हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
छठी पहेली
वेदों की विषय- सामग्री
क्या वे कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य रखते हैं ?
I
यदि वेदों को अनिवार्य और उनके संशय रहित होने को स्वीकार कर भी लिया जाए तो उसके उपदेशों में नैतक और आध्यात्मिक मूल्य होने चाहिए। केवल इसलिए कि जैमिनि ने सही बताया है, हम कचरे को अनिवार्य और दोष रहित नहीं मान सकते। वेदों में कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक सामग्री है भी या नहीं! प्रत्येक हिन्दू जो वेद को संशय रहित मानता है इस प्रश्न पर विचार करने को बाध्य है।
आधुनिक लेखकों के विचार इस बात को स्वीकार नहीं करते कि वेदों का कोई आध्यात्मिक मूल्य है। इस विश्लेषण के लिए हम प्रो. म्यूर के विचारों का संदर्भ ले सकते हैं। प्रो. म्यूर¹ के अनुसार :
"इस पूरी रचना का स्वरूप और इनसे प्राप्त प्रमाणों के अनुसार जिन परिस्थितियों में ये रचे गए, उनसे पता चलता है कि प्राचीन कवियों द्वारा गाई गई ये रचना उन व्यक्तियों की व्यक्तिगत अभिलाषाओं और भावनाओं का सहज वर्णन मात्र है। जिन्हें उनके समक्ष दुहराया गया था। इन गीतों में आर्य ऋषियों ने अपने पैतृक देवताओं को तरह-तरह की बलियां चढ़ाकर उनकी स्तुति की और उन्हें संतुष्ट होने का आह्वान किया और उनसे ऐसे अनेक वरदान मांगे जिनकी मानव मात्र को लालसा होती है, जैसे स्वास्थ्य, सम्पदा, चिरायु, पशुधन, संतति, शत्रु पर विजय, पाप मुक्ति और शायद स्वर्ग-सुख भी । "
नि:संदेह यह आपत्ति की जा सकती है कि सभी विदेशी विद्वान पूर्वाग्रह ग्रस्त हैं, इसलिए उनके मत स्वीकार नहीं किये जा सकते। हम पूर्णतः विदेशियों का सहारा नहीं लेते। इस देश में भी उनके समान विचारधारा वाले विद्वान उपलब्ध हैं। इनमें सबसे सशक्त उदाहरण चार्वाक का है।''
1. मयूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, (पृष्ठ का उल्लेख नहीं है)।
चार्वाक ने वेदों¹ के विरुद्ध जो तर्क दिए हैं, उन तर्कों का खंडन किया गया है। प्राचीन साहित्य में चार्वाकों का उल्लेख उनकी भर्त्सना के संदर्भ में किया गया है:
"यदि आपको इस पर आपत्ति है कि यदि परलोक में सुख जैसा कुछ नहीं है तो बुद्धिमान अग्निहोत्र क्यों करें? बलि क्यों दे? जिन पर भारी अपव्यय होता है और थकान होती है, आपकी आपत्ति को कोई भिन्न साक्ष्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि अग्निहोत्रादि जीविकोपार्जन के साधन मात्र हैं, क्योंकि वेद में तीन दोष हैं अर्थात् मिथ्याकथन, अन्तर्विरोध और पुनरुक्ति । फिर ढोंगी लोग जो स्वयं को वैदिक पंडित बताते हैं, बहुत ही शरारती हैं। क्योंकि ज्ञान - मार्गियों की जड़ खोदने कर्मकांडी आ धमकते हैं और कर्मकांडियों के विरोधी ज्ञानमार्गी, कर्मकांड की धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकते हैं और अंत में तीनों वेद असंबद्ध चारणों का गेय काव्य है। जो पोंगापंथियों के वाक् चातुर्य के कारण आज तक विद्यमान हैं, और इसी कारण यह लोक धारणा प्रचलित है :
'अग्निहोत्र, तीन वेद, तापसवृत्ति, तीन पद और भस्म रमाकर कुरूप होना, ये उनकी कमाई के धंधे हैं, " और बृहस्पति के कथानानुसार "मनुष्यता और बुद्धि से कोई सरोकार नहीं है । "
बृहस्पति भी इसी मत के अनुयायी थे। चार्वाक की अपेक्षा बृहस्पति वेदों के विरुद्ध अधिक कठोर एवं उग्र थे। जैसा कि माधवाचार्य ने उद्धृत किया हौ बृहस्पति² का तर्क है:
"स्वर्ग की कोई सत्ता नहीं है, मोक्ष कुछ नहीं है । पुनर्जन्म होता है। न चार जातियों का कोई कर्म आदि प्रभाव डालते हैं। अग्निहोत्र, तीनों वेद, तापस-वृत्ति तीन-पद भस्म रमाकर कुरूप होना... उनकी कमाई के धंधे हैं जिनमें बुद्धि और मनुष्यता का भाव नहीं है, ज्योतिस्तोम संस्कार में यदि कोई जीव काट दिया जाता है और यदि वह सीधे स्वर्गगामी होता है तो बलिदाता अपने पिता की बलि क्यों नहीं दे देता ?
यदि श्राद्ध से मृतक संतुष्ट होते हैं तो इहलोक में भी जब कोई यात्रा आरंभ करता है तो यात्रा के प्रबंध करना व्यर्थ हैं?
यदि श्राद्ध से परलोक में संतुष्टि होती है तो इहलोक में उन्हें भोजन क्यों नहीं दिया जाता? जो स्वर्ग से विमान आने की प्रतीक्षा में बैठे हैं।
1. सर्व दर्शन संग्रह, पृ. 10
2. वही, (पृ. संख्या का उल्लेख नहीं है)।
(जब तक जीवन है तो सुख से क्यों न रहें? क्यों न ऋण लेकर भी घी पिए ? )
यदि मरणोपरांत देह भस्म बन जाती है तो वापस कैसे आ सकती है?
देह त्याग के पश्चात् कोई यदि परलोक चला जाता है तो वह अपने परिजन के मोह में फंसकर लौट क्यों नहीं आता ?
इस प्रकार यह सब कमाई के धंधे हैं जो ब्राह्मणों ने बना रखे हैं।
यह सभी संस्कार मृतकों के लिए हैं, अन्यत्र कोई फल नहीं मिलता, तीन वेदों के सृष्टा विदूषक, लालबुझक्कड़ और दुरात्मा हैं।
पंडितों, झारपड़ी, तुरपड़ी के सर्वविदित सूत्र और देवी के लिए परोक्ष पूजा सभी अश्वमेध की प्रशंसा में हैं।
इनका अन्वेषण लालबुझक्कड़ों ने किया और इसी कारण पुरोहितों को विभिन्न प्रकार से चढ़ावा दिया जाता है।
जबकि इसी प्रकार निशाचरों ने मांस भक्षण की प्रशंसा की है। "
यदि चार्वाक और बृहस्पति के मत अमान्य हैं तो अन्य अनेक साक्ष्य विद्यमान हैं। यह साक्ष्य न्यायवैशेषिक, पूर्व और उत्तर मीमांसा दर्शनशास्त्रों में उपलब्ध हैं।
यह स्पष्ट है कि कुटिल लेखकों ने इन दर्शनशास्त्रों पर इकतरफा पाठ्य पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने वेदों की प्रामाणिकता का औचित्य बताने से पूर्व इस बात का पूरा षडयंत्र रचा है कि वेदों की सत्ता को चुनौती देने वाले उनके विरोधियों का मत उनकी पाठ्य पुस्तकों के पास भी न फटक सके। इस तथ्य से हम दो बातें प्रामाणित कर सकते हैं : (1) कि एक ऐसी विचारधारा थी जो वेदों को प्रामाणिक ग्रंथ स्वीकार करने के विरुद्ध थी, (2) कि वे सम्मानित विद्वान थे जिनके मत को वेदों की सत्ता स्वीकार करने वाले भी मानने को बाध्य थे। मैं न्याय और पूर्व मीमांसा में विमत को उद्धृत करता हूँ।