हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पांचवी पहेली
ब्राह्मणों की इस माया की क्या तुलना कि वेद न मनुष्य रचित है न भगवान की सृष्टि ?
वैदिक ब्राह्मण वेदों को संशय-रहित कहने से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर कहा कि वेद अपौरुषेय हैं। इसका अर्थ है वेद मनुष्यों द्वारा नहीं रचे गए। यह सिद्धांत निस्संदेह उन्हें संशय रहित बनाता है। क्योंकि यह मनुष्य की रचना नहीं है, इसलिए इसमें त्रुटि संशय और दोष नहीं हो सकता जो मानव रचना से संभव है। इसलिए ये संशय-रहित हैं। कुछ भी हो इस सिद्धांत पर अलग से विचार किया जाना आवश्यक है क्योंकि यह एक स्वतंत्र सिद्धांत है।
क्या वास्तव में वेदों की रचना किसी मानव ने नहीं की? क्या वे सचमुच ही अपौरुषेय थे? इस विषय में सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य अनुक्रमणी में है जो प्राचीन संस्कृत साहित्य में विशेष प्रकार के साहित्य का भाग है। अनुक्रमणी प्राचीन वैदिक साहित्य की क्रमवार विषय-सूची है। प्रत्येक वेद की अनुक्रमणी है। कहीं-कहीं एक से अधिक भी हैं, ऋग्वेद की सात अनुक्रमणी उपलब्ध हैं, इनमें से पांच शौनक की, एक कात्यायन की और एक किसी अज्ञात विद्वान की तैयार की हुई है। यजुर्वेद की तीन हैं, इनमें तीन शाखाओं में से प्रत्येक की एक है। ये हैं, आत्रेयी, चारारण्य और मध्यांदिन। सामदेव की दो अनुक्रमणी हैं। एक का नाम आर्षेय ब्राह्मण है और दूसरी का परिशिष्ट है। अथर्ववेद की एक अनुक्रमणी है। इसका नाम बृहत सर्वानुक्रमणी है।
प्रोफेसर मैक्समूलर के अनुसार कात्यायन की ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी स्वयं में सम्पूर्ण है। इसकी महत्ता इस कारण है कि इसमें (1) प्रत्येक मंत्र का प्रथम शब्द दिया है, (2) मंत्रों की संख्या है, (3) संकलन कर्ता ऋषि और उसकी परम्परा का नाम, (4) देवता का नाम और (5) प्रत्येक छंद का नाम दिया है। सर्वानुक्रमणी के संदर्भ से यह आभास मिलता है कि विभिन्न ऋषियों ने मंत्रों की रचना की और उनका सम्पूर्ण संकलन ऋग्वेद बना। ऋग्वेद अनुक्रमणी के अनुसार यह साक्ष्य मिलता है कि यह वेद पौरुषेय है। अन्य वेदों के विषय में भी यही निष्कर्ष हो सकता है। पौरुषेय अनुक्रमणी यथार्थ है, यह ऋग्वेद के मंत्रों से पता चलता है कि जिनमें ऋषि अपने को वेदों का संयोजक मानते हैं।
कुछ ऐसे उद्धरण निम्नांकित हैं:
"कण्वों ने तुम्हारे लिए स्तुति की है, उनकी स्तुति सुनो।" "हे इन्द्र, अश्वों के सारथी अपनी प्रभावोत्पादकता हेतु गौतम का मंत्र सुनो। "
"तेरे तेजवर्धनार्थ, हे ऐश्वर्यमान अश्विन मानस द्वारा प्रभावोत्पादक मंत्रों की रचना की गई है। "
“हे अश्विन, यह सार्थक उपासना मंत्र तेरे लिए गृत्समद ने उच्चारा है।"
“हे इन्द्र, तू प्राचीन है जो अश्वों को जोतता है, तेरे लिए गौतम के वंशज नौ ने नया मंत्र रचा है।"
"सो हे पुरोधा, प्रश्रय हेतु गृत्समद ने मंत्र रचा है जैसे मनुष्य निर्माण करता है।"
“ऋषियों ने इन्द्र के लिए एक प्रभावोत्पादक रचना की है और प्रार्थना की है।"
"हे अग्नि, यह मंत्र तेरे लिए रचा है, अपनी गऊओं और अश्वों का सुख भोग"
"हमारे पिता इन्द्र के मित्र अयाश्य ने सप्त शीर्ष पवित्र सत्य जन्य इस चौथे महान मंत्र का आह्वान किया है। "
“हम रहूगणों ने अग्नि के लिए मधुभाषा में मंत्रोच्चार किया है, हम उनका गुणगान करते हैं।"
“सो आदित्यों, अदिति और सत्ता सम्पन्न गण प्लाति पुत्र ने तुम्हारी स्तुति की है। गया ने स्वर्गीय देवों की प्रशस्ति गाई है। "
"इसी को वे ऋषि पुरोहित यज्ञकर्ता कहते हैं, स्तुति गायक, मंत्रोच्चारक कहते हैं, वही (अग्नि के ) तीन शरीरों को जानता है। वही वरदानों की वर्षा करने वाला प्रमुख है।"
अनुक्रमणिकाओं के अतिरिक्त और भी साक्ष्य हैं, जिनसे पता चलता है कि वेद अपौरूषेय नहीं हैं। ऋषि वेदों को मानवकृत और ऐतिहासिक रचना मानते हैं। ऋग्वेद के मंत्र पूर्ववर्ती और तत्कालीन मंत्रों के बीच भेद करते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं :
'अग्नि, जिसकी पूर्ववर्ती और साथ ही वर्तमान ऋषि भी स्तुति करते हैं, शुभ करेगा।"
"पूर्ववर्ती ऋषि ने संकटमोचन हेतु तेरा आह्वान किया । "
"मुझ वर्तमान ऋषि की ऋचाएं सुनो, इस वर्तमान (ऋषि) की । "
"इन्द्र, तू पूर्ववर्ती ऋषियों के लिए एक आह्वान था, जिन्होंने अर्चना की - जैसे पिपासु के लिए जल। इस मंत्र द्वारा मैं तेंरा आह्वान करता हूँ। "
"पूर्ववर्ती ऋषियों, देदीप्यमान ऋषियों ने बृहस्पति के सम्मुख आह्लादपूर्व स्वर में प्रस्तुति की। "
"हे माधवन, किसी परवर्ती या पूर्ववर्ती पुरुष अथवा वर्तमान पुरुष में इतना पराक्रम नहीं ।"
"क्योंकि ( इन्द्र के) पूर्ववर्ती आराधक हम हो सकते हैं। ये निष्कलंक, अप्राप्य और अनाहूत थे।"
"हे शक्तिमान देव! इस हेतु लोग तेरे आराधक हैं, जैसे कि पूर्ववर्ती मध्य-युगीन और परवर्ती तेरे मित्र थे और हे परम आहूत, सभी वर्तमान वय वालों की सोच । "
"हमारे पूर्व पिता इन्द्र के लिए सात नवगव ऋषि अपने मंत्रों में भोजन की याचना करते हैं। "
"हमारे नवीनतम मंत्र से गौरवान्वित हो क्या आप हमें सम्पदा और संतति सहित भोजन देंगे?"
ऋग्वेद के गहन अध्ययन से पता चलेगा कि उसके पुराने और नए मंत्रों के बीच अंतर है। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :
“हमारे नवीनतम मंत्र से गौरवान्वित हो तुम हमें सम्पदा और संतत सहित भोजन दो।"
"हे अग्नि तूने देवताओं के मध्य हमारे नवीनतम आह्वान की घोषणा की थी । "
"हमारे नवीन मंत्र से तेरा वेग बढ़ेगा पुरंदर हमें प्राणवान आशीर्वाद दे ।”
"शक्ति पुत्र अग्नि को मैं एक नवीन ऊर्जावान मंत्र अर्पित करता हूं जो भाववाणी के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। "
“जो नवीन अभिव्यक्ति अभी प्रस्फुटित हुई है, उसके द्वारा मैं शक्तिमान संरक्षक को मानस रचना प्रदान करता हूं।"
"हमारी सहायता हेतु गर्जन करने वाले पुंगव नया मंत्र तुझे उद्बोधित करे। "
"मैं पूर्वजों की भांति नवीन मंत्र द्वारा तुझे उत्प्रेरित करना चाहता हूं।"
"तेरी स्तुति में जो नए मंत्र रचे हैं, उनसे तू संतुष्ट हो" ।
“हे सोभारी, इन युवा शक्तिमान और बुद्धिमान देवों के लिए नए मंत्रों का उच्चारण कर। "
“गर्जन करने वाले वृत्रहंता इन्द्र, हम अनेक (पूजकों) ने तेरे लिए कई मंत्र रचे हैं, जो सर्वथा नवीन हैं। "
"मैं इस प्राचीन देव को सम्बोधित करूंगा। मेरी नई स्तुति, जिसकी उसे इच्छा है, उसे वह सुने । "
“हम अश्वों, पशुधन और सम्पदा की कामना से, तेरा आह्वान करते हैं। "
इतने साक्ष्य प्रस्तुत करने पर यह सिद्ध होता है कि वेदों की रचना मनुष्य ने की है। ब्राह्मणों ने कंठशक्ति से यह प्रचारित किया क वेद मानव-रचित नहीं हैं उसका पार पाना सरल नहीं है। यह प्रचार किस उद्देश्य से किया गया ?
इसके बावजूद बहुत से ऐसे प्राख्यात दार्शनिक हैं, जो वेदों की सत्ता स्वीकार करते हैं, हालांकि वे यह नहीं मानते कि वेद सनातन अथवा अपौरुषेय हैं ।