भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४ सदाचरण में पूर्णता कैसे प्राप्त की जाय ?
१. एक बार जब भगवान बुद्ध श्रावस्ती में जेतवनाराम में विराजमान थे, उनके पास पाँच सौ उपासक आये । उनमें से एक का नाम, धाम्मिक' था ।२. धाम्मिक ने तथागत से पूछा--"आपके श्रावक सदाचरण में पूर्णता कैसे प्राप्त करते है ?
३. “मैं आपसे यह प्रश्न इसलिये पूछता हूँ क्योंकि आप मानव-कल्याण के अनुपम शास्ता है ।

४. “समर्थ तैर्थिक और परिव्राजक आप से पार नहीं पा सके । आयु प्राप्त वृद्ध ब्राह्मण और दूसरे भी शास्तार्थ-प्रिय लोग आपके अनुयायी बन जाते है । आप के द्वारा उपदिष्ट सत्य बडा सुक्ष्म है, किन्तु बडा सु-आख्यात है । सब लोग इसके लिये तरसते है । भगवान् ! कृपा करके हमें इस प्रश्न का उत्तर दें ।
५. ”भगवान! हम उपासकों को आपका परिशुद्ध धर्म श्रवण करना मिले ।
६. तथागत ने उन (वृतो) उपासको पर दया करके कहा : --- 'ध्यान दो । मैं तुम्हें शुद्धाचरण के नियम कहता हूँ । सुनो और तदनुसार आचरण करो ।”
७. “जान से मारो नहीं, हत्या न करो, हत्या का अनुमोदन न करो । सबल या दुर्बल कैसा भी प्राणी हो--उसकी हिंसा न करो ।
८. “कोई उपासक जानबूझ कर चोरी न करे, न चोरी कराये और न चोरी का अनुमोदन करे--दूसरे जो दे वही ले ।
९.. “अब्रह्मचर्य को आग के गढे के समान समझें । अब्रह्मचारी बनकर विवाहिता स्त्री से भी संसर्ग न करे ।
१०. “निजी परिषद में, अदालत में या बात-चीत में झूठ न बोले, न वह किसी को झूठ बोलने को प्रेरित करे और न उसका समर्थन करे । उसे चाहिये कि वह असत्य का त्याग कर दे ।
११. “उपासक को चाहिये कि इस नियम को माने, नशीले पदार्थों को ग्रहण न करें । किसी को पान न कराये । किसी के पान करने का अनुमोदन न करे । देखें कि शराब आदमी को कैसा पागल बना देती है ।
१२. शराब के नशे में उपासक पाप कर बैठते है तथा दूसरे प्रमादी उपासको को पाप में प्रवृत्त करते है । इस लिये इस पागल बनाने वाले व्यसन का इस मूर्खता का, इस "मूर्खो के स्वर्ग" का परित्याग करे ।
१३. “प्राणी-हिंसा न करे, चोरी न करे, झूठ न बोले, नशीले पेय पदार्थो से दूर रहे, अब्रह्मचर्य से विरत रहे तथा रात को विका भोजन न करे ।
१४. “सुगन्धियो तथा पुष्य-मालाओ आदि का त्याग करे तथा ऊँची-बडी शैध्या पर न सोये--इस प्रकार सभी उपोसथ दिनों में यह व्रत ग्रहण करे, और पवित्र मन से इस अष्टागिक व्रत का पालन करे ।
१५. “प्रात :काल इन व्रतों को ग्रहन करे और शुद्ध, श्रद्धायुक्त चित्त से भिक्षुओं को यथा सामर्थ्य भोजन तथा पेय पदार्थों का दान करे ।
१६. "माता-पिता की सेवा करे । धार्मीक धन्धा करे । इस प्रकार दृढ श्रद्धावान उपासक ऊंचे पद को प्राप्त करता है ।"
५. सन्मार्ग पर चलने के लिये साथी की प्रतीक्षा अनावश्यक
१. जिस प्रकार हाथी, युद्ध में बाण से गिरे हुए तीरो को सहन करता है, उसी प्रकार मुझे दुर्वचनो को सहन करना चाहिये, क्योंकि सँसार में दुष्टों के दुश्शीलो की कमी नहीं ।
२. जो हाथी शान्त-दान्त होता है, उसी को युद्ध में ले जाया जाता है, जो हाथी शान्त-दान्त है उसी पर राजा चढता है, इसलिये प्राणियों में वह शान्त-दान्त व्यक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है जिसे कोई कटु वचन विचलित नहीं करता ।
३. शिक्षित खच्चर अच्छा होता है, सिन्तु का शिक्षित श्रेष्ठ अश्व अच्छा होता है, शिक्षित बल-सम्पज्ञ हाथी अच्छा होता है, आदमियों मेँ आत्म-सयंत सबसे अच्छा होता है ।
४. "ऐसे श्रेष्ठ वाहन भी हमें निर्वाण पथ पर आगे नहीं ले जा सकते । हम स्वयं आत्म-निर्भर, आत्म- संयत होकर ही निर्वाण पथ पर अग्रसर हो सकते हैं ।
५. “अप्रमाद में आनन्द मनाओ । स्मृति - समजन्य युक्त रहो । कभी प्रमाद मत करो ।अपने आप कों कुपथ से हटाकर सुपथ पर लाओ, हाथी को दलदल में से निकालो ।
६. यदि तुम्हें कोई एक श्रेष्ठ, बुद्धिमान, दृढ साथी मिला है तो सब चिन्ताओं को छोड़कर उसके साथ प्रसत्रतापूर्वक विवरण करो ।
७. यदि तुम्हें कोई श्रेष्ठ, बुद्धिमान साथी नहीं मिला है, तो जिस प्रकार राजा अपने विजित प्रदेश को छोडकर जंगल में अकेले विचरण वाले हाथी की तरह अकेला चल देता है, उसी प्रकार अकेले ही विचरण करो ।
८. अकेला रहना अच्छा है । मूर्खो का साथ हो ही नहीं सकता । अकेला रहे । कोई पाप कर्म न करे । अत्येच्छ रहे । एकान्त में रहे-- जैसे जंगल में बल सम्पन हाथी ।
९. तमाम अकुशल चेतनाओं का त्याग करे ।
१०. अकुशल-चेतनाओं से मुक्ति-लाभ करने की विधि यह है : --
११ तुम्हें यह संकल्प करना होगा कि चाहे दूसरे लोग हानि करने वाले हों, तुम्हें किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना होगा ।
१२. चाहे दूसरे हिंसक हो, तुम हिंसा कभी नहीं करोगे ।
१३. चाहे दूसरे चोरी करे, तुम नहीं करोगे ।
१४. चाहे दूसरे पवित्र जीवन व्यतीत न करें, तुम करोगे ।
१५. चाहे दूसरे किसी की निन्दा करे, विराद्ध बोले, व्यर्थ बोलें, तुम नहीं बोलोगे ।
१६. चाहे दूसरे लोभ-लालच करें, तुम नहीं करोगे ।
१७ चाहे दूसरे द्वेषी हो, तुम द्वेष नहीं करोगे ।
१८. चाहे दूसरे मिथ्या-दृष्टि हो, तुम नहीं होगे । चाहे दूसरों के मिथ्या संकल्प हों, तुम सम्यक् संकल्प वालें रहोगे । चाहे दूसरों की मिथ्या-वाणी चाहे हो, तुम अपनी वाणी सम्यक् रखोगे । चाहे दुसरों के कर्म मिथ्या हों, तुम अपने कर्म सम्यक रखोगे । चाहे दूसरों के जीविका के साधन मिथ्या हों, तुम अपनी जीविका के साधन सम्यक् रखोगे । चाहे दूसरों का प्रयास (साधना) असम्यक् हो, तुम अपना प्रयास सम्यक् करोगे । चाहे दूसरों की स्मृति और समाधि असम्यक् हो, तुम अपनी स्मृति और समाधि सम्यक् रखोगे ।
१९. चाहे दूसरे (आर्य) सत्यों और मुक्ति के बारे में गलत हों, तुम सत्यों और मुक्ति के (पथ के) बारे में ठीक होंगे ।
२०. चाहे दुसरे आलस्य और तन्द्रा से युक्त हों, तुम आलस्य और तंद्रा से मुक्त रहोगे ।
२१. चाहे दूसरे अभिमानी हों, तुम विनम्र रहोगे ।
२२. चाहे दूसरे विचिकित्सा युक्त हों, तुम विचिकित्सा--मुक्त रहोगे ।
२३. चाहे दूसरे क्रोधी हो, दुष्ट हो, इर्ष्यालु हो, कंजूस हों, लोभी हों, ढोंगी हों, ठग हो, वंचक हों, उद्धत हों, दुस्साहसी हों, किसी नीति के मानने वाले न हों, अशिक्षित हो, जड हों, भृमित हों, तथा अज्ञ हो--तुम नहीं होंगे, अर्थात तुम इन सब के विराद्ध होंगे।