हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अब हम महाभारत पर आते हैं। हम क्या देखते हैं? हमें कृष्ण की स्थिति बदली हुई नजर आती है। वहां उनकी स्थिति में उत्थान - पतन की कथा है। पहले कृष्ण का स्थान शिव के ऊपर है। यही नहीं। शिव से निम्न भी पाते हैं और उन्हें शिव की श्रेष्ठता स्वीकार करनी होती है। कृष्ण की श्रेष्ठता प्रमाणित करने के संबंध में एक प्रमाण यह भी है वह है अनुशासन पर्व¹ में यह उल्लेख-
'भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मा जी से भी श्रेष्ठ हैं। वे सनातन पुरुष श्रीहरि कहलाते हैं। उनके शरीर की कांति जाम्बुनद नामक स्वर्ण के समान देदीप्यमान है। बिना बादल के आकाश में उदित सूर्य के समान तेजस्वी हैं। उनकी भुजाएं दस हैं, उनका तेज महान है। वे देवताओं के शत्रु दैत्यों का नाश करने वाले हैं। उनके वक्षःस्थल में श्रीवत्सका चिन्ह शोभा पाता है। वे हृषीक अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी होने के कारण हृषीकेश कहलाते हैं। सम्पूर्ण देवता उनकी पूजा करते हैं। ब्रह्माजी उनके उदर से और मैं उनके मस्तक से प्रकट हुआ हूं। उनके सिर के बालों से नक्षत्रों और ताराओं का प्रदुर्भाव हुआ है। देवता और असुर उनके शरीर की रोमावलियों से प्रकट हुए हैं। समस्त ऋषि और सनातन लोक उनके श्रीविग्रह से उत्पन्न हुए हैं। वे श्री हरि स्वयं ही सम्पूर्ण देवताओं और ब्रह्मा जी के भी धाम हैं। सम्पूर्ण पृथ्वी के स्रष्टा और तीनों लोकों के स्वामी भी वे ही हैं। वे ही समस्त चराचर प्राणियों का संहार करते हैं। वे देवताओं में श्रेष्ठ, देवताओं के रक्षक, शत्रुओं का संताप देने वाले, सर्वज्ञ, सबमें ओतप्रोत, सर्वव्यापक और सब ओर मुखों वाले हैं। वे ही परमात्मा, इन्द्रियों के प्रेरक और सर्वव्यापी महेश्वर हैं। तीनों लोकों में उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। वे ही सनातन, मधुसूदन और गोविन्द आदि नामों से प्रसिद्ध हैं। सज्जनों के आदर देने वाले, वे भगवान श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध में सम्पूर्ण राजाओं का संहार करायेंगे। वे देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए पृथ्वी पर मानव-शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं। उनकी शक्ति और सहायता के बिना सम्पूर्ण देवता भी कोई कार्य नहीं कर सकते। संसार में नेता के बिना देवता कोई भी कार्य करने में असमर्थ हैं। और यह भगवान श्रीकृष्ण सब प्राणियों के नेता हैं, इसलिए समस्त देवता उनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं।
1. म्यूर, खंड 4. पू. 273-74
देवताओं की रक्षा और उनके कार्य साधन में संलग्न रहने वाले वे भगवान वासुदेव ब्रह्मस्वरूप हैं। वह ही ब्रह्मऋषियों को सदा शरण देते हैं। ब्रह्मा जी और मैं दोनों ही उनके शरीर के भीतर उनके गर्भ में बड़े सुख के साथ रहते हैं। उनके श्रीविग्रह में सम्पूर्ण देवता भी सुखपूर्वक निवास करते हैं। उनकी आँखें कमल के समान सुंदर हैं। उनके गर्भ ( वक्ष:स्थल) में लक्ष्मी का वास है। वे सदा लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं। देवताओं के कल्याण हेतु गोविंद मनु के वंश के होने चाहिए। उनमें श्रेष्ठ बुद्धिमत्ता है और प्रजापति के उत्कृष्ट मार्ग पर अग्रसर हैं। जिनमें धर्मपरायणता के सभी लक्षण विद्यमान हैं। यह दक्ष ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धालु हैं, इसमें विख्यात वीर हुए हैं जिनमें सदाचार के श्रेष्ठ गुण विद्यमान हैं जो धर्मप्राण विशुद्ध क्षत्रियों के वीरोचित गुण हैं। ये अनकदुंदुभी के वंशज हैं जिन्हें अपनी जाति को वासुदेव के रूप में पोषित किया। वासुदेव के यहां चतुर्भुज का जन्म होना चाहिए, वासुदेव उदारचेता ब्राह्मण सेवी हैं। ब्रह्मा के समक्ष उनकी छवि ब्राह्मण प्रिय की है। "
“हे देवताओं इस देव की यथेष्ठ पूजा करो जैसी कि अविनाशी ब्रह्मा की की जाती है। उन्हें श्रद्धा के पुष्पहार चढ़ाओ । जो मुझे पिता ब्रह्मा के रूप में पाना चाहते हैं। वे इस दैवी गौरवान्वित वासुदेव को नमन करें। इस विषय में मैं निसंकोच कहता हूं इनके दर्शन मेरे दर्शन हैं अर्थात् पिता ब्रह्मा के दर्शन तप ही इनका धन है। "
अब हमें यह देखना है कि कृष्ण को देवताओं में पहले सर्वश्रेष्ठ बाद में पतित कैसे घोषित कर दिया गया।
महाभारत में अनेक ऐसी घटनाओं का वर्णन है, जिनसे कृष्ण शिव की अपेक्षा हीन स्थान पर रखे गये हैं, उन सबका वर्णन तो करना कठिन है लेकिन कुछ को गिना जा सकता है।
पहली घटना तो यह है जब अर्जुन ने अगले दिन जयद्रथ का वध किया, उन्होंने शपथ ली थी तो अर्जुन बड़े कुण्ठित हो गए थे क्योंकि उनके मन में यह आशंका थी कि जयद्रथ के मित्र उसकी रक्षा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे और जब तक अर्जुन को ऐसा अस्त्र उपलब्ध न हो जाए, जिससे जयद्रथ का वध किया जा सके तो अर्जुन परामर्श के लिए कृष्ण के पास जाते हैं। कृष्ण अर्जुन को सलाह देते हैं कि वे महादेव से पाशुपत अस्त्र प्राप्त करें जिस अस्त्र से शिव ने स्वयं दैत्यों का संहार किया था। यदि वे इसे प्राप्त कर लेते हैं तो निश्चय ही जयद्रथ का वध किया जा सकता है।
महाभारत के द्रोण पर्व में इसका उल्लेख इस प्रकार है:
उनके पास पहुँचकर धर्मपरायण भगवान कृष्ण और पृथा पुत्र अर्जुन ने पृथ्वी पर मस्तक टेक कर वेद मंत्र पढ़ते हुए उन्हें प्रणाम किया। विश्व नियंता, अनन्त, अविनाशी देव के रूप में उनकी अभ्यर्थना की जो परम ज्ञान के स्रोत हैं, आकाश, वायु, नक्षत्रों, सागर के सृष्टा हैं, पृथ्वी के परम श्रेष्ठ तत्व हैं, देवों, दानवों, यक्षों, मानवों के सृजक हैं, साधना के परम ब्रह्म, ज्ञानियों के लिए तत्व ज्ञान का भण्डार हैं। विश्व के निर्माता और संहारक हैं, सूर्य और इन्द्र के जनक हैं। तब कृष्ण ने उन्हें श्रद्धापूर्वक सम्बोधित किया। ये दोनों योद्धा शिव की शरण में आए। अर्जुन ने बार-बार उनकी स्तुति की क्योंकि वे सभी जीवों के सृष्टा थे और त्रिकाल दर्शी थे। उन दोनों नर और नारायण को आया देख भगवान शिव बड़े प्रसन्न हुए और हंसते हुए बोले "वीरवरो, तुम दोनों का स्वागत है! उठो, विश्राम करो और शीघ्र बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है? तुम जिस काम के लिए आये हो, उसे मैं अवश्य पूर्ण करूंगा "।
भगवान शिव की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों हाथ जोड़ खड़े हो गये और उनकी स्तुति करने लगे “भगवान' आप ही संसार के स्वामी, सबके सृष्टा, एवं सर्व व्यापी हैं, आपको हम बारंबार नमस्कार करते हैं। आप भक्तों पर दया करने वाले हैं, प्रभो! हमारा मनोरथ सिद्ध कीजिये । " तदनन्तर अर्जुन ने मन ही मन भगवान शिव और श्रीकृष्ण का स्मरण किया तथा शंकर जी से कहा “भगवन! मैं दिव्य अस्त्र चाहता हूं।" यह सुनकर भगवान शंकर मुसकराये और कहने लगे “श्रेष्ठ पुरुषो । मैं तुम दोनों का स्वागत करता हूं। तुम्हारी अभिलाषा मालूम हुई, तुम जिसके लिये आये हो वह वस्तु अभी देता हूं। यहां से निकट ही एक अमृतमय दिव्य सरोवर है, उसी में मैंने अपने दिव्य धनुष और बाण रख दिये हैं, वहां जाकर बाण सहित धनुष ले आओ।"
"बहुत अच्छा"! कहकर दोनों वीर शिवजी के पार्षदों के साथ उस सरोवर पर गये। वहाँ जाकर उन्होंने दो नाग देखे, एक सूर्यमंडल के समान प्रकाशमान था और दूसरा हजार मस्तकवाला था, उसके मुख से आग की लपटें निकल रही थीं। श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों उस सरोवर के जल का आचमन करके उन नागों के पास उपस्थित हुए और हाथ जोड़कर शिवजी को प्रणाम करते हुए, रुद्रीय पाठ करने लगे। तब भगवान शंकर के प्रभाव से वे दोनों महानाग अपना स्वरूप छोड़कर धनुष बाण हो गये। इससे वे दोनों बड़े प्रसन्न हुए और उस देदीप्यमान धनुष बाण को लेकर शंकरजी के पास आये। वहां आकर उन्होंने वे अस्त्र शंकर जी को अर्पण कर दिये। तत्पश्चात् शंकरजी ने प्रसन्न होकर अपना पाशुपत नामक घोर अस्त्र अर्जुन को दे दिया। उसे पाकर अर्जुन के हर्ष की सीमा न रही, उनके शरीर में रोमांच हो आया। वे अपने को कृतकृत्य मानने लगे। फिर कृष्ण और अर्जुन दोनों ने भगवान शिव को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वे अपने शिविर में चले आये। "