हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
न्याय-व्यवस्था के दर्शन के संस्थापक गौतम का विचार है:
"मंत्रों की भांति वेदों की प्रामाणिक और आयुर्वेद की प्रामाणिकता ऐसे प्रवीण पुरुषों के कारण स्थापित हुई, जिन्होंने इसे प्रचारित किया। क्योंकि वेदों के प्रवीण सृष्टा विद्वान थे, सत्यनिष्ठ थे, उसी का प्रमाण है कि वेदों की रचना ऐसी प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों द्वारा की गई और इसी कारण वेदों की प्रामाणिकता का आभास होता है। यह मंत्रों और आयुर्वेद के दृष्टांत देते हैं। मंत्र का अर्थ है ऐसा वाक्य जो विषादि का शमन करता है और आयुर्वेद वेद का अंग है, जिसमें वेद के लक्षण भी हैं उसके विषय में इस दृष्टांत से अब क्योंकि इन दो की सत्ता सामान्यतः स्वीकार्य है, इसलिए अनुमान लगाया जाना चाहिए। कुछ इस सूक्ति की व्याख्या इस प्रकार करते हैं। वही वेद हैं जिनमें प्रामाणिकता विद्यमान है अथवा मान्य हैं। ऐसे वेदत्व से किसी रचना की प्रामाणिकता का अनुमान किया जा सकता है। "

वैशेषिक दर्शन स्वीकार करता है कि वेद प्रमाण हैं किन्तु इसका आधार निम्नांकित है:
(1) कि वेद मेधावियों की रचना है, और
(2) इनका उद्भव दैवी है। इसलिए ये प्रमाणित हैं।
सांख्य दर्शन के संस्थापक कपिल का कथन है कि वेदों के सनातन होने का अनुमान नहीं किया जा सकता क्योंकि वेदों के अनेक पाठों में स्वयं यह संकेत है कि वे रचे गए हैं। इसमें इस बात का स्पष्ट खंडन किया गया है कि वेदों का उद्भव किसी दैवी शक्ति के सुविचारित प्रयासों से हुआ है। सांख्य के अनुसार वेद प्रदीप्त सूर्य के समान हैं, जिनमें स्वयं प्रसूत प्रकाश है और अपनी समग्रता दर्शाने तथा सृष्टि को प्रकाशित करने के लए स्वार्जित शक्ति से प्रकाशमान हैं। चाहे वह भूत हो या भविष्य, विराट हो या क्षुद्र, निकटस्थ हो या दूरस्थ, वेदांत दर्शन दो भिन्न मत व्यक्त करता है। वह ब्रह्मा को वेदों का सृष्टा मानता है क्योंकि यह उद्गम और उद्गम का कारण भी है। उसमें ब्रह्मा को अनरनारी और नपुंसक और परमात्मा कहा है न कि पुरुष सृष्टा । उसने वेदों को सनातन घोषित किया है और उनके एक स्वतंत्र नियंता की ओर भी संकेत किया है।
ब्राह्मणों की इसी से भरपाई नहीं होती कि वेद व्यक्ति द्वारा निर्मित हैं। वे इससे भी आगे बढ़कर कहते हैं कि स्वयं ईश्वर उनका सृष्टा नहीं है। यह सिद्धांत इसलिए पूर्व मीमांसा के प्रणेता का है । इस सिद्धांत के पक्ष में जैमिनि के तर्क इतने विचित्र हैं कि इसकी करामात बाजीगरी का खेल लगता है।
ब्राह्मण-दर्शन के ग्रंथ पूर्व मीमांसा में यह उल्लेख है कि वेद अपौरुषेय हैं। ग्रंथ का अगला अंश इस तर्क का परिचायक है।
पूर्व मीमांसा के रचयिता जैमिनि पहले न्यायवैशेषिक के कथन की विवेचना करते हैं; जिनका विचार है कि वेद परमेश्वर की कृति है। ये न्यायवैशेषिक के कथन का उल्लेख करते हैं:
मीमांसक का तर्क है कि:
"वेदों का उद्गम अमूर्त परमेश्वर द्वारा संभव नहीं जिसका तालू अथवा उच्चारण के लिए कोई अंग ही नहीं है और इस कारण यह सोचा नहीं जा सकता कि वह शब्दों की अभिव्यक्ति कर सकता है। इस आपत्ति पर नैयायिक की प्रतिक्रिया अनुकूल नहीं है क्योंकि उसके अनुसार परमेश्वर अमूर्त है फिर भी अपने भक्तों को वृतांत देने हेतु वह रूप धारण कर सकता है। इस प्रकार यह तर्क कि वेद अपौरुषेय नहीं है, अमान्य है। "
फिर वह मीमांसकों के सिद्धांत पर आते हैं :
"मैं अब इन संदेहों का निराकरण करता हूं कि इस पौरुषेयत्व का क्या अर्थ है जिसे प्रमाणित करना है। इसका तात्पर्य है, ( 1 ) किसी पुरुष द्वारा उत्पत्ति, जैसे हमारे द्वारा वेदों की उत्पत्ति, जब हम इनका दैनिक पाठ करते हैं अथवा (2) इसकी अभिव्यक्ति की दृष्टि से क्या यह कोई व्यवस्था है जो - ज्ञान अन्य साक्ष्यों से ग्राह्य है, जैसे कि हमने स्वयं ग्रंथों की रचना की है। यदि पहले अर्थ को ग्रहण किया जाए तो कोई विवाद नहीं होगा। "
यदि दूसरे भाव को ग्रहण किया जाए तो मेरा प्रश्न है कि क्या इस कारण वेदों को प्रामाणिक माना जाए कि हमें इनसे आभास होता है अथवा (क) इस कारण कि यह दैवी वाक्य है, अथवा (ख) यह अगम ज्ञान है ।
प्रथम विकल्प (क), कि वेदों की प्रामाणिकता इसलिए है कि यह व्याख्या मात्र है यदि मालती माधव अथवा अन्य निरपेक्ष रचनाओं के कथन को देखा जाए तो यह सही नहीं हो सकता क्योंकि यह सिद्धांत निरापद नहीं । यहीं दूसरे ओर आप कहते हैं। (ख) वेदों की सामग्री अन्य प्रामाणिक ग्रंथों से भिन्न है, इससे भी दार्शनिक सहमत नहीं होंगे क्योंकि वेद वह वाक्य है जिसे अन्य साक्ष्यों से प्रमाणित नहीं किया जा सकता। अब यदि यह स्थापित किया जा सके कि वेद वाक्य मात्र उसी को प्रमाणि करता है तो अन्य साक्ष्यों से उसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता ।
और यदि हम यह स्वीकार कर लें कि परमेश्वर ने कोई स्वरूप धारण किया होगा तो यह मान्य नहीं होगा क्योंकि बिना किसी तत्व के उन्होंने ऐसा कुछ व्यक्त किया हो जो अतीन्द्रिय हो, यह संभव नहीं, वह भी तब जब कोई देश - काल और परिस्थिति न हो। न ही यह सोचा जा सकता है कि उनके नेत्र तथा दूसरी इन्द्रियों में ऐसे ज्ञान - प्रसार की कोई शक्ति थी। पुरुष केवल वही जान सकता है जो उसने साक्षात देखा है।
किसी सर्वज्ञ रचयिता की कल्पना से असहमत ऐसा ही (प्रभाकर) ने कहा है:
"जब किसी सर्वज्ञ को चुनौती दे जिसने किसी तत्व के संपूर्ण रूप को देखा हो तो वह कल्पना बहुत ही धुंधली अथवा अति सूक्ष्म होगी क्योंकि कोई भी इन्द्रियां अपने निश्चित धर्म से विरत नहीं हो सकतीं, जैसे श्रवणेंद्रिय किसी स्वरूप को देख नहीं सकती। "
इस प्रकार वेदों की सत्ता किसी अलौकिक ज्ञान से संपन्न नहीं है जो किसी अमूर्त अरूप देवता से प्राप्त हुआ हो। "
नैयायिकों के मत को निरस्त करने हेतु जैमिनि ने उपरोक्त तर्क प्रस्तुत किए हैं। तदुपरांत जैमिनि सकारात्मक तर्क देते हैं कि वेद किसी भी प्रकार ब्रह्म वाक्य नहीं है किन्तु उससे भी श्रेष्ठ हैं। उनका कथन है:
“परवर्ती सूक्तियों में उद्घोषित किया गया है कि ध्वनि का संयोजन और उसका अर्थ सनातन है। वह चाहते हैं कि प्रमाणत करें कि यह ( संयोजन) की सनातनता शब्द की सनातनता अथवा स्वर पर निर्भर है।"
वह प्रश्न के प्रथम भाग से आरंभ करते हैं अर्थात् उस सिद्धांत से कि ध्वनि सनातन नहीं है।
"कतिपय अर्थात् नैयायिक कहते हैं कि ध्वनि एक रचना है क्योंकि हम जानते हैं कि यह प्रसासोत्पन्न है। यदि यह सनातन होती तो ऐसा न होता । "
"कि अपने संक्रमण स्वभाव के कारण यह सनातन नहीं है अर्थात् यह एक क्षण में ही विलीन हो जाती है । "
"क्योंकि इसके संबंध में हम क्रिया को 'निकालना' कहते हैं अथवा हम ध्वनि निकालते हैं। "
“क्योंकि विभिन्न व्यक्तियों को इसकी अनुभूति तत्काल होती है और परिणामतः श्रवणेन्द्रिय के तत्कालन सम्पर्क में आती है - दूरस्थ और निकटस्थ । यदि यह सनातन और एकमेव होती तो ऐसा न होता । "
'क्योंकि ध्वनि के मूल और संशोधित दो रूप होते हैं "दधि अत्र" और "दधी अत्र" के रूप में प्रस्तार के नियम से मूल ध्वनि ह्रस्व 'इ' दीर्घ 'ई' में बदल जाती है। इस प्रकार जिस तत्व में परिवर्तन हो जाता है, वह सनातन नहीं है। "
क्योंकि यदि अधिक संख्या में व्यक्ति समवेत ध्वनि करते हैं तो उनका विस्तार हो जाता है। फलतः मीमांसकों का सिद्धांत तथ्यहीन हो जाता है जो कहते हैं कि ध्वनि मानव-प्रयत्न से प्रकट ही की जाती है, उत्पन्न नहीं की जाती, क्योंकि सहस्रों वक्ता भी उसके अर्थ में विस्तार नहीं कर सकते जिसके स्वर का विस्तार करते हैं। जैसे एक सहस्र दीपक भी एक घड़े के आकार का विस्तार नहीं कर सकते।
मीमांसकों के इस सिद्धांत के विरुद्ध इन आपत्तियों का जैमिनि ने उत्तर दिया है कि ध्वनि प्रकट की जाती है और उसके उच्चारण उसे उत्पन्न नहीं कर सकते। जैमिनि कहते हैं। :
"परंतु, दोनों सिद्धांतों के अनुसार, यथा जो स्वीकार करता है कि ध्वनि की उत्पत्ति होती है और दूसरे के अनुसार जो कहते है कि वह मात्र प्रकट की जाती है, दोनों के अनुसार वह क्षणिक है । परन्तु इन दोनों मतों के अनुसार अभिव्यक्ति का सिद्धांत अगले मंत्र से प्रकट है, जो यथार्थ है। "
"काल विशेष में सनातन ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती है, उसका कारण है कि कर्ता और कर्म का सम्पर्क नहीं बन पाता। ध्वनि शाश्वत है। उदाहरणार्थ- क्योंकि हम एक स्वर "क" से अवगत हैं जो हमें प्रायः सुनाई पड़ता है, क्योंकि यह सहज प्रक्रिया है तो हमें उसकी सहज कल्पना होती है। निस्तब्धता में जब किसी वक्ता के मुख से वायु का संयोजन और वियोजन होता है तो उससे वातावरण तरंगित होता है और इस प्रकार ध्वनि का आभास होता है जो सदैव विद्यमान रहती है, चाहे उसका आभास न भी होता हो। उसके संचरण पर आपत्ति का यह उत्तर है। "
"ध्वनि करना" का अर्थ है एक क्रिया अथवा " उच्चारण" ।
"जैसे सूर्य का दर्शन एक साथ अनेक व्यक्ति करते हैं, वैसे ही ध्वनि भी एक साथ अनेक व्यक्तियों द्वारा सुनी जाती है। ध्वनि सूर्य की भांति सर्वव्यापी है। यह कोई सूक्ष्म तत्व नहीं है, इसलिए सभी को समान रूप से ग्राह्य है चाहे कोई निकटस्थ हो अथवा दूरस्थ ।"
"सूत्र 10 में वर्णित है कि "इ" स्वर "ई" में परिवर्तित हो जाता है। वह "इ" का रूपांतरण नहीं है बल्कि "ई" एक भिन्न स्वर है। परिणाम निकलता है कि ध्वनि का रूपांतरण नहीं होता । "
“जब कई व्यक्ति समवेत स्वर में बोलते हैं तो कोलाहल की बढ़ता है, स्वर वही रहता है। कोलाहल का अर्थ है भिन्न-भिन्न दिशाओं से वायु के संयोजन - वियोजन का एक साथ कानों में प्रवेश । इसी कारण उसका विस्तार होता है। "
“ध्वनि सनातन होनी चाहिए क्योंकि वह अन्य लोगों तक अर्थ प्रेषित करती है। यदि वह सनातन न होती तो जब तक श्रोता उसका भाव जानता तब तक वह उपस्थित ही न रहती और इस प्रकार श्रोता भाव ग्रहण करने से वंचित रह जाता क्योंकि वह उपस्थित ही नहीं रहती । "
'ध्वनि सनातन है क्योंकि वह सदैव सही और समान होती है और अनेक व्यक्ति उसे एक साथ समान रूप से सुनते हैं और यह नहीं माना जा सकता कि वे सभी गलती करें। "
“यदि “गौ” शब्द को 10 बार दोहराएं तो श्रोता कहेंगे कि दस बार "गौ" कहा गया है। वे यह नहीं कहेंगे कि "गौ" की ध्वनि के दस शब्द कहे गए हैं। इस प्रकार यह ध्वनि की शाश्वतता का एक और प्रमाण है ।"
"ध्वनि सनातन है क्योंकि हमारे पास यह मानने के लिए कोई आधार नहीं है कि इसका क्षय हो जाता है। "
"परन्तु यह कहा जा सकता है कि ध्वनि वायु का रूपांतरण है क्योंकि इसका उद्गम वायु का संयोजन है, क्योंकि शिक्षा का कथन है कि ध्वनि के अनुरूप हवा निकलती है और इस प्रकार यह वायु से उत्पन्न होती है। इसलिए सनातन नहीं हो सकती।"
इस आपत्ति का निराकरण सूत्र 22 में किया गया है।
"ध्वनि वायु का रूपांतरण नहीं है। यदि ऐसा होता तो श्रवणेंद्रिय के समक्ष कोई संगत तत्व न होता जिसकी वह अनुभूति करती है । श्रवणेंद्रिय को वायु के किसी रूपांतरण की (जिसे नैयायिकों ने युक्ति संगत बताया है) अनुभूत न होती। कान की अनुभूति अमूर्त होती है। "
"वैदिक साहित्य में उपलब्ध है कि स्वर सनातन है। इसके लिए सनातन ध्वनि है " हे विरूप" । अब यद्यपि इस वाक्य का एक अन्य उद्देश्य है फिर भी वह भाषण की शाश्वतता घोषित करता है और इस प्रकार नादब्रह्म है। "
इस सिद्धांत के पक्ष में कि वेद सनातन है और मानव द्वारा सृजित नहीं हैं ना ही परमात्मा द्वारा रचित है, जैमिनि के ऐसे तर्क हैं।
जिस तथ्य पर उनका सिद्धांत आधारित था, वह सहज है।
प्रथमतः, ईश्वर अमूर्त है और उसका तालू नहीं है, इस प्रकार वह वेदों का उच्चारण नहीं कर सकता ।
दूसरे, कल्पना करें कि परमात्मा मूर्त हैं, परमात्मा उसकी अनुभूति नहीं कर सकता जो इन्द्रियों की क्षमता से परे हैं जबकि वैदिक साहित्य मानव की इन्द्रियों की अनुभूति से परे हैं।
तीसरे, शब्द और उसके अर्थ के मध्य सम्पर्क सनातन है।
चौथे, ध्वनि सनातन है।
पांचवे, क्योंकि ध्वनि सनातन है इसलिए ध्वनि से उत्पन्न शब्द भी शाश्वत है।
छठे, क्योंकि शब्द सनातन है इसलिए वे वेद भी सनातन हैं और क्योंकि वेद सनातन हैं; इसलिए उनकस सृष्टा न मानव है और न परमेश्वर ।
इन तर्कों के संबंध में क्या कहा जा सकता है? क्या इससे बढ़कर भी कुछ अनर्गल हो सकता है? कौन स्वीकार कर सकता है कि वेदों में ऐसा कुछ है जो मानव की इन्द्रियों की अनुभूतियों से परे है ? कौन स्वीकार कर सकता है कि शब्द और उसके अर्थ के बीच सनातन संबंध है? कौन स्वीकार कर सकता है क नाद उत्पन्न नहीं होता ना ही प्रकट हो सकता है किन्तु सनातन है ?
इन भ्रामक तर्कों के संबंध में हम पूछ सकते हैं कि ब्राह्मणों ने ऐसे निर्जीव निष्कर्षों के स्थापनार्थ ऐसा निर्जीव प्रयत्न क्यों किया ? इससे वे क्या प्राप्त करना चाहते थे ? क्या इसका कारण यह था कि ब्राह्मणों की चतुर्दिक सत्ता के स्थापनार्थ वेदों को चातुर्वर्ण्य का प्रतीक बना दिया गया ?