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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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१९. राजकुमार और उनका सेवक

१. छन्न को भी कन्थक के साथ वापस लौट जाना चाहिये था । लेकिन उसने वापस जाना अस्वीकार किया । उसने आग्रह किया कि कान्क को लिए वह कम से कम अनोमा नदी के तट तक अवश्य साथ चलेगा । छन्न का यह आग्रह इतना अधिक था कि सिद्धार्थ गौतम को उसकी बात माननी पड़ी ।

२. अन्त में वे अनोमा नदी के तट पर पहुँचे ।

३. तब छन्न को सम्बोधित करके सिद्धार्थ बोला- “मित्र ! इस प्रकार यहाँ तक साथ- साथ आने से मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह प्रमाणित हो गया । तुम्हारी भक्ति ने मेरे हृदय को सर्वथा जीत लीया है।”

४. “तुम्हारा मेरे प्रति जो भाव है उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ । खेद है कि मै इस समय ऐसी स्थिति में हूँ कि तुम्हारे लिये कुछ कर नहीं सकता ।"

५. "जिससे उपकार की आशा हो उसके प्रति कौन अनुरक्त नहीं होगा?"

६. “परिवार के लिये पुत्र का पालन-पोषण किया जाता है, अपने भावी सुख के लिये पुत्र पिता को मानता है, किसी न किसी आशा ही संसार के लोग बन्धे रहते हैं, बिना आशा का निस्वार्थ भाव कहीं नही है । "

bhagwan buddha aur unka dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar in Hindi

७. "केवल एक तुम्ही इसके अपवाद हो । इस घोड़े को लो और वापस हो जाओ ।"

८. “राजा के स्नेह में अभी किसी तरह की कमी नहीं आई होगी। उसे किसी न किसी तरह इस दुःख को सह लेने में सहायता करनी होगी ।"

९. “उसे कहना की मैं जो उसे छोड़कर चला आया हूँ वह न किसी स्वर्ग की कामना से, न स्नेह की कमी से और न क्रोध की अधिकता से ।"

१०. “इस प्रकार घर छोडकर चले आये मेरे लिये उसे अनुताप नहीं करना चाहिये, संयोग कितना भी दीर्घकालीन हो एक न एक दिन वियोग में परिणत होता ही है ।"

११. "जब वियोग अनिवार्य ही है तो यह कैसे हो सकता है कि सम्बन्धियों से वियोग न हो। "

१२. “आदमी के मरने पर उसकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी तो बहुत होते हैं, किन्तु उसके पुण्य का उत्तराधिकारी मिलना कठिन है, शायद होता ही नहीं ।"

१३. "राजा-- मेरे पिता-- की देखभाल रखनी होगी। हो सकता है कि वह कहे कि मैंने अनुपयुक्त समय पर गृह त्याग किया है; किन्तु धम्म करने के लिये कोई भी समय अनुपयुक्त समय है ही नहीं ।"

१४. "मित्र ! मेरे पिता को इन और ऐसे ही शब्दों से समझाना । ऐसा प्रयास करना कि उसे मेरी याद भी बनी न रहे । "

१५. “हाँ, मेरी मां से भी कहना कि मैं उसके स्नेह के अयोग्य सिद्ध हुआ । उसका वात्सल्य वचनातीत था ।"

१६. इन शब्दों को सुना तो छन्न ने भावावेश से रूंधे कंठ से हाथ जोड़कर कहा-

१७. “स्वामी! यह देखकर कि आप अपने सम्बन्धियो को वियोग-दुःख देकर जा रहे है मेरा हृदय ऐसे बैठा जा रहा है जैसे दलदल में फँसा हुआ हाथी ।"

१८. “आपका ऐसा निर्णय किसकी आंखो से अश्रु-धारा न बहायेगा, चाहे उसका हृदय लोह-निर्मित भी क्यों न हों, स्नेह - सिक्त हृदय का तो कहना ही क्या ?”

१९. “कहाँ तो यह प्रासाद में ही रहने योग्य कोमलाङ्ग और कहाँ वह तीक्ष्ण कुशाग्रास से ढकी हुई पृथ्वी ?”

२०. “हे कुमार! आप का ऐसा निर्णय जानकर मै अब कपिलवस्तु के लोगों के लिये दुःखदायक इस कन्थक घोड़े को वापस कैसे जा सकता हूँ?"

२१. “निश्चय से आप इस स्नेह - सिक्त वृद्ध राजा को ऐसे ही छोड़कर नहीं जायेंगे जैसे कोई नास्तिक सद्धर्म को ।”

२२. “और अपनी उस मौसी को -- जिसने पाल-पोस कर इतना बड़ा किया आप उसी तरह नही ही भूलेंगे जैसे कोई कृतघ्न अपने उपकारी को भूल जाता है।"

२३. “और अपनी उस भार्या को तो आप छोड़ेंगे ही नहीं, जो गुणवती है, जो श्रेष्ठ कुलोत्पन्न है, जो पतिव्रता है और जो एक बालक की मां हैं।"

२४. “और हे धर्म तथा यश की सर्वाधिक चिन्ता करनेवाले! आप यशोधरा के उस पुत्र को तो उसी प्रकार छोड़ेंगे ही नही, जैसे कोई जुआरी अपने यश छोड़ देता है ।”

२५. “स्वामिन! यदि आपने अपने राज्य और सम्बन्धियों को त्याग देने का दृढ़ संकल्प ही कर लिया है तो आप मुझे तो छोड़ेगे ही नहीं, क्योंकि आप ही मेरे शरण स्थान हैं ।”

२६. “मैं आपको इस प्रकार जंगल में अकेला छोड़कर इस दग्ध हृदय के साथ नगर को वापस नही लौट सकता । "

२७. “जब मैं अकेला वहाँ जाऊँगा तो राजा मुझे क्या कहेगा और मै आपकी सहधर्मिणी को ही क्या शुभ संवाद सुनाऊंगा?”

२८. “और आपका जो यह कहना है कि मै राजा को आपके अवगुण सुनाऊँ ताकि उसका स्नेह कम हो जाय, तो यदि मैं तालु से सटी जिव्हा से निर्लज्ज बनकर आपके अवगुण कहने का प्रयास भी करूं तो उन पर कौन विश्वास करेगा?"

२९. “जो दया-मूर्ति है और जिसने सदा करूणा दिखाई है, यह उसके योग्य नहीं कि अपने स्नेह का परित्याग कर दे । मुझ पर दया करे । लौट चलें । "

३०. छन्न के इन दुःखभरे शब्दों को सुनकर सिद्धार्थ गौतम ने अत्यन्त कोमलता से उत्तर दिया-

३१. “छन्न! मेरे वियोग से उत्पन्न होने वाले दुःख का परित्याग करो । नाना जन्म ग्रहण करने वाले प्राणियों के लिये परस्पर का वियोग अनिवार्य है।”

३२. “यदि मैं स्नेह के कारण आज अपने सम्बन्धियों का परित्याग न भी करूँ, तो भी एक न एक दिन मृत्यु हमें एक दूसरे से अनिवार्य तौर पर पृथक् कर ही देगी ।"

३३. “जिस मेरी मां ने, मुझे इतना कष्ट सहन करके जन्म दिया था, अब वह कहाँ है ? और मैं कहाँ हूँ?”

३४. "जैसे पक्षी अपने विश्राम वृक्ष पर इकट्ठे होते हैं, किन्तु फिर नाना दिशाओं में उड़ जाते हैं, यही प्राणियों की दशा है । उनक भी वियोग अवश्यम्भावी है ।"

३५. “जैसे बादल एकत्र होकर फिर पृथक पृथक नाना दिशाओं में चले जाते हैं, यही प्राणियों की दशा है । उनका भी वियोग अवश्यम्भावी है ।”

३६. “और क्योंकि यह संसार इसी प्रकार परस्पर एक दूसरे की वञ्चना करता हुआ गतिमान है । इसलिये संयोग के समय किसी भी चीज को अपना समझ बैठना भयावह है । "

३७. "क्योंकि यह ऐसा ही है, इसलिये मित्र ! शोक मत करो । वापिस लौट जाओ । यदि मन नहीं ही माने तो जाकर फिर वापस चले आना ।"

३८. "बिना मुझे कुछ और कहे, कपिलवस्तु के लोगों से जाकर कहना कि उसके लिये जो तुम्हारा स्नेह है, उसे छोड़ दें, क्योंकि उसका निश्चय दृढ़ है।” ने

३९. जब स्वामी और सेवक के बीच की यह बातचीत कन्थक ने सुनी तो उस श्रेष्ठ अश्व ने अपनी जिह्वा से स्वामी के चरण चाटे और आँखों से गरम-गरम आँसू गिराये ।

४०. उस हाथ से जिसकी अँगुलियाँ जूड़ी हुई थीं, उस हाथ से जिसमें मंगल स्वस्ति अंकित था, उस हाथ से जिसकी हथेली अन्दर को थी, गौतम ने उसे थपथपाया और एक मित्र की तरह सम्बोधित करके कहा -

४१. “कन्थक! सहन कर । अश्रु मत बहा । तेरा परिश्रम शीघ्र ही सफल होगा ।”

४२. जब छन्न ने देखा कि अब शीघ्र विदा होना ही होगा, तो उसने गौतम के उस परिव्राजक रूप को नमस्कार किया ।

४३. कन्धक और छन्न से विदा लेकर गौतम भी अपने मार्ग पर चल दिये ।

४४. छन्न ने जब देखा कि उसका स्वामी राज्य त्याग कर, परिव्राजक का वेष धारण किये चला जा रहा हैं, उससे न रहा गया । वह अपने हाथ उठाकर जोर से चिल्लाया और जमीन पर गिर पड़ा ।

४५. जब उसने पीछे मुड़कर देखा वह एक बार फिर जोर से चिल्लाया । उसने अपने कन्थक के गले में हाथ डाले । वह निराश और भग्न-हृदय फिर अपने मार्ग पर आगे बढ़ा ।

४६. रास्ते में कभी वह चिन्तित हो उठता, कभी पश्चात्ताप करता, कभी लडखडाता, कभी गिर पड़ता । इस प्रकार स्नेह - विदीर्ण हृदय से उसने रास्ते भर नाना तरह की बातें कीं। वह स्वयं नहीं जानता था कि वह क्या कर रहा है ।

 

२०. छन्न की वापसी

१. स्वामी के वनगमन के बाद वापस लौटते समय छन्न ने अपने दुखी मन का भार हलका करने का भरसक प्रयास किया ।

२. उसका दिल इतना भारी था कि जिस दूरी को वह पहले एक दिन में पूरा कर लेता था जब अपने स्वामी के वियोग की चिन्ता करते-करते उसी दूरी को पूरा करने में उसे आठ दिन लगे ।

३. कन्थक, यद्यपि वह अभी भी धैर्यपूर्वक चला जा रहा था, किन्तु वह अत्यन्त क्लान्त और श्रान्त हो गया था । निस्सन्देह वह अभी भी अलंकारों से अलंकृत था, तो भी स्वामी - विहीन होने के कारण सर्वथा तेज-विहीन हो गया था ।

४. और जिस दिशा में उसका स्वामी गया था उधर घूम-घूम कर बड़े ही शोक संतप्त स्वर में वह बार-बार हिनहिनाया । यद्यपि वह क्षुधा से परेशान था तो भी उसने पहले की तरह न रास्ते भर घास चरी और न पानी पिया ।

५. अन्त में दोनों उस कपिलवस्तु पहुँचे जो सिद्धार्थ के चले जाने के कारण एकदम सूना हो गया था । वे दोनों भी प्राण - विहीन शरीर की तरह ही वहाँ पहुँचे ।

६. पद्म-पुष्टित जलाशय थे, फूलों से लदे हुए वृक्ष थे; किन्तु नागरिकों के हृदय प्रसन्न्ता से शून्य थे ।

७. तेज-विहीन आँखों में अश्रु लिये हुए जब उन दोनों ने कपिलवस्तु मे प्रवेश किया तो उन्हें सारा नगर अन्धकारावृत प्रतीत हुआ ।

८. जब लोगों ने सुना कि शाक्य-जाति के उस अभिमान को बिना साथ लाये ही वे दोनों अकेले लौटे है, तो लोगों की आँखे आँसू बरसाने लगीं ।

९. आवेश से उन्मत्त हुए लोग छन्न का पीछा कर रहे थे और आँसू बहाते हुए चिल्ला रहे थे- "जाति और राज्य का गौरव राजकुमार कहाँ है ?" हैं

१०. “जहाँ वह नहीं है वह नगर हमारे लिये जंगल है, और जिस जंगल में वह है वह जंगल ही हमारे लिये नगर है । सिद्धार्थ विहीन नगर का हमारे लिये कोई आकर्षण नहीं ।"

११. स्त्रियाँ खिड़कियों पर आकर जुट गई । वे एक दूसरे को कह रही थीं -- "राजकुमार लौट आया है।” लेकिन जब उन्होंने देखा कि घोड़े की पीठ नंगी हैं, उन्होनें खिड़किया बंद कर ली और जोर-जोर से विलाप करने लगी ।