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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 29 of 92
25 ऑगस्ट 2023
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बारहवीं पहेली

ब्राह्मणों ने देवताओं का मुकुट क्यों उतारा और देवियों की ताजपोशी की ?

     सामान्यतः देवताओं की उपासना सभी करते हैं, परन्तु देवियों की पूजा अनोखी होती है इसका कारण यह है कि देवता सामान्यतः अविवाहित होते हैं और कोई पत्नियां नहीं होतीं जिन्हें देवियों का स्थान दिया जा सके। देवता के विवाहित होने पर कैसा विवाद हो सकता है, यह इससे प्रकट होता है कि यहूदियों को ईसाई इस बात से सहमत नहीं कर सके कि ईसा परमात्मा के पुत्र हैं। यहूदियों ने कहा कि ईश्वर का विवाह ही नहीं हुआ तो ईसा ईश्वर पुत्र कैसे हो सकते हैं?

Vaidik aur avaidik deviya - Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     हिंदुओं में स्थिति ठीक विपरीत है। वे केवल देवताओं की उपासना ही नहीं करते बल्कि वे देवियों की पूजा भी करते हैं। यह परम्परा आरंभ से ही है।

     ऋग्वेद में अनेक देवियों का उल्लेख है जैसे पृथ्वी, अदिति, दिति, निश्तिग्री, इन्द्राणी, प्रिशनी, उषा, सूर्या, अग्नयी, वरुणानी, रौद्रसी, राका, सिनिवली, श्रद्धा, अरामति, अप्सरा और सरस्वती ।

     पृथ्वी अत्यंत प्राचीन आर्य देवी है।

     उसे द्यौस, स्वर्ग अथवा पारजन्य की पत्नी कहा जाता है। पृथ्वी बहुत महत्वपूर्ण देवी है और कई देवताओं की माता कहलाती है।

     अदिति भी कालक्रम की दृष्टि से प्राचीन वैदिक देवी है। उसे देवताओं की शक्तिशाली माता कहा गया है। मित्र, आर्यमान् और वरुण उसके पुत्र हैं। ऋग्वेद से यह पता नहीं चलता कि उसका विवाह किससे हुआ था? हम दिति के विषय में इससे अधिक कुछ नहीं जानते कि वह अदिति के समान किन्तु विपरीत देवी है। और कालातीत में हिंदू पुराणों के अनुसार देवों के शत्रु दैत्य उसी के पुत्र हैं।


अंग्रेजी के मूल लेख का शीर्षक "वैदिक और अवैदिक देवियां " था। इस अध्याय की विषय-वस्तु और अंतिम पैरा के संदर्भ में इसे पहेली 12 में सम्मिलित किया गया है। यह अंग्रेजी में इक्कीस पृष्ठ की टकित प्रति थी जिसमें लेखक ने कतिपय सुधार- संशोधन किए थे और अपने हाथ से अंतिम पैरा संशोधित किया था। - संपादक


     देवी निश्तिग्री इन्द्र की माता है और इन्द्राणी इन्द्र की पत्नी है । प्रिश्नी मारुत की माता है। ऊषा आकाश की पुत्री बताई गई है, भग की बहन और वरुण की संबंधी तथा सूर्य की पत्नी है। सूर्या सूर्य की पुत्री और अश्विनियों अथवा सोम की पत्नी है।

     अग्नयी, वरुणानी, रौद्रसी क्रमशः अग्नि, वरुण और रुद्र की पत्नियां हैं। अन्य देवियां या तो नदियों का मानवीकरण हैं अथवा उनका विवरण प्राप्त नहीं है।

     इस विश्लेषण से दो बातें स्पष्ट हैं। पहली बात यह है कि हिंदू देवता विवाह बंधन में बंध सकते हैं और उनके भक्तों को इस बात से कोई परेशानी नहीं होती कि उनका आराध्य एक आम आदमी से इस संबंध में बेहतर नहीं है। दूसरी बात यह है कि देवताओं की पत्नियां स्वतः ही पूजनीय देवी बन जाती हैं जो देव उपासकों द्वारा पूजी जाने लगती हैं।

     वैदिक काल को छोड़कर पौराणिक काल पर आते हैं तो हमारा परिचय अनेक देवियों से होता है जैसे, देवी, उमा, सती, अम्बिका, पार्वती, हेमावती, गौरी, काली, निऋति, चण्डी और कात्यायनी, दुर्गा, दसभुजा, सिंहवाहिनी, महिषासुरमर्दनी, जगत्धात्री, मुक्तकेशी, तारा, छिन्नमस्तिका, जगदगौरी, प्रत्यांगिरा, अन्नपूर्णा, गणेशजननी, कृष्णकरोर और लक्ष्मी। यह पता लगाना अत्यंत कठिन है कि इन देवियों में कौन क्या है। पहली कठिनाई तो यह है कि ये सभी अलग-अलग देवियां हैं अथवा एक देवी के कई पर्याय हैं। उनके माता-पिता के संबंध में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। न ही कोई निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि उनके पति कौन हैं?

     एक उल्लेख से उमा देवी, सती, पार्वती, गौरी और अम्बिका एक ही देवी के पर्याय हैं। दूसरी ओर कुछ ने कहा है कि देवी दक्ष की पुत्री है, अम्बिका रुद्र की भगिनी है, पार्वती के संबंध में वाराह पुराण ने उसका आविर्भाव इस प्रकार बताया¹ है।

     ब्रह्मा जब एक बार शिव से मिलने कैलास पर गए तो उन्हें सम्बोधन किया गया, “ब्रह्मा! शीघ्र कहो तुम मेरे पास क्यों आए हो?" ब्रह्मा ने उत्तर दिया, "एक शक्तिशाली असुर अंधक (अंधकार ) है जिससे सभी देव त्रस्त हैं। परित्राण के लिए आए देवों की शिकायत लेकर मैं तुम्हारे पास चला आया।" फिर ब्रह्मा ने उत्सुकता से शिव की ओर देखा जिन्होंने विचार कर विष्णु को अपने पास बुलाया। जैसे ही इन तीन देवों ने एक-दूसरे से नजरें मिलाई, उसकी आभा से एक नीलाभ दिव्य सुंदरी अवतरित हुई, जो नील कमल की पंखुड़ियों के समान थी और रत्नाभूषणो से अलंकृत थी। वह तुरंत ब्रह्मा, विष्णु और महेश के आगे नतमस्तक हो गई । जब उन्होंने पूछा कि वह कौन है और उसमें तीन श्यामल, श्वेत, लाल वर्ण क्यों हैं, उसने कहा, मैं आपकी दृष्टि से उत्पन्न हुई हूं। क्या आप अपनी सर्वशक्तिमान ऊर्जा से परिचित नहीं? ब्रह्मा ने उसकी प्रशंसा में कहा, "तेरा नाम त्रिकाल (भूत, वर्तमान और भविष्य) की देवी रहेगा, संसार की पालक होगी और विभिन्न पूजाओं में तेरी पूजा होगी क्योंकि तू अपने भक्तों के मनोरथ पूरे करेगी। परन्तु हे देवी! तू अपने वर्णों के अनुसार तीन भाग कर ले। तब ब्रह्मा के कहे अनुसार उसने अपने रंगों के अनुसार तीन भाग कर लिए, एक श्वेत, दूसरा लाल और तीसरा श्याम। पहली अनिंद्य सुन्दरी सरस्वती थी और सृष्टि रचना में उसने ब्रह्मा का हाथ बंटाया, लाल वर्ण की विष्णुप्रिया लक्ष्मी थी, जिसने विश्व का पालन किया, तीसरी पार्वती थी, जिससे शिव को अनेक गुण और शक्ति प्राप्त हुई ।


1. विलकिंस में उद्धृत "हिंदू माइथालोजी" पृ. 290-91


     यह बताने का प्रयास किया गया है कि सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती एक ही देवी के तीन रूप हैं। हमें ध्यान रहता है कि सरस्वती ब्रह्मा की पत्नी है। लक्ष्मी विष्णु की और पार्वती शिव की और ब्रह्मा, विष्णु और शिव के बीच संघर्ष भी हुआ। वाराह पुराण की यह व्याख्या बेतुकी लगती है।

     गौरी कौन है ? पुराण कहता है गौरी पार्वती का दूसरा नाम है। पार्वती गौरी¹ क्यों कहलाई? इसका कारण है कि जब शिव और पार्वती कैलास पर्वत पर रहते थे तो उनके बीच कई बार झगड़ा हो जाता था। एक बार शिव ने उन्हें श्याम रंग की बता कर निंदा की। इस कटाक्ष से वह इतनी दु:खी हुई कि घने जंगलों में चली गई और घोर तपस्या की। अंत में बह्या प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया जिससे उनका वर्ण कुन्दन जैसा हो गया। इस कारण वह गौरी के नाम से विख्यात हुई ।

     दूसरी देवियों के विषय में यह निश्चित नहीं कि वे एक ही देवी के पर्यायवाची नाम हैं अथवा इन नामों की भिन्न-भिन्न देवियां हैं। महाभारत में अर्जुन ने दुर्गा के विषय में एक श्लोक पढ़ा जिसके अनुसार वह कहता है² :

     तेरा नमन है, सिद्ध सेनानी, भद्रे, मंदरावासिनी, कुमारी, काली, कपाली, कपिला, कृष्ण पिंगला, तेरा नमन है, भद्रकाली, तेरा नमन है, महाकाली, चण्डी, चण्ड, तारिणी, वारावारुणी, (सुन्दर - रंगरंजित) हे महाभाग्या कल्याणी, ओ कराली, ओ विजया, ओ जया, कृष्ण की अनुजा, महिषारक्त पायी, ओ उमा, शाकम्भरी, तू गौरांग, तू श्यामलांग, ओ कैटभ हंता, ओ विज्ञान, तू वेदों की कला - ज्ञान है, सभी भूतों की महानिद्रा, ओ स्कंद (कार्तिकेय) जननि, देवी दुर्गा कमलासिनी, तू महादेवी है। मैं शुद्ध हृदय से महादेवी की स्तुति करता हूं, तेरी कृपा से मैं युद्ध में विजयी होऊ ।


1. विलकिस, पृ. 289-90
2. वही. पृ. 306-7


     इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि यह देवियों का उपरोक्त उल्लेख मात्र वे दुर्गा केही पर्याय हैं साथ ही दसभुजा, सिंहवाहिनी, महिषासुरमर्दिनी, जगद्धात्री, छिन्नमस्तिका, जगत गौरी, प्रत्यागिरी, अन्नपूर्णा, दुर्गा के ही नाम हैं या उनके विभिन्न रूप हैं।

     इस प्रकार दो प्रधान देवियां हैं। एक पार्वती और दूसरी दुर्गा। बाकी उन्हीं के नाम हैं। पार्वती दक्ष प्रजापति की पुत्री और शिव की पत्नी है। दुर्गा कृष्ण की बहिन और शिव पत्नी है। दुर्गा और काली के विषय में पता नहीं चलता। अर्जुन द्वारा पढ़े गए श्लोक में दुर्गा और काली एक ही हैं। परन्तु लिंग पुराण में भिन्न मत प्रकट किया गया है। उसके अनुसार¹ काली और दुर्गा अलग-अलग हैं।

     इतिहास का विद्यार्थी वैदिक और पौराणिक देवियों के बीच तुलना की उपेक्षा नहीं कर सकता जिसका उद्देश्य मात्र इतहास लिखना नहीं, उसका विश्लेषण करना भी होता है। दोनों के बीच में एक विरोधाभास है। वैदिक देवियों की उपासना मात्र औपचारिकतावश की जाती है। उनकी पूजा मात्र इसलिए की जाती है कि वे देव पत्नियां हैं। पौराणिक देवियों की पूजा भिन्न प्रकार की है। उनकी पूजा का अपना आधार है। यह नहीं कि वे देव - पत्नियां हैं। भिन्नता इसलिए है कि वैदिक-देवियां कभी रणक्षेत्र में नहीं गई और ना ही किसी प्रकार का शौर्य-प्रदर्शन किया। पौराणिक देवियां रणचंडी हैं। और उन्होंने वीरता दिखाई है। उनकी पूजा औपचारिकता नहीं है । इसका कारण उनकी वीरता और पराक्रम है।

     कहा जाता है कि दुर्गा और दो असुरों के बीच हुए घमासान युद्ध के कारण ही दुर्गा की प्रसिद्धि हुई। यह कहानी मार्कण्डेय पुराण में विस्तृत रूप से कही गई है। इसके अनुसार:²


1. विलकिस, हिंदू माइथोलाजी, पृ. 313
2. वही. पृ. 302-6


     "त्रेता युग के अंत में शुभ, निशुंभ नामक दो बलशाली असुरों ने दस हजार वर्ष तक घोर तपस्या की। इसके कारण स्वर्ग से शिव प्रकट हुए जिन्हें पता चला कि अपनी विलक्षण तपस्या के आधार पर वे अमरता का वरदान चाहते हैं। उन्होंने दोनों को बहुत समझाया और इस बात का असफल प्रयास किया कि वे किसी अन्य वरदान से संतुष्ट हो जाएं। जब उनका मनोरथ पूरा न हुआ तो उन्होंने एक हजार साल तक और कठिन तपस्या की। शिव फिर प्रकट हुए और उनको वही वर देने से इंकार कर दिया। फिर वे सिर के बल उल्टे लटक गए और नीचे धीमी अग्नि जला ली। उन्होंने 800 साल तक तपस्या की जब तक उनकी गर्दन से रक्त नहीं बहने लगा। यह सोचकर कि कहीं ऐसे प्रचण्ड तप से ये हमारा सिंहासन ही न छीन लें, देवतागण कांप उठे । देवराज ने एक सभा बुलाई और अपनी आशंका जताई। उन्होंने स्वीकार किया कि यह गंभीर बात है परन्तु पूछा कि इसका उपाय क्या है? इन्द्र के परामर्श पर कंदर्प (कामदेव ) परम सुंदरी अप्सराओं सम्भा और तिलोत्तमा को साथ लेकर महाबलि असुरों की कामुकता जगाने हेतु उनके पास भेजे गए। कंदर्प ने अपने (प्रेम) बाण छोड़े और असुरों को घायल कर दिया। ये युगल सुन्दरियों के जाल में फंस कर मोहित हो गए और तपस्या भंग कर दी। इन सुंदरियों के साथ उन्होंने पांच हजार वर्ष बिताए । फिर उन्हें ध्यान आया कि कामुकता के कारण उनकी अमरता की आशा पर पानी फिर गया है। उनको संदेह हुआ कि यह जाल इन्द्र की मिलीभगत से ही बिछाया गया है, इसलिए स्वर्ग के मोह में उन्होंने फिर पूजा आरम्भ कर दी। एक हजार वर्ष तक यह क्रम जारी रखा, जब तक कि वे कंकाल न बन गए। शिव प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे देवताओं से बढ़कर बलशाली होंगे।

     देवताओं से अधिक बलशाली होकर उन्होंने उनसे युद्ध छेड़ दिया। दोनों पक्षों में घमासान संघर्ष के पश्चात् असुर विजयी रहे। जब इन्द्र और अन्य देवताओं की स्थिति दयनीय हो गई तो उन्होंने ब्रह्मा और विष्णु की सहायता मांगी। दोनों ने उन्हें शिव के पास भेज दिया। शिव ने कहा कि वे कुछ करने में समर्थ नहीं हैं। उन्हें याद दिलाया गया कि इसके कारण तो वही हैं, उन्हीं के वरदान के फलस्वरूप वे बरबाद हो रहे हैं। तब शिव ने उन्हें देवी दुर्गा की तपस्या करने की सलाह दी। उन्होंने ऐसा ही किया। कुछ समय पश्चात् देवी प्रकट हुई और उन्हें वर दिया। फिर अपने-आप एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और पानी का एक घड़ा लेकर वह देवताओं के बीच से गुजरी। फिर उन्होंने अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया और कहा कि तुम मेरी स्तुति करो।