भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४. आदमी का भोजन उसे पवित्र नही बनाता
१. एक ब्राह्मण भगवान् बुद्ध के पास आया और उसने प्रश्न उठाया कि भोजन का आदमी के चरित्र पर प्रभाव पडता है या नहीं?
२. " ब्राह्मण बोला! जौ, गिरि, दाल, फलियाँ, कोपले -- इस तरह का भोजन यदि ठीक से मिले तो सदाचरण का सहायक होता है ।' मुर्दार - माँस, का खाना खराब है ।”

३. ”भगवान्! यद्यपि आप कहते है कि आप, मुर्दार - मास, नहीं खाते, लेकिन आप पक्षियों के मांस का बना हुआ एक से एक बढिया भोजन कर लेते है -- मैं आप से पूछता हूँ कि, मुर्दा - मांस, किसे कहा जाता है?"
४. तथागत ने उत्तर दिया -- "किसी प्राणी की हत्या करना, किसी का अंग छेद करना, मारना पीटना - बध - बंधन, चोरी, झूठ बोलना, ठगी, उल्ला, व्यभिचार - ये सब, मुर्दार - मांस, है, माँस भोजन नहीं ।
५. ”काम -भोगों के पीछे पडे रहना, पेटू - पन, अपवित्र जीवन, तैर विरोध -- वे सब मुर्दार-मांस है, मांस - भोजन नहीं है ।
६. “चुगल -खोरी, निर्दयता, विश्वास -घात, अत्यन्त - अभीमान तथा कमीना - कंजूसपन -- ये सब मुर्दार - मांस हैं, मांस भोजन नहीं।
७. क्रोध, मान, विद्रोह, चालाकी, ईर्ष्या, उबाल, अहंकार, कुसंगति ये सब मुदरि - मांस है, मांस भोजन नहीं ।
८. नीच - जीवन, किसी को झूट - मूठ बदनाम करना, धोखा देना, वंचक होना, धोखा धडी, बदनामी -- ये सब मुर्दार - मांस है, मांस - भोजन नहीं।
९. ये हत्या करने तथा चोरी करने का व्यसन - ये अपराध-ये खतरों से भरे हैं, ये नरक के द्वार हैं- ये सब मुर्दार-मांस है, मांस भोजन नहीं ।
१०. जो आदमी शक्की है, उसके शक्क को न मत्सय मास से विरत रहना दूर कर सकता है, न नग्न रहना, न जटायें, न मुण्डन, न (मृग--) छाल, न अग्निपूजा, न भावी सुख प्राप्ति के उद्देश्य से की गई कठोर तपस्या, न जल द्वारा सफाई, न यज्ञ-हवन और न कोई दूसरी ऐसी ही संस्कार-क्रिया ।
११. अपनी इन्द्रियों को संयत रखो, अपने ऊपर काबू रखो, सत्य का आग्रह रखो और दयावान बनो । जो शान्त-पुरुष सब बन्धनों को तोड़ देता है और सब दुःखो को जीत लेता है, वह फिर देखते-सुनते रहने के बावजूद (अनासक्त) रहने के बावजूद (अनसक्त रहने के कारण) निर्मल रहता है।
१२. तथागत से इस ऊंचे, त्राण करने वाले धम्म की देशना सुन --- - जिसमें, मुर्दार- मास की निन्दा की गई थी, और जो दुःख का क्षय करने वाली थी--ब्राह्मण ने वंदना की और तब्धण प्रव्रज्या की याचना की ।
५. भोजन नहीं ? पवित्र कर्मों का महत्व है
१. आमगन्ध नाम का एक ब्राह्मण तपस्वी अपने शिष्यों के साथ हिमालय में रहता था ।
२. वे मत्स - मौंस नही खाते थे । प्रति वर्ष वे नमक- खटाई खाने के लिये अपने आश्रम से नीचे उतर कर बस्ती मैं आते हैं । गांव के लोग उनका बड़ा स्वागत करते और चार महीने तक लगातार उनका आतिथ्य करते थे ।
३. तब भिक्षु-सैंघ सहित भगवान बुद्ध भी वहीं आये । लोगो ने तथागत का धम्मोपदेश सुना तो उनके श्रावक बन गये ।
४. सदा की भाँति तपस्वी, आमगन्ध और उसके शिष्य भी उस गाँव में आये, लेकिन लोंगों ने उसी उत्साह से, उनका स्वागत नहीं किया ।
५. आमगन्ध को यह जान कर निराशा हुई कि तथागत ने मत्स-माँस के भोजन का निषेध नहीं किया । इस बारे में यथार्थ जानकारी प्राप्त करने के लिये वह श्रावस्ती के जेतवन विहार पहुंचा, जहाँ तथागत ठहरे हुए थे । वह बोला :--
६. “जौ, फलियां और फल, खाने लायक पत्ते और जडे, किसी भी लता पर लगने वाली सब्जी - इन चीजों को न्यायतः प्राप्त कर जो भी कोई खाने वाला खाता है, वह सुख भोग के लिये झूठ नहीं बोलता ।
७. “आप दूसरों के दिये हुए दूसरों के द्वारा तैयार किये गये बढिया बढिया सामिष भोजन ग्रहण करते है । जो इस प्रकार का चावल (-माँस) का पुलाव खाता है, वह आम-गंध खाता है । आप पक्षी के माँस के पका हुआ बढिया चावल खाते है और कहते है कि मुझ पर, आम-गँध' का दोष लागू नहीं होता !
८. “मैं आपसे इस का अर्थ जानना चाहता हूँ । यह आपका, आम-गन्ध, किस तरह का है?"
१. तथागत ने उत्तर दिया : --' जीव हिंसा करना, पीटना, काटना, बाधना, चुराना, अनुपयोगी जानकारी तथा झूठ बोलना, ठगना, वंचना करना, व्यभिचार--यह आम - गन्ध है, माँस का खाना नही,
१०. “इन्द्रिय-विषयों में असंयत होना, मधुर वस्तुओं के प्रति लोभी होना, अपवित्र कार्यों से सम्बन्धित होना, मिथ्या-दृष्टि होना, सीधा -सरल न होना, अननुकरणीय होना - यह आम-गन्ध है, माँस का खाना नहीं ।
११. “कटु होना, कठोर होना, चुगल खोर होना, विश्वासघाती होना, निर्दयी होना, अहंकारी होना, अनुदार होना तथा किसी को कुछ भी देने वाला न होना-यह आम गन्ध है, माँस का खाना नही ।
१२. “क्रोध, अभिमान, उजहुपन, विरोधी भाव, ठगी, ईर्ष्या, शेखी मारना, अधिक अहंकार, कुसंगति--यह आम-गन्ध है, माँस का खाना नही ।
१३. दुश्शीलता, लिये कर्ज का न देना, झूठा अपयश फैलाना, दूसरे का वंचक होना, बहानेबाज होना- इस संसार में निकृष्टतम लोगों का इस प्रकार के कुकर्म करना --यह आम-गन्ध है, मांस भौजन नहीं ।
१४. “प्राणियों (की जान लेने) के विषय में असंयत होना, दूसरों को कष्ट पहुँचाने पर तुला होना, दूसरो की वस्तुएँ छीन लेना होना, दुश्शील होना, निर्दयी, कठोर होना तथा आदर की भावनारहित होना -- यह आम-गन्ध है; मांस भोजन नहीं ।
१५. “लो भ या द्वेष से प्राणियों पर आक्रमण करना तथा सदैव कुकर्म करने के लिये उद्यत रहना--मरणान्तर आदमियो को अन्धकार से ले जाकर नरक मे पहुँचा देता है-- यह आम गन्ध है, माँस भोजन नही,
१६. “न मत्स-मांस से विरत रहने से, न नंगे रहने से, न सिर मुडाने से, न जटाये रखने से, न भभूत रमाने से, न मृग -छाल धारण करने से, न अग्नि-पूजा करने से, न अमृत -प्राप्ति के निमित्त तमाम तरह की तपस्याये करने से, न मन्त्र जाप से, न बलि चढाने से और ऋतु के अनुसार भिख यज्ञ आदि करने से ही वह आदमी शुद्ध हो सकता है, जिसके सन्देह दूर नहीं हुए ।
१७. जो संयतेन्द्रिय है, जो धम्म में स्थित है, जिसे शीलपालन में आनन्द को अनुभव होता है जिसने आसक्ति को त्याग दिया है। और दुःख का क्षय कर चुका है, वह आदमी देखे सुने के साथ आसक्त नहीं होता ।
१८. यह अकुशल कर्म ही है, जो आमगन्ध है, मास - भोजन नहीं ।