भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
६. बाह्य शुद्धि अपर्याप्त है
१. एक बार भगवान् बुद्ध श्रावस्ती मे विहार कर रहे थे । उस समय ब्राह्मण भी यही रहता था । वह पानी से शुद्धि मानने वाला था और पानी से शुद्धि की किया करता था । रात-दिन वह प्राय:स्तान करने मे ही लगा रहता ।
२. अब आनन्द महास्थविर चीवर धारण कर, अपना पात्र चीवर साथ ले श्रावस्ती में भिक्षाटन के लिये निकले । भिक्षाटन से लौटकर, भिक्षा ग्रहण कर चुकने पर, आनन्द महास्थविर तथागत के पास पहुंचे, अभिवादन किया और एक ओर बैठ गये । इस प्रकार बैठे हुए आनन्द महास्थविर ने कहा: --
३. ”भगवान!,श्रावस्ती में सट्टारव नाम का एक ब्राह्मण रहता है । वह पानी से शुद्धि में विश्वास रखता है और पानी से शुद्धि ही करता रहता है ।रात-दिन उसका अधिकाँश समय स्नान करने में ही खर्च होता है । भगवान्! यह अच्छा होगा यदि आप सट्टारव ब्राह्मण पर दया कर उससे भेंट करने चलें ।

४. तथागत ने मौन रहकर स्वीकार किया ।
५. दूसरे दिन प्रात:काल तथागत अपना चीवर पहन, पात्र - चीवर साथ ले सट्टारव ब्राह्मण के घर जा पहुँचे । वहाँ जाकर बिछे आसन पर बैठे ।
६. तब सट्टारव ब्राह्मण जहाँ तथागत थे, वहाँ आया और कुशल-क्षेम पूछ एक ओर बैठ गया ।
७. उस के बैठ जाने पर सट्टारव ब्राह्मण से तथागत ने पूछा:--"ब्राह्मण! जैसा लोग कहते है, क्या यह सच है कि तुम जलसे शुद्धि विश्वास रखते हो, पानी से शुद्धि ही करते रहते हो ? तुम्हारा रात-दिन का अधिकांश समय स्नान करने में ही खर्च होता है ।"
८. " श्रमण गौतम! यह सच हैं ।”
९. “ब्राह्मण! इस प्रकार रात-दिन स्नान आदि करते रहने मे ही तुम क्या लाभ देखते हो?
१०. ” श्रमण गौतम! यह इस तरह है कि दिन में मुझसे जो कुछ भी पाप कर्म होता है, मैं उसे उसी दिन शाम को धो डालता हूँ औ रात को मुझसे जो पाप-कर्म होता है । वह मैं प्रातः काल उठते ही स्नान करके धो डालता हूँ । इस प्रकार रात-दिन स्नान आदि करते रहने में मुझे यही लाभ दिखाई देता है ।
११. तब तथागत ने कहा--
१२. " धम्म ही वह जल स्रोत है, जो स्वच्छ है। जो निर्मल है ।
१३. “यहाँ जब शास्त्रों के ज्ञाता स्नान करने आते है, तो उनका प्रत्येक अंग शुद्ध हो जाता है तथा वे दूसरे तट पर चले जाते है ।
१४. तथागत के ऐसा कहने पर सट्टारव ब्राह्मण बोला--" श्रमण गौतम! यह अदभूत है । आज से जीवनपर्यत आप मुझे अपना शरणागत उपासक जाने" ।
७. पवित्र जीवन क्या है?
१. एक बार भगवान बुद्ध ने चारिका करते समय भिक्षुओं को निम्नलिखीत प्रवचन दिया: --
२. “भिक्षुओं! यह पवित्र जीवन न लोंगो को ठगने के लिये है, न उनसे कुछ प्राप्त करने के लिये है, न लाभ यश की प्राप्ति के लिये है, न शासार्थ करना सीखने के लिये है, न इसलिये है कि लोग जान जायें कि यह अमुक है । निश्चय से भिक्षुओं! इस पवित्र जीवन का अभ्यास किया जाता है । शरीर और वाणी को संयत रखने के लिये, आसों को दूर करने के लिये तथा चित्त की विमुक्ति और तृणा का क्षय प्राप्त करने के लिये ।"