भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
८. सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर प्रवचन
१. राजाओं की कृपा के भरोसे मत रहो
१. एक बार भगवान् बुद्ध राजगृह में वेकुवनाराम में कलन्दक-निवाप मे ठहरे हुए थे ।
२. उस समय राजकुमार अजातशत्रु देवदत्त का सहायक बना हुआ था, जो भगवान् बुद्ध का विरोधी बन गया था ।

३. वह पांच सौ गाडियों में भोजन भरे पांच सौ बर्तन लाद कर देवदत्त के समर्थकों तक सुबह-शाम पहुंचाता था ।
४. तब कुछ भिक्षु तथागत के पास आये, अभिवादन किया और एक ओर बैठ गये । एक ओर बैठे हुए भिक्षुओं ने ये सभी बातें तथागत को सुनाई ।
५. तब तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित करके कहा- 'भिक्षु ओं! राजाओं से लाभ-सत्कार की, खुशामद की इच्छा न करो । जब तक भिक्षुओं! अजातशत्रु पांच सौ गाडियों में, भोजन भरें पांच सौ बर्तन लाद कर देवदत्त के समर्थकों तक सुबह-शाम पहुंचाता है, तब तक इस में देवदत्त की हानि ही हैं, लाभ नहीं है ।
६. भिक्षुओं! यदि कोई किसी पागल कुत्ते की नाक तक किसी की कलेजी ले जाता है तो वह उस कुत्ते को और भी अधिक पागल ही बनायेगी, इसी प्रकार जब तक भिक्षुओं! अजातशत्रु पाचसौ गाडियों में भोजन भरे पाँच सौ बर्तन लाद कर देवदत्त के समर्थकों तक सुबह-शाम पहुचाता है, तब तक इसमें देवदत्त की हानि ही है, लाभ नहीं भिक्षुओं! राजाओं से मिलने वाले लाभ-सत्कार-खुशामद और भेंट आदि इतने भयानक होते है ।
७. "वे शान्ति प्राप्ति के मार्ग की बडी ही कटु, दुखद बाधायें है ।
८. ' इसलिये भिक्षुओं! ऐसा अभ्यास डालना चाहिये कि जब हमे राजाओं से लाभ-सत्कार खुशामद और भेंटे आदि मिलेगी, हम उन्हें अस्वीकार करेंगे और जब वह सिर पर आ ही पडे तो वह हमें जकड नही पायेंगी, हमारे हृदय में उनका कोई स्थान नहीं होगा और वे हमें राजकुमारों का गुलाम नहीं बना सकेंगी ।”
२ राजा धाम्मिक होगा, तो प्रजा भी धाम्मिक होगा
१. एक बार भगवान् बुद्ध ने भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए कहा--
२. “भिक्षुओं! ऐसे समय जब राजा अधाम्मिक हो जाते हैं तो उनके मन्त्री - गण और अफसर भी अधाम्मिक हो जाते है । जब मंत्री- गण और अफसर अधाम्मिक हो जाते है । तो ब्राहाण और गृहपति भी अधाम्मिक हो जाते है । जब ब्राह्मण और गृहपति अधामिक जाते है, तो नगरों के नागरिक और ग्रामों के ग्रामीण भी अधाम्मिक हो जाते हैं ।
३. “लेकिन भिक्षुओं! ऐसे समय जब राजा धाम्मिक होते है तो उनके मन्त्रीगण और अफसर भी धाम्मिक होते रहते है, जब मन्त्री गण और अफसर धाम्मिक रहते है तो ब्राह्मण और गृहपति भी धाम्मिक हो जाते है । जब ब्राह्मण गृहपति धाम्मिक रहते है, तो नगरों के नागरिक और ग्रामों के ग्रामीण भी धाम्मिक हो जाते है ।
४. “जब गौवें नदी पार करती होती है, तब यदि बूढा बैल गलत रास्ते पर जाता है तो उसका अनुकरण करती हुई वे सभी गलत पथ का अनुकरण करती है ।इस प्रकार आदमियों में जो मुखिया होता है यदि वह कुमार्गी बनता है तो दूसरे भी कुमार्गी बनते है ।
५. "इसी प्रकार जब राजा पथभ्रष्ट होता है, तो समस्त राज्य दुःखी होता है । जब गौवें नदी पार करती है, तब यदि वृषभ सीधा जाता है, तो सभी गौवें भी उसका अनुकरण कर सीधी जाती है । इस प्रकार आदमियों में जो मुखिया होता है यदि वह सन्मार्गी होता है तो दूसरे भी सन्मार्गी होते है ।जब राजा धाम्मिक होता है तो सारा राज्य सुखी रहता है ।”
३ राजनैतिक तथा सामारिक ( सैनिक) शक्ति सामाजिक व्यवस्था पर निर्भर करती है।
१. एक समय भगवान् बुद्ध राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर ठहरे थे ।
२. उस समय मगध-नरेश, वैदेही- पुत्र अजातशत्रु वज्जियों पर आक्रमण करना चाहता था । उसने अपने मन में कहा - "चाहे ये कितने ही शक्तिशाली क्यों न हो, मैं इन वज्जियों की जड़ खोद डालूंगा, मैं इन वज्जियों को नष्ट कर डालूंगा, मैं इन वज्जियों का सर्वथा विनाश कर डालूंगा ।”
३. तब उसने मगध के प्रधान मन्त्री वर्षकार ब्राह्मण को बुलाया और कहा --
४. “ब्राह्मण! तुम आओं और भगवान् बुद्ध के पास जाओ मेरी ओर से उनके चरणों में नमस्कार करो, तब उनका कुशल- समाचार पूछो कि वे निरोग और स्वस्थ हैं या नही ?
५. “और तब उनसे कहो कि मगध नरेश वैदेही- पुत्र अजातशत्रु वज्जियों पर आक्रमण करना चाहता है । उसका कहना है कि चाहे वे कितने ही शक्तिशाली हो, वह उनकी जड उखाड़ देगा, वह उनको नष्ट कर डालेगा, वह उनका सर्वथा विनाश कर देगा ।
६. “ऐसा कहने पर जो कुछ तथागत कहें उसे ध्यानपूर्वक सुनना और आकर मुझे बताना । क्योंकि बुद्धों का कथन कभी अन्यथा नहीं होता ।”
७. तब वर्षकार ब्राह्मण ने राजा के वचनों को सुना और कहा - "जैसा आप चाहते है, वैसा होगा ।" और बहुत से सुन्दर- सुन्दर रथ जुतवाकर वह गृध्रकूट पर्वत पर पहुंचा ।
८. तब वहां पहुंच कर वर्षकार ब्राह्मण ने तथागत को अभिवादन किया, उनका कुशल- समाचार पूछा और राजा की आज्ञा के अनुसार मगध नरेश का संदेश तथागत के सामने निवेदन कर दिया ।
९. उस समय आनन्द स्थविर तथागत के पास खड़े थे । तथागत ने आनन्द को सम्बोधित करते। पूछा : --"आनन्द! क्या तुमने सुना है कि वज्जिगण के लोग प्राय: अपनी सार्वजनिक समितियों की बैठक करते रहते हैं ?
१०. आनन्द स्थविर ने उत्तर दिया--"हाँ भगवान! मैंने ऐसा सुना है"
११. तथागत ने कहा-”आनन्द ! जब तक वज्जी अपनी सार्वजनिक समितियों की बैठके करते रहेंगे, तब तक वज्जियों की वृद्धि ही होती रहेगी, उनका हास नहीं होगा ।
१२. “आनन्द! जब तक वज्जी मिल-जुलकर बैठेंगे, मिल-जुलकर उठेंगे और मिल-जुलकर अपने निश्चयों को कार्यरुप में परिणत करेंगे तब तक ........ होगा ।
१३. “आनन्द! जब तक वह बिना नियम बनाये कोई कार्रवाई नहीं करेंगे, जो नियम बन चुका है उसका उल्लंघन नहीं करेंगे, और पुराने, समय से चली आई वज्जियों परमरा के अनुसार कार्य करेंगे तब तक... . होगा ।
१४. “जब तक वे अपने ज्येष्ठ वज्जियों का आदर-सत्कार करते रहेंगे उनकी आवश्यकतायें पूरी करते रहेंगे और उनकी बातों को महत्व देते रहेंगे : तब तक..... . होगा ।
१५. “जब तक वे किसी वज्जी लडकी या स्त्री को जबरदस्ती अपने यहाँ लाकर नहीं रखेंगे तब तक...... होगा ।
१६. "जब तक वज्जीगण के लोक धम्म का पालन ऊरते रहेंगे तब तक. ....... होगा ।
१७. "जब तक वे ये बातें करते रहेंगे तब तक वज्जियों की वृद्धि ही होती रहेगी, उनका हास नहीं होगा, और कोई उनका नाश नही कर सकता ।"
१८. थोडे शब्दों में भगवान् बुद्ध ने कहा कि जब तक वज्ज्ञीगण प्रजातन्त्र में विश्वास करते हैं और प्रजातन्त्रात्मक ढंग से रहते हैं तब तक उनके गणराज्य को कोई खतरा नहीं ।
१९. तब तथागत ने वर्षाकार को सम्बोधित किया--
२०. "हे ब्राह्मण! जब मै वैशाली में ठहरा हुआ था, तब मैंने वज्जीयो को ये बातें सिखाई थीं ।"
२१. ब्राह्मण बोला--"तो हम वज्जीयो की उन्नती की ही आशा कर सकते है, अवनति की नहीं । हे गौतम! मगध नरेश वज्जीयों को नहीं जीत सकता ।” २२. इस प्रकार वर्षकार ब्राह्मण ने तथागत के वचन सुने, वह अपने आसन से उठा और राजगृह वापस लौट कर उसने मगध नरेश को वह सब कह सुनाया जो उसने तथागत से सुना था ।