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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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विभाग - २ सुचरित्र बने रहने के लिये प्रवचन

१ आदमी का पतन कैसे होता है?

१. एक बार भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे ।

२. अब जब रात काफी बीत चुकी थी, तो एक देवता, जिसके प्रकाश से सारे जेतवन को प्रकाशित कर दिया था, तथागत के पास आया, और पास आकर श्रद्धा-पर्वक्र अभिवादन किया और एक ओर खड़ा हो गया । इस प्रकार खडे होकर उसने तथागत से निवेदन किया--

sucharita Bane Rahne ke liye pravachan - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. “तथागत! मैं आपकी सेवा में प्रश्न पूछने के लिये उपस्थित हुआ हूँ । कृपया बताएँ कि आदमी का पतन कैसे होता है ।” भगवान् बुद्ध ने आदमी के पतन के कारणों का वर्णन करना स्वीकार किया--

४. “उन्नतिशील आदमी के लक्षण भी आसान है ओर पतनोन्मुख आदमी के लक्षण भी आसान है । जो धम्म से प्रेम करता है व उन्नत होता है जो धम्म से घृणा करता है, उसका पतन होता है ।

५. “असत्पुरुष उसे अच्छे लगते है, सत्पुरुष उसे अच्छे नहीं लगते, असत्पुरुषों का धर्म अच्छा लगता है--यह पतनोन्मुख आदमी का दूसरा लक्षण है ।

६. वह तन्द्रालू होता है, उसे बडबड करना अच्छा लगता है, वह परिश्रमी नही होता, सुस्त होता है और क्रोधी होता है -- यह पतनोन्मुख का तीसरा लक्षण है ।

७. जो पास में पैसा रखकर भी अपने गत-यौवन वृद्ध माता- -पिता का पालन-पोषण नहीं करता -- यह पतनोन्मुख का चौथा लक्षण है ।

८. "जो झूठ बोलकर किसी भले आदमी को, किसी श्रमण को वा किसी अन्य साधु को ठगता है--यह का पाचवा लक्षण है। १. जो आदमी बहुत सम्पति रखता है, पास बहुत धन-धान्य है; लेकिन जो उसे अकेला ही भोगता है--यह पतनोन्मुख का छठा लक्षण है ।

१०. “जिस आदमी को अपने जन्म का, धन का वा जाति का अभिमान हैं और अपने सम्बन्धियों से ही दूरदूर रहता है-यह पतनोन्मुख आदमी का सातवां लक्षण है ।

११. "जो आदमी व्यभिचारी है, शराबी है, जुआरी है और जो कुछ पास है उसे ऐशे आराम में लुटाता है--यह पतनोन्मुख आदमी का आठवा लक्षण है ।

१२. “जो अपनी पत्नी से ही सन्तुष्ट न रहकर, वेश्याओं तथा पर स्त्रियों के पास जाता है- यह पतनोन्मुख आदमी का नौंवा लक्षण है । १३. “जब वृद्ध व्यक्ति नव युवती को घर ले आता है, तो उसकी ईर्ष्या के कारण वह सुखपूर्वक नहीं सोता है । यह पतनोन्मुख आदमी का दसवां लक्षण है ।

१४. “जो आदमी किसी असंयत फजूल खर्च आदमी वा स्त्रियों को अधिकारी बना देता है-- यह पतनोन्मुख आदमी का ग्यारहवाँ लक्षण है।

१५. “जो क्षत्रिय, अल्प साधन रखते हुए किन्तु बडी महत्वाकांक्षा होने के कारण राजा बनने की आकांक्षा रखता है -- यह पतनोन्मुख आदमी का बारहवीं लक्षण है ।

१६. "हे देव! पतन के इन कारणों को जान ले । यदि तू इनसे बचा रहेगा तो तू सुरक्षित रहेगा ।"

 

२. बुरा आदमी

१. चारिका करते समय भगवान् बुद्ध ने उन भिक्षुओं को जो साथ चल रहे थे यह उपदेश दिया--

२. भिक्षुओं को सम्बोन्धित करके भगवान् बुद्ध ने कहा-- “क्या तुम जानते हो कि बुरा आदमी की पहचान क्या है?” “ भन्ते! नहीं ।”

३. मैं तुम्हें, एक बुरे आदमी की पहचान बतलाता हूँ ।

४. “कोई कोई आदमी होता है जो पूछे जाने पर तो कहना ही क्या, बिना पूछे ही दूसरों के दुर्गुणों का वर्णन करता है । लेकिन पूछे जाने पर, प्रश्न किये जाने पर, वह दूसरों के दुर्गुण बिना ढके, बिना छिपाये, बडे विस्तार से कहता है । भिक्षुओं ऐसा आदमी बुरा आदमी होता है ।

५. “कोई कोई आदमी होता है, जो न पूछे जाने पर तो कहना ही क्या, पूछे जाने पर भी दूसरे आदमीयों के गुण नहीं कहता । पूछे जाने पर, प्रश्न किये जाने पर, वह दूसरों के गुण कहता है ।

६. “कोई कोई आदमी होता है, जो न पूछे जाने पर तो कहना ही क्या, पूछे जाने पर भी अपने दुर्गुण प्रकट नहीं करता । पूछे जाने पर, प्रश्न किये जाने पर वह अपने दुर्गुण प्रकट करता है, लेकिन उन्हें ढकता है और छिपाता है और उनका पूरा व्योरा नहीं बताता । भिक्षुओं, ऐसा आदमी बुरा आदमी होता है ।

७. “कोई कोई आदमी होता है, जो पूछे जाने की तो बात ही क्या बिना पूछे जाने पर ही अपने गुणों का वर्णन करता है । पूछे जाने प्रश्न किये जाने पर, वह अपने सद्गुणों का वर्णन करता है । वह उनको ढकता नहीं, छिपाता नहीं । वह उनका पूरा विवरण देता है । भिक्षुओं, ऐसा आदमी बुरा आदमी होता है ।

 

३. सर्वश्रेष्ठ आदमी

१. चारिका करते समय भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को जो साथ चल रहे थे, यह उपदेश दिया--

२. भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए भगवान् बुद्ध नें कहा:-
“भिक्षुओं! इस संसार में चार तरह के लोग हैं "

३. “(१) जिसने न अपना भला किया और न किसी दूसरे का भला किया, (२) जिसने दूसरों का भला किया, अपना भला नही किया किन्तु (३) जिसने अपना भला किया, किन्तु दूसरों का भला नहीं किया तथा (४) जिसने अपना भी भला किया तथा दूसरों का भला भी किया ।"

४. जिस आदमी ने न अपना भला करने का प्रयास किया और न दूसरों का भला करने का प्रयास किया, यह श्मशान की उस लकड़ी की तरह है जो दोनो सिरों पर जल रही है, और जिसके बीच में मैला लगा है। वह न गांव में जलावन के काम आती है और न जंगल में । इस तरह का आदमी न संसार के किसी काम का होता है, न अपने किसी काम का ।

५. “जो अपनी हानि करके दूसरों का उपकार करता है, वह दोनो में अधिक अच्छा है।”

६. “लेकिन भिक्षुओं! चारों तरह के आदमियों में सबसे अच्छा तो वही है जिसने दूसरों का भला करने का भी प्रयास किया है और अपना भला करने का भी प्रयास किया है । "

 

४. ज्ञानी आदमी

१. एक बार भगवान् बुद्ध उकट्ठ और सेतब्ब नामक दो नगरों के बीच के महापथ पर जा रहे थे। उसी समय दोण नामक ब्राह्मण भी उकट्ठ और सेतब्ब नामक दो नगरों के बीच के महापथ पर जा रहा था ।

२. उस समय तथागत ने सडक छोड़ दी और एक वृक्ष के नीचे जाकर पद्मासन लगा कर बैठे । तब दोण ब्राह्मण भी उनके चरण-
चिन्हों को देखता हुआ वहाँ जा पहुंचा जहाँ तथागत उस वृक्ष के नीचे शान्त- मुद्रा में, संयतेन्द्रिय, प्रसत्र - वदन और एकाग्रचित बैठे थे । यह देख दोण ब्राह्मण तथागत के पास पहुंचे ।

३. पास पहुंचकर उसने प्रश्न किया--
"क्या आप देवता नहीं है?"
“ब्राह्मण! मैं निश्चय से देवता नहीं हूँ ।"
"क्या आप गन्धर्व नहीं है?"
“ब्राह्मण ! मैं निश्रय से गन्धर्व नहीं हूँ ।"
"आप यक्ष नहीं है?"
“ब्राह्मण! मैं निश्चय से यक्ष नहीं हूँ ।" “क्या आप आदमी नहीं है?"
“ब्राह्मण! मैं निश्चय से (सामान्य) आदमी नहीं हूँ ।"

४. तथागत के ये उत्तर सुने तो द्रोण ब्राह्मण बोला--
“आप से देवता हैं, पूछे जाने पर आपका उत्तर है नहीं, आप से गन्धर्व है, पूछे जाने पर आपका उत्तर है नहीं. आप से यक्ष है, पूछे जाने पर आप का उत्तर है नहीं, आप से मनुष्य है, पूछे जाने पर आपका उत्तर है नहीं,
तो आखिर आप क्या है?"

५. “ब्राह्मण! मैं निश्चय से एक देव, एक गन्धर्व, एक यक्ष, एक मानव सब कुछ था, जब तक मैंने अपने आसवों का क्षय नहीं किया था । अब मैं इन आसवों से मुक्त हूँ, ये कटे ताड-वृक्ष के समान हो गये हैं, ये जडमूल से जाते रहे हैं । इनकी पुनरात्पति की सम्भावना नहीं रही है ।

६. "जिस प्रकार एक कँवल पानी में उत्पन्न होता है, पानी में बढ़ता है, पानी से बाहर निकल आता है और फिर पानी से अस्पृष्ट होकर रहता है; इसी प्रकार है ब्राह्मण! मैं संसार में उत्पन्न हुआ हूँ, संसार में बड़ा हुआ हूँ किन्तु अब संसार को जीतकर संसार से अस्पृष्ट होकर रहता हूँ ।

७. "इसलिए ब्राह्मण! अब तुम मुझको तथागत (ज्ञानी आदमी) जानो ।”


५. मनुष्य - न्यायी तथा सज्जन

१. भिक्षुओ को सम्बोधित करके भगवान् बुद्ध ने कहा - 'चार प्रकार के लोगों का जानना चाहिये, यदि तुम न्यायी और सज्जन आदमी की पहचान करना चाहते हो ।'

२. “भिक्षुओं, कुछलोग ऐसे होते हैं जो अपनी भलाई करने की कोशिश करते हैं दूसरों की नहीं।”

३. “भिक्षुओ, एक आदमी अपने कामच्छन्द को दूर करने की कोशिश करता है, किन्तु दूसरों के कामच्छन्द को दूर करने की प्रेरणा नहीं करता अपने व्यापाद (क्रोध) को दूर करने की कोशिश नहीं करता हैं, किन्तु दूसरों के क्रोध को दूर करने की प्रेरणा नहीं करता; अपनी अविद्या को दूर करने की कोशिश करता है, किन्तु दूसरो की अविद्या दूर करने की प्रेरणा नहीं करता ।”

४. “भिक्षुओं! यह आदमी निश्चय से अपनी भलाई करने की काशिश करते हैं दूसरों की नहीं ।"

५. भिक्षुओ कुछ लोग ऐसे होते है जो दुसरों की भलाई करने की कोशिश करते हैं, अपनी नहीं ।

६. “भिक्षुओं, एक आदमी अपने कामच्छन्द, व्यापाद तथा अविद्या को दूर करने की कोशिश नहीं करता, किन्तु दूसरों के कामच्छन्द, व्यापाद तथा अविद्या दूर करने की प्रेरणा देता है ।”

७. “भिक्षुओ! यह आदमी निश्चयसे दूसरों की भलाई करने की कोशिश करता है, अपनी नहीं ।"

८. “भिक्षुओ, कुछ लोग ऐसे होते है जो न अपनी भलाई करने की कोशिश करते हैं और न दूसरों की भलाई करने की कोशिश करते है ।"

९. भिक्षुओं, एक आदमी न अपने कामच्छन्द, व्यापाद तथा अविद्या को दूर करने की कोशिश करता है, न दूसरों के कामच्छन्द, व्यापाद तथा अविद्या के दूर करने की प्रेरणा देता है ।

१०. “भिक्षुओं! यह आदमी निश्चय से न अपनी भलाई करने की कोशिश करता है और न दूसरों की ।

११. “भिक्षुओं! कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनी भलाई करने की कोशिश भी करते है, तथा दूसरों की भलाई करने की कोशिश भी करते है ।"

१२. “भिक्षुओं! एक आदमी अपने कामच्छन्द, व्यापाद तथा अविद्या को दूर करने की भी कोशिश करता है तथा दूसरों के भी कामच्छन्द, व्यापाद तथा अविद्या दूर करने की प्रेरणा करता है ।"

१३. “भिक्षुओं! यह आदमी निश्चय से अपनी भलाई करने की भी कोशिश करता है तथा दूसरों की भलाई करने की भी कोशिश करता है ।"

१४. यह अन्तिम आदमी ही न्यायी और सज्जन माना जाना चाहिए ।


६. शुभ कर्म करने की आवश्यकता

१. एक अवसर पर भगवान् बुद्ध ने भिक्षुओं को इस प्रकार सम्बोधित किया--

२. “भिक्षुओं कुशल-कर्म करने में मत झिझको । यह जो, कुशल-कर्म, शब है यह एक प्रकार से, सुख का, या जिसको हम इच्छा करते हैं उसका, या जो कुछ हमको प्रिय है उसका अथवा जो कुछ हमे आनन्द देने वाला है उसका पर्याय ही है । भिक्षुओं! मैं स्वय साक्षी कि मैंने स्वयं चिरकाल तक शुभ कर्मों के इच्छित, रुचिकर, प्रिय तथा आनन्द दायक फल का उपभोग किया है । ३. “मैं प्राय : अपने आप से पूछता हूँ कि यह किस कुशल कर्म का परिणाम है, यह किस कुशल-कर्म का फल है कि मैं इस समय इतना सन्तुष्ट और सुखी हूँ?

४. “जो उत्तर मुझे मिलता है वह यह है कि यह तीन कुशल कर्मों का फल है दान का, शील का तथा संयम का ।

५. "वह घडी मंगल घडी होती है, वह घडी उत्सव मनाने की घडी होती है, वह घडी आनन्द मनाने की घडी होती है, वह घडी मंगलमय मुहूर्त होती है जब दान के योग्य अधिकारियों को दान दिया जाता है, जब शुभ कर्म, शुभ-वचन तथा शुभविचारो के परिणाम स्वरुप इनका अभ्यास करने वालों का शुभ फल की प्राप्ति होती है ।

६. “भाग्यवान् हैं वे जिन्हें इस लाभ की प्राप्ति होती है, जिन्हें इस समृद्धि की प्राप्ति होती है! इसलिए तुम भी अपने सब सगे- सम्बन्धियों सहित निरोग और सुखी रहते हुए सत्यपथ की समृद्धि को प्राप्त करो ।”

 

७. शुभ संकल्प करने की आवश्यकता

१. एक बार श्रावस्ती में जेतवन में विहार करते समय भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को कहा--

२. भिक्षुओं, पवित्र और सुखी जीवन व्यतीत करने के लिये शुभ संकल्पों की नितान्त आवश्यकता है ।

३. "मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारे शुभ संकल्प कैसे होने चाहिये ।

४. (१) संकल्प होना चाहिये कि हम जीवन भर माता-पिता की सेवा करेंगें । (२) संकल्प होना चाहिये कि हम अपने बड़ों का आदर करेंगें ।(३) संकल्प होना चाहिये कि हम मधुर भाषी रहेंगें । (४) संकल्प होना चाहिये कि हम किसी की बुराई नहीं करेंगे, (५) सकल्प होना चाहिये कि हम अपने हृदय को स्वार्थपरता से मुक्त कर, दान शील होकर रहेंगे । (६) संकल्प होना चाहिये कि हमें जो कुछ प्राप्त होगा, वह हम दूसरों में बाँट कर ग्रहण करेंगे ।

५. "संकल्प होना चाहिये कि हम जीवन भर शान्त रहेंगे और यदि क्रोध उत्पज्ञ होगा तो हम उसे शान्त कर लेंगे ।

६. भिक्षुओं, ये सात संकल्प हैं जिन्हे तुम अपने मन में जगह देने से और जिनके अनुसार आचरण करने से जीवन को सुखी और पवित्र बना सकोगे ।”