हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
इसके आगे का वर्णन इस प्रकार है:
तब देवताओं ने ब्रह्मा से आग्रह किया कि नीलकंठ (महादेव) और विष्णु के गुणावगुण का पता लगाएं। परम श्रेष्ठ ब्रह्मा ने दोनों के बीच वैमनस्य के आशय को जान लिया। इस स्थिति में नीलकंठ और विष्णु के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। दोनों ही एक-दूसरे को पराजित करना चाहते थे। शिव जी के विकराल धनुष में शिथिलता आ गई और त्रिनेत्र शिव जाप करने लगे। दोनों महान देवों के देवता समूह, ऋषियों और चारणों ने अर्चना की और वे शांत हो गए। जब देवताओं ने यह देखा कि विष्णु के तेज के आगे शिव धनुष शिथिल पड़ गया तो देवताओं ने विष्णु की श्रेष्ठता मान ली।

इस प्रकार ब्रह्मा ने महादेव द्वारा अपने प्रति किए गए अन्याय का बदला ले लिया। इस प्रपंच से भी ब्रह्मा विष्णु पर श्रेष्ठता न पा सके। ब्रह्मा का इतना पराभव हुआ कि जो कभी विष्णु को आदेश देते थे, वही ब्रह्मा का सृष्टा कहलाया ।
शिव के साथ हुए श्रेष्ठता संघर्ष में भी ब्रह्मा की वैसी ही गत बनी, इस संदर्भ में भी स्थिति ठीक विपरीत हो गई। कहां तो शिव ब्रह्मा से उत्पन्न हुए और कहां अब शिव ब्रह्मा के सृष्टा बन गए। ब्रह्मा मुक्ति¹ के कारण नहीं रहे। वह देवता, जो मोक्ष प्रदान कर सकते थे, शिव थे और मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा की हैसियत शिव और उनके लिंग की एक साधारण भक्त की तरह पूजा करने की हो गई, वह शिव के सेवक हो गए और उनके सारथी² बने ।
अंततोगत्वा, अपनी पुत्री के साथ व्यभिचार करने के आरोप के कारण ब्रह्मा पूजनीय नहीं रहे। भागवत पुराण में इस लांछन का उल्लेख इस प्रकार है-
"हे क्षत्रिय ! हमने सुना है कि स्वायंभुव के मन में अपनी अबला और मोहक पुत्री वाच के प्रति कामुकता जगी, जिसके मन में उनके प्रति कामभाव नहीं था। ऋषियों और मारीचि के नेतृत्व में अपने पिता के कुकर्म पर, उनके पुत्रों ने उन्हें फटकारा। तुमने ऐसा कुकर्म किया है, जो तुमसे पहले किसी ने नहीं किया। न तुम्हारे बाद कोई ऐसा करेगा। क्या तुम्हें विधाता होते हुए अपनी पुत्री से ही विषयभोग करना था? क्या तुम अपने उन्माद को रोक नहीं सकते थे ? अरे विश्व के गुरु तुम्हारे जैसे गौरवशाली व्यक्ति के लिए यह प्रशंसनीय नहीं है। जिनके कार्यों की मर्यादा के कारण व्यक्ति को आनन्द प्राप्त होता है जो जिस विष्णु की महिमा की दीप्ति से यह ब्रह्मांड प्रकाशित होता है, लौ उसी से फूटती है। उसे विष्णु धर्म परायणता को बनाए रखना चाहिए, अपने पुत्रों के व्यवहार को देखकर, जो प्रजापतियों के स्वामी से ऐसा कह रहे थे, प्रजापति शर्म से गड़ गए और अपने शरीर का विखंडन कर दिया। उसके भयानक अवशेष उस क्षेत्र में फैल गए और वहीं कोहरे के नाम से विख्यात हुआ। "
ब्रह्मा के विरुद्ध ऐसा अपकर्ष एवं अपमानजनक प्रहार होने से वह चारों खाने चित्त हो गए। इसमें कोई आश्चर्य नहीं। भारत से उनकी उपासना लुप्त हो गई और त्रिमूर्ति में औपचारिक रूप से ही सहभागी रह गए।
ब्रह्मा के मैदान से बाहर होने पर रह गए शिव और विष्णु। ये दोनों भी कभी चैन से नहीं बैठ पाए। दोनों के बीच होड़ और खींचतान जारी रही ।
1. महाभारत म्यूर द्वारा उद्धृत, खंड 4, पृ. 1921
2. महाभारत म्यूर द्वारा उद्धृत खंड 4, पृ. 1991
शिव और विष्णु उपासकों में पुराणों के माध्यम से एक-दूसरे के विरुद्ध जो प्रचार होता रहा, उसका उदाहरण निम्नांकित से देखा जा सकता है।
विष्णु से वैदिक देवता सूर्य का और शिव भक्त शिव से अग्नि का संबंध जोड़ते हैं। इसका आशय यह प्रकट करना था कि यदि विष्णु का उदभव वैदिक है तो शिव का उद्गम भी वैदिक है। जन्म के आधार पर कोई भी एक-दूसरे से घटकर नहीं है ।
शिव विष्णु से बड़े हों और विष्णु कम न हों। विष्णु के सहस्त्र¹ नाम हैं तो शिव के भी सहस्त्र नाम होने चाहिए और ऐसा ही हुआ² ।
विष्णु के चार चिह्न हैं। इसलिए शिव के भी होने चाहिए। वे हैं 1. जटा से बहती गंगा, 2. चन्द्रचूड़, 3. नाग और 4. जटाजूट |
एक मात्र क्षेत्र है, अवतार जहां शिव विष्णु की बराबरी में नहीं हैं। इसका कारण यह नहीं है कि उनकी इच्छा बाजी मार लेने की नहीं थी । परन्तु दार्शनिक दृष्टि से शिव के मार्ग में अवतार संबंधी एक अवरोध था शिव और विष्णु के उपासकों में परमानन्द की अवधारणा के संबंध में मौलिक मतभेद हैं। यह श्री अय्यर ने स्पष्ट किया है :
“शैवों को उद्देश्य है दैहिक और मानसिक बंधनों से मुक्ति और उनका पूर्ण उत्सर्ग। इसलिए वे शिव को अक्षय मानते हैं अर्थात् जो कभी नष्ट नहीं होता अपितु संपूर्ण जगत का संहार करता है। इसी कारण रुद्र को महाकाल कहा जाता है। किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक ज्ञान की चरमसीमा पर परम शिव से उसका भेद मिट जाता है, वह अपने भौतिक शरीर, मन, सुख, और दुख और कर्त्तव्य से ज्ञानातीत हो जाता है। वह शिव में सयुज्य हो जाता है। इस स्थिति में वह स्वयं में और शिव में भेद करना भूल जाता है। जब तक वह इस स्थिति को नहीं पहुंचता, वह अपूर्ण है चाहे वह कितना भी शुद्ध कितना ही योग्य क्यों न हो । सयुज्य तक पहुंचने हेतु जो भी पात्र हैं, वे मात्र सालोक्य, सामीप्य और सारूप्य का गौण पद ही पाते हैं। यही कारण है कि अवतार का सिद्धांत शैवों को आकर्षित नहीं कर पाया। अवतार के रूप में भगवान सीमित हो जाता है अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो कदाचित अपने को तो बंधन मुक्त कर लेता है परन्तु मुक्त को मुक्त नहीं कर सकता| वैष्णवों का मत भिन्न है। परमपद के संबंध में उनकी स्पष्ट अवधारणा है। हमें परमात्मा से एकाकार होना है। इसके बावजूद हमें उसकी चेतना रहनी चाहिए । उसे ब्रह्मलीन होना है। इससे ब्रह्माण्ड की अक्षयता के रूप में सत्य का एक अन्य पक्ष माना जाए। दूसरे शब्दों में वह ब्रह्मांड के क्षय में आस्था नहीं रखते क्योंकि उसका परम पुरुष से भेद विभेद नहीं है। बल्कि वे ब्रह्मांड के पालन के पक्ष में हैं जो प्रकट पुरुष की पहचान से न कम है न ज्यादा। यही कारण है विष्णु को पालनहार कहा गया है। अंततोगत्वा यही भेद है जिससे सत्य का दर्शन होता है। शैव विश्व को दुःख और दारुण का पाश मानते हैं। (इससे सभी को पशु बनना पड़ता है) जिसको तोड़ा जाना चाहिए और उसका संहार होना चाहिए। वैष्णव इसे पुरुष की महानता का प्रमाण मानते हैं और इसके पालन के पक्ष में हैं। शैव निराशावाद अथवा दुखवाद के कारण धर्मसूत्रों के प्रति आस्थावान नहीं हैं। न वे अर्थशास्त्र और अन्य ग्रंथों को ही मानते हैं जो विश्व के संचालन और कल्याण के लिए बना दिए गए हैं। वे पुष्टिमार्गी नहीं हैं। वे नियमों और परम्पराओं की अवज्ञा करते हैं। किसी परम शैव के लिए जाति-बंधन खण्डनीय हैं। हां, वे निसंदेह उसका पालन कर सकते हैं जो परिपक्व नहीं है। वह समाज के उन्हीं लोगों का सम्मान करते हैं और उनके विस्तार के पक्ष में हैं जो चाहे किसी भी जाति के हों, परन्तु शिव के साथ सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य और सयोज्य हों। दूसरी ओर वैष्णवों की रुचि सभी नियमों के पालन में है जिससे विश्व का कल्याण होता हो । यदि ध र्म का क्षय होता है तो विश्व का भी क्षय होगा और विश्व का क्षय नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पुरुष के अर्न्तयामी होने का लक्षण है। यह उनका कर्म है कि धर्म की रक्षा हो। यदि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है तो विष्णु स्वयं ठीक करते हैं। इसलिए वे अवतार धारण कर विश्व में अवतरित होते हैं। परन्तु जब विष्णु धरती पर आते हैं। तो दुष्टों का विनाश करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम जानें कि जो धर्म का क्षय करता है उसे विष्णु का कोप भाजन बनना पड़ता है। इसी प्रकार शिवभक्तों के लिए जो विधान लिया गया है, उसमें जाति-बंधन अप्रसांगिक है और भक्ति धर्म त सीमित है। उसके समुचित पालन से भगवान के दर्शन होंगे और अंततोगत्वा, शिव के साथ एकाकार होगा, दूसरे इसे शूद्र नहीं मानते। यह जाति उन्मूलक है और वे सनातन शास्त्रों के अनुरूप नहीं है । "
1. देखें विष्णु सहस्त्रनाम ।
2. पद्मपुराण में उल्लिखित है।
3. वही।
शिव की महिमा में किए गए प्रचार के समान ही विष्णु भक्तों ने उसके खण्डन के लिए प्रचार-तंत्र अपनाया। गंगा¹ अवतरण का प्रसंग एक उदाहरण है। शिवभक्त उसकी उत्पत्ति शिव की जटाओं से मानते हैं। परन्तु वैष्णव इसे मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने एक और कथा रच डाली। वैष्णवों के आख्यान के अनुसार पतितपावनी गंगा बैकुण्ठ (विष्णु के निवास) से निकलती है। उसका उद्गम विष्णु के चरणों से है और कैलाश पर आकर वह शिव के मस्तक पर उतरती है। उस कथा के दो निष्कर्ष हैं। प्रथम यह कि गंगा का उद्गम विष्णु के चरणों से है, शिव की जटा से नहीं। फिर शिव का पद विष्णु से नीचा है क्योंकि उनके मस्तक पर गंगा की धार विष्णु के चरणों से गिरती है।
1. मूर, हिंदू पेनथियन, पृ. 40-41
दूसरा उदाहरण देवों और असुरों द्वारा सागर मंथन का है। उन्होंने मंदराचल पर्वत को मथानी और शेष नाग को रस्सी बनाया। विष्णु ने कूर्म अवतार लिया, फिर पृथ्वी को अपनी पीठ पर धारण किया और मंथन के समय उसके स्पादन को नियंत्रित किया है।
यह कथा विष्णु की महिमा बढ़ाने के लिए रची गई है। शिव का स्थान इसमें गौण। इसके अनुसार समुद्र तल से चौदह रत्न निकले। इनमें से हलाहल एक था। जब तक कोई इस हलाहल का पान न करता यह समस्त विश्व को नष्ट कर सकता था। शिव ही उसके पान के लिए तत्पर हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि विष्णु द्वारा दोनों विरोधी समूहों, देव और असुरों को सागर मंथन की अनुमति देकर विश्व के विनाश का द्वार खोल दिया था और अविवेकपूर्ण कार्य किया था। शिव की महिमा बताई गई है कि उन्होंने विषपान करके विष्णु की मूर्खता से होने वाले अनिष्ट से विश्व को बचा लिया।
तीसरा उदाहरण भी यह प्रकट करता है कि विष्णु मूर्ख थे और शिव ने ही अपनी विलक्षण बुद्धिमत्ता और पराक्रम से विष्णु को उनकी मूर्खताओं के परिणाम से त्राण दिलाया। यह कथा अक्रूरासुर¹ की है। अक्रूरासुर ऋक्ष के मुख वाला एक राक्षस था। इसके बावजूद वह नियमित रूप से वेद पाठ करता था और भक्तिकर्म करता था। विष्णु उससे अत्यंत प्रसन्न थे और उसे मन चाहा वरदान देने का वचन दे डाला। अक्रूरासुर ने वर मांगा कि त्रिलोक में उपस्थित कोई प्राणी उसके प्राण नहीं ले सके। विष्णु मान गए। परन्तु वह इतना ढीठ हो गया कि जब उसने देवताओं को त्रास दिया तो उन्होंने उसके समक्ष समर्पण कर दिया और वह विश्व का शासक बन बैठा। असुर के अत्याचारों से लाचार विष्णु काली तट पर चिंतित बैठे थे। उनका रोष स्पष्ट दिख रहा था। उनकी आंखों के सामने इस आकार का जीव प्रकट हुआ, जो पहले त्रिलोक में विद्यमान नहीं था । वह रौद्ररूपी महादेव थे जिन्होंने क्षण भर में विष्णु को त्राण दिलाया।
इसके प्रतिरोध में भस्मासुर की कथा प्रचलित हुई कि शिव औधड़ (मूर्ख) हैं और विष्णु ने उनकी करतूत से उन्हें बचाया। भस्मासुर ने शिव को एक वरदान पाने के लिए प्रसन्न कर लिया। वरदान यह था कि भस्मासुर जिसके भी सिर पर हाथ फिरायेगा, वह भस्म हो जायेगा। शिव ने वरदान दे दिया। भस्मासुर ने शिव के वरदान से उन्हें ही भस्म करने की ठानी। शिव सिर पर पांव धरकर भागे और विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और भस्मासुर के पास गए। वह उन्हें देखकर आसक्त हो गया। मोहिनी रूपी विष्णु ने कहा कि वह एक शर्त पर उनकी हो जाएगी कि जैसे-जैसे वह करे वैसे ही भस्मासुर करे, विष्णु ने इस प्रकार भस्मासुर का हाथ उसके सिर पर रखवा दिया। परिणाम यह निकला कि भस्मासुर का काम तमाम हो गया और विष्णु को यह श्रेय मिला कि उन्होंने शिव को उनकी मूर्खता के कारण संभावित विनाश से बचा लिया।
1. यह कहानी विष्णु आगम में कही जाती है और मूर की 'हिंदू पेनथियन' में उद्धृत है, पृ. 19-20
क्या ईश (महादेव) किसी अन्य दृष्ठि से भी कार्यों का कारण है? हमने यह नहीं सुना है कि किसी व्यक्ति के लिंग की दूसरे व्यक्ति और देवता पूजा करें। आप बताएं कि क्या आपने कहीं सुना है कि शिव के सिवाय किसी अन्य के लिंग की पूजा की जाती है अथवा पहले भी कभी देवताओं ने की है। जिसके लिंग की ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र देवताओं सहित निरंतर पूजा करते हैं। इस प्रकार शिव सर्वोच्च है। जातकों में न तो कमल- चिह्न (ब्रह्मा का ), न ही चक्र (विष्णु का ) और न ही वज्र (इन्द्र का) होता है बल्कि उनमें स्त्री पुरुष के अंग होते हैं। इस प्रकार सारी संतानों का दाता महेश्वर है। सभी नारियां देवी से उत्पन्न हैं, उनमें नारी के अंग हैं और पुरुषों में शिवलिंग विद्यमान रहता है। चराचर में से एक भी ढूंढ दो। सब जान लीजिए जो पुरुष हैं वे ईश हैं जो नारी हैं, वे उमा हैं। इस प्रकार सारा चराचर विश्व इन दो में से निकला है।
यूनानी दार्शनिक जैनोफेन्स इस बात पर बल देते हैं कि बहुदेववाद अमान्य है और इसमें विरोधाभास है इसलिए एकेश्वरवाद ही सत्य है । दार्शनिक कसौटी पर परखने से जैनोफेन्स का विचार सही हो सकता है । परन्तु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से दोनों स्वाभाविक हैं। जहां एक ही सम्प्रदाय का समाज है वहां बहुदेववाद स्वाभाविक और आवश्यक है। क्योंकि प्रत्येक प्राचीन सम्प्रदाय में न केवल भिन्न व्यक्ति होते हैं बल्कि उनके विविध भगवान भी होते हैं। विभिन्न समुदायों का विलय और समुच्चय सिवा इसके संभव नहीं कि उनके भगवान को दूसरे भी स्वीकार करें। इस प्रकार बहुदेववाद पनपा ।
निष्कर्ष निकलता है कि हिंदुओं में अनेक भगवानों का अस्तित्व ठीक ही है क्योंकि हिंदू समाज अनेक कबीलों-सम्प्रदायों का जमघट है जिनके अलग-अलग देवता हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि देवता आपस में संघर्षरत परस्पर दोषारोपण और वंदना में निरत रहे। यह सब कुछ लज्जा और क्षुद्रता की बात है। इसका स्पष्टीकरण वांछित है।