हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
आठवीं पहेली
वेद विरुद्ध उपनिषदों का घोषित युद्ध
वेदों के संदर्भ में उपनिषदों की स्थिति क्या है? क्या उनका एक-दूसरे के प्रति सौहार्द है या फिर प्रतिस्पर्धा ? सचमुच कोई हिंदू अब यह स्वीकार नहीं करेगा कि वेद और उपनिषद एक-दूसरे के प्रतिकूल हैं। इसके विपरीत यह अवधारणा है कि उनके बीच कोई प्रतिरोध नहीं है और दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। क्या यह विश्वास सारगर्भित है?
इस विश्वास का प्रमुख कारण यह तथ्य है कि उपनिषदों का दूसरा नाम वेदांत है । वेदांत के दो अर्थ हैं। एक से परिलक्षित होता है कि वेदों का अंतिम भाग हैं। दूसरा अर्थ - वेदों का सार । वेदांत शब्द उपनिषद् का दूसरा नाम होने के कारण उसके यह अर्थ उपनिषदों ने अंगीकार कर लिए। इसी अर्थ के कारण यह धारणा है कि वेद और उपनिषदों में कोई खींचातानी नहीं है।
वास्तव में किसी सीमा तक उपनिषदों के लिए यह अर्थ सार्थक है? पहली बात तो यही है कि 'वेदांत' शब्द का अर्थ जान लिया जाए। वेदांत का मूल अर्थ क्या था? क्या इसका अर्थ वेदों का अंतिम अंग है?
जैसा कि प्रोफेसर मैक्समूलर¹ ने अवलोकन किया कि :
वेदांत एक तकनीकी शब्द है और मूलरूप से इसका अर्थ वेदों का अंतिम अंश नहीं है और न ही वैदिक साहित्य का अंतिम अध्याय है। अपितु वेदों का अंतिम मनोरथ है। तैत्तरीय आरण्यक (सम्पादक राजेन्द्र मित्र. पृ. 820) जैसे ग्रंथों में कुछ ऐसे वाक्यांश हैं, जिनसे भारतीय और यूरोपीय विद्वानों को भ्रांति हुई है कि वेदांत का सरल सा अर्थ है-वेदों का उपसंहारः "या वेदादु स्वर: प्रकटो वेदांते का प्रतिष्ठितः
1. दि उपनिषद् (एस.बी.ई) खंड 1 भूमिका
15 पृष्ठों की यह टकित पांडुलिपि लेखक के हाथ से संशोधित है। मूल रूप से इसका शीर्षक "वेदा वर्सेस उपनिषद्” था। अंतिम दो परिच्छेद लेखक ने हाथ से जोड़े हैं। - संपादक
ओ३म् से वेद का आरम्भ होता है और उसी से वेद का समापन होता है। यहां वेदों का जो सीधा अर्थ है वह वेदादू के विपरीत है जैसा कि सायण ने इसका अनुवाद किया है। उसका अनुवाद वेदांत अथवा उपनिषद के रूप में असंभव है। वेदांत दर्शन के रूप में तैत्तरीय आरण्यक पृष्ठ 817 में दिग्दर्शित हुआ है। नारायणिया उपनिषद् के एक मंत्र में, जिसकी आवृति मांडुक्य उपनिषद तीन, 2, 6 में तथा अन्यत्र भी हुई है। 'वेदांत विज्ञान सुनिश्चितारह' जो विद्वान वेदांत मर्मज्ञ हैं, उनके अनुसार वह वेदों का उपसंहार नहीं और श्वेताश्वतर उप. 6, 22 वेदांत प्रमाणम गुहयम नहीं, भाष्यकार के मन में यह वेद का उपसंहार नहीं जो कालांतर में बहुवचन के रूप में प्रयुक्त हुआ है। अर्थात् भाष्यकार ने कहा है: 'क्षुरीकोपनिषद, 10 ( बिबलि इंड, पृ. 210 ) पुण्डारिकेति वेदांतेषु निगादयाते, ' वेदांत को छांदोग्य तथा अन्य उपनिषदों में पुण्डरीक कहा गया है परन्तु यह प्रत्येक वेद का अंतिम ग्रंथ नहीं।
इस संबंध में गौतम धर्म सूत्र में और स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध है। अध्याय 19 के बारहवें मंत्र में शुद्धीकरण पर गौतम का कथन है:
“शुद्धीकरण (पाठ) उपनिषद वेदांत संहिता - सभी वेदों के पाठ (हैं)” आदि।
इससे यह स्पष्ट है कि गौतम के समय उपनिषद और वेद अलग-अलग माने जाते थे और उपनिषद वेदों का अंग नहीं माने जाते थे। हरदत्त ने अपने भाष्य में कहा है “ आरण्यक के वे अंश जो (उपनिषद) नहीं है, वेदांत कहलाते हैं। यह निर्विवाद साक्ष्य है कि उपनिषद वैदिक सिद्धांतों से भिन्न थे।
भगवत्गीता में वेद के उल्लेख से भी इसी विचार को बल मिलता है। भगवतगीता में वेद शब्द का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। श्री भट्ट¹ के अनुसार इस शब्द का प्रयोग इस भाव से किया गया है कि लेखक ने इस आशय से उपनिषद को सम्मिलित नहीं किया है।
उपनिषदों की विषयवस्तु भी वेदों से भिन्न हैं। यह दूसरा तर्क है कि उपनिषद वेदों का अंग नहीं है। 'उपनिषद' शब्द की व्युत्पत्ति क्या है? यह अस्पष्ट है। अधिकांश यूरोपीय विद्वान उपनषिद् की व्युत्पत्ति "षद" धातु से मानते हैं जिसका अर्थ है। " बैठना "। इसके पूर्व दो सर्ग "नि" और " उप" हैं जिनमें "नि" का अर्थ है "नीचे" और "उप" का आशय है " निकट"। इस प्रकार इसका आशय है समागम अथवा सभा। जिसका तात्पर्य है गुरु के निकट बैठकर उसका उपदेश सुनना। यही कारण है कि त्रिखंडाशेष में उपनिषद की व्याख्या 'समीप साधना' अथवा किसी व्यक्ति के पास बैठना है।
1. सैक्रेड बुक्स ऑफ दी ईस्ट, खंड 2, पृ. 275
परन्तु जैसा कि प्रो. मैक्समूलर ने मत व्यक्त किया है, इस व्युत्पत्ति को स्वीकार करने में दो आपत्तियां हैं। पहली बात तो यह है कि ऐसा लगता है कि ऐसा शब्द वेद के उपनिषद समेत अन्य अंश के लिए प्रयुक्त हुआ होगा तो इसके सीमित अर्थ कैसे किए गए? फिर समागम के रूप में उपनिषद का प्रयोग सार्थक नहीं लगता। जहां भी इस शब्द का प्रयोग हुआ है, इसका अर्थ है सिद्धांत अथवा इसका प्रयोग दार्शनिक लेख के रूप में हुआ है। जिसका आशय है। गुह्य सिद्धांत।
प्रोफेसर मैक्समूलर ने शंकर के अन्य भाष्य का उल्लेख किया है जो तैत्तरीय उपनिषद 2, 9 के विषय में है। उनके अनुसार उपनिषद से परम आनन्द प्राप्त होता है। इसी कारण उसे उपनिषद कहते हैं। इस संबंध में प्रो. मैक्समूलर कहते हैं:
"आरण्यकों में ऐसी व्युत्पतियों की भरमार है जो वास्तविक नहीं शब्दों के साथ खिलवाड़ है, फिर भी उनका कुछ अर्थ निकल आता है । "
फिर भी प्रो. मैक्समूलर 'उपनिषद' शब्द का मूल 'षद' धातु से विनाश के अर्थ में मानते हैं, अर्थात् ऐसा ज्ञान जो मोक्ष के साधन के लिए ब्राह्मणों के ज्ञान से अज्ञान का विनाश करता है। प्रो. मैक्समूलर का कथन है कि भारतीय विद्वान उपनिषद का यही अर्थ निकालने पर सर्वसम्मत है ।
यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि उपनिषद शब्द का जो अर्थ मैक्समूलर सुझाते हैं वह सही है तब यह एक ऐसा साक्ष्य होगा कि हिंदुओं में भ्रांतियां हैं और वेदों तथा उपनिषदों की विषय-वस्तु एक-दूसरे की पूरक नहीं वरन उनमें विरोधाभास है कि नि:संदेह उपनिषदों की विचार पद्धति वेदों के प्रतिकूल है। वेदों का खंडन प्रकट करने के लिए उपनिषदों के कुछ उदाहरण पर्याप्त हैं।