हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अब हम कृष्ण पर आते हैं।
कृष्ण नाम के चार व्यक्ति हुए हैं। एक कृष्ण सत्यवती के पुत्र और धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर के पिता हैं, दूसरे कृष्ण सुभद्रा के भाई और अर्जुन के मित्र हैं, तीसरे कृष्ण मथुरा के वासुदेव और देवकी के पुत्र हैं, चौथे कृष्ण गोकुल के नंद और यशोदा के पुत्र हैं जिन्होंने शिशुपाल वध किया। यदि कृष्ण गोकुल के नंद और यशोदा के पुत्र हैं, जिन्होंने शिशुपाल वध किया, यदि कृष्ण भक्तों के कृष्ण वही हैं जो देवकी के पुत्र हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वे वेद द्रोही थे। छादोग्य उपनिषद् में आया है कि ऐसा लगता है कि वे घोर आंगिरस कुल से थे। घोर आंगिरसों ने उन्हें क्या शिक्षा दी ? छांदोग्य उपनिषद कहता है:
'आंगिरस के कुल से घोरों ने देवकी पुत्र कृष्ण से कहा (रहस्यमय दंतकथा ) कि वे इच्छा रहित हैं जैसे मृत्यु के समय मनुष्य को तीन बातें कहीं जाती हैं। तुम अविनाशी हो, तुम अक्षय हो, और तुम जीव के सूक्ष्म तत्व हो ।
घोर जाति के आंगिरस कुल के एक व्यक्ति ने देवकी पुत्र कृष्ण को यज्ञ की यह पद्धति बताई और उसके अनुगामियों ने तब कहा, आदि। इस क्रम में अंतिम शब्द कहा 'उन' इन तीनों के पश्चात् हैं... और इस सिद्धांत को सुनकर वह प्रत्येक ज्ञान सभी इच्छाओं के प्रति वीतरागी हो गए। पुरुष यज्ञ के इस ज्ञान की उन्होंने इस प्रकार प्रशंसा की। यह इतना विलक्षण है कि उसने देवकी पुत्र कृष्ण की अन्य ज्ञान के प्रति सभी तृष्णाओं को शांत कर दिया। अब वह यह बताते हैं जो घोर अंगिरस ने कृष्ण को गुरुमंत्र देते हुए कहा था, वह इस प्रकार है- " जो अपने मृत्यु काल में उपरोक्त यज्ञ से भिज्ञ होता है वह इन तीन शब्दों को कह " प्रणसमसितम् " जिसका अर्थ है, तू ही अति सूक्ष्म है, तू ही अति गूढ़ प्राण तेज है। "
यह स्पष्ट है कि घोर आंगिरस ने कृष्ण को आध्यात्मिक मुक्ति का जो उपदेश दिया, वह वेदों और वैदिक उपासना के प्रतिकूल थी। इसके विपरीत विष्णु वैदिक देव हैं फिर भी उनकी उपासना शिव उपासना के काफी समय बाद आरंभ हुई। यह समझना अत्यंत कठिन है कि विष्णु की इतनी उपेक्षा क्यों हुई?
इसी प्रकार राम यद्यपि वेदद्रोही नहीं है तथापि वेदों में उनका उल्लेख नहीं है। उनकी उपासना की क्या आवश्यकता थी? वह भी इतने दिनों बाद ?
एक पूर्व अध्याय में ब्रह्मा, विष्णु और शिव के उत्थान - पतन का प्रसंग पहले ही आ चुका है। पद और सत्ता का संघर्ष इन तीनों देवताओं तक सीमित था । उन्हें किसी तीसरे देवता से नीचे की कोटि में नहीं रखा गया । परंतु एक समय आया जब इन्हें श्री नामक एक देवी के नीचे माना जाने लगा । यह कैसे हुआ? यह देवी भागवत में वर्णित है। देवी भागवत¹ का कथन है कि श्री नामक देवी से संपूर्ण जगत की उत्पत्ति हुई और यही देवी है जिसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव को उत्पन्न किया। देवी भागवत का मत है कि देवी की इच्छा अपनी हथेलियां रगड़ने की हुई। हथेलियां रगड़ने से एक चमक निकली। उस चमक से ब्रह्मा पैदा हुए। जब ब्रह्मा पैदा हो गए तो देवी ने उससे विवाह करने को कहा। ब्रह्मा ने यह कहकर इंकार कर दिया कि वह तो उनकी मां हैं। देवी कुपित हो उठी और उसने अपने कोप से ब्रह्मा को भस्म कर दिया। देवी ने दूसरी बार अपनी हथेलियां रगड़ी, फिर चमक पैदा हुई और दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ। वह था विष्णु । देवी ने विष्णु से भी अपने साथ विवाह करने को कहा । विष्णु ने यह कहकर अनिच्छा प्रकट की कि वह उनकी मां है। देवी को क्रोध आया और विष्णु को भी जलाकर राख कर दिया। देवी ने तीसरी बार हथेलियां रगड़ीं और तीसरी चमक में तीसरा पुत्र उत्पन्न हुआ। वह थे शिव। देवी ने शिव से विवाह करने के लिए कहा। शिव ने कहा “मैं तुम्हें दूसरा शरीर धारण कराता हूं।" देवी तैयार हो गई। तभी शिव की दृष्टि राख के दो ढेरों पर पड़ी। देवी ने कहा ये तुम्हारे दो भाई हैं जिन्हें मैंने जलाकर राख कर दिया क्योंकि उन्होंने मुझसे विवाह करने से इंकार कर दिया था। इस पर शिव ने कहा, "मैं अकेला कैसे विवाह कर सकता हूं? आप दो स्त्रियां और उत्पन्न करें जिससे हम तीनों का विवाह हो सके। देवी ने वैसा ही किया जैसा शिव ने कहा था और तीनों देवों ने देवी, और उसके द्वारा उत्पन्न दो देवियों से विवाह कर लिया। इस कथा के दो बिन्दु हैं। एक यह कि शिव ने यद्यपि पापकर्म किया तब भी इस भय से वे अधिक पाप नहीं कर पाए कि कहीं अपने दोनों प्रतिद्वंद्वियों की अपेक्षा उनकी प्रतिष्ठा गिर न जाए । और भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश का स्थान नीचे आ गया क्योंकि वे देवी द्वारा उत्पन्न हुए।
1. सत्यार्थ प्रकाश में संक्षिप्तीकरण ।
ब्रह्मा, विष्णु और शिव के उत्थान - पतन के विश्लेषण के पश्चात् दो नए देवों कृष्ण और राम के संबंध में उलट-फेर पर विचार करना शेष है।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश की अपेक्षा कृष्ण की उपासना में कुछ कृत्रिमताएं हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जन्मजात भगवान थे। कृष्ण एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें भगवान मान लिया गया। उन्हें कदाचित इस कारण देवत्व प्राप्त हुआ कि उन्हें विष्णु का अंशावतार माना जाता है।¹ परन्तु इसके बावजूद उन्हें उनके दुराचार के कारण, उन्होंने गोपियों के साथ किया, अपूर्ण अवतार माना जाता है। यदि वह विष्णु के पूर्ण और विशुद्ध अवतार होते तो उनके वह कर्म अक्षम्य होते।
इसके बावजूद सामान्य पुरुष कृष्ण सर्वोपरि बन गए। श्रीकृष्ण कितने महान बन गए, वह भगवतगीता के अध्याय दस और चौदह से परिलक्षित है। इन अध्यायों में कृष्ण कहते हैं:
“हे कुरुश्रेष्ठ, अब (मैं) तेरे लिए अपनी दिव्य विभूतियों को प्रधानता से कहूंगा क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है। हे गुडाकेश (अर्जुन), मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूं तथा (सम्पूर्ण) भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूं। मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु अर्थात् वामन अवतार (और) ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूं तथा मैं (उनचास) वायु देवताओं में मरीचि नामक वायु देवता, (और) नक्षत्रों में नक्षत्र का अधिपति चन्द्रमा हूं। वेदों में सामवेद हूं, देवों में इन्द्र हूं और इन्द्रियों में मन हूं। भूतप्राणियों में चेतना अर्थात् ज्ञान - शक्ति हूं।
1. देखें म्यूर, खंड 4, पृ. 49
एकादश रुद्रों में शंकर हूं और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूं और मैं आठ वसुओं में अग्नि हूं (तथा) शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूं। पुरोहितों में मुख्य अर्थात् बृहस्पति हूं। तू मुझ को जान हे पार्थ! सेनापतियों में मैं स्वामी, कार्त्तिकेय और जलाशयों में समुद्र हूं। मैं महर्षियों में भृगु (और) वचनों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूं। तथा सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पर्वत हूं। सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष और देवऋषियों में नारद मुनि (तथा) गंधवों में चित्ररथ (और) सिद्धों में कपिल मुनि हूं। घोड़ों में अमृत से उत्पन्न उच्चैश्रवा नामक घोड़ा, हाथियों में ऐरावत नामक हाथी तथा मनुष्यों में राजा मुझे ही जान। मैं शस्त्रों में वज्र और गऊओं में कामधेनु हूं और (शास्त्रोक्त रीति से) संतान की उत्पति हेतु कामदेव हूं। सर्पों में सर्पराज वासुकि हूं। मैं नागों में शेषनाग और जलचरों में उनका अधिपति जल देवता हूं और पितरों में अर्चना नामक पित्रेश्वर (तथा) शासन करने वालों में यमराज मैं हूं। मैं दैत्यों में प्रहलाद और गणनाकारों में मृत्यु का स्वामी (काल, समय) हूं तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़हूं।
"मैं पवित्र करने वालों में वायु (और) शस्त्रधारियों में राम हूं तथा मछलियों में मगरमच्छ हूं, नदियों में भागीरथी गंगा हूं। हे अर्जुन! सृष्टियों में आदि, अंत और मध्य भी मैं ही हूं तथ मैं विद्याओं में आध्यात्मिक विद्या अर्थात् ब्रह्म विद्या ( एवं) परस्पर में विनोद करने वालों में तत्व निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूं। मैं अक्षरों में आकार, समासों में द्वंद्व हूं, (तथा) अक्षय काल अर्थात् काल का भी महाकाल और विराट स्वरूप, सबका धारण करने वाला (भी) मैं ही हूं। तथा मैं गेय श्रुतियों में बृहत्साम, छंदों में गायत्री छंद, महीनों में मार्गशीर्ष का महीना और ऋतुओं में वसंत ऋतु मैं ही हूं। मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूं, (तथा) मैं जीतने वालों की विजय हूं और निश्चय करने वालों का निश्चय, सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूं। वृष्णि वंशियों में वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तुम्हारा सखा और पाण्डवों में धनंजय एवं मुनियों में वेद व्यास, कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूं। मैं दमन करने वालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूं। जीतने की इच्छा करने वालों की नीति हूं। (और) गोपनीय भावों में मौन हूं और ज्ञान वालों का तत्वज्ञान मैं ही हूं और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूं क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है जो मुझ से रहित हो ।
"जो तेज सूर्य में स्थित हो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो (तेज) चन्द्रमा में स्थित है और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान । मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूं और रसस्वरूप अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को पुष्ट करता हूं। मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ, वैश्वानर अग्नि रूप होकर प्राण और अपान में युक्त हुआ चार प्रकार के अन्न को पचाता हूं और मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूं। मेरे से ही स्मृति - ज्ञान प्रकट होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूं। वेदांत का कर्ता और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूं, संसार में नाशवान और अविनाशी दो प्रकार के पुरुष हैं उनमें सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के शरीर तो नाशवान हैं और जीवात्मा अविनाशी कही जाती है, उत्तम पुरुष तो अन्य ही हैं जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका भरण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमात्मा कहलाता है क्योंकि मैं नाशवान का प्रणेता हूं। सर्वथा अतीत हूं और (माया में स्थित ) अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूं, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूं।"
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जहाँ तक गीता का संबंध है, कृष्ण से महानतम कोई नहीं है। वह अन्य सभी देवों से उत्तम है।