भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
१५. देश छोड़ जाने को सुझावा
१. दूसरे दिन सेनापति ने शाक्य संघ की दूसरी सभा बुलाई । इसका उद्देश्य था कि उसके अनिवार्य सैनिक भर्ती के प्रस्ताव पर विचार हो ।
२. जब संघ एकत्र हुआ उसने प्रस्ताव किया कि उसे आज्ञा दी जाय कि वह बीस वर्ष और पचास वर्ष के बीच के प्रत्येक शाक्य के लिये कोलियों के विरुद्ध लड़ने के निमित्त सेना में भर्ती होना अनिवार्य होने की घोषणा कर दे ।
३. सभा में दोनों पक्ष उपस्थित थे --वे भी जिन्होंने संघ की पहली सभा में युद्ध घोषणा के पक्ष में मत दिया था और वे भी जिन्होंने इसके विरुद्ध मत दिया था ।
४. जिन्होंने इसके पक्ष में मत दिया था, उनके लिये सेनापति का प्रस्ताव स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं थी । यह उनके पूर्व निश्चय का स्वाभाविक परिणाम था ।
५. लेकिन जिस अल्पमत ने उक्त निर्णय के विरुद्ध मत दिया था, उसके सामने एक कठिनाई थी । उसकी समस्या थी -- बहुमत के आगे सर झुकाना अथवा नहीं झुकाना ?

६. अल्पमत का निश्चय था कि बहुमत के आगे सिर न झुकाया जाय । इसीलिये उन्होंने उस सभा में उपस्थित रहने का भी निर्णय किया था । दुर्भाग्य से किसी में यह साहस नहीं था कि यही बात खुल कर कह सके । कदाचित् वे बहुमत का विरोध करने के परिणामों से परिचित थे ।
७. जब सिद्धार्थ ने देखा कि उसके समर्थक मौन हैं तो वह उठ खड़ा हुआ । और उसने संघ को सम्बोधित करके कहा -- 'मित्रों ! आप जो चाहें कर सकते हैं । आपके साथ बहुमत है । लेकिन मुझे खेद के साथ यह कहना पड़ता है कि मैं अनिवार्य सैनिक भर्ती विरोध करूँगा । मैं आपकी सेना में सम्मिलित नहीं होऊँगा । मैं युद्ध में भाग नहीं लूँगा ।'
८. सिद्धार्थ गौतम को उत्तर देते हुए सेनापति ने कहा -“उस शपथ की याद करो जो तुमने संघ का सदस्य बनते समय ग्रहण की थी । यदि तुम अपने दिये गये वचनों में से किसी एक का भी पालन न करोंगे तो तुम सार्वजनिक निन्दा के भाजन बनोगे ।”
९. सिद्धार्थ का उत्तर था - " निस्सन्देह मैने अपने तन, मन, धन से शाक्यों के हितों की रक्षा करने का वचन दिया है। लेकिन मैं नहीं समझता कि यह युद्ध शाक्यों के हित में हैं । शाक्यों के हित के मुकाबले में सार्वजनिक निन्दा का मेरे लिये कोई मूल्य नहीं ।”
१०. सिद्धार्थ ने संघ को इस बात की याद दिलाई और सावधान किया कि कोलियों से निरन्तर झगड़ते रहने के कारण शाक्य-संघ बहुत कुछ कोशल-नरेश के हाथ का खिलोना बन गया है । इसकी कल्पना करना आसान है कि यह युद्ध शाक्य संघ को और भी अधिक दुर्बल बना देगा और इससे कोशल- नरेश को एक और ऐसा अवसर मिल जायेगा कि वह शाक्य संघ के स्वातंत्र्य को और भी अधिक घटा दे ।
११. सेनापति को क्रोध आ गया । वह बोला -- “तुम्हारा यह भाषण कौशल तुम्हारे किसी काम न आयेगा । तुम्हे संघ के बहुमत के सामने सिर झुकाना होगा । शायद तुम्हें इस बात का बहुत भरोसा है कि कोशल- नरेश की अनुमति के बिना संघ अपनी आज्ञा की अवहेलना करने वाले को फांसी या देश से निकल जाने की सजा नहीं दे सकता और यदि इनमें से कोई भी एक दण्ड तुम्हें दिया जाय तो कोशल-नरेश इसकी अनुमति नहीं देगा ।”
१२. “लेकिन याद रखो । संघ तुम्हें दूसरे अनेक तरीकों से दण्डित कर सकता है । संघ तुम्हारे परिवार के सामाजिक बहिष्कार का निर्णय कर सकता है और संघ तुम्हारे परिवार के खेतों को जब्त कर सकता है । इसके लिये संघ को कोशल नरेश की अनुमति की आवश्यकता नहीं ।"
१३. सिद्धार्थ ने समझ लिया कि यदि उसने कोलियों के विकद्ध युद्ध घोषणा करने के प्रस्ताव का अपना विरोध जारी रखा तो उसके क्या क्या दुष्यपरिणाम हो सकते है । इसलिये वह तीन बातों में से एक का चुनाव कर सकता था -- (१) सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग ले सकता था, (२) फांसी पर लटकना या देश से निकाल दिया जाना स्वीकार कर सकता था, (३) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हो सकता था ।
१४. पहली बात वह किसी भी हालत में स्वीकार नहीं कर सकता था । वह इस विषय में दृढ़ था । तीसरी बात पर तो वह विचार तक न कर सकता था । इस परिस्थिति में उसने सोचा कि उसके लिये दूसरी बात ही सर्वाधिक मान्य हो सकती है ।
१५. तद्नुसार सिद्धार्थ ने संघ को सम्बोधित किया -- "कृपया मेरे परिवार को दण्डित न करें । सामाजिक बहिष्कार द्वारा उन्हें कष्ट न दें । उनके खेत जब्त करके उन्हें जीविकाविहीन न करें । वे निर्दोष हैं । अपराधी मैं ही हूँ । मुझे अकेले ही अपने अपराध का । दण्ड भोगने दें । चाहे आप मुझे फांसी पर लटका दें और चाहे देश से निकाल दें- आप चाहें दण्ड दें । मैं खुशी से इसे स्वीकार कर लूंगा । और मैं इस बात का वचन देता हूं कि मैं इस की शिकायत कोशल- नरेश से न करूंगा ।"
१६. प्रव्रज्या - अभिनिष्क्रमण
१. सेनापति बोला -- “तुम्हारी बात मानना कठिन है । क्योकि यदि तुम स्वेच्छा से भी 'मृत्यु' अथवा 'देश-निकाले' का वरण करो, तो भी कोशल- नरेश को इसका पता लग ही जायेगा । वह निश्चयपूर्वक इसी परिणाम पर पहुँचेगा कि शाक्य-संघ ने ही यह दण्ड दिया होगा और वह शाक्य संघ के विरुद्ध कार्रवाई करेगा ।"
२. “यदि यह कठिनाई है, तो मैं आसानी से एक उपाय सुझा सकता हूँ”, सिद्धार्थ गौतम का उत्तर था । "मैं परिव्राजक बन सकता हूं और देश के बाहर चला जा सकता हूँ। यह भी एक प्रकार का 'देश निकाला' ही है।"
३. सेनापति ने सोचा कि यह एक अच्छा सुझाव है । किन्तु उसे इसके कार्यरूप में परिणत होने में सन्देह था ।
४. इसलिये सेनापति ने सिद्धार्थ से पूछा - "बिना अपने माता-पिता और पत्नी की अनुज्ञा के तुम परिव्राजक कैसे बन सकते हो ?”
५. सिद्धार्थ ने उसे विश्वास दिलाया कि वह भरकस अनुमति प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा और कहा, 'मैं वचन देता हूँ कि चाहे अनुमति मिले और चाहे न मिले, मैं तुरन्त देश छोड़ दूंगा ।'
६. संघ को लगा कि सिद्धार्थ का सुझाव ही इस बिकट समस्या का सर्वश्रेष्ठ हल है। संघ ने इसे स्वीकार कर लिया ।
७. सभा के सम्मुख जो कार्य-क्रम था उसे समाप्त कर संघ विसर्जित होने को ही था कि एक तरूण शाक्य ने अपने स्थान पर खड़े होकर कहा -- “कृपया मेरी बात सुनें । मैं कुछ महत्व की सूचना देना चाहता हूँ ।”
८. उसे बोलने की अनुमति मिली तो उसने कहा -- “मुझे इसमें तनिक सन्देह नहीं कि सिद्धार्थ गौतम अपने वचन का पालन करेगा और तुरन्त देश के बाहर चल जायेगा । लेकिन एक बात है, जिससे मैं थोडा चिन्तित हूँ ।"
९. अब जब कि सिद्धार्थ आँखों से अदृश्य हो जायेगा तो क्या संघ का यही इरादा है कि कोलियों के विरुद्ध की घोषणा कर दी जाय ।"
१०. “मै चाहता हूँ कि संघ पुन: इस बात पर गम्भीरतापूर्वक विचार करे। कुछ भी हो कोशल- नरेश को सिद्धार्थ गौतम के देश- निकाले का तो पता ही लग जायेगा । यदि शाक्य तुरन्त कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देंगे तो कोशल-नरेश समझ जायेगा कि सिद्धार्थ गौतम ने इसीलिये देश का त्याग किया होगा क्योंकि वह कोलियों के विरुद्ध युद्ध छेड देने का विरोधी था । यह हमारे लिये अच्छा न होगा ।"
११. “इसलिये मेरा प्रस्ताव है कि हमें सिद्धार्थ गौतम को गृह त्याग और कोलियों के विरुद्ध वास्तविक युद्ध छेड देने के बीच कुछ समय को यू गुजार देना चाहिये । अन्यथा केशल- नरेश इन दोनो घटनाओ मे संबंध स्थापित कर लेगा ।"
१२. संघ को लगा कि निश्चय से यह बात महत्त्वपूर्ण हैं । नीति की दृष्टि से यह मान ली गई ।
१३. इस प्रकार शाक्य-संघ की यह दुःखान्त सभा समाप्त हुई और उस अल्पमत ने भी जो युद्ध का विरोधी था किन्तु जिसमें अपनी बात साफ-साफ कहने का साहस न था, संतोष की सांस ली कि एक अत्यन्त भयानक स्थिति से किसी न किसी तरह पार हो गये ।