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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
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     यह नई देवी हिमालय पर्वत पर गई, जहां शुंभ-निशुंभ के दो दूत चण्ड-मुण्ड रहते थे। जब ये दैत्य पर्वत पर विचर रहे थे तो उन्होंने देवी को देखा और वे उसका रूप देखकर चकित रह गए। उन्होंने अपने-अपने स्वामी गण से इसका वर्णन किया और देवी को प्राप्त करने के लिए उकसाया चाहे उन्हें अपनी सारी निधियां भी न्यौछावर क्यों न करनी पड़े, जो उन्होंने स्वर्ग के देवताओं से लूटी हैं।

Vaidik aur avaidik deviya - Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     शुंभ ने देवी के पास सुग्रीव को संदेशवाहक के रूप में भेजा कि वह कहे कि तीनों लोकों का सुख उसके प्रासाद में है। जो भेंट कभी देवताओं को चढ़ाई जाती थी, अब उसे चढ़ाई जा रही है। देवी ने कहा- प्रस्ताव बहुत ठीक है । परन्तु उन्होंने यह संकल्प किया है कि वह उसी से विवाह रचायेगी जो उसे युद्ध में जीतेगा और उसका मान मर्दन करेगा।

     सुग्रीव निष्फल लौटना नहीं चाहता था। उसने देवी से हामी भरवाने के लिए गरजकर कहा "क्या वह उसके स्वामी को जानती है? जिसके समक्ष विश्व को कोई व्यक्ति नहीं टिक सकता चाहे वह देवता हो, दैत्य हो, अथवा मनुष्य हो ? तब क्या एक स्त्री होकर वह इस प्रस्ताव को ठुकराने का दुस्साहस कर सकती है? क्योंकि उसके स्वामी का आदेश है, वह तुम्हें उनके समक्ष तुरंत प्रस्तुत करने को विवश कर सकता है। देवी ने कहा यह ठीक है परन्तु उन्होंने अपना संकल्प दोहराया और कहा कि वे अपने स्वामी को मनाएं और वह उनके साथ अपनी शक्ति - परीक्षा करें।

     दूत वापस चला गया और अपने स्वामी से सब कहा सुनाया। यह सुनकर शुंभ क्रोध से जल उठा और कोई उत्तर दिए बिना उसने अपने सेनापति धूम्रलोचन को बुलाया उसे हिमालय जाकर देवी को पकड़ लाने का आदेश दिया और कहा यदि कोई रक्षा के लिए आए तो उसे वहीं नष्ट कर देना ।

सेनापति हिमालय पर गया और देवी को अपने स्वामी का आदेश सुनाया। उन्होंने मुस्कराते हुए आदेश पालन की सलाह दी। उस वीर के आने पर देवी ने एक भयानक गर्जना की, जिससे वह भस्मीभूत हो गया। इसके पश्चात् उन्होंने दैत्य की सेना नष्ट कर दी। केवल कुछ भगोड़ों को छोड़ दिया जिससे कि वे उसे समाचार दे सकें। शुंभ-निशुंभ आपे से बाहर हो गए और चण्ड-मुण्ड को पठाया । पर्वत पर जाकर उन्होंने देखा कि एक स्त्री गधे पर बैठी अट्टहास कर रही है। उन्हें देखकर वह कुपत हो गई और उनकी सेना के दस बीस और तीस सैनिकों को एक साथ उठा उठा कर ऐसे खाने लगी जैसे कोई फल खाता है। उन्होंने फिर मुंड को केशों से पकड़ा और उसका सिर काट कर अपने मुख के ऊपर लटका कर उसका खून पी गई। चण्ड ने जब एक वीर की गति देखी तो वह देवी की ओर बढ़ा, पर वह सिंह पर चढ़ गई और उस पर झपट पड़ी और उसका भी वही हाल किया जो मुण्ड का किया था। उसके बहुत से सैनिकों को खा लिया और घायलों का खून पी लिया।
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     महाबलियों ने जैसे ही यह चिंताजनक समाचार सुना, उन्होंने स्वयं जाने का संकल्प किया और अपने सैनिकों को एकत्र करके असंख्य वीरों को लेकर हिमालय की  ओर बढ़े। देवताओं ने इस विशाल सेना को आश्चर्यपूर्वक देखा और देवी महामाया (दुर्गा) की सहायता के लिए आरोहित हुई, जिन्होंने शीघ्र ही शुंभ-निशुंभ के सेनानायक अपने शत्रु रक्तबीज को नष्ट कर दिया। उन्होंने देखा कि देवी ने उसकी पूरी सेना का सफाया कर दिया। यद्यपि उन्होंने रक्तबीज के पूरे शरीर को छलनी कर दिया किन्तु उसके रक्त की एक-एक बूंद से एक-एक सहस्त्र उतने ही बलशाली रक्तबीज पैदा हो गए। इस प्रकार असंख्य शत्रुओं ने दुर्गा को घेर लिया। देवों ने देखा कि देवी के लिए संकट उत्पन्न हो गया है। इस अवसर पर दुर्गा के साथ लड़ रही काली से कहा कि यदि वह रक्तबीज के रक्त की बूंद धरती पर गिरने से पहले ही पी जाएगी तो चण्डी उससे लड़कर उसकी चाल विफल कर देगी। काली ने स्वीकार कर लिया। इस प्रकार सेनानायक सहित पूरी सेना को मौत के घाट उतार दिया गया।

     अब शुंभ-निशुंभ ने निराश होकर देवी को द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारा। पहले शुंभ मैदान में आया। दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ। बाद में दोनों महाबलि काल-कवलित हुए। काली ने जम कर रक्तपान किया। देवताओं और देव पत्नियों ने देवी वीरांगना का जय-जयकार किया। देवी ने उन्हें आशीर्वाद दिया । "

     मार्कण्डेय पुराण में विभिन्न रूपों में दुर्गा के वीरोचित कार्यों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है। वह कहता है:

     "दुर्गा के रूप में उन्होंने दैत्यों का संदेश ग्रहण किया, दस भुजा के रूप में उन्होंने उनकी सेना का संहार किया, सिंहवाहिनी के रूप में रक्तबीज से लड़ी, महिषासुर मर्दनी के रूप में महिषासुर रूपी शुंभ का हनन कया । जगतधात्री के रूप में उन्होंने दैत्यों की सेना का संहार किया। काली के रूप में रक्तबीज का नाश किया। मुक्तकेशी के रूप में उन्होंने दैत्यों की दूसरी सेना को समाप्त कर दिया। तारा बनकर शुंभ को उसके वास्तविक रूप में मौत के घाट उतारा, छिन्नमस्तका के रूप में उन्होंने निशुंभ का वध कया, जगद-गौरी (स्वर्णवर्णा) बनकर उन्होंने देवताओं का अभिवादन और आभार स्वीकार किया।"

     वैदिक तथा पौराणिक देवियों की तुलना में कुछ रोचक प्रश्न उभरते हैं। इनमें से एक स्वाभाविक है। वैदिक साहित्य में असुरों के साथ युद्ध के अनेक कारण हैं। ब्राह्मण साहित्य में भी उसकी आवृति है । परन्तु असुरों के साथ सभी युद्ध वैदिक देवों ने लड़े। वैदिक देवियां उनमें सम्मिलित नहीं हुई थीं।

     पौराणिक देवियों के संबंध में स्थिति बिल्कुल भिन्न है। पौराणिक काल में भी वैदिक काल की भांति असुरों से युद्धों का विवरण है। भिन्नता यह है कि वैदिक काल में असुरों से देवता लड़े, लेकिन पौराणिक काल में देवियां लड़ीं। ऐसा क्यों है? क्योंकि पौराणिक काल में वह कार्य देवियों को करना पड़ा, जो वैदिक काल में देवों ने किया? यह बात नहीं है कि पौराणिक काल में देवता विद्यमान नहीं थे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव मौजूद थे, जिनका पौराणिक काल में आधिपत्य रहा। जब वे असुरों से युद्ध के लिए मौजूद थे तो देवियां इस उद्देश्य से क्यों आगे आई। इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता नहीं मिलता और इसका उत्तर चाहिए।

     दूसरा प्रश्न यह है कि शक्ति का वह स्रोत क्या है जो पौराणिक देवियों में विद्यमान था और वैदिक देवियों में नहीं था? पौराणिकों का उत्तर है कि देवताओं की शक्ति ही देवियों में निहित थी। सामान्य सिद्धांत यह था कि प्रत्येक देव में शक्ति थी और वही शक्ति उनकी पत्नियों में विराजमान थी । यह सिद्धांत इतना प्रचलित हुआ कि देवियां शक्ति कहलाने लगीं और देवियों के उपासक शाक्त कहलाए।

     इस सिद्धांत के संबंध में कुछ प्रश्न उठते हैं:-

     पहला यह कि यद्यपि पुराणों में अनेक देवियों के नाम हैं। किन्तु उनकी संख्या वास्तव में पांच ही है। सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती, दुर्गा और काली । सरस्वती और लक्ष्मी, ब्रह्मा और विष्णु की पत्नियां हैं, जो शिव की भांति ही पौराणिक देवता हैं। पार्वती, दुर्गा और काली शिव की पत्नियां हैं। सरस्वती और लक्ष्मी ने किसी असुर का संहार नहीं किया और कोई वीरता नहीं दिखाई। प्रश्न है क्यों? ब्रह्मा और विष्णु में भी शक्ति थी फिर उस सिद्धांत के अनुसार उनकी पत्नियों में भी संनिहित होनी चाहिए थी । फिर सरस्वती और लक्ष्मी ने असुरों के विरुद्ध युद्ध क्यों नहीं किया? यह भूमिका केवल शिव पत्नियों के लिए ही थी। यहां भी पार्वती की भूमिका दुर्गा से भिन्न थी । पार्वती एक सामान्य नारी दिखाई गई है। दुर्गा की भांति वह भी शिव की शक्ति है। पार्वती में शिव की शक्ति इतनी शिथिल, साधारण और निष्क्रिय क्यों है ?

     दूसरा प्रश्न यह है क देवियों की स्वतंत्र रूप से पूजा आरंभ करने का यह औचित्य सही लगता है परन्तु तार्किक और ऐतहासिक दृष्टि से इसे स्वीकार करने में कठिनाई है। शुद्ध तार्किक दृष्टि से देखें तो यदि प्रत्येक देव में शक्ति है तो फिर वैदिक देवों में भी वह शक्ति होनी चाहिए थी। फिर वैदिक देवों की पत्नियों पर यह सिद्धांत लागू क्यों नहीं होता ? यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो यह कहने का कोई औचित्य नहीं है कि पौराणिक देवों में भी यह शक्ति विद्यमान थी ।

     फिर ऐसा लगता है कि ब्राह्मणों ने यह नहीं सोचा कि उन्होंने मात्र दुर्गा को ही वीरांगना बताया है जिसने असुरों का संहार किया। इससे उनके अपने ही देवता दयनीय तथा पामर अथवा कायर सिद्ध होते हैं। ऐसा प्रकट होता है कि देवता असुरों से अपनी रक्षा नहीं कर पाए और उन्हें अपनी पत्नियों का सहारा लेना पड़ा। इस संबंध में मार्कण्डेय पुराण का एक उदाहरण ही पर्याप्त है कि पौराणिक देव कितने दुर्बल थे, और ब्राह्मणों के अनुसार कैसी दुर्बलता उन्होंने असुरों के समक्ष दिखाई। मार्कण्डेय पुराण कहता है:

     'दैत्यों के राजा महिष ने एक बार युद्ध में देवताओं को इतनी पटखनी खिलाई कि वे धरती पर भिखारियों की तरह घूमते थे। पहले इन्द्र उन्हें ब्रह्मा के पास ले गए फिर शिव के । क्योंकि ये दोनों देव कोई भी सहायता करने की स्थिति में नहीं थे, वे विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु उनका संताप देखकर इतने दुखी हुए कि उनके नेत्रों से एक प्रभा उत्पन्न हुईं, उसमें से एक नारी रूप प्रकट हुआ, जिसका नाम महामाया ( दुर्गा का दूसरा नाम ) था । अन्य देवताओं के मुखों से भी आभा फूटी। वह भी महामाया में समा गई, इसका परिणाम यह निकला कि वह आभा पुंज बन गई जैसे कि अग्नि का पर्वत हो । वह वायुमंडलन में उड़ गई और दैत्यों को पछाड़ा तथा देवताओं की रक्षा की।”

     ऐसे कायर देवों में शक्ति कहां थी? जब उनमें शक्ति नहीं थी तो वे अपनी पत्नियों को कैसे दे सकते थे ? यह कहना कि देवियों में शक्ति थी, मात्र एक पहेली ही नहीं है, वरन् एक विसंगति है। इसका उत्तर कोई नहीं दे पाता कि शक्ति के सिद्धांत का अनुसंधान क्यों किया गया? क्या ब्राह्मणों ने धर्म के नाम पर नये सिद्धांत को गढ़कर देवी - पूजा प्रारंभ नहीं की और देवताओं का अपमान नहीं किया ?