भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
११. प्रधान मंत्री का कुमार को समझाना
१. उदायी समझ गया कि तरुणियाँ असफल रही हैं और राजकुमार ने उनमें कोई दिलचस्पी नहीं ली ।
२. नीतिकुशल उदायी ने राजकुमार से स्वयं बातचीत करने की सोची ।
३. राजकुमार से एकान्त में उदायी ने कहा – “क्योंकि मुझे राजा ने आपके सुहृद् - पद पर नियुक्त किया है । इसलिये मैं एक मित्र की हैसियत से ही आपसे दो बातें करना चाहता हूँ।”
४.." किसी अहित काम से बचाना, हितकर काम में लगाना, विपत्ति में साथ न छोड़ना - मित्र के यही तीन लक्षण हैं ।”
५. “यदि मैं अपनी मैत्री की घोषणा करने के अनन्तर भी पुरूषार्थ से विमुख आपको न समझाऊँ तो मै अपने मैत्री- धम्म से च्युत होता हूँ ।"
६. “ऊपरी मन से भी स्त्रियों से सम्बन्ध जोड़ना अच्छा है। इससे आदमी का संकोच जाता रहता है और मन का रंजन भी होता ही है।"
७. “निरादार न करना और उनका कहना मानना - इन दो बातों से ही स्त्रियाँ प्रेम के बन्धन में बँध जाती हैं । निस्सन्देह सद्गण भी प्रेम का कारण होते हैं । स्त्रियाँ आदर चाहती हैं ।”
८. "हे विशालाक्ष! क्या आप ऊपरी मन से भी, उनके सौन्दर्य के अनुरूप शालीनता दिखाने के लिये, उन्हें प्रसन्न रखने का कुछ प्रयास न करेंगे ?"
९. “दाक्षिण्य ही स्त्रियों की औषध है । दाक्षिण्य ही उनका अलंकार है । बिना दाक्षिण्य ही सौंन्दर्य पुष्प विहीन उद्यान के समान हैं।”

१०. “लेकिन अकेले दाक्षिण्य से भी क्या ! उसके साथ हृदय की भावना का भी मेल होना चाहिये । इतनी कठिनाई से हस्तगत हो सकने वाले कामभोग जब आपकी मुट्ठी में है तो निश्चय से आप उनका तिरस्कार न करेंगे ।”
११. “काम को ही सर्वप्रथम पुरूषार्थ मान कर, प्राचीन काल में, इन्द्र तक ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का आलिंगन किया ।"
१२. “इसी प्रकार अगस्त्य ऋषि ने भी सोमभार्या रोहिणी के साथ रमण किया और श्रुति अनुसार लोपमुद्रा के साथ भी यही बीती ।"
१३. “औतथ्य-पत्नी मरूत की पुत्री ममता के साथ ऋषि बृहस्पति ने सहभोग किया और भारद्वाज को जन्म दिया ।"
१४. “अर्ध्य अर्पण करती हुई बृहस्पति की पत्नी को चन्द्रमा ने ग्रहण किया और दिव्य बुध को जन्म दिया ।”
१५. “इसी प्रकार पुरातन समय में रागातिरेक से पराशर ऋषि ने यमुना तट पर वरूण - पुत्र की पुत्री काली के साथ सहवास किया ।"
१६. "वसिष्ठ ऋषि ने अक्षमाला नाम की एक नीच जाति की स्त्री से सहवास किया और कपिंजलाद नाम के पुत्र को जन्म दिया । "
१७. “और बड़ी आयु हो जाने पर भी राजर्षि ययाति ने चैवरथ वन में अप्सरा विश्वाची के साथ संभोग किया ।"
१८. “यद्यपि वह जानता था कि पत्नी के साथ सहवास उसकी मृत्यु का कारण होगा तो भी कौरव- नरेश पण्डु माद्री के रूप और गुणों पर मुग्ध हो, प्रेम के वशीभूत हो गया ।"
१९. “इस प्रकार के महान् पुरूषो तक ने जुगुप्सित काम भोगों का सेवन किया है। तब प्रशंसनीय काम भोगो के सेवन में तो दोष ही क्या है?"
२०. “यह सब होने पर भी, आश्चर्य है कि शक्ति, तारूण्य और सौन्दर्य से सम्पन्न आप उन काम भोगों की उपेक्षा कर रहे हैं जिन पर न्यायतः आपका अधिकार है और जिनमें सारा जगत आसक्त है ।”
१२. राजकुमार का प्रधान मन्त्री को उत्तर
१. पवित्र परम्परा से समर्थित उचित ही प्रतीत होने वाले इन वचनों को सुनकर मेघ गर्जन सदृश स्वर में राजकुमार ने उत्तर दिया. --
२. “आपकी स्नेह - सिक्त भाषा तो आपके योग्य ही है, लेकिन मैं आपको बताऊंगा कि आप कहाँ गलती पर है ।"
३. “मै संसार के विषयों की अवज्ञा नहीं करता । मै जानता हूँ कि सारा जगत इन्ही में आसक्त है । लेकिन क्योंकि मैं जानता हूं कि सारा संसार अनित्य है, इसलिये मेरा मन उनमें रमण नहीं करता । "
४. “यदि यह स्त्री-सौंदर्य स्थायी भी रहे, तो भी यह किसी बुद्धिमान् आदमी के योग्य नहीं कि उसका मन विषयों में रमण करे ।” ५. “और जहाँ तक तुम कहते हो कि वे बड़े-बड़े महात्मा भी विषयों के वशीभूत हुए है तो वे इस विषय मे प्रमाण नही हैं, क्योंकि अन्त मे वे भी क्षय को प्राप्त हुए है ।"
६. “जहाँ क्षय है वहाँ तास्तविक महानता नही है, जहाँ विषयासक्ति है वहाँ वास्तविक महानता नहीं हैं, जहाँ असंयम हैं वहाँ वास्तविक महानता नहीं है ।"
७. “और यह जो आपका कहना है कि ऊपरी मन से ही स्त्रियाँ से स्नेह करना चाहिये तो चाहे यह दक्षता से भी तो भी मुझे यह रूचिकर नही है ।"
८. “यदि यह यथार्थ नहीं है तो मुझे स्त्रियों की इच्छा के अनुसार अनुवर्तन भी प्रिय नहीं । यदि आदमी का मन उसमें नहीं है तो ऐसे अनुवर्तन पर भी धिक्कार है ।"
९. “जहाँ राग का अतिशय है, जहाँ मिथ्यात्व में विश्वास है, जहाँ असीम आसक्ति है और जहाँ विषयों की सदोषता का यथार्थ दर्शन नहीं ऐसी -- वञ्चना में भी क्या धरा है ?"
१०. “और यदि राग के वशीभूत हुए प्राणी परस्पर एक दूसरे को ठगते हैं तो क्या ऐसे पुरुष भी इस योग्य नहीं कि स्त्रियाँ उनकी ओर देखे तक नहीं और क्या स्त्रियाँ भी इस योग्य नही कि पुरुष उनकी ओर देखें तक नहीं ?”
११. “क्योंकि यह सब ऐसा ही है, इसलिये मुझे विश्वास है कि तुम मुझे विषय भोग के अशोभन कृपथ पर नहीं ले जाओगे ।" १२. राजकुमार के सुनिश्चित दृढ संकल्प ने उदायी को निरुत्तर कर दिया । उसने राजा को सारा वृतान्त जा सुनाया ।
१३. जब शुद्धोदन को यह मालूम हुआ कि उसके पुत्र का चित किस प्रकार विषयों से सर्वथा विमुख है तो उसे सारी रात नींद नहीं आई, उसके दिल में वैसा ही दर्द था जैसा किसी हाथी की छाती में जिसे तीर लगा हो ।
१४. अपने मंत्रियो के साथ उसने बहुत सा समय यह विचार करने पर खर्च किया कि वह किस उपाय से सिद्धार्थ को संसार के विषयों की ओर अभिमुख कर सके और उस जीवन से विमुख कर सके जिसकी ओर अग्रेसर होने की उसकी पूरी संभावना थी । लेकिन उन उपायों के अतिरिक्त जिन्हें करके वे मात खा चुके थे, उन्हे कोई दूसरा उपाय नहीं सूझा ।
१५. जिनकी पुष्यमालायें और अलंकार व्यर्थ सिद्ध हो चुके थे, जिनके हाव भाव और आकर्षण - कौशल निष्प्रयोजन सिद्ध हो चुके थे, जिनके हृदय में विगढ प्रेम था, उन तरूणियो की सारी मण्डली विदा कर दी गई ।
१३. शाक्य संघ में दीक्षा
१. शाक्यों का अपना संघ था । बीस वर्ष की आयु होने पर हर शाक्य तरूण को शाक्य संघ में दीक्षित होना पड़ता था और संघ सदस्य होना होता था ।
२. सिद्धार्थ गौतम बीस वर्ष का हो चुका था । अब यह समय था कि वह संघ में दीक्षीत हो और उसका सदस्य बने ।
३. शाक्यों का अपना एक संघ - भवन था, जिसे वह संथागार कहते थे । यह कपिलवस्तु में ही था । संघ सभायें संथगार में ही होती थी ।
४. सिद्धार्थ को संघ में दीक्षित कराने के लिये शुद्धोदन ने शाक्य पुरोहित को संघ की एक सभा बुलाने के लिये कहा ।
५. तदनुसार कपिलवस्तु में शाक्यों के संथागार में संघ एकत्रित हुआ ।
६. सभा में पुरोहित ने प्रस्ताव किया कि सिद्धार्थ को संघ का सदस्य बनाया जाय ।
७. शाक्य-सेनापति अपने स्थान पर खड़ा हुआ और उसने संघ को सम्बोधित किया -- “शाक्य कुल के शुद्धोदन के परिवार में उत्पन्न गौतम संघ का सदस्य बनना चाहता है । उसकी आयु पूरे बीस वर्ष की है और वह हर तरह से संघ का सदस्य बनने के योग्य है । इसलिये मेरा प्रस्ताव है कि उसे शाक्य संघ का सदस्य बनाया जाय । यदि कोई इस प्रस्ताव के विरुद्ध हो तो बोले ।” ८. किसी ने प्रस्ताव का विरोध नहीं किया । सेनापति बोला- "मैं दूसरी बार भी पूछता हूँ कि यदि कोई प्रस्ताव के विरूद्ध हो तो बोले ।"
९. प्रस्ताव के विरुद्ध बोलने के लिये कोई खडा नहीं हुआ । सेनापति ने फिर कहा- "मैं तीसरी बार भी पूछता हूँ कि यदि कोई प्रस्ताव के विसद्ध हो तो बोले ।”
१०. तीसरी बार भी कोई प्रस्ताव के विरुद्ध नहीं बोला ।
११. शाक्यों में यह नियम था कि बिना प्रस्ताव के कोई कार्रवाई न हो सकती थी और जब तक कोई प्रस्ताव तीन बार पास न हो तब तक वह कार्य रूप में परिणत नहीं किया जा सकता था ।
१२. क्योंकि सेनापति का प्रस्ताव तीन बार निर्विरोध पास हो गया था, इसलिये सिद्धार्थ के विधिवत् शाक्य संघ का सदस्य बन जाने की घोषणा कर दी गई ।
१३. तब शाक्यों के पुरोहित ने खड़े होकर सिद्धार्थ को अपने स्थान पर खड़े होने के लिये कहा ।
१४. सिद्धार्थ को सम्बोधन करके उसने पूछा- “क्या आप इसका अनुभव करते थे कि संघ ने आपको अपना सदस्य बनाकर सम्मानित किया है ?" सिद्धार्थ का उत्तर था --"मैं अनुभव करता हूँ ।"
१५. “क्या आप संघ के सदस्यों के कर्तव्य जानते हैं?” “मुझे खेद है कि मै उनसे अपरिचित हूँ, किन्तु उन्हें जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी।"
१६. पुरोहित बोला -“मै सर्वप्रथम आपको बताऊँगा कि संघ के सदस्य की हैसियत से आपके क्या कर्तव्य है ।” उसने उन्हें एक एक करके क्रमश : गिनाया- (१) आपको अपने तन, मन और धन से शाक्यों के स्थार्थ की रक्षा करनी होगी । (२) आपको संघ की सभाओं में उपस्थित रहना होगा । (३) आपको बिना किसी भी भय का पक्षपात के किसी भी शाक्य का दोष खुलकर कह देना होगा । (४) यदि आप पर कभी कोई दोषारोपण किया जाय तो आप को क्रोधित नहीं होना होगा, दोष होने पर अपना दोष स्वीकार कर लेना होगा, निर्दोष होने पर वैसा कहना होगा ।”
१७. इसके आगे पुरोहित ने कहा--"मैं आपको बताना चाहता हूँ कि क्या करने से आप संघ के सदस्य न रह सकेंगे -- (१) व्यभिचार करने पर आप संघ के सदस्य न रह सकेंगे, (२) किसी की हत्या करने पर आप संघ के सदस्य न रह सकेंगे, (३) चोरी करने पर आप संघ के सदस्य न रह सकेंगे, (४) झूठी साक्षी देने पर आप संघ के सदस्य न रह सकेंगे ।”
१८. सिद्धार्थ का उत्तर था - " मान्यवर ! मैं आपका कृतज्ञ हूँ कि आपने मुझे संघ के नियमों से परिचित कराया। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उनके अर्थ और व्यञजन सहित उन्हें पालन करने का प्रयास करूँगा।”