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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
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दसवीं पहेली

ब्राह्मणों ने हिंदू देवताओं को एक-दूसरे से क्यों लड़ाया ?

     विश्व के संबंध में हिंदुओं का तत्वज्ञान त्रिमूर्ति पर आधारित है। उनके अनुसार विश्व की तीन स्थितियाँ हैं। सृष्टि, पालन और संहार । यह एक अविरल क्रम है। यह तीन कार्य ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा किए जाते हैं। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की । विष्णु इसका पालनहार है और महेश संहारक। ये देवता त्रिमूर्ति कहे जाते हैं । त्रिमूर्ति के सिद्धांत से परिलक्षित है कि तीनों का पद समान है। ऐसा कार्य सम्पन्न करते हैं, जो अन्योन्याश्रित है, उनमें कोई विरोध नहीं। वे परस्पर मित्र हैं, विरोधी नहीं। वे परस्पर सहायक है, शत्रु नहीं।

God at War - Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar     इन तीन देवों के कार्यों का उल्लेख करने वाले साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि स्थिति बिल्कुल भिन्न है। कथनी और करनी में अंतर है। ये देव परस्पर मित्र होने के स्थान पर एक-दूसरे के शत्रु हैं, जो श्रेष्ठता और सत्ता के लिए एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। पुराणों के कुछ उदाहरण स्थिति स्पष्ट कर देंगे ।

     एक समय था जब विष्णु और शिव की अपेक्षा ब्रह्मा परमदेव थे। ब्रह्म को जगत नियंता बताया गया है अर्थात् प्रथम प्रजापति। वे शिव के भी जनक हैं कि विष्णु के भी स्वामी हैं। यदि विष्णु सृष्टि के पालक हैं तो इसका आदेश उन्हें ब्रह्मा से मिला है। ब्रह्मा का परम पद ऐसा पद है कि रुद्र और नारायण तथा कृष्ण और शिव के बीच विवाद पर निर्णय ब्रह्मा देते हैं।

     इतना ही ध्रुव सत्य है कि कालांतर में ब्रह्मा का शिव और विष्णु से संघर्ष हुआ और आश्चर्य है कि अपने विरोधियों के समक्ष उन्हें अपनी श्रेष्ठता से हाथ धोना पड़ा। विष्णु के साथ उनके संघर्ष के दो उदाहरण हैं:


मूल शीर्षक 'गॉड एट वार' था। यह 25 पृष्ठों की टंकित और संशोधित पाण्डुलिपि थी। इसके अंतिम तीन पृष्ठ लेखक ने हाथ से लिखे। संपादक


     पहला अवतारों की कथा । अवतारों के विषय में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य प्रतिद्व 'द्विता है । मानवता को आपदाओं से त्राण दिलाले हेतु अवतार सिद्धांत ब्रह्मा के अवतार से आरम्भ होता है। कहा जाता है कि उन्होंने दो अवतार लिए (1) वाराह और (2) मत्स्य। परंतु विष्णु-भक्त यह मानने को तैयार नहीं। उनका कथन है कि ये अवतार ब्रह्मा ने नहीं लिये अपितु विष्णु ने लिए थे। उन्हें इन्हीं अवतारों से संतोष नहीं हुआ । उन्होंने कहा कि विष्णु ने और भी अवतार लिए थे।

     पुराणों में विष्णु के अवतार बताने की होड़ सी लग गई। विभिन्न पुराणों में अवतारों की भिन्न-भिन्न सूचियाँ दी गई हैं जो निम्नांकित हैं:

विष्णु के अवतार

 क्र.सं. हरिवंश के
अनुसार
 नारायणी
आख्यान के
अनुसार
  वाराह
पुराण के
अनुसार
वायु पुराण
के
अनुसार
 भागवत् पुराण
के अनुसार
1. वाराह हंस कूर्म नरसिंह सनत्कुमार
2. नरसिंह कूर्म मत्स्य वामन वाराह
3. वामन मत्स्य वाराह वाराह  
4. परशुराम वाराह नरसिंह कूर्म नरनारायण
5. राम नरसिंह वामन संग्राम कपिल
6. कृष्ण वामन परशुराम आदिवक दत्तात्रेय
7.   परशुराम राम त्रिपुरारी यज्ञ
8.   राम कृष्ण अंधकार ऋषभ
9.   कृष्ण बुद्ध ध्वज पृथि
10.   कल्कि कल्कि वर्त मत्स्य
11.       हलाहल कूर्म
12.       कोलाहल धन्वंतरी
13.         मोहिनी
14.         नरसिंह
15.         वामन
16.         परशुराम
17.         वेद व्यास
18.         नरदेव
19.         राम
20.         कृष्ण
21.         बुद्ध
22.         कल्कि

     दूसरी कथा सर्वप्रथम जन्म धारण करने की है। इसका उल्लेख स्कंद पुराण में है । कथा इस प्रकार है कि एक बार विष्णु देवी के वक्ष स्थल पर सो रहे थे। उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ और वह पुष्प जल की सतह पर आ गया। उसमें ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने जब यह देखा कि इस अनंत में कोई जीव नहीं है तो उन्होंने सोचा सर्वप्रथम वे ही उत्पन्न हुए हैं और इस प्रकार उन्होंने अपने को भावी सृष्टि से पूर्व जन्मा बताया। फिर भी यह निश्चय करने के लिए कि उनकी प्रमुखता को चुनौती कौन दे सकता है ? उन्होंने कमल नाल को खींचा तो विष्णु को सोता हुआ पाया। उन्होंने जोर से पूछा "यह कौन है "? विष्णु ने कहा मैं सबसे पहले जन्मा हूं, और जब ब्रह्मा ने अपने को पूर्व जन्मा बताया तो दोनों में युद्ध छिड़ गया। तभी महेश प्रकट हुए और कहा, पहले मेरा जन्म हुआ है। परन्तु मैं तुम दोनों में से किसी के लिए भी यह स्थिति त्यागने के लिए तैयार हूं यदि तुममे सें कोई मेरी शिखा तक अथवा मेरे पांवों के तलवे तक पहुंच जाए। ब्रह्मा तुरंत तैयार हो गए किन्तु वे थक गए थे पर बिना बात की बात पर अनिच्छुक हो गये इसलिए उन्होंने अपना दावा त्याग किया। वे महादेव की ओर मुड़े और कहा। उन्होंने बात पूरी कर दी है और उनके माथे का मुकुट देख लिया है और साक्षी के लिए प्रथम जन्मी गाय को बुला लिया। इस दर्प और झूठ पर शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा कि ब्रह्मा की कोई पूजा नहीं होगी और गाय का मुख विकृत हो जाएगा। फिर विष्णु आए और उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे शिव के चरण नहीं देख पाए तब उन्होंने उनसे कहा कि देवों में वही प्रथम जन्में हैं और उनका पद सर्वोच्च है। इसके पश्चात् शिव ने ब्रह्मा का पाँचवा मुख काट डाला और उनका मौन भंग हुआ। उनकी शक्ति और प्रभाव क्षीण हो गए।

     इस कथा के अनुसार ब्रह्मा का यह दावा झूठा था कि उनका जन्म सर्वप्रथम हुआ है। इसके लिए वह शिव के दण्ड के भागी बने । विष्णु को प्रथम जन्मा कहलाने का अधिकार मिला। ब्रह्मा के अनुयाइयों ने शिव की सहायता से विष्णु द्वारा ब्रह्मा का स्थान छीन लेने पर बदला लेने की ठानी। इसलिए उन्होंने एक और कथा रच डाली, जिसके अनुसार विष्णु ब्रह्मा के नथुनों से सूकर रूप में उत्पन्न हुए और स्वाभाविक रूप से बाराह बन गए विष्णु के वाराह अवतार का यह बहुत तुच्छ विश्लेषण है।

     इसके पश्चात् ब्रह्मा ने शिव विष्णु के बीच शत्रुता उत्पन्न कराने की चेष्टा की। स्वाभाविक है कि अपनी स्थिति बेहतर बनाने के लिए यह चेष्टा की होगी । यह कथा रामायण में कही गई है। वह इस प्रकार है:

     जब राजा दशरथ, मिथिलापति जनक, जिसकी पुत्री से राम का विवाह हुआ था, से विदा लेकर अपने राज्य को लौट रहे थे तो उनके समक्ष अपशकुन हुए, उनके चारों ओर भयंकर स्वर वाले पक्षी चीख उठे और भूमि पर विचरने वाले मृग उनके दाहिनी ओर चलने लगे। यह देखकर दशरथ ने वशिष्ठ से पूछा, पक्षी चीख रहे हैं और मृग दाहिनी ओर चल रहे हैं, यह शकुन शुभ भी है और अशुभ भी है। यह क्या बात है? इससे मेरा हृदय शंका से भर उठा है। तब वशिष्ठ बोले यह परशुराम के आगमन की चेतावनी है जो तूफान की तरह चले आ रहे हैं, जिससे पृथ्वी कांप उठी, पेड़-पौधे गिरने लगे हैं और गहन अंधकार छा गया है। धूल से सूरज ढक गया है। परशुराम सामने से आ रहे हैं, बड़े भयानक दिखाई दे रहे हैं, कंधे पर फरसा और धनुष-बाण है। दशरथ ने उनका सम्मानपूर्वक अभिवादन किया, जिसे परशुराम ने स्वीकार कर लिया और दशरथ पुत्र राम की ओर बढ़े। कहा कि राम तुम्हारा बहुत पराक्रम सुना है। जनक द्वारा दिया गया शिव धनुष भी तुमने तोड़ दिया है। मैं दूसरा धनुष लेकर आया हूं। इसे खींचकर बाण चढ़ाओ । बाण चढ़ाने से तुम्हारे बल का अनुमान लगाकर मैं तुम्हारे साथ द्वंद्व करूंगा। परशुराम का वचन सुनकर दशरथ की हवाइयां उड़ गईं। परन्तु उन्होंने परशुराम से दीनभाव से ही बातचीत की। परशुराम ने फिर राम से ही कहा कि जो धनुष तुमने तोड़ा है, वह शिव का धनुष था किंतु अब मैं लाया हूं वह विष्णु का है। ये दोनों धनुष विश्वकर्मा ने बनाए थे, जिनमें से एक महादेव को दिया गया और दूसरा विष्णु को ।