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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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३. बिम्बिसार को गौतम का उत्तर

१. इन्द्र की तरह स्पष्टता और दृढता से जब मगध नरेश ने यह कहा, तो उसकी भी बात सुनकर कुमार अपने निश्चय से विचलित नहीं हुआ। वह पर्वत के समान अचल था

२. मगध-नरेश से इस तरह सम्बोधित किये जाने पर संयत, स्थिर राजकुमार ने मैत्री-पूर्ण हृदय से यह उत्तर दिया-

३. "राजन! जो कुछ आप ने कहा है वह आपके योग्य है ।"
आपका जन्म उस महान् कुल में हुआ है, जिसका राज - चिन्ह सिंह है। आप मित्रों के हितचिन्तक हैं । आपके लिये यह स्वाभाविक है कि आप अपने एक मित्र को इस तरह कहें ।"

The Buddha and His Dhamma - author dr Bhimrao Ramji Ambedkar

४. “दुश्शीलों की कुलागत मैत्री शीघ्र ही नष्ट हो जाती है, सुशील ही है जो नये-नये व्यवहार से पुरानी परम्परागत मैत्री को दीर्घकाल तक बनाये रखते है ।"

५. “प्रतिकूल परिस्थिति में ही जो मैत्री का त्याग नहीं करते वे ही सच्चे मित्र हैं । सुख - पूर्ण अवस्था में, वैभव की स्थिति में तो मित्र नहीं होता ।”

६. “सम्पत्ति प्राप्त होने पर अपने मित्रों के लिये तथा धर्म के निमित्त जो उसका उपयोग करते हैं उन्हीं की सम्पत्ति सार्थक है; जब इसका विनाश भी होता है तब भी यह दुःखजनक नहीं सिद्ध होती ।”

७. "हे राजन ! आपने जो भी मेरे बारे में कहा वह आपके औदार्य और मैत्री का ही परिणाम है। मैं भी मैत्री - पूर्ण ढंग से ही आपका समाधान करने का प्रयास करूँगा ।"

८. “मुझे न साँपों से ही उतना भय लगता है और न आकाश से गिरने वाले वज्र से ही उतना भय लगता है, न वायु के झोको से प्रेरित आग के शोलो से ही इतना भय लगता है, जितना भय इन इन्द्रियों के विषयों से लगता है ।”

९. “यह अस्थिर विषय -- हमारे सुख और सम्पत्ति के विनाशक, जो संसार में अन्तःशून्य और माया के सदृश हैं - आशाकाल में ही आदमी के चित्त को चंचल कर देते हैं, जब वे उसे ग्रस लेते हैं तब तो इनका कहना ही क्या ?”

१०. “मर्त्य-लोक तो क्या, दिव्य-लोक में भी विषयानुरक्त को संतोष और सुख प्राप्त नहीं होता । जिस प्रकार ईंधन से वायु-प्रेरित आग की कभी तुष्टि नहीं होती उसी प्रकार विषयों की कामना रखने वाले की कभी प्यास नही बुझती ।”

११. “विषयों से बढ़कर संसार में विपत्ति नहीं है, अविद्या में ग्रसे रहने के ही कारण लोग उनमें अनुरक्त होते हैं। एक बार विषयों से भयभीत हो जाने पर कौन बुद्धिमान् फिर उनकी कामना करेगा?”

१२. “समुद्र से घिरी सारी पृथ्वी जीत लेने पर भी राजा लोग समुद्र के दूसरी और विजयी होने की कामना करते हैं । जिस प्रकार अपने में गिरनेवाली नदियों से समुद्र अतृप्त ही रहता है, उसी प्रकार आदमी की कभी भी विषयों से तृप्ति नहीं होती ।”

१३. “आकाश से स्वर्ण-वर्षा हो चुकने पर भी, चारो समुद्रों को जीत लेने पर भी, शक्र का आधा राज्य हस्तगत हो जाने पर भी राजा मान्धाता विषयों में अतृप्त ही रहा ।"

१४. जब इन्द्र ने वृत्र के भय के मारे अपने आपको छिपा लिया था उस समय नहुर्ष स्वर्ग-लोक का सुख भोग कर भी अहंकार के वशीभूत हो से अपनी पालकी उठवा कर भी विषयों में अतृप्त हो रहा ।”

१५. “इन विषय-भोग नामधारी शत्रुओं का कौन स्वागत करेगा, जिन्होंने ऐसे ऋषियों पर भी काबू पा लिया जो दुसरे ही पुरुषार्थ मे लगे थे, जो वल्कल वस्त्र धारण करते थे, जो फल-मूल खाकर गुजारा करते थे और जिनकी साँपों जैसी लंबी-लंबी जटाए थी ।” १६. "विषयासक्त मनुष्यों के दुःखों की जानकारी हो जाने पर जो संयत है उनके लिये यही योग्य है कि वे विषयों के पास न फटके

१७. “विषयासक्त मनुष्यो के लिये विषय सम्बन्धी सफलता भी एक विपत्ति ही है, क्योंकि इच्छित विषय की प्राप्ति होने पर वह उससे मदमत्त हो जाने पर जो नहीं करना चाहियें, वह करता है और जो करना चाहिये वह नहीं करता, और इससे आहत होकर वह भयानक दुःख को प्राप्त होता है ।"

१८. “ये काम-विषय जो बड़े ही प्रयास से सुरक्षित रख जाते हैं, जो विषयी की वञ्चना के अनन्तर जहाँ से आते हैं वहाँ लौट जाते हैं, जो थोड़ी देर के लिये ऋण लिये जैसे ही होते हैं, कौन बुद्धिमान् संयत आदमी इनमें आनन्द मनायेगा?”

१९. ये काम - - विषय उल्का के समान हैं, इन के पीछे पड़ने पर ये पिपासा में वृद्धि का कारण होते हैं, कौन बुद्धिमान् संयत आदमी इन्हें प्राप्त कर सन्तुष्ट होगा ।"

२०. “ये काम - विषय फेंके हुए मांस के समान है, जो राजाओं से लेकर सभी के दुःख का कारण होते है, कौन बुद्धिमान संयत आदमी इन्हें प्राप्त कर संतुष्ट होगा ।"

२१. “ये काम-विषय इन्द्रियों की ही तरह नाशवान् है, जो भी इनमे रमण करता है, ये उसके लिये विपत्तिजनक ही होते हैं, कौन बुद्धिमान् संयत आदमी इन्हें प्राप्त कर सन्तुष्ट होगा?”

२२. “जो संयमी आदमी इन काम-विषयों से डसा जाता है ये उसका सुख हर लेते है और उसके विनाश का कारण होते है । ये एक क्रुद्ध निर्दय सर्प के समान हैं, कौन बुद्धिमान् संयत आदमी इन्हें प्राप्त कर सन्तुष्ट होगा ?”

२३. “जिन काम-विषयों को भोगने से भी वैसे ही तृप्ति नहीं होती जैसी एक कुत्ते की हड्डी चाटने से, जो सूखी हड्डीयों के पंजर के समान हैं, कौन बुद्धिमान् संयत आदमी इन्हें प्राप्त कर सन्तुष्ट होगा?”

२४. “जो दरिद्र कामान्ध है, जो विषयाशा का दास है, वह इसी संसार मे मृत्यु-दुःख का अधिकारी है ।”

२५. “गीतों के कारण हिरण विनाश को प्राप्त होते हैं, दीपक की चमक के कारण पतंगे आग में जल-भून कर जान गँवाते हैं, माँस- मछली लोहे का काँटा निगल जाती है, इसलिये संसार के काम-भोग अन्त में विनाश का ही कारण होते हैं ।”

२६. “यह जो सामान्यतया कहा जाता है कि 'काम भोग भोगने के लिये है' यदि विचार कर देखा जाय तो इनमें से कोई भी भोग्य- पदार्थ नहीं है, अच्छे अच्छे कपड़े और दूसरी भी वैसी ही सभी चिजें अधिक से अधिक दुःख के मार्जन मात्र है ।”

२७. “पानी प्यास बुझाने के लिये होता है, भोजन भूख मिटाने के लिये, घर हवा - धूप और वर्षा से बचाने के लिये, और वस्त्र से रक्षा करने के लिये तथा नग्नता ढकने के लिये ।”

२८. “इस प्रकार शैया तन्द्रा के विघात के लिये है, वाहन यात्रा की थकावट मिटाने के लिये है, आसन खड़े रहने की थकावट दूर करने के लिये है, इसी प्रकार स्नान शरीर शुद्धि और स्वास्थ का साधन है ।”

२९. “जितने भी बाह्य-पदार्थ हैं वे आदमियों के दुःख हरण के ही साधन हैं - वे अपने में भोग्य पदार्थ नहीं हैं, कौन बुद्धिमान आदमी इन दुःख के दूर करने के साधनों को भोग्य वस्तुएँ मान कर भोगेगा ?"

३०. “जो आदमी सन्निपात ज्वर से ग्रस्त होने पर ठण्डी पट्टी आदि को भोग्यवस्तुएँ मानें- जो कि केवल वेदना को दूर करने के ही उपाय है - वहीं आदमी इन काम - विषयों को भोग्य वस्तुओं का नाम दे सकता है ।”

३१. क्योंकि सभी काम - विषय अनित्य है, इसलिये मै उन्हें भोग्य विषय मान ही नहीं सकता । जो स्थितियाँ सुख दायक प्रतीत होती है वही दुःखकारक भी बन जाती हैं । "

३२. “गर्म-वस्त्र और सुगन्धित धूप शीत ऋतु में सुख पहुँचाते है, किन्तु ग्रीष्म ऋतु में वही अप्रिय बन जाते है, चन्द्रमा की किरणें और चन्दन का लेप गर्मी में सुखकारक होते हैं, किन्तु वही सरदी में अप्रिय बन जाते हैं ।”

३३. “क्योंकि संसार की सभी वस्तुएँ - हानि-लाभ, यश-अपयश, सुख-दुःख आदि द्वन्दों के आधीन हैं । इसलिये कोई भी आद न नित्य सुखी रहता है और कोई भी आदमी न नित्य दुखी ।"

३४. "जब मैं इस सुख-दुःख के मिश्रण को देखता तो मै राज्य और दासता को समान ही समझता हूँ। क्योंकि न तो राजा ही हमेशा हँसता रहता है और न दास ही हमेशा रोता रहता है । "

३५. “क्योंकि राजा के सिर पर बड़ी जिम्मेदारी होती है, इसलिये राजा की चिन्ताएँ भी अधिक होती है । क्योंकि राजा तो कपड़े टांगने की खूँटी के समान होता है, उसे दूसरों के लिये ही कष्ट सहन करना पड़ता है।”

३६. “जो राजा अपने 'राज्य' पर अत्याधिक निर्भर करता है वह अभागा ही है जो कि उसे एक न एक दिन त्याग देने वाला है और जिसे वक्रगति ही प्रिय है, दूसरी ओर यदि राजा राज्याश्रित नहीं है तो ऐसे कायर नरेश को सुख ही क्या हो सकता है?”

३७. “और क्योकी सारी पृथ्वी का राज्य जीत लेने पर भी राजा एक ही नगरी में रह सकता है और उसमें भी केवल एक ही महल में सो सकता है, बाकी सब कुछ क्या दूसरों के ही लिये नहीं है?"

३८. “और राजा को भी एक जोड़ा कपड़ा ही लगता है और भूख मिटाने के लिये थोड़ा भोजन अपेक्षित होता हैं, इसी प्रकार क शैय्या और एक आसन की ही आवश्यकता होती है, शेष सब तो मद के लिये ही है ।"

३९. “यदि इन सब वस्तुओं का उपयोग आदमी का सन्तोष ही है, तो मैं बिना राज्य के भी सन्तुष्ट है तो सन्तुष्ट हूँ । और यदि कोई इनके बिना ही संतुष्ट है तो क्या ये सब बेकार नहीं है?”

४०. “जो मंगलकारी पथ का पथिक हैं, उसे काम-भोगो में का प्रलोभन देना योग्य नहीं । उस मैत्री का, जिसकी आपने घोषणा की है, ध्यान करके, मै आपसे बार-बार पूछता हूँ कि आप मुझे बतायें कि क्या विषयों मे कुछ भी सार है ?"

४१. “मैने रोष में आकर गृह-त्याग नहीं किया है और न इसलिये कि शत्रु के बाणों ने मेरे मुकुट को गिरा दिया है और न मेरी कोई दूसरी फल-आकांक्षा ही है, जिसके कारण मैं आपके प्रस्ताव का स्वागत नहीं कर रहा हूं।"

४२. “जो कोई किसी भयानक क्रूद्ध सर्प से एक बार बचकर फिर उसी को प्राप्त करने की इच्छा करें जो तेज जलती हुई तुषाग्नि से एक बार बचकर फिर उसी में पड़ने की इच्छा करे, वही एक बार इन काम-विषयों से बचकर फिर इन्हीं में फँसने की इच्छा कर सकता है।"

४३. “जो भली प्रकार देखता हुआ भी किसी अन्धे से ईर्षा करे, जो मुक्त होता हुआ भी किसी बँधे हुए से ईर्षा करे, जो धनी हो भी किसी दरिद्र से ईर्षा करे, जो स्वस्थ चित्त होकर भी किसी पागल से ईर्षा कर सकता है ।"

४४. "मित्र ! जो भिक्षाजीवी है, वह दया का पात्र नहीं है । उसे इस लोक मे परं सुख प्राप्त है, शान्ति प्राप्त है और आगे के लिये भी उसके सग दुःखो का अन्त हो गया है।"

४५. “किन्तु वही दया का पात्र है जो विशाल धन राशि के बीच गडा हुआ होने पर भी तृष्णा के वशीभूत है, जिसे न इस लोक में परं सुख प्राप्त है, न शान्ति प्राप्त है और न आगे के लिये भी उसके दुःखों का अन्त हुआ है।"

४६. “जो कुछ तुमने मुझे कहा है वह तुम्हारे शील, तुम्हारी जीवन-चर्या, और तुम्हारे कुल के अनुरूप है । किन्तु अपने निश्चय दृढ़ रहना मेरे भी शील, मेरी भी जीवन चर्या और मेरे भी कुल के अनुरुप है ।”


४. गौतम का उत्तर

१. "मै संसार के कलहों से आहत हूँ । मैं शान्ति की खोज में हूँ । मैं इस दुःख का अन्त करने के बदले में इस पृथ्वी का राज्य तो क्या दिव्य लोक का राज्य भी न चाहूंगा ।"

२. “और राजन्! यह जो तुमने कहा है कि धर्म, अर्थ और काम ही मनुष्य के तीन के पुरुषार्थ हैं, और तुम्हारा यह भी कहना है कि मैं दुःख के मार्ग पर हूँ तो तुम्हारे तीनों पुरूषार्थ अनित्य है और असन्तोषकारक है।"

३. “और जहाँ आपका यह कहना है कि 'वार्धक्य आने तक प्रतीक्षा करनी चाहीये, क्योंकि तरुणाई का ठिकाना नहीं, तो आपका यह कथन ही सुनिश्चित नहीं क्योंकि तरुणाई मे भी दृढता हो सकती है और वार्धक्य में भी नहीं हो सकती ।”

४. “और जब मृत्यु किसी भी समय किसी को भी अपने वश में ले सकती हैं, तो कोई भी शान्ति का खोजी बुद्धिमान किस प्रकार वार्धक्य की प्रतीक्षा कर सकता है जब वह यह जानता ही नहीं कि मृत्यु कब आ धर दबायेगी ?"

५. “जब वार्धक्यरूपी शस्त्र हाथ में लीये, रोगों के तीर चारों और बिखेरे मृत्यु प्राणियों को निगल जाने के लिये तैयार खडी है और प्राणी भी उसके मुंह में ऐसे जाते हैं जैसे हिरण जंगल की ओर तो कोई भी दीर्घायू की भी क्या कामना कर सकता है?”

६. “चाहे तरुण हो, चाहे वृद्ध हो और चाहे लड़का हो, हर किसी के लिये यही योग्य है कि वह करूणा के धार्मिक पथ पर अग्रसर हो ।”

७. “और जहाँ तक तुम्हारा यह कहना है कि मैं यज्ञ करने में अप्रमादी बनूं, क्योंकि वे मेरे कुल के अनुकूल है और महान् फलदायी हैं, तो ऐसे यज्ञों को नमस्कार हैं जिनमे निरीह प्राणियों का वध होता है ।”

८. “किसी भावी फल के लिये किसी भी निरीह प्राणी की हत्या करना किसी भी कारुणिक शील-सम्पन्न मुनष्य को योग्य नहीं, चाहे फिर वह यज्ञ का फल अनन्तकालीन ही क्यों न हो ।”

९. “और यदि यह भी न स्वीकार किया जाय कि आत्म-संयम, सदाचार और कामजित होना ही सद्धर्म का अनुकरण करना है, तो भी याज्ञिक होना ठीक नहीं, क्योकि यज्ञ- -धर्म के अनुसार ऊँचे-से-ऊँचा फल पशुओं की हत्या से ही मिल सकता है ।"

१०. “दुसरों को दुःख देकर, इसी जन्म में, जो सुख आदमी को प्राप्त होता है वही जब कारूणिक बुद्धिमान पुरुष के लिये काम्य नहीं तो फिर किसी अदृश्य दुसरे लोक मे जो सुख मिलने की बात कही जाती है, उसके बारे में तो कहना ही क्या?”

११. “मैं अगले जन्म में मिलने वाले किसी फल की आशा से कोई कर्म करने में प्रेरित नहीं हो सकता, हे राजन्! मेरे मन को भावी जन्मों की कल्पना में सुख नहीं मिलता, क्योंकि ऐसे कर्मों की दिशा उसी तरह अनिश्चित और अस्थिर है जैसे बादलो से गिरी वर्षा से प्रताड़ित किसी पौंधे की दिशा । "

१२. राजा ने हाथ जोड़कर कहा- "बिना बाधा के आपका उद्देश्य सफल हो । जब भी कभी आप का जीवनोद्देश्य पूरा हो जाय तब फिर इधर पधारने की कृपा करना ।"

१३. गौतम को फिर अपने राज्य मे आने के लिये वचन बद्ध कर अपने दरबारियों सहित राजा अपने महल को चला गया ।


५. शान्ति का समाचार

१. जब गौतम राजगृह में कुटी बनाकर ठहरे हुए थे, उसी समय पाँच दूसरे परिव्राजक भी आये और उन्होने भी उसके पास ही एक कुटी बना ली।

२. इन पाँच परिव्राजको के नाम थे कौण्डिन्य, अश्वजित, बाष्प, महानाम तथा भद्रिक ।

३. वे भी गौतम के व्यक्तिगत से प्रभावित हुए और सोचने लगे कि इसकी प्रव्रज्या का क्या कारण रहा होगा ?

४. राजा बिम्बिसार की भाँति ही उन्होंने भी इस विषय में प्रश्न किया ।

५. जब उसने उन्हें वह सारी परिस्थिति समझाई जो कि उसके प्रव्रजित होने का कारण बनी थी, उन्होंने कहा, "हाँ हमने यह सुना हैं, लेकिन क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे चले आने के बाद क्या हुआ ?"

६. सिद्धार्थ का उत्तर था, “नहीं।” तब उन्होने उसे बताया कि उसके चले आने के बाद कोलियों से युद्ध ठानने के विरोध में शाक्यों मे बड़ा आन्दोलन छिडा ।

७. आदमियों, औरतों, लड़कों, लड़कियों ने प्रदर्शन किये और जुलूस निकाले । वे नारे लगा रहे थे कि 'कोलिय और शाक्य भाई भाई है, भाई का भाई के विरूद्ध शस्त्र उठाना अनुचित हैं', 'गौतम के जलावतन हो जाने को याद करो' इत्यादि ।

८. आन्दोलन का यह परिणाम हुआ कि शाक्य संघ को एक सभा बुलाकर पुनः अपने निर्णय पर विचार करना पड़ा । इस समय बहुमत कोलियों से समझौता कर लेने के पक्ष में था ।

९. शाक्य-संघ ने पाँच जनो को अपना दूत चुना और उन्हें यह काम सौंपा गया कि वे कोलियों के साथ सन्धि-वार्ता चलायें ।

१०. जब कोलियों को इसका पता लगा वे बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने भी अपने में से पाँच जन चुने जो शाक्यों के दूतों के साथ सन्धि- वार्ता चलायें ।

११. दोनों ओर दूत आपस में मिले और दोनों ने तय किया कि एक स्थायी पंचायत की नियुक्ति की जाय और रोहिणी के जल को लेकर कभी भी यदि कोई झगड़ा हो तो इस पंचायत के सामने ही रखा जाय और पंचायत का निर्णय मान्य किया जाय । इस प्रकार युद्ध का खतरा सदा के लिये शान्त हो गया ।

१२. जो कुछ कपिलवस्तु में हुआ था उससे गौतम को सूचित करने के अनन्तर परिव्राजकों ने कहा- “अब तुम्हारे लिये परिव्राजक बने रहने की कोई आवश्यकता नही । अब तुम अपने परिवार के लोगों के पास वापस जा सकते हो ।”

१३. सिद्धार्थ का उत्तर था- “इस शुभ समाचार से मुझे प्रसन्नता हुई है । यह मेरी विजय है । लेकिन मैं वापस घर नहीं जाऊँगा । मुझे नहीं जाना चाहिये ।”

१४. गौतम ने उन पाँच परिव्राजकों से पूछा - "तुम्हारा क्या कार्यक्रम है?” उनका उत्तर था - "हमने तपस्या करने का निश्चय किया है तुम भी क्यों हमारे साथ शामिल नहीं होते?” सिद्धार्थ ने कहा- “शनैः शनैः पहले मुझे दूसरे पथों की परीक्षा करनी है।”

१५. तब पाँचो परिव्राजक चले गये।


६. समस्या की नई पृष्ठभूमि

१. पाँच परिव्राजकों द्वारा लाये गये इस समाचार ने कि शाक्यों और कोलियों में युद्ध का होना रूक गया था, गौतम को बड़ा बेचैन बना दिया ।

२. अकेला होने पर वह बड़ी गम्भीरता से सोचने लगा कि क्या अब भी परिव्राजक बने रहने का उसके लिये कोई उचित कारण रह गया है!

३. उसने अपने से प्रश्न किया- वह अपने बन्धु-बान्धवों को क्यों छोड़कर आया था?

४. . उसने इसीलिये गृहत्याग किया था क्योंकि वह युद्ध का विरोधी था । "अब जब कि युद्ध समाप्त हो गया है, तब भी क्या मेरे लिये कोई समस्या शेष रह गई है ! क्या युद्ध की समाप्ति के साथ-साथ मेरी समस्या भी समाप्त हो गई?”

५. गहराई से सोचने पर उसे उत्तर मिला- नहीं;

६. युद्ध की समस्या अनिवार्य तौर पर विरोध की समस्या है । यह एक बड़ी समस्या का एक अंग मात्र है ।

७. "यह विरोध न केवल जातियो और राजाओं में ही विद्यमान है, यह विरोध यह संघर्ष विद्यमान है क्षत्रियों में, ब्राह्मणों मे, गृहस्थो में, माता और पुत्र मे, पुत्र और माता में, पिता और पुत्र में, बहन और भाई में तथा साथी और साथी में ।”

८. जातियों में जो संघर्ष होता है वह तो कभी-कभी होता है लेकिन वर्गों के बीच में जो संघर्ष होता है वह स्थायी है और लगातार जारी है । संसार के कष्टों और दुःख के मूल में यह वर्ग संघर्ष ही हैं ।

९. यह सत्य है कि मैंने युद्ध के कारण ही गृहत्याग किया था । लेकिन शाक्यों और कोलियों का युद्ध समाप्त हो जाने पर भी मैं घर वापस नही लौट सकता । मैं देखता हूँ कि मेरी समस्या ने व्यापक रूप धारण कर लिया है। मुझे उस सामाजिक-संघर्ष की समस्या का हल खोज निकालना है ।

१०. पुराने परम्परागत दर्शनों के पास इस सामाजिक संघर्ष की समस्या का हल है या नहीं और यदि हैं तो कहाँ तक?

११. क्या हम इन सामाजिक दर्शनों में से किसी एक को भी सही मान सकते हैं ?

१२. उसने हर परम्परा का हर मत का, स्वयं परीक्षण करने का निश्चय किया ।