कार और ओंकार भी आप ही हैं। आप श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ परमात्मा हैं। आपके आविर्भाव और तिरोभाव को कोई नहीं जानता । आप कौन हैं, इसका भी किसी को पता नहीं है। समस्त प्राणियों, गौओं तथा ब्राह्मणों में भी आप ही दिखाई देते हैं। समस्त दिशाओं में, आकाश में, पर्वतों में और नदियों में भी आपकी ही सत्ता है। आपके सहस्त्रों चरण, सैकड़ों मस्तक और सहस्त्रों नेत्र हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियों को, पृथ्वी का अंत हो जाने पर आप ही जल के ऊपर महान सर्प शेषनाग के रूप में दिखाई देते हैं। श्रीराम, आप ही तीनों लोकों को तथा देवता, गन्धर्व और दानवों को धारण करने वाले विराट पुरुष नारायण हैं। सबके हृदय में रमण करने वाले परमात्मा हैं। मैं ब्रह्म आपका हृदय हूं और देवी सरस्वती आपकी जिह्वा है। प्रभो! मुझ ब्रह्म ने जिनकी सृष्टि की है, वे सब देवता आपके विराट शरीर में रोम हैं। आपके नेत्रों का बंद होना रात्रि, खुलना ही दिन है। वेद आपके संस्कार हैं। आपके बिना इस जगत का अस्तित्व नहीं है। सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है। पृथ्वी आपकी स्थिरता है। अग्नि आपका कोप है और चन्द्रमा प्रसन्नता है। वक्षःस्थल में श्रीवत्स चिन्ह धारण करने वाले भगवान विष्णु आप ही हैं। पूर्वकाल में (वामनावतार के समय) आपने ही अपने तीन पगों में तीनों लोक नाप लिये थे। आपने अत्यंत दारुण दैत्यराज बलि को बांधकर इन्द्र को तीनों लोकों का राजा बनाया था। सीता साक्षात लक्ष्मी है और आप भगवान विष्णु हैं। आप ही सच्चिदानंद भगवान श्रीकृष्ण एवं प्रजापति हैं। मनुष्य आपको ही सृष्टि का पालक, सृष्टा, और संहार का परम स्रोत मानते हैं।

     यह स्पष्ट है कि राम को जान-बूझकर कृत्रिमतापूर्वक भगवान बता दिया गया, जैसे कृष्ण एक मानव से भगवान बना दिए गए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तरह वे जन्मजात भगवान नहीं थे। उन्हें ब्राह्मणों के नायक परशुराम से भी हीन सिद्ध किया गया। रामायण में यह कथा इस प्रकार आती है:

     "जब राजा दशरथ मिथिलापति जनक, जिनकी पुत्री से अभी राम का विवाह हुआ था, से विदा लेकर अपने राज्य को लौट रहे थे तो उनके समक्ष अनेक अपशकुन हुए। उनके चारों ओर भयंकर स्वर वाले पक्षी चीत्कार उठे और भूमि पर विचरने वाले मृग दाहिनी ओर चलने लगे। यह देखकर दशरथ ने वशिष्ठ से पूछा, "पक्षी चीख रहे हैं और मृग दाहिनी ओर चल रहे हैं। यह शकुन शुभ भी है और अशुभ भी है। यह क्या बात है ? इससे मेरा हृदय शंका से भर उठता है । " तब वशिष्ठ बोले, “यह परशुराम के आगमन की चेतावनी है जो तूफान की तरह आ रहे हैं, बड़े भयानक दिखाई दे रहे हैं, कंधे पर फरसा और धनुषबाण हैं।" दशरथ ने उनका आदरपूर्वक अभिवादन किया, जिसे परशुराम ने स्वीकार कर लिया और दशरथ पुत्र राम की ओर बढ़े। कहा, राम् तुम्हारा बहुत पराक्रम सुना है। जनक द्वारा दिया गया शिव धनुष तुमने तोड़ दिया है। मैं दूसरा धनुष लेकर आया हूं। इसकी प्रत्यंचा खींचकर बाण चढ़ाओ । बाण चढ़ाने में तुम्हारे बल का अनुमान लगाकर ही मैं तुम्हारे साथ द्वन्द्व करूंगा।”

     "राम ने उत्तर दिया कि यद्यपि उनके विरोधी ने उनकी युद्धप्रियता की निंदा की है तथापि वे उन्हें अपनी शक्ति का परिचय देंगे। तब उन्होंने क्रोध में परशुराम का धनुष छीन लिया और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी और चुनौती देने वाले परशुराम से कहा कि मैं उन पर प्रहार नहीं करूंगा क्योंकि वे एक ब्राह्मण हैं। फिर उनके परिजन विश्वामित्र का भी ध्यान है। परंतु मैं उनकी मानवेतर शक्ति को क्षीण कर दूंगा, विचरण शक्ति समाप्त कर दूंगा अथवा उनकी तपस्या के बल को नष्ट कर दूंगा। इस अवसर पर देवतागण प्रकट हुए। परशुराम बुझ से गए और शक्तिहीन हो गए और दीन भाव से कहा कि उनके विचरण की शक्ति से उन्हें वंचित न करें नहीं तो वे कश्यप को दिया गया वह वचन पूरा नहीं कर पाएंगे कि वे प्रत्येक रात्रि को उनके पास पहुंचेंगे। उनकी यह सहजता नष्ट हो जायेगी । "

     इस अपवाद के अतिरिक्त राम की किसी भी अन्य देवता से कोई शत्रुता नहीं थी। वह जहां भी रहे, सब प्रबंध करते रहे। अन्य देवों की कथाएं भिन्न हैं। ब्राह्मणों के हाथों वे गरीब प्राणी, मात्र खिलौने बनकर रह गए। ब्राह्मणों ने देवताओं के साथ इस प्रकार का घटिया व्यवहार क्यों किया ?