भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
१४. संघ से संघर्ष
१. सिद्धार्थ को शाक्य-संघ का सदस्य बने आठ वर्ष बीत चुके थे ।
२. वह संघ का बड़ा ही वफादार और दृढ़ सदस्य था । जितनी दिलचस्पी उसे निजी मामलों में थी, उतनी ही दिलचस्पी उसे संघ के मामलों में भी थी।
३. उसकी सदस्यता के आठवें वर्ष में एक ऐसी घटना घटी जो सिद्धार्थ के परिवार के लिये दुर्घटना बन गई और उसके अपने लिये जीवन-मरण का प्रश्न ।
४. इस दुःखान्त प्रकरण का आरम्भ इस प्रकार हुआ ।
५. शाक्यों के राज्य से सटा हुआ कोलियों का राज्य था । रोहिणी नदी दोनों राज्यों की विभाजक रेखा थी ।

६. शाक्य और कोलिय दोनों ही रोहिणी नदी के पानी से अपने अपने खेत सींचते थे। हर फसल पर उनका आपस में विवाद होता था कि रोहिणी के जल का पहले और कितना उपयोग कौन करेगा? यह विवाद कभी-कभी झगड़ो में परिणत हो जाते और झगड़े लड़ाइयों में ।
७. जिस वर्ष सिद्धार्थ की आयु २८ वर्ष की हुई उस वर्ष रोहिणी के पानी को लेकर शाक्यों के नौकरों में और कोलियों के नौकरों में बड़ा झगड़ा हो गया। दोनों पक्षों ने चोट खाई ।
८. जब शाक्यों और कोलियों को इसका पता लगा तो उन्होंने सोचा कि इस प्रश्न का युद्ध के द्वारा हमेशा के लिये निर्णय कर लिया जाय ।
९. शाक्यों के सेनापति ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध छेड देने की बात पर विचार करने के लिये संघ का एक अधिवेशन बुलाया ।
१०. संघ के सदस्यों को सम्बोधित करके सेनापति ने कहा -- “कोलियों ने हमारे लोगों पर आक्रमण किया । हमारे लोगों को पीछे हट जाना पड़ा । कोलियों ने इससे पहले भी अनेक बार ऐसी आक्रमणात्मक कार्रवाइयाँ की हैं । हमने आज तक उन्हें सहन किया लेकिन यह इसी तरह नहीं चल सकता । यह रूकना चाहिये और इसे रोकने का एक ही तरीका है कि कोलियों के विकद्ध युद्ध की घोषणा कर दी जाय । मेरा प्रस्ताव है कि कोलियो के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी जाय । जो विरोध करना चाहे, वे बोलें ।”
११. सिद्धार्थ गौतम अपने स्थान पर खड़ा हुआ बोला - "मैं इस प्रस्ताव का विरोध करता हूँ । युद्ध से कभी किसी समस्या का हल नहीं होता । युद्ध छेड देने से हमारे उद्देश्य की पूर्ति ही होगी । इससे एक युद्ध का बीजारोपण हो जायेगा । जो किसी की हत्या करता है, उसे कोई दूसरा हत्या करने वाला मिल जाता है, जो किसी को जीतता है उसे कोई दूसरा जीतने वाला मिल जाता है, जो किसी को लूटता है उसे कोई लूटने वाला मिल जाता है।”
१२. सिद्धार्थ गौतम ने अपनी बात जारी रखी -- “मुझे ऐसा लगता है कि शाक्यों को कोलियों के विरूद्ध युद्ध छेड़ने में जल्दबाजी से काम नहीं लेना चाहिये । पहले सावधानी से इस बात की जाँच करनी चाहिये कि वास्तव में दोषी पक्ष कौनसा है? मैंने सुना है कि हमारे आदमियो ने भी ज्यादती की है । यदि ऐसा है तो हम भी निर्दोष नहीं हैं ।"
१३. सेनापति ने उत्तर दिया--"यह ठिक है कि हमारे आदमियो ने ही पहल की थी। लेकिन यह याद रहना चाहिये कि पहले पानी लेने की भी यह हमारी ही बारी थी । "
१४. सिद्धार्थ गौतम ने कहा - "इससे स्पष्ट है कि हम भी सर्वथा निर्दोष नहीं है। इसलिये मेरा प्रस्ताव है कि हम अपने में से दो आदमी चुनें और कोलियों से भी कहा जाय कि वे भी अपने में से दो आदमी चुनें और फिर यह चारों मिलकर एक पाँचवाँ आदमी चुनें । ये पाँचो आदमी मिलकर झगडे का निपटारा कर दें।"
१५. सिद्धार्थ गौतम ने प्रस्ताव में जो परिवर्तन सुझाया था उसका विधिवत् समर्थन हो गया । किन्तु सेनापति ने विरोध किया । कहा --"मुझे निश्चय है कि जब तक कोलियों को कड़ा दण्ड नही दिया जाता तब तक उनका यह टण्टा समाप्त नहीं होगा ।”
१६. प्रस्ताव और उसमें सुझाये हुए परिवर्तन पर मत लेने आवश्यक हो गये। पहले सिद्धार्थ के सुझाये परिवर्तन पर ही मत लिये गये । बहुत बड़े बहुमत से सिद्धार्थ का सुझाव अमान्य हो गया ।
१७. इसके बाद सेनापति ने स्वयं अपने प्रस्ताव पर मत माँगे । सिद्धार्थ गौतम ने फिर खड़े होकर विरोध किया । उसने कहा -- “मेरी प्रार्थना है कि संघ इस प्रस्ताव को स्वीकार न करे । शाक्य और कोलिय निकट- सम्बन्धी है । परस्पर एक दूसरे का नाश करने में बुद्धिमानी नहीं है
१८. सेनापति ने सिद्धार्थ गौतम की स्थापना का सर्वथा विरोध किया उसने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध में क्षत्रियों के लिये कोई अपना पराया नही होता । राज्य के लिये उन्हें अपने सगे भाइयों से भी लड़ना ही चाहिये ।
१९. ब्राह्मणों का धर्म है यज्ञ करना, क्षत्रियों का धर्म है युद्ध करना, वैश्यों का धर्म है व्यापार करना और शूद्रों का धर्म है सेवा करना । हर किसी को अपना अपना धर्म निभाने में ही पुण्य हैं । यही शास्त्रों की आज्ञा हैं ।
२०. सिद्धार्थ का उत्तर था -- “जहाँ तक मैं समझ सका हूँ, धर्म तो इस बात के हृदयंगम करने में है कि वैर से वैर कभी शान्त नहीं होता । यह केवल अवैर से ही शान्त हो सकता है ।"
२१. सेनापति बेसबर हो उठा । बोला -- “इस दार्शनिक शास्त्रार्थ में पडना बेकार है । स्पष्ट बात यह है कि सिद्धार्थ को मेरा प्रस्ताव अमान्य है । हम संघ का मत लेकर इसका निश्चय करें कि संघ का क्या विचार है ?"
२२. तदनुसार सेनापति ने अपने प्रस्ताव पर लोगों के मत माँगे । बड़े भारी बहुमत से प्रस्ताव पास हो गया ।