मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 24 of 92
25 ऑगस्ट 2023
Book
5,7,2,1,,

ग्यारहवीं पहेली

ब्राह्मणों ने देवताओं का उत्थान - पतन क्यों किया ?

     हिंदुओं को मूर्तिपूजक होने का दोषी ठहराया जाता है । परन्तु मूर्तिपूजा में कोई हर्ज नहीं। मूर्ति बनाना और बनाना और देवताओं के चित्र बनाना समान है और यदि चित्र बनाने पर कोई आपत्ति नहीं है तो मूर्ति बनाने पर क्या आपत्ति हो सकती है ? हिंदुओं की मूर्तिपूजा पर वास्तविक आपत्ति यह है कि यह मात्र चित्रकारी नहीं है, मूर्ति की मात्र रचना नहीं है यह सब उससे अधिक है। हिंदू मूर्ति प्राणवान बताई जाती है और वही सब कार्य करती है जो मनुष्य करता है। प्राणप्रतिष्ठा से उनमें जान डाल दी जाती है। बौद्ध भी मूर्तिपूजक हैं। परन्तु जिस मूर्ति अथवा चित्र की वे पूजा करते हैं, वे मात्र प्रतीक हैं। ब्राह्मणों ने हिंदू देवी-देवताओं को जीवंत घोषित क्यों किया? यह एक प्रश्न है जिसके उत्तर की आवश्यकता है। परन्तु इस अध्याय में इस उत्तर की गुंजाइश नहीं है।

Rise and Fall of the Gods - Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     हिंदुओं पर जो दूसरा आरोप लगाया जाता है वह है- बहुदेववादी होने का अर्थात् वे बहुत से देवताओं के पूजक हैं। इस संबंध में भी केवल हिंदू ही इस आरोप से ग्रस्त नहीं हैं। अन्य समाजों में भी बहुदेववाद का प्रचलन है। हम केवल दो को गिनाते हैं। रोमन और यूनानी भी मूलतः बहुदेववादी हैं। वे भी अनेक देवताओं को मानते हैं। इसलिए इस लांछन में कोई दम नहीं।

     हिंदुओं पर जो बड़ा आरोप लगाया जा सकता है, अधिकांश लोग उससे परिचित नहीं। वह है कि हिंदू अपने देवों की उपासना में अटल विश्वासी नहीं। उनमें एक देवता के प्रति आस्था श्रद्धा का अभाव है। हिंदू देवताओं के इतिहास में यह सामान्य बात है कि कुछ देवताओं की कभी उपासना होती रही और कालांतर में बंद हो गई और उन देवताओं को कचरे में डाल दिया गया। बिल्कुल ही नए देवताओं की मान्यता हो गई और पूर्ण भक्ति भाव से उनकी उपासना होने लगी । फिर ये देव भी अप्रासंगिक हो गए और देवताओं के बीच संघर्ष का क्रम चल रहा है। यह ऐसी बात है जो विश्व के किसी अन्य सम्प्रदाय में दृष्टिगोचर नहीं ।


लेखक द्वारा स्व हस्तलिपि में संशोधित यह तैतालीस पृष्ठ की पाण्डुलिपि प्राप्त हुई थी। अंतिम पैरा लेखक ने स्वयं कलम से लिखा था। इस अध्याय का मूल शीर्षक 'राइज एंड फाल आफ दि गाड्स' था। इस शीर्षक को लेखक ने नीली स्याही की कलम से काट दिया था जैसी कि आम तौर पर लेखकीय परंपरा है। संपादक


     इस कथन को बिना आपत्ति के स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि हिंदू अपने देवताओं के विषय में इतने हल्के विचार रखते थे। कुछ उदाहरण देना आवश्यक है। सौभाग्य से उनकी भरमार है। आजकल हिंदुओं के चार देवता है। (1) शिव, (2) विष्णु, (3) राम, और (4) कृष्ण । प्रश्न यह है कि क्या हिंदुओं के यही देवता हैं जिनकी आदिकाल से पूजा-अर्चना होती आ रही है ?

     हिंदू देव- कुल में देवों की संख्या सर्वाधिक है। संख्या की दृष्टि से संसार का कोई धर्म इस देवकुल की बारबरी नहीं कर सकता। ऋग्वेद-काल में देवताओं की विशाल संख्या थी। दो स्थानों पर ऋग्वेद में¹ कहा गया है तीन हजार तीन तीन सौ नौ देवता हैं ( पता नहीं किस कारण से यह संख्या घटकर तैंतीस² रह गई ) । यह एक उल्लेखनीय ह्रास है। उसके बावजूद तैंतीस देवताओं का हिन्दू देव - कुल सबसे विशाल है।

     शतपथ ब्राह्मण³ में तैंतीस देवों की व्याख्या इस प्रकार की गई है- आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और पृथ्वी तथा स्वर्ग ।

     उनकी संख्या से बढ़कर प्रश्न उनके परस्पर संबंधों का है। क्या पद की दृष्टि से उनमें कोई भेद था? ऋग्वेद में एक मंत्र है कि आदर और स्थान की दृष्टि से इनके दो वर्ग हैं, एक बड़ा और छोटा तथा दूसरा नवीन और प्राचीन ।

     यह विचार ऋग्वेद की प्राचीन मान्यता से भिन्न लगता है। पुराना नियम इस प्रकार है:

     “हे देवताओं! तुम में से न कोई छोटा है, न नवीन, तुम सब महान हो”। प्रोफेसर मैक्यूलर का भी यही निष्कर्ष है :

     "जब इन देवों का आह्वान किया गया, उनकी शक्ति दूसरे से सीमित नहीं समझी गई थी न वे एक दूसरे से पद में ही श्रेष्ठ अथवा हीन थे। उपासक की दृष्टि में एक देव अन्य देवों के समान था। उसमें एक समय यथार्थ देवत्य समझा गया। चाहे कितनी भी सीमाएं हों हमारी दृष्टि में बहुदेववाद प्रत्येक देवता में अपरिहार्य होना चाहिए। प्रत्येक देव में देवों की विशेषता होनी चाहिए। कवि की दृष्टि से अन्य देव लुप्त हो जाते हैं और केवल वही रह जाता है जो उपासक का मनोरथ पूरा करे। "


1. ऋग्वेद 3, 99:10 52:6, वाज सं 33.7, म्यूर खण्ड 5, पृष्ठ 12
2.1, 139; 23; 679; 1; 8.30. 2; 8,35. 35. q. 10
3. एस. बी. ई. खंड 4:5, 72; म्यूर 5, पृष्ठ 2


     "कोई ऐसा देव नहीं है जो अन्य का अधीन हो । "

     एक समय यही सत्य था। देवताओं के प्रति पुराने दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। क्योंकि अनेक वेद मंत्रों में ऐसा उल्लेख है जिनमें कुछ देवों को सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान समझा जाने लगा था।

     द्वितीय मंडल के प्रथम मंत्र में अग्नि को विश्व-नियंता कहा गया है। परमात्मा, मेधावी राजा, पिता, भ्राता पुत्र और मानव- मित्र बताया गया है। अपितु अन्यों की शक्तियां, और नाम भी विशेष रूप से उसे प्रदान किए गए हैं।

     फिर अग्नि के ऊपर भी दूसरे देवता का स्थान हो गया। वह है इन्द्र इन्द्र को वेद मंत्रों और साथ-साथ ब्राह्मणों में सर्वोच्च शक्तिशाली देवता कहा गया और दसवें मण्डल में कहा गया है । विश्वमद् इन्द्र उत्तरहः " इन्द्र सर्वोच्च है। "

     फिर तीसरा देवता शिखर पर पहुंचा। वह सोम है। सोम के विषय में कहा गया है। कि वह जन्मजात महान था और उसने सभी को पराजित किया। वह विश्व का एक छत्र राजा कहलाता था। वह मनुष्यों के जीवन का विस्तार कर सकता था। एक मंत्र में कहा गया है कि वह स्वर्ग और धरती, अग्नि, सूर्य, इन्द्र और विष्णु का स्रष्टा था। फिर सोम भी विस्मृत हुआ और चौथे देवता की उपासना होने लगी। वह वरुण था । सभी देवताओं में सर्वोच्च था। दैवी और परमशक्ति का गुणगान करने के लिए मानव अभिव्यक्ति और क्या हो सकती थी जो वैदिक कवि ने वरुण के लिए की: "तू स्वर्ग और मृत्युलोक का स्वामी है।" या एक अन्य मंत्र में कहा गया है ( 27.10 ) तू सब का स्वामी है, उनका जो देवता है और "उनका भी, जो मनुष्य हैं। "

     इससे स्पष्ट है कि 33 वैदिक देवों में चार देवता अग्नि, इन्द्र, सोम और वरुण प्रधान थे। दूसरों का देवत्य भी विद्यमान रहा। परन्तु इन चार का स्थान सर्वोच्च था । कालांतर में विभिन्न देवों की तुलना में शतपथ ब्राह्मण के काल में एक और परिवर्तन आया। एक नया देवता उभरा। सोम और वरुण के नाम प्रधान देवताओं में से नदारद हो गए जबकि अग्नि और इन्द्र मौजूद रहे। एक और देवता का नाम सामने आया वह था सूर्य। परिणाम यह हुआ कि अग्नि, इन्द्र, सोम और वरुण के स्थान पर प्रमुख देवता हो गए अग्नि, इन्द्र और सूर्य । यह शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण है जो कहता है:

     'मूलतः सभी देव समान थे उन सबके समान होने से, सबके विमल होने से तीनों की चाह थी । "हम श्रेष्ठ बनें," वे हैं अग्नि, इन्द्र और सूर्य ।

     "3. मूलतः अग्नि की शिखाएं ऐसी नहीं थीं जैसी वर्तमान में हैं। उन्होंने इच्छा की कि ये शिखाएं मुझ में हों" उन्होंने इस को देखा, उसे ग्रहण किया और तब से उनकी शिखाएं उनमें समाहित हो गई ।

     4. "मूलतः इन्द्र में इतना बल नहीं था आदि (उपरोक्तानुसार )

     5. "मूलत: सूर्य में उतनी कांति नहीं थी आदि"

     कब तक ये तीन देव उच्चता की उसी दशा में बने रहे, यह बताना कठिन है। परन्तु निःसंदेह कालांतर में स्थिति बदल गई। यह चुल्ल निदेश के प्रसंग से स्पष्ट है। चुल्ल निदेश बौद्ध धर्म की रचना है। इसका रचनाकाल... (अधूरा छोड़ दिया गया) चुल्ल निदेश में उन सम्प्रदायों की सूची दी गई है जो उस समय भारत में प्रचलित थे। इनका पंथ और उपासना के आधार पर वर्गीकरण किया गया है। वे इस प्रकार हैं:-


1. पंथ

क्रम सं. सम्प्रदाय का नाम  
1. आजीविका श्रावक¹ आजीविका²
2. निगंठ श्रावक निगंठ³
3. जटिल श्रावक जटिल⁴
4. परिव्राजक श्रावक परिव्राजक⁵
5. अवरुद्ध श्रावक अवरुद्ध

 


1. श्रावक का अर्थ है शिष्य ।
2. जीविकोपार्जन विषयक विशेष नियमों का पालन करने वाला भिक्षु ।
3. हर प्रकार के बंधन - बाधाओं से मुक्त भिक्षु ।
4. सर की जटाओं को बांधने वाले भिक्षु ।
5. समाज से विरक्त भिक्षु ।


 

2. उपासना

क्र. सं. सम्प्रदाय का नाम पूज्यदेव
1. हस्ति वृत्तिका¹ (व्रती) हस्ति ²
2. अश्‍व वृत्तिका अश्‍व³
3. गोवृत्तिका गो⁴
4. कुकुर वृत्तिका कुक्कुर⁵
5. काक वृत्तिका काक⁶
6. वासुदेव वृत्तिका वासुदेव
7. बलदेव वृत्तिका बलदेव
8. पूर्णभद्र वृत्तिका पूर्णभद्र
9. मणिभद्र वृत्तिका मणिभद्र
10. अग्नि वृत्तिका अग्नि
11. नाग वृत्तिका नाग
12. सुपर्णवृत्तिका सुपर्ण
13. यक्ष वृत्तिका यक्ष
14. असुर वृत्तिका असुर
15. गंधर्व वृत्तिका गंधर्व
16. महाराज वृत्तिका महाराज
17. चन्द्र वृत्तिका चन्द्र
18. सूर्यवृत्तिका सूर्य
19. इन्द्रवृत्तिका इन्द्र
20. ब्रह्मा वृत्तिका  ब्रह्मा
21. देव वृत्तिका देव
22. दिशा वृत्तिका दिशा

1. वृत्तिका का अर्थ श्रद्धालु भक्त से है।
2. हाथी
3. घोड़ा।
4. गाय।
5. श्वान।
6. कौआ ।