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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 12 of 92
25 ऑगस्ट 2023
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     न्यायदर्शन के प्रणेता गौतम वेदों की प्रामाणिकता के पक्षधर थे। उन्होंने सूत्र 57 में अपने विरोधियों के तर्क का सारांश दिया है जो निम्नांकित¹ है :

     "वेद प्रमाण नहीं है क्योंकि इनमें "मिथ्यावाद, आत्मविरोध और पुनरुक्ति दोष है । मौखिक साक्ष्य जो प्रत्यक्ष साक्ष्यों से भिन्न है कि वेद प्रमाण नहीं है, क्यों? क्योंकि उसमें मिथ्यापन आदि के दोष हैं। "

vedon ki Vishay samagri - Hindu Dharm Ki Paheliyan - dr Bhimrao Ramji Ambedkar


1. मयूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 113


     "इन दोषों के संदर्भ में मिथ्यावाद इस तथ्य से प्रमाणित है कि कई बार हम पाते हैं कि पुत्रेष्टि के लिए दी गई बलि फलदायी नहीं होती और इसी प्रकार अन्तर्विरोध प्रकट है कि पूर्व और परवर्ती घोषणाओं में भिन्नता है। इस प्रकार वेद कहता है कि "वह तब यज्ञ करता है जब सूर्योदय होता है।" वह सूर्योदय से पूर्व यज्ञ करता है। वह तब यज्ञ करता है जब श्यान उसका चढ़ावा लेकर भाग जाता है और दोनों ही बलिदाता का चढ़ावा उठाकर ले जाते हैं, फिर शब्दों के बीच अनतर्विरोध है जिनमें बलि की प्रेरणा है और उसकी निंदा भी है जिसके घातक परिणाम होते हैं। तब पुनरुक्ति के कारण वे प्रमाण नहीं है क्योंकि जो पहले कहा गया है उसकी तीसरी बार आवृति होती है। अंत में भी पहली बात दोहराई जाती है। क्योंकि आदि, अंत के समान है और शब्दों की तीसरी आवृति है। यह वाक्य पुनरुक्ति है। क्योंकि इस वाक्य विशेष में इन उदाहरणों के अनुसार एक-सा कथन होने के कारण और यह सभी रचनाएं एक व्यक्ति की हैं इसलिए समान प्रकृति की हैं और उनमें कोई प्रामाणिकता नहीं है । "

     जैमिनि का संदर्भ देखें। वह वेद विरोधियों के विचारों¹ को पूर्व मीमांसा के सूत्र 28 और 32 में सार-संक्षेप में उद्धृत करते हैं। सूत्र 28 कहता है :

     "यह भी आपत्ति की गई है कि वेद सनातन नहीं हो सकते, क्योंकि हम पाते हैं कि उनमें ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख है जो सनातन नहीं है बल्कि जन्म और मृत्यु के पात्र हैं। इस प्रकार वेद में कहा गया है "बाबरा प्रवाहनी की इच्छा है, कुसर विंदा औद्दालकी की इच्छा है" इसलए वेद के संदर्भित वाक्यों में इन व्यक्तियों के जन्म-पूर्व उल्लेख संभव नहीं है। यह स्पष्ट है कि ये वाक्य आरंभिक हैं। इस प्रकार सनातन नहीं है। यह प्रमाणित है कि ये मानव कृतियां हैं। "

सूत्र 32 कहता² है :

"यह प्रश्न किया गया है कि वेद कर्त्तव्यों का साक्ष्य कैसे हो सकते हैं जबकि उनमें ऐसी असंगत और अनर्गल बातें भरी पड़ी हैं जैसे "कम्बल और खड़ाऊं पहने एक बूढ़ा द्वार पर खड़ा है और आशीष के गीत गा रहा है। समर्पण को तत्पर एक ब्राह्मणी कहती है "हे राजन बता, प्रतिपदा के दिन संभोग के क्या अर्थ हैं? अथवा यह " गऊओं ने इस बलि पर उत्सव मनाया " ।

     निरुक्त के लेखक यास्क ने भी यह मत प्रकट किया है। वह कहता है :


1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 7
2. वही, पृ. 80


     पूर्वोक्त खंड में चार प्रकार की ऋचाएं हैं। क. जो देवता की अनुपस्थिति में संबोधित हैं, ख. जिसमें उसको समक्ष जानकर संबोधन कया गया है, ग. जिनमें आराधक को उपस्थित और आराध्य को अनुपस्थित माना गया है। ये अत्यधिक हैं, घ. जबकि जो स्वगत हैं ये यत्र-तत्र ही हैं। ऐसा भी हुआ है कि देवता की प्रशंसा बिना वरदान की कामना की गई है जैसे कि मंत्र (ऋ. वे. 1.32) “मैं इन्द्र के शौर्य का वर्णन करता हूं" आदि। फिर बिना स्तुति किए वरदान की कामना की गई है। जैसे "मैं अपने चक्षुओं से अच्छा देखूं, मेरा मुख कांतिमान हो और कानों से भली भांति सुनूं। ऐसा अथर्ववेद (यजुर) और बलि सूत्रों में बार-बार कहा गया है। फिर इसमें हम शपथ और शाप भी पाते हैं। (ऋ.वे. 7, 104, 15) “यदि मैं यातुधानी हूं तो आज मैं मर जाऊं" (आदि) फिर हम पाते हैं कुछ विशिष्ट परिस्थितियों को दर्शाने वाले मंत्र (ऋ.वे. 10, 29, 2) सत मृत्यु नहीं थी न अमरत्व आदि कुछ स्थितियों में विलाप भी लक्षित है जैसे कि मंत्र (ऋ.वे. 10, 95, 14 ) “रूपदान देवता लुप्त हो जाएगा और कभी नहीं लौटेगा " आदि। कहीं लांछन और प्रशंसा भी है जैसा कि (ऋ.वे. 10, 117, 6) “वह व्यक्ति जो अकेला खाता, अकेला पापकर्म करता है आदि। ऐसे ही द्यूत के विषय में मंत्र हैं (ऋ. वे 10, 34, 13) द्यूत क्रीड़ार की निंदा की गई है - और कृषि कार्य की प्रशंसा । इस प्रकार जिन उद्देश्यों से ऋचाओं की सृष्टि हुई, ये विविध प्रकार के हैं। '

     यास्क के शब्दों में :

     "प्रत्येक मंत्र किसी देवता के लिए रचा गया है जिससे ऋषि का उद्देश्य इच्छा पूर्ति का है, वह उसे संबोधित करता है । "

     यदि वह प्रमाणित करने के लिए इतना भी पर्याप्त नहीं है कि वेदों में कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य नहीं है तो अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

     जहां तक नैतिकता का प्रश्न है, ऋग्वेद में प्राय: कुछ है ही नहीं, न ऋग्वेद नैतिकता का ही आदर्श प्रस्तुत करता है। इस संबंध में तीन उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

     पहला यम-यमी संवाद है जो भाई-बहन थे।

     '(यमी कहती है)

     मैं अपने मित्र (यम) को मित्रता के लिए निमंत्रित करती हूं। विशाल रेगिस्तान और महासागरों को पार करती हुई आई हूं, इस निर्जन भूमि पर ( तुम्हारी) संतान जन्म दे, जो तुम्हारे जैसे पिता के महान गुणों से सम्पन्न हो । "

     यम कहता है- " तुम्हारा मित्र ऐसी मित्रता की इच्छा नहीं रखता। एक ही मूल की होते हुए भी तुम्हारी प्रकृति दूसरे प्रकार की है। महान प्रजापति के बहादुर पुत्रों का स्वर्ग पर अधिकार है और वे हमें देख रहे हैं।"

     यमी कहती है-" अमरत्व प्राप्त देवादि सहवास का सुख प्राप्त करते हैं जो मृत्यु लोक के लोगों के लिए मना है। आप मुझसे सहवास करें कि जिस प्रकार सबका निर्माता (ब्रह्मा) अपनी पुत्री का पति बना । "

     यम कहता है-"हमने वह कर्म नहीं किया जो पहले किया गया है। हम सत्यवादी हैं। अतः असत्य भाषण कैसे कर सकते हैं। गंधर्व (सूर्य) अंतरिक्ष जल धारण करने वाला और उसकी वधू हम दोनों के पिता-माता हैं, अतः हम सगे ( भाई - बहन) हैं।"

     यमी कहती है- "परमपिता प्रजापति ने हमें गर्भ में ही पति-पत्नी बना दिया। उसके कार्य में कोई बाधक नहीं। पृथ्वी और आकाश भी हमारे संबंध से परिचित हैं। "

     यम कहता है-"हमारे प्रथम प्रणय को कौन जानता है। किसने यहां रहस्य से परिचित कराया हैं। मित्र और वरुण के स्थान दिन-रात के विषय में तू क्या कहती है। नर्क की सजा कौन देता है। "

     यमी कहती है- "यम की वासना मुझ यमी को एक शैया पर सोने के लिए विवश करे। मैं पत्नी के रूप में पति को अपना सब कुछ समर्पित करती हूं। एक रथ के दो पहियों की भांति हम सहयोग कर वासना की पूर्ति करें। "

     यम कहता है- " ईश्वर के दूत पृथ्वी पर सदा विचरण करते हैं और अपने नेत्र खुले रखते है। ओ विनाशिनी शीघ्र किसी अन्य के साथ रमण कर जैसे कि एक गाड़ी के दो पहिए मिलते हैं और मेरा पीछा छोड़। "

     यमी कहती है- "तुम्हारे ऊपर प्रत्येक पुजारी रात्रि और दिन का न्यौछावर करें, सदैव सूर्य के नेत्र खुलें, तुम्हारे लिए युगल ( रात और दिन) संयुक्त होकर आकाश और पृथ्वी की भांति मिलें। मैं यम के वियोग को सहन न कर सकूं।"

     यम कहता है-" आगे चलकर ऐसा समय आयेगा जब बहनें ( पति के रूप में) उसे चुनेंगी तो उनके भाई नहीं होंगे। अतः भाग्यशालिनी मेरे अतिरिक्त अन्य के साथ अपनी भुजाओं को उसका तकिया बना । "

     यमी कहती है-" उस भाई होने से क्या लाभ है जिसके रहते हुए भी बहिन पति विहीन रहे। उस बहिन के होने से क्या लाभ है जिसके रहते हुए भी भाई दुख उठाए। मैं कामाहत होकर ऐसे वचन बोल रही हूं। तुम मेरे शरीर से अपना शरीर भली-भांति मिलाओ।"

     यम कहता है-“हे यमी, मैं तुम्हारे शरीर से अपना शरीर नहीं मिलाना चाहता । जो अपनी बहिन से सम्भोग करता है उसे लोग पापी कहते हैं। हे सुंदरी ! मेरे अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष से आमोद-प्रमोद करो। तुम्हारा भाई यह काम नहीं करना चाहता । "

     यमी बोली - "मुझे खेद है कि तुम बहुत कमजोर हो। मैं तुम्हारे मन को नहीं समझ पा रही हूं। रस्सी जिस प्रकरा घोड़े को बांधती है, और लता जिस प्रकार वृक्ष से लिपट जाती है, उसी प्रकार अन्य स्त्री तुम्हारा आलिंगन करती है । "

     यम ने कहा-“हे यमी! लता जिस प्रकार वृक्षर को लपेटती है, उसी प्रकार तुम मेरे अतिरिक्त अन्य पुरुष का आलिंगन करो। तुम उस पुरुष का मन जीतने की कामना करो और वह पुरुष तुम्हारा मन जीतने की इच्छा करे। तुम उसी के साथ कल्या कारी सहवास करो। "

     'राक्षस - हंता अग्नि हमारी प्रार्थना स्वीकार करे। दुरात्मा से त्राण दें जो व्याधि के रूप में तेरे भ्रूण को आक्रांत कर सके, जो अंतः काष्ठ की भांति तेरे गर्भाशय को निरस्त करे।"

     "अग्नि देव हमारी अर्चना को स्वीकार करें, नरभक्षियों को नष्ट करें जो व्याधि के रूप में तेरे गर्भाशय पर दुष्प्रभाव डालते हैं, जो अंतः काष्ठ की भांति तेरी कोख को रिक्त कर सकते हैं। "

     "दुरात्मा से हमें त्राण दें जो पुंसत्व का हरण करते हैं। गर्भ ठहरते ही उसे विस्थापित करते हैं जो नवजात शिशु का हनन करना चाहते हैं। "

     “हमें दुरात्मा से त्राण मिले जो तेरी जंघा को विलग करता है जो पति-पत्नी के बीच बाधा बनता है जो तेरी कोख में प्रविष्ट होता है। बीज हरण करता है। हमें उस दुरात्मा से त्राण मिले जो भ्राता पति अथवा पति इतर प्रियतम के रूप में तुझ तक पहुंचता है और गर्भपात करना चाहता है । "

     "हमें दुरात्मा से त्राण मिले जो तुझे नींद या अंधेरे में छल लेता है। तुझ तक आकर गर्भपात कर देता है।"