भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
चौथा भाग - बुद्ध प्रवचन
विभाग १ गृहस्थो के लिए प्रवचन
१. सुखी - गृहस्थ
१. एक बार अनाथपिण्डक जहाँ भगवान् बुद्ध थे, वहाँ आया । अभिवादन किया और एक ओर बैठ गया ।
२. अनाथपिण्डक जानना चाहता था कि गृहस्थ कैसे सुखी रह सकता है ?

३. तदनुसार अनाथपिण्डक ने भगवान् बुद्ध से प्रार्थना की कि वे उसे गृहस्थ जीवन के सुख का रहस्य समझायें ।
४. भगवान् बुद्ध ने कहा कि गृहस्थ को पहला सुख तो सप्पत्ति का मालिक होने का होता है । एक गृहस्थ के पास धाम्मिक तरीके से, न्यायतः बड़े परिश्रम से, बाहुबल से पसीना बहाकर कमाया हुआ धन होता है । इस विचार से कि मेरे पास न्यायतः अर्जित धन है, उसे प्रसन्नता होती है ।
५. दूसरा सुख सम्पत्ति के भोगने का सुख है । एक गृहस्थ के पास धाम्मिक तरीके से, न्यायतः बडे परिश्रम से, बाहुबल से, पसीना बहाकर कमाया हुआ धन होता है। वह अपने धन का उपभोग करता है और पुण्य कर्म करता है । इस विचार से कि मैं अपने न्यायतः अर्जित धन से पुण्य कर्म करता हूँ, उसे प्रसन्नता होती है ।
६. तीसरा सुख 'ऋण' ग्रस्त न होने का है। एक गृहस्थ के सिर पर किसी का भी कम या जादा, ऋण नही होता । इस विचार से कि सिर पर किसी का भी कम या ज्यादा 'ऋण' नही है, उसे प्रसन्नता होती है ।
७. चौथा सुख दोष रहित होने का है । एक गृहस्थ के शारीरिक कर्म निर्दोष होते है, वाणी के कर्म निर्दोष होते है और मन के कर्म निर्दोष होते है । उसे निर्दोषता का सुख प्राप्त होता है।
८. अनाथपिण्डक! निश्चय से ये चार सुख ऐसे है जिन्हें यदि गृहस्थ प्रयास करे तो प्राप्त कर सकता है ।
२. पुत्री पुत्र से अच्छी हो सकती है
१. जिस समय भगवान् बुद्ध श्रावस्ती मे ठहरे हुए थे, कोशल- नरेश प्रसेनजित् उनके दर्शनार्थ आया ।
२. जिस समय कोशल-नरेश प्रसेनजित भगवान् बुद्ध से बातचीत कर रहा था, राजमहल से एक दूत आया और उसने आकर राजा को कान में सूचना दी कि मल्लिका ने एक पुत्री को जन्म दिया है ।
३. राजा बडा दुखी और खिन्न-मन हो गया । भगवान् बुद्ध ने राजा से उसकी खिन्नता का कारण पूछा ।
४. राजा बोला कि उसे अभी अभी यह अप्रसन्न करने वाला समाचार मिला है कि रानी ने एक पुत्री को जन्म दिया है ।
५. तब उस समय भगवान् बुद्ध ने इसी की चर्चा करते हुए कहा--"महाराज ! यह हो सकता है कि पुत्री पुत्र से भी अच्छी निकले । वह बुद्धिमति हो, सुशीला हो और पति के माता पिता की सेवा करने वाली हो- -एक अच्छी लडकी । --और हो सकता है कि जिस पुत्र को वह जन्म दे वह बड़े काम करे, बडे राज्यों का शासक हो । श्रेष्ठ माता का इस प्रकार का पुत्र अपने देश का नेता हो ।
३. पति और पत्नी
१. एक समय भगवान् बुद्ध मधुरा (मधुरा) और नेरज्जा के बीच के महापथ से चले जा रहे थे । बहुत से गहस्थ तथा उनकी पत्नियाँ मधुरा (मथुरा) और नेरज्जा के बीच के महापथ से चली जा रही थीं ।
२. उस समय भगवान् बुद्ध सडक छोड़कर एक वृक्ष के नीचे जा विराजमान हुए । इन गृहस्थों और उनकी पत्नियों ने भी भगवान् बुद्ध को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखा ।
३. यह देख वे जहां तथागत विराजमान थे, वहां आये । आकर अभिवादन किया और एक ओर बैठ कर उन्होने तथागत से पूछा कि पति-पत्नी का आपस का ठीक व्यवहार कैसा होना चाहिये ? इस प्रकार बैठे हुए उन गृहस्थों तथा उनकी पत्नियों को भगवान बुद्ध ने कहा--
४. “गृहपतियों! पति-पत्नी के इकट्ठे रहने के चार रुप है । एक दुष्ट पुरुष एक दुष्ट स्त्री के साथ रहता है, एक दुष्ट पुराष एक देवी के साथ रहता है, एक देवता एक दुष्ट स्त्री के साथ रहता है, और एक देवता एक देवी के साथ रहता है ।"
५. “गृहपतियों! एक पति हत्या करता है, चोरी करता है, व्यभिचार करता है, झूठ बोलता है, नशीली चीजें पीता है, दुष्ट है, पापी है, लोभ-र - युक्त मन से गृहस्थ जीवन व्यतीत करता है, सदाचारियों को कटु वचन बोलता है और गालियाँ देता है । उसकी पत्नी भी हत्या करती है, चोरी करती है, व्यभिचार करती है, झूठ बोलती है, नशीली चीजें पीती है, दुष्ट है, पापी है, लोभ-युक्त मन से गृहस्थ जीवन व्यतीत करती है, सदाचारियों को कटु वचन बोलती है और गालियां देती है । है, गृहपतियों! इस प्रकार एक दुष्ट पुरुष, एक दुष्ट स्त्री के साथ रहता है।"
६. “गृहपतियो । एक पति हत्या करता है, चोरी करता है, व्यभिचार करता है, झूठ बोलता है नशीली चीजें पीता है, दुष्ट है, पापी है, लोभ-युक्त मन से गृहस्थ जीवन व्यतीत करता है, सदाचारियो को कटु वचन बोलता है और गालियाँ देता है । लेकिन उसकी पत्नी न हत्या करती है, न चोरी करती है, न व्यभिचार करती है, न झूठ बोलती है, न नशीली चीजे पीती है, न दुष्ट है, न पापी है, न लोभ- युक्त मन से गृहस्थ जीवन व्यतीत करती है, न सदाचारियो को कटु वचन बोलती है और न गालियाँ देती है । इस प्रकार गृहपतियों! निश्चय से एक दुष्ट आदमी एक देवी के साथ रहता है ।"
७. “गृहपतियों । एक पति हत्या नहीं करता है, चोरी नहीं करता है, व्यभिचार नहीं करता है, झूठ नहीं बोलता है, नशीली चीजें नहीं पीता है, दुष्ट नही है, पापी नहीं है, लोभ-युक्त मन से गृहस्थ जीवन व्यतीत नहीं करता है, सदाचारियों को कटु वचन नहीं बोलता और गालियाँ नहीं देता है । लेकिन उसकी पत्नी हत्या करती है, चोरी करती है, व्यभिचार करती है, झूठ बोलती है, नशीली चीजें पीती है, दुष्ट है, पापी है, लोभ-युक्त मन से गृहस्थ जीवन व्यतीत करती है, सदाचारियो को कटु वचन बोलती है और गालियाँ देती है । इस प्रकार गृहपतियो । निश्चय से एक देवता, एक दुष्ट स्त्री के साथ रहता है ।”
८. “गृहपतियो । एक पति-पत्नी न हत्या करते हैं, न चोरी करते हैं, न व्यभिचार करते हैं, न झूठ बोलते हैं, न नशीली चीजें पीते हैं, न दुष्ट हैं, न पापी हैं, न लोभ-युक्त मन से गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हैं, न सदाचारियों को कटु वचन बोलते हैं और न गालियाँ देते हैं ।इस प्रकार गृहपतियों । निश्चय से एक देवता एक देवी के साथ रहता है ।"
९. “गृहपतियो । पति-पत्नी के इकट्ठे रहने के ये चार रुप हैं।”