भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
तीसरा भाग : नये प्रकाश की खोज मे
१. भृगु आश्रम पर रूकना
१. अन्य पंथों का परीक्षण करने के उद्देश्य से सिद्धार्थ गौतम ने आलार कालाम से भेंट करने के लिये राजगृह को छोड़ दिया ।
२. मार्ग में उसने भृगु ऋषि का आश्रम देखा और यूं ही जरा देखने के लिये उसमें प्रवेश किया ।
३. आश्रम के ब्राह्मण निवासी जंगल से लकडी चुन कर लाये थे । उनके हाथ 'तपस्या' की अत्यावश्यक वस्तुएँ समिधा, पुष्प तथा कुश के भरे थे । वे बुद्धिमान् अपनी - अपनी कुटियों में न जाकर सिद्धार्थ गौतम की ही ओर मुडे ।
४. आश्रम निवासियों द्वारा समुचित रूप से सम्मानित होकर सिद्धार्थ गौतम ने भी आश्रम के बडे-बुढो के प्रति आदर प्रदर्शित किया ।

५. उस मोक्ष-कामी बुद्धिमान् ने उन स्वर्ग-कामी तपस्वियों की विचित्र विचित्र तपस्याओं का निरीक्षण करते हुए उस आश्रम को देखा ।
६. उस सुकोमल संन्यासी ने उस पवित्र वन में उन तपस्वियो को वैसी नाना प्रकार की तपस्याएँ करते हुए प्रथम बार देखा ।
७. तपस्याओं के रहस्य के श्रेष्ठ ज्ञाता भृगु ब्राम्हण ने उसे सभी प्रकार की तपस्याऐं समझायी और प्रत्येक तपस्या का फल भी बताया ।
८. पानी से उत्पन्न, निरिग्नि भोजन, मूल और फल - यही धर्मशास्त्रों के अनुसार तपस्वियों का भोजन है, लेकिन तपस्या के भिन्न- भिन्न नाना रूप हैं ।
९. कुछ पक्षियों की भाँति दाने चुग कर गुजारा करते हैं, दूसरे हिरणों की भांति घास चुगते हैं और तीसरे साँपों की भाति वायु-भी होते हैं - मानो वे दीमक की बाम्बी ही बन गये हों ।
१०. दुसरे बड़ी कठिनाई से पत्थरों से अपने शरीर के लिये पोषण प्राप्त करते हैं, दूसरे अपने दांतों से ही पीस कर अन्न खाते हैं, और तीसरे दूसरों के लिये उबालते हैं और उनके लिये भाग्यवश जो कुछ थोड़ा बच रहे उसी पर गुजारा करते है ।
११. कुछ दूसरे निरन्तर पानी में भीगी जटाओं से दो बार अग्नि देवता को अर्ध्य अर्पण करते हैं, कुछ दूसरे मछलियों की तरह पानी मे डूबे रहते हैं । उनके बदनों को कछुए नोचते रहते है ।
१२. कुछ समय तक इस प्रकार के तपस्या के कष्ट सहने से अधिक कष्ट सहने से स्वर्ग, मध्यम कष्ट सहने से मर्त्य-लोक, वे अन्त में सुख लाभ करते हैं । कहा गया है कि कष्ट सहन ही पुण्य का मूल है ।
१३. यह सब सुना तो गौतम ने उत्तर दिया- "किसी भी ऐसे आश्रम को देखने का यह मेरा पहला अवसर है । मेरी समझ में तुम्हारा यह तपस्या -क्रम नही आता ।”
१४. “अभी तो मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ । आप की यह निष्ठा स्वर्ग लाभ के लिये है, किन्तु मेरी इच्छा तो यही है कि संसार के दुःख के मूल कारण का और उसके दूर करने का उपाय खोज निकाला जाय । क्या मैं अब आप से विदा ले सकता हूँ? मैं सांख्य-दर्शन का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ और योग-विधि का भी अभ्यास करना चाहता हूँ और देखना चाहता हूँ कि क्या यह दोनों पद्धतियाँ मेरी समस्या के हल में किसी प्रकार सहायक हो सकती है ?”
१५. “जब मैं सोचता हूं कि मुझे आप लोगों से जो ऐसी निष्ठा से अपने पथ पर अग्रसर हो रहे है, जिन्होने मेरे प्रति इतने सौहार्द्र का परिचय दिया है -- विदा लेनी होगी, तो मुझे बड़ा दुःख होता है, वैसा ही दुःख जैसा मुझे अपने सम्बन्धियों को छोड़ते समय हुआ था।"
१६. “मैं जो इस उन से विदा ले रहा हूँ यह कोई आपकी कृति के प्रति वितृष्णा के कारण नहीं, क्योंकि आप तो अपने पूर्वज ऋषियों के पथ पर चलने वाले महान ऋषि - गण हैं ।"
१७. “मैं मुनि आलार कालाम के पास जाना चाहता हूँ, जो सुविज्ञ माना जाता हैं ।
१८. उसका यह संकल्प देखकर आश्रम-पति भृगु ने कहा – “राजकुमार तुम्हारा संकल्प महान् है । तुमने तरुण होने के बावजूद स्वर्ग-सुख और मोक्ष के बारे में गम्भीरता से विचार कर लिया है और तुम स्वर्ग-सुख के स्थान पर मोक्ष लाभ करना चाहते हो । तुम निसन्देह वीर हो ।”
१९. “यदि जैसा तुम कहते हो, यही तुम्हारा दृढ़ निश्चय हो तो शीघ्र विंध्य प्रदेश को जाओ । वही वह मुनि आलारकालाम रहता है जो निरपेक्ष सुख के रहस्य का ज्ञाता है ।"
२०. "उससे तुम मार्ग का ज्ञान प्राप्त करोगे । लेकिन जहाँ तक मैं देख सकता हूं तुम वहाँ भी न रूकोगे । तुम उसके सिद्धान्त की भी जानकारी प्राप्त कर और आगे बढ़ जाओगे ।"
२१. गौतम ने उसका धन्यवाद किया और ऋषि- मण्डली के प्रति आदर प्रदर्शित कर वहाँ से विदा हुआ । वे ऋषि- गण भी उसके प्रति यथायोग्य सत्कार सम्मान की भावना प्रदर्शित कर पुनः तपस्या करने के निमित्त वन में जा दाखिल हुए ।
२. सांख्य परम्परा का अध्ययन
१. भृगु के आश्रम से विदा ले चुकने पर गौतम आलार कालाम के आश्रम का पता लगाने के लिये निकल पड़ा ।
२. आलार कालाम उस समय वैशाली में ठहरा हुआ था । गौतम उधर गया । वैशाली पहुँच कर वह उसके आश्रम पहुँचा । ३. आलार कालाम के पास पहुँच कर उसने कहा कि मैं आपके सिद्धान्त और अभ्यास में दीक्षित होना चाहता हूँ ।
४. आलार कालाम ने उत्तर दिया- “तुम्हारा स्वागत है । मेरा सिद्धान्त ऐसा है कि तुम्हारे जैसा बुद्धिमान् आदमी इसे अचिरकाल में ही स्वयं समझ ले सकता है। मेरे सिद्धान्त का साक्षात् कर सकता है और तद्नुसार जीवन बिताने लग सकता हैं ।”
५. “निश्चय से, तुम ऊँची-से-ऊँची शिक्षा ग्रहण करने के पात्र हो ।”
६. आलार कालाम के ये शब्द सुनकर राजकुमार बहुत प्रसख हुआ । उसने उत्तर दिया-
७. “इस असीम करूणा के कारण जो आप मेरे प्रति दिखा रहे हैं, सदोष होने पर भी मुझे लगता है कि ये निर्दोष हुँ ।
८. "क्या आप कृपा कर मुझे अपना सिद्धान्त बतायेंगे?"
९. आलार कालाम बोला- “तुम्हारे शील, तुम्हारे चरित्र और तुम्हारे दृढ़ निश्चय का मेरे मन पर ऐसा प्रभाव पड़ा है कि ये तुम्हारी पात्रता जाँचने के लिये तुम्हारी कोई परीक्षा नहीं लेना चाहता ।”
१०. “हे सुनने वालों में श्रेष्ठ! हमारे सिद्धान्तों को सुनो।”
११. तब उसने गौतम को उन सिद्धान्तों से परिचित कराया जो उस समय सांख्य दर्शन के नाम से ज्ञात थे ।
१२. प्रवचन की समाप्ति पर आलार कालाम ने कहा - "गौतम ! बस इतने ही हमारे सिद्धान्त हैं । मैंने सार रूप में सब बता दिये हैं।”
१३. गौतम आलारकालाम की स्पष्ट व्याख्या से बडा प्रसन्न हुआ ।
३. समाधि - मार्ग का अभ्यास
१. जिस समय गौतम अपनी समस्या का हल ढूंढ निकालने के लिये नाना तरह के परीक्षण करने में लगा हुआ था, उसे विचार आया कि वह समाधि लगाने का ढंग भी क्यों न सीख ले ?
२. ध्यान मार्ग की तीन पद्धतियाँ प्रचलित थीं ।
३. तीनों पद्धतियों में एक बात समान थी। तीनों की मान्यता थी कि सांस पर काबू पा लेने से चित्त की एकाग्रता सिद्ध हो जाती है । ४. सांस को बस में रखने (?) की एक पद्धति आनापानसति कहलाती थी ।
५. सांस को वश मे रखने की एक दूसरी पद्धति प्रचलित थी जो प्राणायाम कहलाती थी । यह सांस लेने के तीन विभाग करती थी (१) पूरक (अन्दर सांस खींचना ), कुम्भक (सांस को अन्दर रोके रखना), रेचक (सांस को बाहर निकाल देना) । सांस को वश में करने का एक और तीसरा मार्ग समाधि मार्ग कहलाता था ।
६. आलार कालाम ध्यान मार्ग में निष्णात समझा जाता था । गौतम को लगा यह अच्छा होगा कि यदि यह आलार कालाम की देख-रेख में ध्यान-मार्ग का कुछ अभ्यास कर ले ।
७. इसलिये उसने आलार कालाम से बातचीत की और प्रार्थना की कि वह कृपया उसे ध्यान मार्ग का अभ्यास करा दे ।
८. आलारकालाम का उत्तर था - "बड़ी खुशी से ।"
९. आलारकालाम ने उसे अपने ध्यान मार्ग की विधि सिखाई । इसकी सात 'सिढियाँ' थीं ।
१०. गौतम ने इस विधि का नियमित रूप से प्रतिदिन अभ्यास किया ।
११. इस विधि पर पूरा अधिकार कर चुकने के बाद गौतम ने पूछा- "क्या सीखने के लिये कुछ और शेष है ?"
१२. आलार कालाम का उत्तर था- "मित्र ! नहीं इसके अतिरिक्त मेरे पास सिखाने के लिये और कुछ नहीं ।" गौतम ने आला कालाम से विदा ली।
१३. गौतम ने उद्दक रामपुत्त नाम के एक दूसरे योगी के बारे में सुना जिसकी ख्याति थी कि उसने एक ऐसी ध्यान-विधी का आविष्कार किया है कि उससे ध्यानी आलारकालाम की ध्यान विधि की अपेक्षा एक सीढ़ी ऊपर चढ़ जाता हैं ।
१४. गौतम ने सोचा कि यह विधि भी सीख कर योगी की अन्तिम अवस्था तक पहुंचना चाहिये । तदनुसार वह उद्दक रामपुत्त आश्रम में पहुंचा और उसके कथनानुसार योगाभ्यास आरम्भ किया ।
१५. थोड़ी देर में ही गौतम ने उद्दक राम-पुत्त के आठवें दर्जे तक भी अधिकार प्राप्त कर लिया । उद्दक रामपुत्त की ध्यान विधि को पूर्ण रुप से हस्तगत करने के अनन्तर गौतम ने उससे भी वही प्रश्न पूछा जो उसने आलार कालाम से पूछा था: “क्या आगे कुछ और भी सीखना शेष है?"
१६. उद्दक रामपुत्त का उत्तर भी पूर्ववत् ही था: - "मित्र! इसके अतिरिक्त तुम्हें सिखाने के लिये और मेरे पास कुछ नहीं।”
१७. आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त दोनों ध्यानाचार्य के रूप में कोशल "जनपद" में प्रसिद्ध थे । लेकिन गौतम ने सुना था कि मगध जनपद में भी वैसे ही ध्यानाचार्य है। उसने सोचा कि उसे उनकी भी विधि सीख लेनी चाहिये ।
१८. तदनुसार गौतम मगध गया ।
१९. उसने देखा कि यद्यपि उनकी भी ध्यान - विधि का आधार सांस पर काबू पाना ही था, तो भी जो ध्यान - विधि कोशल जनपद प्रचलित थी, उससे वह सर्वथा भिन्न थी ।
२०. इस ध्यान- विधी की विशेषता यह थी कि यह सांस का सर्वथा निरोध करके चित्त की एकाग्रता का सम्पादन करती थी ।
२१. गौतम ने यह विधि सीखी। जब उसने सांस को रोक कर चित्त को एकाग्र करने का प्रयास किया तो उसने देखा कि उसके कानों में से बड़ी तीव्र आवाज आती है और अपना सिर उसे ऐसा प्रतीत होने लगा मानों कोई तेज चाकू से चीर रहा हो । २२. यह बड़ी कष्टदायक विधि थी। लेकिन गौतम ने इस पर भी अधिकार प्राप्त कर ही लिया ।
२३. इस प्रकार उसने समाधि मार्ग का अभ्यास किया ।
४. तपस्या का परीक्षण
१. गौतम ने सांख्य-मार्ग तथा समाधि-मार्ग का परीक्षण कर लिया था । लेकिन वह तपश्चर्या का परीक्षण बिना किये ही भृगुओं के आश्रम से चला आया था ।
२. उसे लगा कि इसके बारे में भी उसका स्वानुभाव होना चाहिए ताकि वह अधिकार से इसकी चर्चा कर सके ।
३. तदनुसार गौतम गया पहुंचा । वहाँ पहुँच कर सबसे पहले उसने घूम फिर कर आस पास का इलाका देखा । बाद में उसने तपश्चर्या के लिये गया के राजर्षि नगरी के आश्रम मे जो कि ऊरूवेला में था - निवास करने का निश्चय किया । तपश्चर्या के लिये नेरञ्जरा नदी के तट पर यह एक एकान्त स्थान था ।
४. उरूवेला में उसे वह पाँच परिव्राजक भी मिले जो उसे राजगृह में मिले थे और जिन्होने उसे 'शान्ति का समाचार' लाकर सुनाया था। वे भी तपश्चर्या का अभ्यास कर रहे थे ।
५. उन तपस्वियों ने उसे देखा और उसके पास आकर कहा कि वह उन्हें भी साथ ले ले । गौतम ने स्वीकार किया ।
६. इसके बाद से वे उसकी सेवा करते हुए उसकी आज्ञा में रहने लगे । वे उसके प्रति बड़े विनम्र थे और जैसा वह कहे वैसा करने वाले थे ।
७. गौतम की तपस्या तथा आत्म-क्लेश की प्रक्रिया अत्यन्त उग्र रूप की थी ।
८. कभी कभी वह केवल दो तीन घरो पर ही भिक्षाटन के लिए जाता, सात घरों से अधिक पर कभी नहीं! और उन घरों में से भी एक एक घर से दो तीन कौर भोजन ही स्वीकार करता, सात कौर से अधिक किसी एक घर से नहीं ।
९. वह दिन में एक दो कटोरी भर भोजन पर ही गुजारा करता; सात कटोरियो से अधिक किसी हालत में नहीं ।
१०. कभी कभी वह सारे दिन में एक ही बार भोजन करता, कभी कभी दो दिनों में एक बार, इसी क्रम से कभी कभी सात दिनों में एक बार, या पन्द्रह दिनों में भी एक बार और बड़ी ही नपी-तुली मात्रामें ।
११. जब उसने तपश्चर्या में और प्रगति की तो उसका आहार जंगल से इकट्ठी की हुई हरी जडें मात्र रह गया था, या अपने से उगे हुए जौ या धान के दाने, या पेड़ों की छाल के टुकडे, या काई, या चावल के गिर्द के अन्दर के लाल कण, या उबले हुए चावल की पीछ, या सरसों की खली ।
१२. वह जड़ें और जंगली फल खाकर रहता था, या जो स्वयं हवा से अपने आप गिरे ।
१३. उसके कपड़े या तो सन के बने थे, या सन की रस्सी और कूडे के ढेरों पर पड़े हुए चीथड़ो के, या पेड की छाल के, या आधी या पूरी मृग-छाल के या घास के या छाल की लकड़ी की पट्टियों के, या आदमियों या पशुओं के बालों से बने कम्बलों के और या उल्लू के परों के ।
१४. वह अपने सिर और दाढ़ी के बाल नोच-नोच कर उखाड़ता था, वह हमेशा सीधा और पालथी मार कर बैठता था तथा वह पालथी मारे मारे आगे सरकता था -- वह खड़ा नहीं होता था ।
१५. इस तरह से तथा और भी नाना प्रकार से वह अपने शरीर को कष्ट और पीडा पहुँचाता था उस की तपश्चर्या इस सीमा तक पहुँच गई थी ।
१६. अपने शरीर के प्रति उपेक्षा के भाव को वह इस सीमा तक ले गया कि वर्षो तक उसके शरीर पर मैल जमती रही जो कि बाद में अपने आप गिरने लगी ।
१७. वह भयानक घनघोर जंगल में रहता था, ऐसे घनघोर जंगल में कि उसके आरे में कहा जाता था कि एक पागल के सिवा और कोई उस जंगल में प्रवेश करने का साहस नही कर सकता । यदि करेगा तो उसके रोंगटे खडे हो जायेगे ।
१८. शीत ऋतु में जब रातें भयानक ठण्डी हो जाती तो कृष्ण पक्ष के दिनों में रात को वह खुले में रहता और दिन के समय धुप अन्धेरे में ।
१९. और जब वर्षा के ठीक पहले ग्रीष्म ऋतु की भयानक गरमी पड़ने लगती तो दिन में वह सूर्य के नीचे रहते और रात को सां घोट देने वाली गरमी में भीतर जंगल में ।
२०. वह श्मशान-भूमि में मुर्दों की हड्डियों का तकिया बनाकर लेटता ।
२१. इसके बाद गौतम एक दिन में एक फली खाकर दिन बिताने लगा- बाद में एक ही सरसों का दाना - बाद में एक ही चावल का दाना ।
२२. जब वह एक दिन में केवल एक ही दाना खाकर गुजारा करने लगा तो उसका शरीर बहुत क्षीण हो गया ।
२३. यदि वह अपने पेट को स्पर्श करता, तो उसका हाथ उसकी पीठ को जा लगता, यदि व अपनी पीठ को स्पर्श करता, तो उसका हाथ उसके पेट को जा लगता । उसका पेट और पीठ एक दूसरे के इतने नजदीक सट गये थे । यह सब कुछ उसकी अत्यन्त अल्पाहारता के ही कारण हुआ था ।
५. तपश्चर्या का त्याग
१. गौतम की तपश्चर्या और आत्म-पीड़न बड़े ही उग्र रूप का था - इतना उग्र जितना उग्र वह हो सकता था । यह छ: वर्ष के लम्बे अर्से तक जारी रहा ।
२. छः वर्ष बीतने पर उसका शरीर इतना दुर्बल हो गया था कि वह हिल डोल तक न सकता था ।
३. तब भी उसे कोई नया प्रकाश नहीं दिखाई दिया था, और संसार में जो दुःख की समस्या है और जिस पर उसका मन केन्द्रित था, उस समस्या का कोई हल उसे दिखाई नहीं दिया था ।
४. उसने अपने मन में सोचा- “यह न आत्म विजय का मार्ग है, न पूर्ण बोधि प्राप्त करने का मार्ग है और न मोक्ष का मार्ग है ।”
५. "कुछ इस संसार के सुख भोग के निमित्त कष्ट उठाते है, कुछ स्वर्ग लाभ के निमित्त कष्ट सहन करते थें; सभी प्राणी आशा चक्कर में पड़कर अपने उद्देश्य को प्राप्त न हो, सुख को खोजते है, दुःख के गढ़े में जा गिरते है ।
६. “क्या मेरे साथ भी कुछ कुछ ऐसा ही नहीं हुआ है?”
७. "मैंने जो प्रयास किया है मैं उसे दोष नहीं दे रहा हूँ, किन्तु यह आधार को छोड़कर आकाश में उड़ने में उड़ने का प्रयास !”
८. मैं पूछता हूँ क्या शरीर का अधिक से अधिक उत्तापन 'धर्म' हो सकता है?"
९. क्योकि मन की प्रेरणा से ही शरीर या तो कार्य करता है अथवा कार्य करने विरत रहता है, इसलिए मात्र मन की साधना ही योग्य है - बिना विचार के शरीर एक कुत्ते के समान है ।
१०. “यदि केवल शरीर की ही बात होती तो शायद भोजन की शुद्धि से ही पवित्रता आ सकती, किन्तु जो कर्ता है, जो मन है - उसका भी तो प्रश्न हैं । लेकिन यह सब किस काम का?"
११. “जिसके शरीर का बल जाता रहा, जो भुख तथा प्यास से परेशान है जिसका मन थकावट के मारे एकाग्र और शान्त नहीं है - ऐसे आदमी को कभी नया ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता ।”
१२. "जो पूर्ण रूप से शान्त नहीं है वह ऐसे उद्देश्य को जो चित्त द्वारा ही साध्य है कैसे प्राप्त कर सकता है?”
१३. “सच्ची शान्ति और चित्त की एकाग्रता शरीर की आवश्यकताओं को पूर्ति से ही ठीक ठीक प्राप्त हो सकती हैं।"
१४. इस समय उरूवेला में सेनानी नाम का एक गृहपति रहता था । उसकी कन्या का नाम था सुजाता ।
१५. सुजाता ने एक न्यग्रोध वृक्ष के प्रति मिन्नत मान रखी थी और यदि उसे पुत्र लाभ हो तो प्रति वर्ष भेंट चढ़ाने का संकल्प किया था ।
१६. क्योंकि उसकी इच्छा पूर्ण हुई थी, इसलिए उसने अपनी पुण्णा नाम की दासी को 'पूजा-स्थली' तैयार करने के लिये भेजा था ।
१७. गौतम को न्यग्रोध वृक्ष के नीचे बैठा देख पुण्णा ने सोचा आज वृक्ष देवता ही साकार हो गया है ।
१८. सुजाता स्वयं आई और उसने अपनी बनाई हुई खीर स्वर्ण पात्र में सिद्धार्थ गौतम को अर्पण की ।
१९. उसने स्वर्णपात्र लिया और सुपतिट्ठ नाम के नदी घाट पर स्नान करने अनन्तर भोजन ग्रहण किया ।
२०. इस प्रकार उसकी ‘तपश्चर्या' का अन्त हुआ ।
२१. जो पांच परिव्राजक सिद्धार्थ गौतम के साथ थे, वे उससे रूष्ट हो गये। क्योंकि, उसने तपस्वी तथा आत्म- पीड़न के जीवन का परित्याग कर दिया था । वे सिद्धार्थ गौतम को छोड़ कर चले गये ।