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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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२१. परिवार का विलाप

१. शुद्धोदन के परिवार के लोग बड़ी उत्सुकतापूर्वक इस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे कि सम्भव है छन्न सिद्धार्थ को समझा-बुझा कर वापस लागने में सफल हो जाय ।

२. राजकीय अस्तबल में प्रवेश करते ही कन्थक बड़े ओर से हिनहिनाया । इस प्रकार उसने महल के लोगों को अपना दुःख व्यक्त कर दिया ।

३. जो लोग राज-महल के भीतरी भाग में थे, उन्होंने सोचा -- "क्योंकि कन्थक हिनहिना रहा है, इसलिये राजकुमार वापस आ गया होगा ।"

४.. और वे स्त्रियाँ जो दुःख के मारे होश - हवास भुलाये बैठी थीं, अब प्रसन्नता से पागल हो गई । वे राजकुमार को देखने की आशा में बड़ी तेजी से महल से बाहर आई । वे निराश हुई । वहाँ कन्थक था । राजकुमार न था ।

Gautam Buddha ke Parivar ka vilap - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

५. सारा आत्म-संयम भूल कर गौतमी चिल्ला उठी । वह बेहोश हो गई । जोर-जोर से रोती हुई कहने लगी :-

६. "जिसके वैसे लम्बे-लम्बे बाहु हों, जिसकी सिंह समान चाल हो, जिसकी वृषभ जैसी आँखे हों, जो स्वर्ण समान सुन्दर हो, जिसका वक्षस्थल खूब चौड़ा हों, जिसका स्वर मेघ गर्जन के समान गम्भीर हो - क्या एसे वीर को किसी आश्रम में रहना चाहिये?"

७. "यह वसुन्धरा ही रहने योग्य नहीं है क्योंकि वह अनुपम श्रेष्ठ कर्मी हमें छोड़कर चला गया हैं ।”

८. “उसके वे दो पाँव - जिनके चरणों की अँगुलियों के बीच में सुन्दर जाली है, जिनके गिट्टे नील कंवल की तरह कोमल और आच्छादित है, जिनके बीच चक्र चिन्ह अंकित है, वन की कठोर भूमि पर कैसे चल सकेंगें?”

९. “वह शरीर-- जो महलों में रहने या लेटने के योग्य है, जो मूल्यवान भेष-भूषा तथा चन्दन आदि के लेप से अलंकृत रहता है - उन जंगलों में कैसे रहेगा, जहाँ शीत, उष्णता और वर्षा से बचने का कोई उपाय नहीं ।"

१०. “जिसे अपना कुल, शील, शौर्य, बल, विद्या, सौन्दर्य और तारूण्य का अभिमान था, जिसे हमेशा देने का ही अभ्यास रहा, लेने का नहीं, वह दूसरों से भिक्षा कैसे माँग सकेगा?"

११. “जो स्वच्छ सुनहरी शैया पर सोता था और जिसे मधुर वाद्य के संगीत से उठाया जाता था वह मेरा तपस्वी अब केवल वस्त्र बिछाकर कठोर पृथ्वी पर कैसे सोयेगा ?"

१२. इस प्रकार के करूण विलाप को सुनकर स्त्रियाँ परस्पर एक दूसरे का आलिङ्गन कर आंसू बहाने लगी । उनकी आँखों से आँसू क्या बरस रहे थे, हिलाई गई लताओं के फूलों से मधु बरस रहा था ।

१३. यह भूलकर कि उसने उसे सहर्ष जाने की अनुमति दे दी थी वियोगाहत यशोधरा भी एक बार ही भूमि पर गिर पड़ी ।

१४. “अपनी धर्मपत्नी को -- मुझे -- वह कैसे छोड़ गया ? वह मुझे विधवा बना गया । वह अपनी धर्मपत्नी को अपने नये- जीवन का संगी-साथी बना सकता था । "

१५. “मुझे स्वर्ग की कामना नहीं है । मेरी एक ही इच्छा रही है कि मेरा पति मुझे इस लोक वा परलोक में कभी न छोड़े।”

१६. “यदि मै उसके विशालाक्ष तेजस्वी मुख की ओर देखने की अधिकारिणी नहीं हूँ तो क्या यह बिचारा राहुल भी अपने पिता की गोद में लेटने का अधिकारी नहीं हैं !”

१७. “खेद है कि उस वीर के कोमल सौन्दर्य के भीतर उसका हृदय अत्यन्त कठोर है, अत्यन्त निर्दय है। कौन ऐसा है जो शत्रु को भी मुग्ध कर लेने वाले, तोतली बोली बोलने वाले इस प्रकार के बच्चे तक को छोड़ कर चला जाय?"

१८. “निश्चय से मेरा हृदय भी अत्यन्त दारूण है -- शायद पत्थर का बना हुआ अथवा लोह- निर्मित है जो अपने स्वामी के वनगमन पर, अनाथवत् छोड़कर चले जाने पर भी विदीर्ण नही होता । लेकिन मैं करूँ क्या ? मेरा दुःख असह्य है ।”

१९. इस प्रकार अपने दुःख में अपने होश - हवास गँवाये हुए यशोधरा रोई और जोर-जोर से रोई । यद्यपि वह स्वभाव से बड़ी धैर्यवान् थी, लेकिन इस समय दुःख में वह अपना धैर्य गँवा बैठी थी ।

२०. इस प्रकार जमीन पर पड़ी यशोधरा को, दुःख के मारे अपने होश- हवास गँवाये देखकर और उसका करूण विलाप सुनकर सारी स्त्रियाँ भी चिल्लाने लगीं । आँसुओं के मारे उनके चेहरे ऐसे हो गये थे जैसे वर्षा से प्रताड़ित कमल हों ।

२१. छन्न और कन्थक दोनों के वापस लौट आने की बात सुनकर और अपने पुत्र के दृढ़ निश्चय की बात सुनकर शुद्धोदन के चित्त को बड़ी चोट पहुँची ।

२२. अपने पुत्र के वियोग से अत्यन्त दुःखी शुद्धोदन ने नौकर-चाकरों से सँभाले जाकर जरा देर के लिये घोड़े की ओर देखा । उस समय असकी आँखे आँसुओं से भरी थीं। इसके बाद वह जमीन पर गिर पड़ा और जोर-जोर से चिल्लाने लगा ।

२३. तब शुद्धोदन अपने मन्दिर मे गया, प्रार्थना की और कई माङ्गलिक क्रियाएँ की । उसने अपने पुत्र के सकुशल लौट आने के लिये कई मन्नते मानीं ।

२४. इस प्रकार शुद्धोदन, गौतमी और यशोधरा यही मनाते - मनाते अपने दिन गिनने लगे कि हे देव ! हम उसे जल्दी-से-जल्दी फिर कब देखेंगे ?