भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
१७. बिदाई के शब्द
१. शाक्य संघ की सभा में जो कुछ हुआ उसकी सूचना सिद्धार्थ गौतम के वापिस लौटने से बहुत पहले राजा के महल में पहुँच गई थी ।
२. घर पहुँचने पर सिद्धार्थ गौतम ने देखा कि उसके माता-पिता बहुत दुःखी है और रो रहे हैं ।
३. शुद्धोदन ने कहा- “हम युद्ध के दुष्परिणामो की चर्चा किया करते थे । लेकिन मै नहीं जानता था कि तुम इस सीमा तक चले जाओगे ।"
४. सिद्धार्थ का उत्तर था- "मैं भी नहीं सोचता था कि ऐसी स्थिति आ पहुंचेगी। मैं समझता था कि समझाने से शाक्य शान्ति समर्थक बन जायेंगे ।"
५. “किन्तु दुर्भाग्य से, सैनिक अधिकारियों ने लोगों को इतना उत्तेजित कर दिया था कि मेरी बातों का उन पर कोई प्रभाव न पडा।”

६. “लेकिन मै आशा करता हूँ कि इतना तो आप समझते ही होंगे कि मैंने कैसे परिस्थिति को अधिक बिगड़ने से बचा लिया । मैं सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं हुआ और सत्य और न्याय का आग्रह करने का जो भी दण्ड था मैने उसे अपने ही सिर पर ले लिया । "
७. लेकिन शुद्धोदन इससे संतुष्ट नहीं था । बोला- “तुमने यह नहीं सोचा कि इससे हमारे सिर पर क्या बितेगी?" "लेकिन इसी कारण तो मैंने प्रव्रज्या लेना स्वीकार किया है। जरा सोचो तो सही यदि शाक्यों ने सारे खेत जब्त करने की आज्ञा दे दी होती तो इसका क्या दुष्यरिणाम हुआ होता ।”
८. “लेकिन, तुम्हारे बिना हम इन खेतों को रखकर क्या करेंगे?” शुद्धोदन बोला । “सारा परिवार ही शाक्य जनपद का परित्याग कर देश से बाहर क्यो न चल दे?"
९. रोती हुई प्रजापित गौतमी भी सहमत थी । बोली - "तुम हम सब को इस प्रकार छोड़ कर अकेले कैसे जा सकते हो ?”
१०. सिद्धार्थ ने सान्त्वना दी -- "मां ! क्या तुमने हमेशा क्षत्राणी होने का दावा नहीं किया ? क्या यह ऐसा ही नही है ? तुम्हें वीरता का त्याग नही करना चाहिये । इस प्रकार दुखी होना तुम्हारे लिये अशोभनीय है । यदि मैं युद्ध भूमि में गया होता और वहाँ जाकर मर गया होता तो तुम क्या करती ? क्या, तब भी तुम इसी प्रकार दुःखी हुई होती ।”
११. गौतमी बोली -- “नहीं, यह तो एक क्षत्रिय के योग्य होता । लेकिन अब तुम लोगों से दूर जंगल जानवरों के साथ रहने जा रहे हो । हम यहाँ शान्त कैसे रह सकते हैं? मैं यही कहती हूँ कि तुम हमें भी साथ ले चलो।”
१२. सिद्धार्थ ने प्रश्न किया -- "मै तुम सबको कैसे साथ ले चल सकता हूँ? नन्द केवल एक बच्चा हैं । मेरे पुत्र राहुल का अभी जन्म ही हुआ है। क्या तुम इन्हें छोड़कर मेरे साथ आ सकती हो?
१३. गौतमी को संतोष न हुआ । उसका कहना था, “हम सब शाक्यों का देश छोड़कर कोशल- नरेश की अधीनता में रहने के लिये कोशल जनपद मे जा सकते हैं ।”
१४. सिद्धार्थ ने आपत्ति की "लेकिन माँ! शाक्य क्या कहेंगे? क्या वे इसे देश-द्रोह न समझेंगे? फिर मैने वचन दिया है कि मैं वचन या कर्म से कोई ऐसी बात न करूँगा, न करूँगा कि जिससे कोशल नरेश को मेरी प्रव्रज्या का यथा कारण ज्ञात हो सके ।”
१५. “यह सही है कि मुझे अकेले जंगल में रहना होगा । लेकिन कोलियों के विरुद्ध लड़ाई में हिस्सा लेने और जंगल में रहने -- इन दोनों में से अधिक श्रेयस्कर क्या है?"
१६. इस बीच शुद्धोदन ने प्रश्न किया- "लेकिन इतनी जल्दी किस लिये ? शाक्य - संघ ने अभी कुछ समय के लिये लड़ाई को स्थगित कर दिया है ।"
१७. “हो सकता है कि युद्ध कभी छिडे ही नहीं । तुम अपनी प्रव्रज्या भी क्यों स्थगित नहीं करते? हो सकता है कि शाक्य-संघ तुम्हें यहाँ बने रहने की ही अनुमति दे दे ।”
१८. सिद्धार्थ को यह विचार सर्वथा नापसन्द था । इसलिये उसने कहा -- “क्योंकि मैंने प्रव्रजित हो जाने का वचन दिया इसीलिये शाक्य संघ ने अभी कोलियों के विरुद्ध युद्ध छेड़ना स्थगित किया है ।"
१९. “यह भी संभव है कि मेरे प्रव्रज्या ग्रहण कर लेने पर शाक्य संघ अपनी युद्ध की घोषणा को वापिस ले ले । किन्तु यह सब कुछ पहले प्रव्रज्या ले लेने पर ही निर्भर करता है ।”
२०. “मैने वचन दिया है और मुझे उसे अवश्य पूरा करना चाहिये । वचन भंग का बड़ा बुरा परिणाम हो सकता है - हमारे लिये भी और शान्ति पक्ष के लिये भी ।"
२१. “माँ, अब मेरे मार्ग में बाधक न बनो । मुझे आज्ञा दो और अपना आशीर्वाद । जो कुछ हो रहा है, अच्छे के लिये ही हो रहा हैं ।"
२२. गौतमी और शुद्धोदन मूक थे ।
२३. तब सिद्धार्थ यशोधरा के कमरे में पहुंचे । उसे देख कर सिद्धार्थ के मुँह से वचन नहीं निकला । वह नहीं जानता था कि क्या कहे और कैसे कहे? यशोधरा ने ही मौन भंग किया । बोली -- "कपिलवस्तु में शाक्य-स् संघ की सभा में जो कुछ हुआ वह सब में सुन चुकी हूँ।”
२४. सिद्धार्थ ने पूछा- - "यशोधरा । मुझे बता कि तुझे मेरा प्रव्रजित होने का निश्चय कैसा लगा है ?"
२५. सिद्धार्थ समझता था कि शायद यशोधरा बेहोश हो जायेगी । किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ ।
२६. अपनी भावनाओ को अच्छी तरह अपने वश मे रख कर उसने उत्तर दिया -- “यदि मैं ही तुम्हारी स्थिति मे होती तो और दुसरा मै कर ही क्या सकती थी? निश्चय से मै कोलियो के विरुद्ध छेड जाने वाले युद्ध मे हिस्सा नही ले सकती थी ।”
२७. “तुम्हारा निर्णय ठीक है । तुम्हें मेरी अनुमति और समर्थन प्राप्त है । मैं भी तुम्हारे साथ प्रव्रजित हो जाती । यदि मैं नहीं हो रही हूँ तो इसका मात्र यही कारण है कि मुझे राहुल का पालन-पोषण करना है ।”
२८. “अच्छा होता यदि ऐसा न हुआ होता। लेकिन हमे वीरतापूर्वक इस स्थिति का मुकाबला करना चाहिये । अपने माता-पिता तथा पुत्र की चिन्ता न करना । मैं जब तक जीऊँगी उनकी देख-भाल करूँगी।"
२९. “अब मैं इतना ही चाहती हूँ कि अपने प्रिय सम्बन्धियों को छोड़-छाड़ कर जो तुम प्रव्रजित होने जा रहे हो, तुम किसी ऐसे नये पथ का आविष्कार कर सको जो मानवता के लिये कल्याणकारी हो ।”
३०. सिद्धार्थ इससे बड़ा प्रभवित हुआ । इससे पहले उसने कभी नहीं जाना था की यशोधरा इतनी दृढ़ थी, इतने वीर-भाव से समन्वित थी और इतनी अधिक उदाराशया थी । आज ही उसे पता लगा कि वह कितना भाग्यवान् था कि उसे यशोधरा जैसी पत्नी मिली थी । आज भाग्य ने दोनो को पृथक्-पृथक् कर दिया था । उसने उसे राहुल को लाने को कहा । एक पिता की वात्सल्यपूर्ण दृष्टि डाल कर वह वहाँ से विदा हो गया ।
१८. गृह त्याग
१. सिद्धार्थ ने सोचा कि वह भारद्वाज के पास जाकर प्रव्रजित हो जायेगा । भारद्वाज का आश्रम कपिलवस्तु में ही था । तदनुसार वह अपने सारथी छन्न को साथ लेकर और अपने प्रिय अश्व कन्धक पर चढ़कर आश्रम की ओर चला ।
२. ज्योही वह आश्रम के समीप पहुँचा, द्वार पर ही एकत्र हुए पुरुषो और स्त्रियों ने उसे ऐसे घेर लिया मानो वह एक नयी नवेली वधू का स्वागत कर रह हों ।
३. जब वे उसके सामने आये, उनकी आंखे आश्चर्य से खुली रह गई । उन्होंने बन्द कमल की तरह हाथ जोड़कर उसे नमस्कार किया ।
४. वे उसे घेरे खड़े थे । उनके हृदय भावाविष्ट थे । वे ऐसे खड़े थे कि मानो वे अपने अर्ध-खिले नेत्रों से उसका पान ही कर रहे हों ।
५. कुछ स्त्रियों ने तो यही समझा कि वह कामदेव का साकार रुप है । क्योंकि वह अपने लक्षणों तथा अलंकारों से ऐसा ही अलंकृत था।
६. कुछ दूसरी स्त्रियो ने उसकी कोमलता और ऐश्वर्य की ओर ध्यान देकर सोचा कि अपनी अमृतमयी किरणों के साथ चन्द्रमा पर उतर आया है ।
७. कुछ दूसरी स्त्रियाँ उसके सौन्दर्य से इतनी पराभूत थी कि वह मुँह बाये खड़ी थीं, मानो वे उसे निगल ही जायेगी । वे लम्बे आश्वास ले रही थीं।
८. इस प्रकार स्त्रियाँ केवल उसकी ओर देख ही रही थी । न उनके मुँह में शब्द था, न चेहरे पर मुस्कुराहट । वे उसे घेरे खड़ी थी, और उसके प्रव्रजित होने के निश्चय पर आश्चर्य से विचार कर रही थीं ।
९. बड़ी कठिनाई से उसने उस भीड़ में से अपने लिये रास्ता निकाला और आश्रम के द्वार में प्रवेश किया ।
१०. सिद्धार्थ को यह अच्छा नहीं लगता था कि शुद्धोदन और प्रजापति गौतमी उसके प्रव्रजित होने के समय उपस्थित रहे । क्योकि वह जानता था कि ऐसे समय वे अपने को संभाले न रख सकेंगे। लेकिन उसकी जानकारी के बिना ही वे पहले से आश्रम आ पहुँचे थे ।
११. ज्योंही उसने आश्रम में प्रवेश किया उसने देखा कि उपस्थित मण्डली में उसके माता-पिता भी है ।
१२. अपने माता-पिता को वहाँ उपस्थित देखकर वह सर्वप्रथम उनके पास गया और उनका आशीर्वाद चाहा । वे भावना से इतने अधिक अभिभूत थे कि उनके मुहं से एक शब्द नहीं निकल रहा था। वे लगातार रोते रहे। उन्होने उसे छाती से लगाया और आँसुओं से उनका अभिषेक किया ।
१३. छन्न ने कन्थक को एक पेड से बांध दिया था और पास खड़ा था । जब उसने देखा कि शुद्धोदन और प्रजापति आँसू बहा रहे हैं तो वह भी भावनावश अपने आँसुओं को न रोक सका ।
१४. बड़ी कठिनाई से अपने माता-पिता से पृथक् हो सिद्धार्थ वहाँ गया जहाँ छन्न खड़ा था । उसने वापिस घर ले जाने के लिये उसे अपने वस्त्र और गहने कपड़े दे दिये ।
१५. तब उसने अपना सिर मुण्डवाया । ऐसा करना परिव्राजक के लिये आवश्यक था । उसका चचेरा भाई महानाम परिव्राजक योग्य वस्त्र और भिक्षापात्र ले आया था । सिद्धार्थ ने उन्हें पहन लिया ।
१६. इस प्रकार परिव्राजक का जीवन व्यतीत करने की पूरी तैयारी करके वह भारद्वाज के पास गया कि वह उसे विधिवत् प्रव्रजित कर दे ।
१७. अपने शिष्यों की सहायता से भारद्वाज ने आवश्यक संस्कार किये और सिद्धार्थ गौतम के परिव्राजक बनने की घोषणा कर दी ।
१८. यह याद करके कि उसने शाक्य संघ के सम्मुख दोहरी प्रतिज्ञा की थी, एक तो प्रव्रज्या लेने की और दूसरे अविलम्ब की शाक्य जनपद की सीमा से बाहर हो जाने की, सिद्धार्थ गौतम ने प्रव्रज्या का संस्कार समाप्त होते ही अपनी यात्रा आरम्भ कर दी ।
१९. जो जनसमूह आश्रम में इकट्ठा हो गया था वह असामान्य था । सिद्धार्थ गौतम की प्रव्रज्या की परिस्थिति भी असामान्य ही थी । जब राजकुमार आश्रम से बाहर निकला, जनता भी उसके पीछे-पीछे हो ली ।
२०. उसने कपिलवस्तु से बिंदा ली और अनोमा नदी की ओर बढ़ा । पीछे मुड़कर देखा तो जनता अभी भी पीछे-पीछे चली आ रही थी ।
२१. उसने उन्हें रोका और कहा- “बहनो और भाइयों! मेरे पीछे-पीछे चले आने से क्या लाभ हैं? मैं शाक्यों और कोलियों के बीच का झगड़ा न निपटा सका । लेकिन यदि तुम समझौते के पक्ष में जनमत तैयार कर लो, तो तुम सफल हो सकते हो । इसलिये कृपा करके वापिस लौट जाओ ।" उसकी प्रार्थना सुनी तो लोग पीछे लौटने लगे ।
२२. शुद्धोदन और गौतमी भी महल को वापस चले गये ।
२३. सिद्धार्थ के त्याग वस्त्रों और गहनों को देखना गौतमी के लिये असह्य था । उसने उन्हें एक कंवल तालाब मे फिकवा दिया ।
२४. प्रव्रज्या ग्रहण करने के समय सिद्धार्थ गौतम की आयु केवल २९ वर्ष की थी ।
२५. लोग उसे याद करते थे और यह कह कह कर प्रशंसा करते थे कि "यह उच्च कुलात्पन्न है, यह श्रेष्ठ माता-पिता की सन्तान है, यह सम्पन्न है, यह तारूण्य के मध्य मे है, यह सुन्दर शरीर और बुद्धि से युक्त है, सुख भोग में पला है और वही अपने सम्बन्धियो से इसलिये लडा कि पृखी पर शान्ति बनी रहे और जनता का कल्याण हो ।”
२६. “यह एक शाक्य तरूण था जिसने बहुमत के आगे झुकने के बजाय स्वेच्छा से दण्ड स्वीकार किया जिसका मतलब था ऐश्वर्य के स्थान पर दरिद्रता, सुख समृद्धि के स्थान पर भिक्षाटन, गृह- निवास के स्थान पर गृह- त्याग । और यह जा रहा है जब कोई इसकी चिन्ता करनेवाला नहीं, और यह जा रहा है बिना किसी भी ऐसी एक चीज को साथ लिये जिसे यह अपनी कह सके ।”
२७. “इसका यह स्वेच्छा से किया हुआ महान् त्याग है । यह बड़ी ही वीरता और साहस का कार्य है । संसार के इतिहास में इसकी उपमा नहीं । यह शाक्य मुनि अथवा शाक्य - सिंह कहलाने का अधिकारी है ।"
२८. शाक्य-कुमारी कृषा गौतमी का कथन कितना सही था । सिद्धार्थ गौतम के ही सम्बन्ध में उसने कहा था । “धन्य हैं वे माता- पिता जिन्होंने ऐसे पुत्र को जन्म दिया और धन्य है वह नारी जिसका ऐसा पति है ।”