भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
८. चित्त कि जागरुकता और एकाग्रता
१. प्रत्येक कार्य करते समय जागरुक रहो, प्रत्येक काम में सोच-विचार से काम लो, हर विषय में अप्रमादी और उत्साही रहो ।
२. यही बौद्ध जीवन मार्ग हैं ।

३. जो कुछ हम है, यह सब कुछ हमारे विचारों का ही परिणाम है; यह हमारे विचारो पर ही आधारित है, यह हमारे विचारो में ही निर्मित है । यदि आदमी बुरे विचारों से कुछ बोलता या करता है, तो वह दुःख भोगता है । यदि आदमी पवित्र विचार से कुछ भी बोलता या करता है, तो उसे सुख । मेलता है । इसलिये पवित्र विचार महत्वपूर्ण है ।
४. विचारहीन मत बनो, विचारवान बनो । दलदल में फंसे हुए हाथी की तरह अपने आप को पाप में से उबारो ।
५. आदमी को चाहिये कि अपने चित्त की रक्षा करे इसकी रक्षा करना आसान नहीं, यह जँहा चाहे वहाँ जाने वाला है; किन्तु चित्त की रक्षा सुखदायिनी है ।
६. जिस प्रकार ठीक से न छाई गई छत में पानी घुस जाता है, उसी प्रकार यदि चित्त साधना-विहीन है, तो उसमें राग प्रवेश कर जाता है।
७. जिस प्रकार ठीक से छाई हुई छत में पानी नहीं प्रवेश कर पाता है; उसी प्रकार साधना- युक्त चित्त में राग का प्रवेश नही हो पाता है ।
८. पहले तो यह चित्त जहाँ चाहे वहाँ गया, लेकिन अब ये इस चित्त को वैसे ही काबू में रखूँगा जैसे अंकुश-धारी हथवान् मस्त हाथी को ।
९. जँहा चाहे वहाँ जाने वाले चित को साधना अच्छा है, इसे काबू में रखना कठिन है । किन्तु साधना-यूक्त चित्त सुखावह होता है ।
१०. जो इस दूर-गामी चित्त को संयत रखेंगे, वे मार (कामराग) के बन्धन से मुक्त रहेंगे ।
११. यदि आदमी का चित्त अस्थिर है, यदि वह धम्म का जानकार नहीं है, यदि उसका चित्त शान्त नहीं है तो उसकी प्रज्ञा कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होगी
१२. एक द्वेषी अपने द्वेषी की जितनी हानि कर सकता है, गलत रास्ते पर गया हुआ चित्त आदमी की उससे कहीं अधिक हानि कर सकता है।
१३. इसी प्रकार, ठीक रास्ते पर गया हुआ चित्त आदमी की जितनी भलाई कर सकता है उतनी भलाई न माता-पिता ही कर सकते और न अन्य रिश्तेदार ही कर सकते है ।
९. अप्रमाद और वीर्य
१. जब अप्रमादी, प्रमाद को जीत लेता है तो शोक - मुक्त हुआ वह स्वयं शोक-ग्रस्त मानव जाति को प्रज्ञारुपी प्रासाद पर चढा हुआ ऐसे देखता है जैसे कोई पर्वत-शिखर पर चढा हुआ बुद्धिमान आदमी नीचे तलहटी में खडे हुए मूर्खो को देखता है ।
२. प्रमादियो को अप्रमादी, सोते हुएं को जागने वाला ऐसे ही पीछे छोड़कर चला जाता है जैसे शीघ्रगामी अश्व दुर्बल अश्व को । ३. प्रमाद में मत पड़ो । काम भोगो मे मत फंसो । अप्रमादी ही ध्यान-लाभ करता है ।
४. अप्रमाद अमृत पद है, प्रमाद तो मृत्यु के ही समान है। जो अप्रमादी है वे नहीं मरते है और प्रमादी तो मरे समान ही होते है।
५. अपने (जीवन के) उद्देश्य को, दूसरो के बडे अर्थ के लिये भी न छोडे । जब एक बार अपना उद्देश्य स्पष्ट हो जाय तो दृढतापूर्वक उसे ही पकड रहें ।
६. अप्रमादी बनो । प्रमाद को दूर भगाओ । सत्पथ पर चलो; जो आदमी सत्पथ पर चलता है, वह दुनिया में सुख से रहता है ।
७. प्रमाद एक कलंक है, सतत प्रमाद एक काला धब्बा है । निरन्तर प्रयास और प्रज्ञा की सहायता से प्रमाद रुपी विषैले तीर को निकाल बाहर करो ।
८. प्रमाद में मत पडो । काम-भोगो में मत फसो । अप्रमादी तथा ध्यानी ही असीम सुख लाभ करते है ।
९. यदि कोई अप्रमाद-युक्त आदमी जागरुक रहता है, यदि वह विस्मरण शील नहीं है, यदि उसकी चर्य्या शुद्धं है, यदि वह विवे से काम लेता है, यदि वह संयत है तथा उसका आचरण धम्मानुसार है तो उसका यश बढता है।
१०. दुःख और सुख, दान तथा दया
१. गरीबी से दुःख पैदा होता है ।
२. लेकिन यह आवश्यक नहीं कि गरीबी दूर होने से आदमी सुखी भी हो जाय ।
३. ऊँचा जीवन-स्तर नहीं, बल्कि ऊंचा- आचरण सुख का मूलमंत्र है ।
४. यही बौद्ध जीवन मार्ग है।
५. भूख सबसे बडा रोग है ।
६. आरोग्य सबसे बडा लाभ है, सन्तोष सबसे बड़ा धन है, विश्वास सबसे बड़ा रिश्तेदार है और निर्वाण सबसे बड़ा सुख है ।
७. वैरियो के बीच में भी अवैरी बनकर हम सुखपूर्वक जीयेंगे ।
८. आतुरों के बीच में भी अनातुर बनकर हम सुखपूर्वक जीयेगे ।
९. लोभियों में निलोभी बनकर हम सुखपूर्वक जीयेगे ।
१०. जिस प्रकार बेकार की घास खेती को नुकसान पहुचाती है उसी प्रकार काम राग जनता को कष्ट देता है । इसलिये जो राग- मुक्त है उन्हें दान देने का महान फल है ।
११. जिस प्रकार बेकार की घास खेतो को हानि पहुंचाती है उसी प्रकार प्रमाद जनता को कष्ट देता है । इसलिये जो प्रमाद-मुक्त है उन्हें दान देने का महान फल है ।
१२. जिस प्रकार बेकार की घास खेतो को हानि पहुंचाती है, उसी प्रकार तृष्णा जनता को कष्ट देती है । इसलिये जो तृष्णा-मुक्त हैं उन्हें दान देने का महान् फल है ।
१३. धम्म का दान सब दानो से बढकर है । धम्म का माधुर्य सब माधुर्यो से बडकर है । धम्म का आनन्द सब आनन्दों से बढकर है।
१४. जय से वैर पैदा होता है, पराजित दुःखी रहता है। जिसने जय और पराजय की भावना का त्याग कर दिया है वह संतोप से सुखी रहता है।
१५. रागाग्नि के समान आग नही, घृणा के समान पराजय नहीं, इस शरीर के समान कोई दुःख (का कारण ) नहीं, शान्ति के समान कोई सुख नहीं ।
१६. दूसरों की कमियों की ओर वा दूसरों के कृत-अकृत की ओर मत देखो । अपनी ही कमियों या अपने ही कृत-अकृत की ओर देखो ।
१७. जो विनम्र है, जो शुद्धि-गवेषक है, जो आसक्ति -रहित है, जो एकान्त का इच्छुक है जो पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहता है तथा जो विवेक-प्रिय है--उसके लिये जीवन कठिन हैं ।
१८. क्या संसार में कोई आदमी ऐसा है जो ऐसा अवसर ही नहीं देता कि उसे कोई कुछ कह सुन सके, जैसे अच्छा घोडा अपने सवार को कभी चाबुक चलाने का अवसर नहीं देता ?
१९. किसी से कठोर वचन मत बोलो । दूसरे भी वैसा ही प्रत्युत्तर देंगे । क्रोध युक्त वाणी दुखद है । किसी पर भी प्रहार करोगे तो तुम पर भी प्रहार होगा ।
२०. स्वतन्त्रता, उदारता, सदाशयता और निःस्वार्थपरता का संसार के लिये वैसा ही महत्व है जैसा पहिये की धुरी का पहिये के लिये ।
२१. यही बौद्ध जीवन मार्ग है ।
११. ढोंग
१. कोई झूठ न बोले । कोई दूसरे को झूठ बोलने की प्रेरणा न करे और कोई दूसरे के झूठ बोलने का समर्थन न करे । सभी प्रका का मिथ्याभाषण दूर दूर रहे ।
२. जैसे तथागत बोलते हैं तदनूसार आचरण करते है । जैसा आचरण करते है, वैसा ही बोलते है ।क्योंकि वे यथाभाषी तथा कारी और यथाकारी तथा भाषी' है इसलिये वे तथागत कहलाते है ।
३. यही बौद्ध जीवन-मार्ग है।
१२. सम्यक मार्ग का अनुसरण
१. सन्मार्ग को चुनो । उस पथ से विचलित न हो ।
२. युँ पथ बहुत है, किन्तु सभी सन्मार्ग की ओर नहीं जाते ।
३. सन्मार्ग थोडे से ही लोगो को सुखी बनाने के लिये नहीं है, बल्कि सभी को सुखी बनाने के लिये है ।
४. यह आदि में कल्याणकारी होना चाहीये, मध्य में कल्याणकारी होना चाहिये और अन्त में कल्याणकारी होना चाहीये ।
५. सन्मार्ग पर चलने का मतलब है बौद्ध जीवन मार्ग पर चलना ।
६. सर्वश्रेष्ठ मार्ग आर्य-अष्टांगिक मार्ग है, सर्वश्रेष्ठ सत्य चार आर्य सत्य है, सर्वश्रेष्ठ धम्म विराग है, सर्वश्रेष्ठ पुरुष वह है जो चक्षुमान (बुद्ध) है।
७. यही एक मार्ग हैं, प्रज्ञा की विशुद्धि का दूसरा मार्ग ही नहीं है । इसलिये इसी पर चलो ।
८. यदि तुम इस मार्ग पर चलोगे, तो तुम दुःख का अन्त कर सकोगे । मैने दुःखरुपी शल्य की सम्यक् जानकारी प्राप्त करने के अनन्तर इस मार्ग का उपदेश दिया है।
९. प्रयास तो तुम्हें स्वयं करना होगा । तथागत तो केवल पथ-प्रदर्शक है ।
१०. 'सभी संस्कार अनित्य है' जब प्रज्ञा की आँख से कोई इसे देख लेता है, तो वह दुःख का अन्त कर सकता है ।
११. ‘सभी धर्म अनात्म हैं' जब कोई प्रज्ञा से इसे देखता है तो उसे दुःख से मुक्ति प्राप्त होती है ।
१२. जो उत्साहपूर्वक कार्य करने के समय उत्साहपूर्वक कार्य नहीं करता, जो तरुण और सशक्त होने पर भी अत्यंत आलसी रहता है, जिसकी सकल्प-शक्ति दृढ नहीं है-ऐसा सुस्त आदमी कभी प्रज्ञावान नहीं हो सकता ।
१३. वाणी पर ध्यान दे, विचारों को संयत रखे तथा शरीर से कोई बुरा कर्म न करे। आदमी यदि केवल तीन कर्म-पंथो को निर्म रखे तो वह बुद्ध-उपदिट पथ को प्राप्त कर लेगा ।
१४. वास्तविक ज्ञान लाभ है, ज्ञान का अभाव हानि है- इन दोनो बातों को जानकर आदमी को चाहिये कि ऐसा व्यवहार करे कि ज्ञान में वृद्धि हो ।
१५. अपने ही हाथ से, शरद्कालीन कुमुद की तरह, स्नेह-सूत्र को काट डालो । शान्ति पथ पर आरुढ हो । सुगत (बुद्ध) ने निर्वाण की देशना की है।
१६. असद्धर्म का सेवन न करे । अविचारवान बनकर न रहे । मिथ्या मत में वृद्धि करने वाला न हो ।
१७. उठ कर खड़ा हो जाये । प्रमाद न करे । सद्धम्म का पालन करे । शीलवान संसार में सुखी रहता है ।
१८. जो पहले भले ही प्रमादी रहा हो, किन्तु बाद में जो प्रमाद को छोड देता वह बादलो से मुक्त चन्द्रमा कि तरह इस संसार को प्रभावित करता है।
१९. जिसके अच्छे कर्म उसके बूरे कर्म को ढक लेते है, वह बादलो से मुक्त चन्द्रमा की तरह इस लोक को प्रकाशित करता है ।
२०. जो आदमी धम्म का अधिक्रम करता है और जो मृषावादी है वह कोई भी पाप कर्म कर सकता, है ।
२१. जो सदा जागरुक है, जो दिन-रात अपने आप को अधिकाधिक शिक्षित करते रहते है और जो निर्वाणाभिमुख है, उनके आस अस्त हो जाते हैं ।
२२. यह पुरानी बात है जो चुप रहता है उसकी भी निन्दा होती है, जो अधिक बोलता है उसकी भी निन्दा होती है, जो कम बोलता है उसकी भी निन्दा होती है, इस पृथ्वी पर कोई ऐसा नही जिसकी कोई न कोई निन्दा न करता हो ।
२३. न कोई ऐसा आदमी हुआ है, न होगा और न है, जिसकी निरन्तर निन्दा ही निन्दा होती हो अथवा निरन्तर प्रशंसा होती हो ।
२४. वाणी के क्रोध के प्रति सावधान रहो । अपनी जिव्हा पर संयम रखो । मन के कोप के प्रति सावधान रहे। अपने मन पर संयम रखो ।
२५. अप्रमाद अमृत (निर्वाण) का पथ है प्रमाद मृत्यु का पथ है । जोअप्रमादी है वे मरते नहीं है, जो प्रमादी है वे तो मरे हुए ही है ।
१३. सद्धम्म के साथ मिथ्या धर्म को मत मिलाओ
१. जो झूठ को सच और सच को झूठ समझ बैठते है-- ऐसे मिथ्या दृष्टि सम्पन्न लोंगो को कभी सत्य की प्राप्ति नहीं होती ।
२. जो सच को झूठ ओर झूठ को सच समझ बैठते है-- ऐसे मिथ्या-दृष्टि-सम्पन्न लोंगो को कभी सत्य की प्राप्ति नहीं होती ।
३. जो सत्य को सत्य और झूठ को झूठ समझ लेते हैं ऐसे सम्यक दृष्टि-सम्पन्न लोंगो को ही सत्य की प्राप्ति होती है ।
४. जैसे ठीक से न छाई गई छत मे पानी प्रवेश कर जाता है, उसी प्रकार साधना -रहित चित में राग प्रवेश कर जाता है ।
५. जैसे ठीक से छाई गई छत में पानी प्रवेश नहीं करता, उसी प्रकार साधनायुक्त चित्त में राग प्रवेश नहीं करता । `
६. उठे। प्रमाद न करे । सन्मार्ग पर चले । सन्मार्ग पर चलने वाला इस लोक तथा दूसरे सभी लोको में सुखी रहता है ।
७. सन्मार्गगामी बने । कुमार्गगामी न बने । सन्मार्ग पर चलने वाला इस लोक तथा दूसरे सभी लोको में सूखी रहता है ।