भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
९. पुत्र के संरक्षण के लिये पिता की योजना
१. राजा प्रसन्न था कि पुत्र का विवाह हो गया और वह गृहस्थ बन गया, किन्तु साथ ही असित ऋषि की भविष्यवाणी भूत की तरह उसका पीछा कर रही थी ।
२. उस भविष्यवाणी को पूरा न होने देने के लिये उसने सोचा कि सिद्धार्थ गौतम को 'काम-भोगों' के बंधन से अच्छी तरह दिया जाय ।
३. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये शुद्धोदन ने अपने पुत्र के लिये तीन महल बनवाये एक ग्रीष्म ऋतू में रहने के लिये, दूसरा वर्षा ऋतु में रहने के लिये और एक तीसरा शीत ऋतु में रहने के लिये । उसने इन महलों को हर तरह के भोगविलास के साधनों से सुसज्जित किया ।
४. हर महल के गिर्द एक-एक सुन्दर बाग था जिसमें नाना तरह के फूलों से लदे हुए पेड थे ।
५. अपने पुरोहित उदायी के परामर्श से उसने निश्चय किया कि कुमार के लिये एक 'अन्तःपुर' की व्यवस्था करनी चाहिये, जहाँ सुन्दरियों की कमी न हो ।
६. शुद्धोदन ने तब उदायी को कहा कि वह उन षोडशियों को संकेत कर दे कि वे कुमार का चित्त जीतने का प्रयास करें ।
७. उदायी ने सुन्दरियों को इकट्ठा कर कुमार का चित्त लुभाने का संकेत ही नहीं किया, विधि भी बताई ।
८. उन्हें सम्बोधित करके उसने कहा -“आप सब इस तरह की कला में दक्ष है, आप सबको रागररंजित चित्त की भाषा का अच्छा परिचय है । आप सब सुन्दर हैं, आकर्षक है । आप सब अपने कौशल में कुशल हैं।”
९. “आप अपने चातुर्य से उन ऋषि-मुनियों को भी जीत सकती हैं तो कामजित् माने जाते हैं । आप उन देवताओं को भी जीत सकती हैं, जिन्हें केवल दिव्य लोक की अप्सराएँ ही लुभा सकती हैं।"
१०. “अपनी कला, अपनी चतुराई, अपने आकर्षण से पुरुषों की तो बात ही क्या, आप स्त्रियों तक को मोह ले सकती हैं ।”

११. “अपने-अपने क्षेत्र में आप सब इतनी कुशल थी कि आप सबके लिये कुमार को कामरूपी रज्जु में बांधकर अपने वश में कर लेना किसी भी तरह कठीन नही हो सकता ।"
१२. "नवागत वधुओं को -- जिनकी आंखों पर लाज शर्म का पर्दा पड़ा रहता है -- तो यह शोभा देता है कि वे संकोच से काम लें । आप सबको नहीं ।"
१३. “निस्सन्देह यह वीर भी महान् है । लेकिन इससे तुम्हें क्या । स्त्री का बल भी तो महान् होता है । यही तुम्हारा दृढ़ संकल्प होना चाहिये ।"
१४. “पुराने समय में काशी की एक वेश्या ने एक ऋषि को पथ - भ्रष्ट कर दिया था और उसे अपने पैरों में लिटाया था।” १५. “और उस महान् ध्यानी प्रसिद्ध विश्वामित्र को घृताची नाम की अप्सरा ने दस वर्ष तक जंगल में बन्दी बनाकर रखा था ।”
१६. “इस प्रकार के अनेक ऋषि-मुनियों को स्त्रियाँ रास्ते पर ले आई हैं । इस कुमार ने तो अभी तारूण्य के प्रथम प्रहर में पैर ही रखा है। इसका तो कहना ही क्या ?"
१७. “जब यह ऐसा है तो तुम निधडक होकर प्रयास करो ताकि राज्य परिवार की परम्परा बनी रहे । "
१८. “सामान्य स्त्रियाँ सामान्य आदिमियों को वशीभूत करती हैं, किन्तु धन्य है वे जो असाधारण मनुष्यों को वशिभूत करती हैं ।"
१०. स्त्रियाँ राजकुमार को अपने वश मे न ला सकी ।
१. उदायी के ये शब्द स्त्रियों के हृदय को छू गये । उन्होंने कुमार को वशीभूत करने के लिये अपनी सारी शक्ति लगा देने का निश्चय किया ।
२. लेकिन अपनी थ्रू-भंगिमाओं, अपने अक्षि-कटाक्षों, अपनी मुस्कराहटों, अपने कोमल अंग-संचालनों के बावजूद उन षोडशियों को यह विश्वास न था कि उनका जादू कुमार पर चल सकेगा ।
३. लेकिन उदायी की प्रेरणा के कारण, कुमार के कोमल स्वभाव के कारण तथा सुरा और प्रेम-मद के कारण उनका आत्म-विश्वास शीघ्र ही स्थिर हो गया ।
४. तब स्त्रियाँ अपने काम में लग गई । कुमार की स्थिती वैसी ही थी जैसी हथिनी समूह से घिरे हुए हिमालय के जंगल मे विचरते हुए हस्ति राज की हो ।
५. उन स्त्रियों से घिरा हुआ वह राजकुमार ऐसे ही सुशोभित होता था जैसे सूर्य देवता अपने दिव्यभवन में अप्सराओं से घिरा हो ।
६. उनमें से कुछ ने रागातिरेक से उसे अपने छातियों से दबाया ।
७. कुछ दूसरियों ने लड़खड़ाने का बहाना बना उसे बड़ी जोर से अपनी छातियों से लगाया । उसके बाद उन्होंने अपने लताओं से कोमल करों को उसके कंधों पर ढीला छोड़ अपना भार भी उस पर डाल दिया ।
८. कुछ दूसरियो ने अपने सुरा-गंध, रक्तवर्ण होठों वाले मुख से उसके कान में फुसफुसाया -- मेरी रहस्यपूर्ण बातें सुनों ।
९. कुछ दूसरियो ने -- जिनके वस्त्र इतरों से भीगे थे -- उसे आज्ञा देने की तरह कहा --"हमारी पूजा यहाँ करो । ”
१०. दूसरी नीलाम्बरा सुरा से मत्त होने का बहाना बनाते हुए अपनी जीभ को बाहर करके खड़ी हो गई जैसे रात के समय बिजली कौंध रही हो ।
११. कुछ दूसरी घुंघरुओ का निनाद करती घूमती थी और अपने अर्ध- आच्छादित शरीर का प्रदर्शन भी कर रही थी ।
१२. कुछ दूसरी एक आम्र-शाखा को पकड़े खड़ी थी और अपनी कलश सदृश छातियों का प्रदर्शन कर रही थी ।
१३. कुछ किसी पद्म-सरोवर से आई थी हाथो में पद्म थे, आँखें भी पद्मों के ही समान थीं, वे पद्म-पाणि की तरह उस पद्य-पाणि की तरह उस पद्म-मुख राजकुमार के पास खड़ी थीं ।
१४. एक दूसरी ने उचित हाव-भाव के साथ एक गीत गाया ताकि वह संयत भी उत्तेजित हो सके । उसकी दृष्टि कह रही थी -- अरे ! तुम किस भ्रम में पड़े हो!
१५. दूसरी ने अपने प्रकाशपूर्ण चेहरे पर अपनी श्रूरुपी कमान को तानकर उसकी मुख-मुद्रा को नकल बनाई ।
१६. एक दुसरी जिसकी छाती पूरी उभारी थी और जिसके कानों की बालियाँ हवा में झूक रही थीं जोर हूंसी और बोली -- "यदि सके तो मुझे पकडे ।”
१७. कुछ दूसरियो ने उसे फल-मालाओं के बंधन में बाँधने की कोशिश की । कुछ दूसरियों ने उस पर मधुर किन्तु अंकुश के समान चुभने वाले शब्दों का प्रहार किया ।
१८. एक दूसरी ने उसे बुलाने के लिये, एक आम्र-वृक्ष की शाखा को हाथ में लेकर एक फूल दिखाया और प्रश्न किया -- “यह किसका फूल है ?"
१९. एक दूसरी ने आदमी की-सी चाल-ढाल बनाकर कहा - "हे स्त्री-जित, जा इस पृथ्वी को जीत ।”
२०. एक दूसरी ने एक नील पद्म की गंध लेते हुए और अपनी गोलगोल आँखे मटकाते हुए कुछ अस्पष्ट शब्दों में राजकुमार को सम्बोधित किया-
२१. “स्वामी! मधु-गन्धी पुष्पों से आच्छादित इस आम्र फल को देखें । स्वर्ण-पिंजर में बन्द की तरह कोकिल यहाँ गाती हैं ।”
२२. “यहाँ आयें और इस अशोक वृक्ष को देखें जो प्रेमियों का शोकवर्धक है और जहाँ मधु मक्खियाँ ऐसे गूञ्जार करती हैं मानों वे अग्निदग्ध हों।"
२३. “यहाँ आयें और आम्र लतिका लिपटे इस तिलक वृक्ष को देखें मानों कोई पीतवस्त्रधारिणी किसी श्वेत वस्त्र आच्छादीत ! पुरूष से लिपटी हो ।”
२४. "अंगुरी - रस की तरह प्रकाशमान् पुष्पित कुरवक वृक्ष को देखें जो कि इस प्रकार झुका हुआ है, मानों स्त्रियों के नखों की लाली से आहत हुआ हो!"
२५. “इस तरूण अशोक को आकर देखें, जिसकी नई-नई शाखायें चारों और फैली हुई हैं। ऐसा लगता है मानों यह हमारे हाथों के सौन्दर्य को देखकर ही लज्जा से गडा जाता हो ।”
२६. “इस झील को ही देंखे, जिसके तट पर सिन्दवार उगी है, मानों श्वेत वस्त्र पर एक सुन्दर रमणी लेटी हुई है ।”
२७. “स्त्री जाति की सामर्थ्य देखो । पानी में वह चकवी आगे-आगे जाती है और उसका पति पीछे-पीछे मानों वह उसका दास हो ।”
२८. "मत्त कोकिल का संगीत सुनो, और दुसरे का भी उसका अक्षरश: अनुकरण करते हुए ।”
२९. “अच्छा होता यदि वसन्त ऋतु में पक्षियों में पैदा होने वाले उन्माद का कुछ अंश आप में भी होता और यह अपने आपको सदा बुद्धिमान समझते रहने वाले पण्डितों के विचार न होते ।"
३०. इस प्रकार इन प्रेमासक्त स्त्रियों ने राजकुमार के विरूद्ध हर तरह की युद्ध-नीति बरती ।
३१. इतने आक्रमण किये जाने पर भी वह संयतेन्द्रिय न प्रसन्न हुआ, न मुस्कराया ।
३२. उनकी वास्तविक अवस्था से परिचय प्राप्त होने के कारण राजकुमार स्थिर एकाग्रचित्त से विचार करता रहा ।
३३. "इन स्त्रियों में किस बात की ऐसी कमी है कि ये इतना भी नहीं देख सकतीं कि यौवन चञ्चल है । वार्धक्य समस्त सौन्दर्य का नाश कर देगा ।"
३४. इस प्रकार यह बे-मेल मेल महीनों वर्षो चलता रहा । किन्तु इसका कुछ फल न हुआ ।