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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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25 ऑगस्ट 2023
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     मुण्डकोपनिषद का कथन है -

     1. सभी देवताओं में सबसे पहले विश्वनियंता, जगतपालक ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उन्होंने अपने ज्येष्ठतम पुत्र अथर्व को ब्रह्मविज्ञान की शिक्षा दी जो समस्त ज्ञान का आध तर है। 2. अथर्व ने यह ज्ञान, जो उन्हें ब्रह्मा से मिला था, अंगिस को दिया; उन्होंने भारद्वाज की संतति सत्यवाह को समझाया जिन्होंने किंवदंतियों के अनुसार यह ज्ञान अंगिरस को दिया। 3. शौनक पूर्ण शिष्टाचार पूर्वक अंगिरस के पास गए। और पूछा- “हे आदरणीय ऋषि, वह कौन सा साधन है जिससे इस सम्पूर्ण जगत का ज्ञान हो सकात है।" 4. अंगिरस ने उत्तर दिया, ये दो विधाएं पवित्र विद्याओं में इस प्रकार मानी जाती हैं, एक श्रेष्ठ और दूसरी अश्रेष्ठ। 5. अश्रेष्ठ विद्याएं हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, स्वाराघात, आध्यात्मिक व्याकरण, भाष्य, पिंगल और खगोल शास्त्र । श्रेष्ठ विद्या अक्षय, अनित्य है, जिसका आशय उपनिषदों से है।

Veda Versus Upanishads - Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार :

     (1) “नारद सनत्कुमार के पास गये और कहा- "मुझे उपदेश करें"। नियमानुसार आये हुए नारद से सनत्कुमार ने कहा- तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे पास आओ, फिर मैं तुम्हें तुम्हारे ज्ञान से आगे उपदेश करूंगा । " (2) ऐसा सुनकर नारद ने कहा, ," मैं ऋग्वेद पढ़ा हूं। यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद भी जानता हूं। सिवाय इनके इतिहास, पुराण रूप पंचमवेद, वेदों का वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, कलानिधि शास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, शिक्षाकल्प, छंद और ब्रह्मविद्या, भूतशास्त्र, धनुर्वेद, ज्योतिषविद्या, गारुड़विद्या, नृत्य संगीतादि विद्या - यह सब मैं जानता हूं। (3) यह सब जानते हुए भी वह मैं केवल शब्दार्थ मात्र ही जानता हूं, आत्मा को मैं नहीं जानता। मैंने आप पूज्यजनों के जैसे महापुरुषों से सुना है। आत्मज्ञानी शोक को पारकर जाता है। मैं तो शोक करता हूं। ऐसे शोकग्रस्त मुझे शोक से पारकर देवें, अर्थात् मुझे अभय प्राप्त करा देवें। ऐसा सुनकर सनत्कुमार ने नारद से कहा- " अभी तक यह जो कुछ तुम जानते हो, वह नाममात्र ही है"। (4) क्योंकि ऋग्वेद नाम है; यजुर्वेद, सामवेद, चौथा अथर्ववेद, पांचवां वेद इतिहास पुराण, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पात ज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेद विद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड़, संगीतादि कला और शिल्पशास्त्र - ये सब भी नाम ही हैं। अतः प्रतिमा में विष्णु बुद्धि के समान । तुम नाम की ब्रह्म बुद्धि से उपासना करो। (5) वह जो नाम ब्रह्मा है, ऐसी उपासना करता है, जहां तक नाम की गति है, वहां तक नाम के विषय में उस उपासक की यथेष्ट गति हो जाती है। जो "यह ब्रह्म है" इस प्रकार नाम की उपासना करता है। ( नारद ने कहा ) भगवान् क्या नाम से बढ़कर भी कोई वस्तु है। सनत्कुमार ने कहा नाम से भी बढ़कर वस्तु है। तब नारद ने कहा भगवन्, मुझे उसका ही उपदेश करें। "

     बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार :

     इस सुषुप्तावस्था में पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता हो जाती है अर्थात् जन्य जनक भाव संबंध नहीं रह जाता। लोक अलोक हो जाते हैं। देव अदेव और वेद अवेद हो जाते हैं, अर्थात् सभी साध्य - साधन का अभाव हो जाता है। यहां पर चोर अचोर हो जाता है। भ्रूण हत्यारा अभ्रूण हो जाता है। चांडाल - चांडाल नहीं रह जाता है। पुल्कस अपौल्कस हो जाता है। शूद्र से ब्राह्मणी में उत्पनन संतान को चाण्डाल कहते हैं। शूद्रा में ब्राह्मण से उत्पनन संतान को निषाद कहते हैं एवं निषाद से क्षत्रिय में उत्पन्न संतान को पुल्कस कहते हैं। परिव्राजक अपरिव्राजक और वानप्रस्थी अतापस हो जाता है, अर्थात् किसी वर्णाश्रम धर्म की या पुण्य-पाप की प्रतीति नहीं होती । उस समय यह पुरुष पुण्य से असंबद्ध तथा पास से भी संबंध रहित हो जाता है। किंबहुना:- उस अवस्था में हृदयस्थ समस्त शोकों को पार कर जाता है।

     कठोपनिषद का मत निम्न प्रकार से है :

     आत्मा उपदेश से प्राप्त नहीं। न ही ज्ञान से, न पठन से वह उसी को प्राप्त होती है जिसे वह चाहे । आत्मा उसी शरीर में वास करती है जिसे वह चुन लेती है।

     यद्यपि आत्मा का ज्ञान कठिन है तथापि समुचित साधनों से उसे जाना जा सकता है। वह (लेखक) कहता है, इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे न तो उपदेश से ना ही कई वेदों के ज्ञान से न बुद्धि से न पुस्तकों के रखने से ना ही मात्र पाठन से। फिर वह कैसे लभ्य हैं? वह यह घोषित करता है ।

     उपनिषदों में कितनी प्रतिकूलता है और इनकी दार्शनिकता कितनी असंगत है, इसका आभास तभी हो सकता है जब कोई हिंदुओं की विवाह पद्धति अनुलोम और प्रतिलोम शब्दों का उत्पत्ति समझेगा । उसकी उत्पत्ति के विषय में काणे¹ का कथन है-

     अनुलोम और प्रतिलोम (विवाह की परम्परा) ये दोनों वैदिक साहित्य में दुर्लभ हैं। बृहदारण्यक उपनिषद ( 2,1.5) और कौषीतकि (4,8) में प्रतिलोम शब्द का प्रयोग उस स्थिति के लिए किया गया है, जब कोई ब्राह्मण, ब्राह्मण के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्षत्रिय के पास जाए ।

     अनुलोम का अर्थ है, शास्त्रानुसार सहज परम्परा से कार्य सम्पन्न होगा, प्रतिलोम का अर्थ है सहज परम्परा के विपरीत। श्री काणे के कथनानुसार प्रतिलोम की परिभाषा के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि उपनिषदों को वैदिक साहित्य की मान्यता नहीं है। उन्हें यदि तिरस्कृत भी नहीं किया गया है तो भी वैदिक ब्राह्मणों ने उनका स्थान तुच्छ रखा है। वह एक और प्रमाण है जो प्रकट करता है कि वेदों और उपनिषदों का संबंध सौहार्दपूर्ण न होकर प्रतिस्पर्धापूर्ण है । "

     उपनिषदों का अध्ययन करने वाले ब्राह्मणों के प्रति वैदिक ब्राह्मणों के व्यवहार का एक अन्य उदाहरण भी है। बौधायन ने अपने धर्मसूत्र ( 8.3) में कहा है। श्राद्ध क्रिया के लिए यदि कोई अन्य ब्राह्मण उपलब्ध न हो तो किसी रहस्यविद् को बुलाया जाए। रहस्यविद् का अर्थ है उपनिषद पाठी ब्राह्मण।

     यह धारणा कि वेदों और उपनिषदों के संबंध सौहार्दपूर्ण हैं, वास्तव में एक पहेली है।


1. हिस्ट्री आफ धर्मशास्त्र, खंड 2 भाग 1, पृ. 52