भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
दूसरा भाग सदा के लिये अभिनिष्क्रमण
१. कपिलवस्तु से राजगृह
१. कपिलवस्तु से निकलकर सिद्धार्थ गौतम ने मगध राज्य की राजधानी राजगृह जाने का विचार किया ।
२. उस समय राजा बिम्बिसार का राज्य था । यह एक ऐसा स्थान था जहाँ बड़े-बड़े दार्शनिक और पण्डित रहते थे ।
३. इस विचार से उसने गंगा पार की। उसने गंगा की तेज धारा तक की परवाह नहीं की ।
४. रास्ते में वह एक ब्राह्मण स्त्री साकी के आश्रम में रूका, उसके बाद पद्म नाम की एक दूसरी ब्राह्मण स्त्री के आश्रम पर रूका और तब रैवत नाम के ब्राह्मण ऋषि के आश्रम पर । सभीने उसका आतिथ्य किया ।
५. उसका व्यक्तित्व, उसकी तेजस्विता और उसका अनुपम सौन्दर्य ऐसा था कि उस प्रदेश के सभी लोगों को आश्चर्य हो रहा कि उसने संन्यासी के वस्त्र कैसे धारण किये हैं ?
६. उसे देखकर, अन्यत्र जाता हुआ कोई-कोई वहीं खड़ा रह गया, वहीं खड़ा खड़ा कोई शीघ्रता से उसके पीछे हो लिया, जो धीरे- धीरे चल रहा था वह तेजी से दौड़ने लगा और जो बैठा था वह तुरन्त खड़ा हो गया ।
७. कुछ ने उसे हाथ जोड़कर नमस्कार किया, कुछ ने सिर झुकाकर आदर प्रदर्शित किया, कुछ ने उसे प्रिय-वचनों से सम्बोधित किया, कोई एक भी ऐसा नही था जिसने उसके प्रति अपना आदर का भाव न दिखाया हो ।
८. जो रंग-बिरंगे कपड़े पहने थे उन्हें उसे देखकर संकोच हुआ, जो व्यर्थ प्रलाप कर रहे थे वे चुप हो गये, कोई भी ऐसा न था जो व्यर्थ के संकल्प-विकल्पों में लगा रहा हो ।
९. उसकी भौंहें, उसका माथा, उसका मुंह, उसका शरीर, उसका हाथ, उसके पाँव, उसकी चाल -- उसके शरीर का किसी ने कोई भी अंग देखा वह मंत्र-मुग्ध की तरह खड़ा रह गया ।
१०. बड़ी लम्बी और कठिन यात्रा के बाद गौतम राजगृह पहुँचे, जो कि पाँच पहाड़ियों से घिरी हुई थी, जो कि पर्वतों से सम्यक सुरक्षित और अलंकृत थी और जहाँ चारों ओर मंगलकारी पवित्र स्थान थे ।
११. राजगृह पहुँच कर उसने वहाँ पाण्डव पर्वत के नीचे एक जगह चुनी और वहाँ अपने रहने के लिये पत्तों की एक छोटी-सी झोपड़ी बना ली ।
१२. कपिलवस्तु राजगृह पैदल चलकर कोई ४०० मील की से दूरी पर है ।
१३. सिद्धार्थ गौतम ने यह सारी यात्रा पैदल की ।

२. राजा बिम्बिसार और उसका परामर्श
१. दूसरे दिन वह उठा और उसने भिक्षापात्र हाथ में ले भिक्षाटन के लिये नगर में जाने की तैयारी की । उसके इर्द-गिर्द बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई ।
२. मगध-नरेश श्रेणिय बिम्बिसार ने अपने महल के बाहर लोगों का जमघट देखा । उसने कारण जानना चाहा । एक दरबारी ने उसे इस प्रकार कारण बताया ।
३. "जिसके बारे में ब्राह्मणों ने भविष्यवाणि की थी कि या तो यह बुद्ध होगा या चक्रवर्ती राजा होगा' - यह वही शाक्य पुत्र है जो अब संन्यासी हो गया है। उसी पर लोग नजर गडाये हैं ।”
४. राजा ने यह बात सुनी और इसके अर्थपर विचार किया तो उसने तुरन्त दरबारी को कहा- “पता लगाओ, यह किरा है ?” दरबारी आज्ञा पाकर राजकुमार के पीछे-पीछे चला ।
५. स्थिर - दृष्टि, मात्र दो गज ही आगे देखते हुए, शान्त स्वर, नपे-तुले कदम वाला वह श्रेष्ठ परिव्राजक भिक्षाटन के लिये चला तो उसकी इंद्रियाँ तथा चित्त पूर्णरुप से संयत थे ।
६. जैसी भी कुछ भिक्षा मिली उसे ग्रहण कर वह पर्वत के एक एकान्त कोने में जा बैठा और भिक्षान्न खा चुकने के बाद पाण्डव- पहाड़ी पर चढ़ गया ।
७. लोध्र वृक्षों से भरे जंगल में जहाँ मयूरों का स्वर गूंज रहा था, वह काषाय वस्त्रधारी, मानवता का सूर्य ऐसे चमक रहा था जैसे पूर्व-दिशा के पर्वतों पर प्रात:कालीन सूर्य ।
८. उस राज-दरबारी ने यह सब देखकर, जाकर राजा को सारा वृत्तान्त सुनाया । राजा ने जब यह सब सुना तो अपने साथ कुछ थोडे-से अनुयायी ले वह गौरवपूर्ण भाव सहित उसी ओर चला ।
९. पर्वत के समान व्यक्तित्व वाले उस राजा ने पर्वतारोहण किया ।
१०. वहाँ उसने जितेन्द्रिय गौतम को पर्यङ्कासन लगाये बैठे देखा । वह ऐसा प्रतीत होता था मानों चलायमान पर्वत का शिखर हो । ११. उसके पास जो सौन्दर्य और शान्त-भाव में विशेष था, आश्चर्य और स्नेह की भावना से परिपूर्ण राजा गया ।
१२. विनम्रतापूर्वक उसके समीप पहुँचकर बिम्बिसार ने उसका कुशल-क्षेम पूछा और गौतम ने भी वैसी ही शालीनता के साथ अपने सकुशल होने की बात कही ।
१३. तब राजा एक स्वच्छ चट्टान पर बैठ गया और अपना मनोभाव व्यक्त करने के लिये इस प्रकार बोला -
१४. "तुम्हारे कुल से मेरी वंशानुगत प्रगाढ़ मैत्री है । इसीसे मेरे मन में तुम्हें दो शब्द कहने की इच्छा उत्पन्न हुई है । मेरी बात ध्यान से सुने ।”
१५. “जब मैं तुम्हारे सूर्य-वंश का विचार करता हूं, तुम्हारे तारुण्य का विचार करता हूँ, तुम्हारे अनुपम सौन्दर्य का विचार करता हूँ तो मैं सोचता हूँ कि तुम्हारे मन में संन्यासी का जीवन व्यतीत करने का यह सर्वथा बेमेल संकल्प कहाँ से घर कर गया?”
१६. “तुम्हारे अंग रक्त चन्दन से चर्चित होने के योग्य है, रक्ताम्बर के नहीं, तुम्हारा यह हाथ प्रजा-रक्षण के योग्य है, भिक्षापात्र ग्रहण करने के योग्य नहीं ।"
१७. “हे तरुण! यदि तू अपना पैतृक राज्य नहीं ही चाहता तो मैं तुझे अपना आधा राज्य देता हूं । इसे ग्रहण करने की कृपा कर ।”
१८. “यदि तू ऐसा करेगा तो इससे तेरे स्वजनों को किसी प्रकार का दुःख न होगा । समय बीतने पर अन्त में लक्ष्मी स्थिर चित्तों की ही शरण ग्रहण करती है । इसलिये कृपया मेरी बात मान ले । सत्पुरुषों की सहायता पाकर सत्पुरुषो की श्री बहुत बलवती हो जाती है।"
१९. “यदि अपने कुलाभिमान से मेरा कहना अमान्य हो तो अनन्त सेना के साथ धनुष बाण का उपयोग कर मेरी सहायता से अपने विरोधियों पर विजय प्राप्त कर लो।"
२०. “इसलिये इन तीन पुरूषार्थों में से एक चुन लो । धर्मानुसार अर्थ और काम की प्राप्ति की कामना करो । काम और मोक्ष की उलटे क्रम से अर्थात् पहले काम की और फिर मोक्ष की इच्छा करो। जीवन के धर्म, अर्थ, काम - यही तीन उद्देश्य हैं । आदमी मरता है तो जहाँ तक इस संसार का सम्बन्ध है सभी कुछ निरोप को प्राप्त हो जाता है ।”
२१. “इसलिये इन तीन पुरुषार्थो की प्राप्ति का प्रयास करके जीवन को सफल करो । कहा है कि धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति में ही जीवन की सफलता है ।"
२२. “इन धनुष-बाण धारण करने में समर्थ बाहुओं को बेकार न रहने दों । इस पृथ्वी का तो कहना ही क्या इनमें तीनों लोकों को जीत लेने का सामर्थ्य है ।"
२३. “मै जो यह सब कह रहा हूँ, इसमें मात्र मेरा स्नेह ही कारण हैं, न तो मैं यह राज्य लोभ से ही कह रहा हूँ और न तुम्हारा यह तपस्वी भेष देखकर उत्पन्न हुई अभिमान - भावना से ही कह रहा हूँ । मेरे दिल मे दया है और आँखो में आँसू हैं ।”
२४. "हे अपने कुल के अभिमान ! हे तपस्या के इच्छुक ! अभी समय है काम-भोगों का आनन्द ले । बाद में बुढापा आ जायेगा और इस तेरे सौन्दर्य को म्लान कर देगा ।”
२५. “बुढापे में आदमी ‘पूण्य' करके धर्मार्जन कर सकता है ? बुढापे में आदमी विषय-भोग के अयोग्य हो जाता है । इसीलीये कहा है कि तरूण के लिये विषय भोग है, मध्य- वयस्क के लिये धन है और वृद्ध के लिये धर्म है ।"
२६. “इस संसार में तारूण्य का धन और धर्म से विरोध है- क्योंकि काम सुखों को कितना ही सुरक्षित रखे, वे सुरक्षित रखे ही नहीं जा सकते । इसलिये जब और जहाँ भी सुख भोग प्राप्त हो वहाँ उनका उपभोग कर लेना चाहिए ।"
२७. “वार्धक्य विचार-प्रधान होता है । यह स्वभावत: गम्भीर और शान्त रहता हैं। बिना प्रयास के ही यह संयत-भाव को प्राप्त हो जाता है ।"
२८. “इसलिये वञ्चक, अस्थिर 'बाह्य- - विषयों में अनुरक्त, असावधान, अधैर्यवान, अदूरदर्शी तारूण्य के गुजर जाने पर लोगों को ऐसा लगता है कि मानों किसी भयानक जंगल में से सुरक्षित निकल आये ।”
२९. “इसलिये इस तिमिराच्छन्न तारूण्य को गुजर जाने दो । हमारा आरम्भिक जीवन सुख भोग के लिये ही है । इस समय इन्द्रियों को काबू में रखा ही नहीं जा सकता ।"
३०. “और यदि धर्म में ही तेरी विशेष रूचि है तो अपने कुल-धर्म के अनुसार यज्ञ कर, क्योंकि यज्ञ करने से ऊँचे - से उँचा स्वर्ग प्राप्त किया जा सकता हैं ।"
३१. “बाहुओं पर स्वर्ण-निर्मित बाजू-बन्द बाँधे हुए और नाना वर्ण के आभापूर्ण रत्न जडित मुकुट धारण किये हुए राजर्षि-गण यज्ञों द्वारा उसी पद को प्राप्त कर सके है जिसे अनेक महर्षियों ने तपस्या द्वारा प्राप्त किया है ।"