भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४. युद्ध निषिद्ध है
१. ऐसा हुआ कि मगध-नरेश अजातशत्रु ने घुडसवार और पैदल सेना इकट्ठी कर कोशल- नरेश प्रसेनजित के राज्य के एक हिस्से काशी जनपद पर आक्रमण कर दिया ।'
२. दोनों लडे ।अजातशत्रु ने प्रसेनजित को हरा दिया । प्रसेनजित वापस श्रावस्ती चला गया ।

३. जो भिक्षु श्रावस्ती से भिक्षाटन कर लौट रहे थे, उन्होंने आकर भगवान् बुद्ध को लडाई का तथा प्रसेनजित के हार कर वापस लौट आने का समाचार कहा ।
४. “भिक्षुओं! मगध-नरेश अजातशत्रु अकुशल का पक्ष लेने वाला है । कोशल-नरेश प्रसेनजित कुशलधम्मी है । अभी प्रसेनजित राजा पराजित हो जाने के कारण दुखी रहेगा ।
५. “जय से वैर पैदा होता है । पराजित दुःखी रहता है । लेकिन जो उपशान्त है, जिसे जय-पराजय की चिन्ता नहीं, वह सुखपूर्वक सोता है ।"
६. फिर ऐसा हुआ कि वे दोनों राजा दूसरी बार युद्ध भूमी मे मिले । लेकिन इस बार कोशल-नरेश प्रसेनजित ने अजातशत्रु को दिया और जिवीत पकड लिया । तब प्रसेनजित ने सोचा: " यद्यपि अजातशत्रु ने--जिसे मैं कुछ हानि नहीं पहुचा रहा था, मुझे दिया है, तो भी वह मेरा भानजा है ।कैसा हो यदि मैं उसे जीता छोड़ दूँ, किन्तु उसकी सारी सेना, हाथी, घोडे, रथ और पैदल ले लूँ।” उसने वैसा ही किया ।
७. श्रावस्ती में भिक्षाटन करके लौटने पर भिक्षुओं ने आकर तथागत को यह समाचार सुनाया ।तब तथागत ने कहा--"एक आदमी दूसरे की यथेच्छ हानि कर सकता है, लेकिन जिसकी हानि होती है वह फिर दूसरे को हानि पहुंचाता ही है ।
८. . "जब तक पाप-कर्म फल देना आरम्भ नहीं करता तब तक मूर्ख आदमी आनन्द मना सकता है । लेकिन जब पाप - कर्म फल देता है, तब मूर्ख आदमी दुःखी होता है ।
९. “हत्यारे को हत्यारा मिलता है, जो दूसरों को लडाई में हराते हैं उन्हें हराने वाले मिल जाते हैं, जो दूसरो गाली देता है, उसे गाली देने वाले मिल जाते हैं।
१०. “इस प्रकार कर्म के विकास के फलस्वरुप जो आदमी दूसरे को कष्ट देता है, वह कष्ट पाता है ।
५ युद्ध - विजेता के कर्तव्य
१. जब योधा युद्ध - विजयी हो जाता है तो सामान्य तौर पर वह अपना अधिकार समझता है कि यदि वह पराजित को अपना दास बनाकर न रखें तो उसे कम से कम जलील तो खूब करे । भगवान् बुद्ध का इस विषय में सर्वथा भिव दृष्टिकोण था । वे समझते थे यदि,शान्ति' का कुछ भीं अर्थ है तो उसका यही अर्थ होना चाहिये कि विजेता अपनी, विजय से विजित की सेवा करे । इस बारे में उन्होंने भिक्षुओं को कहा:-
२. “शान्ति स्थापित हो जाने पर (युद्ध) कुशल आदमी के लिये आवश्यक है कि वह योग्य सिद्ध हो, सीधा-स - सरल सिद्ध हो, मृदुभाषी हो, कोमलस्वभाव हो, अभिमानी न हो, सन्तुष्ट रहने वाला हो, सुभर (-जिसते। भार का अनुभव न हो) हो, अत्यकृत्य, हलकी- फुलकी वृत्ति वाला, इन्द्रिय-विजयी हो, बुद्धिमान हो, अप्रगत्म हो, योग्य व्यवहार करने वाला हो तथा कभी छोटे से छोटा भी कोई ऐसा खराब काम न करे जिसकी पण्डित लोग निन्दा कर सकें ।
३. “सभी प्राणि सुखी रहे, सभी का कत्याण हो--सबल हों वा दुर्बल हों, बडे हों या छोटे हों, दृश्य हो वा अदृश्य हों, पास रहने वाले हों वा दूर रहने वाले हों, उत्पन्न हो चुके हों वा उत्पन्न होने वाले हों - सभी प्राणि शान्त रहें ।
४. “कोई एक दूसरे का अपमान न करे, क्रोध या घृणा के वशीभूत होकर कोई किसी का बुरा न चाहे ।
५. "जिस प्रकार माता अपने प्राण देकर भी अपने इकलौते बच्चे से प्यार करती है वैसी ही भावना सभी प्राणियों के प्रति रखे । ऊपर,नीचे, चारों ओर असीम मैत्री भावना रखें -- जिसमें घुणा का लव -लेश न हो, शत्रुता का लव -लेश न हो ।
६. ” खडे होते समय, चलते समय, बैठे रहते समय, लेटे रहते समय यही, भावना रखें यही ब्रह्म विहार, कहलाती है ।"