मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 84 of 132
16 जून 2023
Book
12,14,5,7,1,,

विभाग ५ - सद्धम्म सम्बन्धी प्रवचन

१. सम्यक दृष्टि का पहला स्थान क्यों है?

१. आर्य अष्टांगिक मार्ग में सम्यक् - दृष्टि श्रेष्ठतम है ।

Buddha pravachan - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

२. सम्यक दृष्टि श्रेष्ठ जीवन की प्रत्येक बात की भूमिका है, चाबी है ।

३. और सम्यक्-दृष्टि का न होना सभी बुराईयो की जड़ है ।

४. सम्यक्-दृष्टि के विकास के लिये आवश्यक है कि आदमी जीवन की प्रत्येक घटना को प्रतीत्य समुत्पन्न जाने । सम्यक दृष्टि का मतलब ही है प्रतीत्य समुत्पाद के नियम को जान लेना ।

५. “भिक्षुओं ! जो कोई भी व्यक्ति मिथ्या दृष्टि रखता है, मिथ्या सकल्प रखता है, मिथ्या वाणी रखता है मिथ्या-कर्मान्त रखता है, मिथ्या-जीविका रखता है, मिथ्या प्रयास करता है, मिथ्या स्मृति तथा मिथ्या-समाधि रखता है, जिस का ज्ञान और विमुक्ति मिथ्या रहती है, उसका हर कार्य, उसका हर वचन, उसका हर विचार, उसकी हर चेतना, उसकी हर आकांक्षा, उसका हर निश्चय, उसकी हर प्रक्रिया--ये सभी चीजे उसे ऐसी स्थिति की ओर ले जाती है जो कि अरुचिकर होती है, अप्रतीकार होती है बुरी लगती है. अलाभ प्रद होती है तथा दुःखद होती है । ऐसा क्यों ? मिथ्या दृष्टि के कारण ।

६. "ठीक आचरण ही पर्याप्त नहीं है । एक छोटा बालक ठीक आचरण कर सकता है, लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि उसे इसका ज्ञान है कि उसका आचरण ठीक है । ठीक आचरण के लिये ठीक आचरण का ज्ञान आवश्यक है।

७. "आनन्द! यथार्थ भिक्षु किसे कहते है ? यथार्थ भिक्षु उसे ही कहते है जो बुद्धिपूर्वक संभव और असंभव के भेद को समझ लेता है।”