मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 81 of 132
16 जून 2023
Book
12,14,5,7,1,,

विभाग ३ - सदाचरण सम्बन्धी प्रवचन

१. सदाचरण क्या है?

१. एक बार जब भगवान बुद्ध महान भिक्षु संघ सहित चारिका कर रहे थे तो वह शाला नाम के एक ब्राह्मण-ग्राम में पहुंचे । यह ग्राम कोशल - जनपद में था ।

२. शाला ग्राम के ब्राह्मण-मुखियों ने सुना कि चारिका करते करते भगवान् बुद्ध उनके कोशल जनपद स्थित गांव में आये हैं ।

३. उनको लगा कि भगवान बुद्ध के दर्शनार्थ जाना अच्छा है । इसलिये शाला ग्राम के ब्राह्मण भगवान् बुद्ध के पास गये और कुशल-क्षेम पूछकर एक ओर बैठ गये ।

SadaCharan sambandhi pravachan - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

४. उन्होंने तथागत से प्रार्थना की कि वे बताये कि सदाचरण का क्या मतलब है?

५. ध्यान देकर सुनने के लिये उद्यत ब्राह्मणों को भगवान बुद्ध ने कहा--"शरीर के तीन दुराचरण होते है, वाणी के चार दुराचरण होते हैं और मन के तीन दुराचरण होते हैं ।

६. जहाँ तक शरीर के दुराचरण की बात है एक आदमी (१) रक्त-रंजित हाथों से, हत्यारा होने के कारण, प्राणियो के प्रति किसी भी प्रकार की दया न होने के कारण जीव हत्या कर सकता है, (२) वह गांव या जंगल में जो वस्तु उसकी नहीं है, उसे चोरी की नियत से बिना दिये गये ले सकता है, अथवा (३) वह व्यभिचार कर सकता है, माता, पिता, भाई, बहन अथवा अन्य सम्बन्धियों की अधीनता में रहने वाली (अविवाहित) लडकियों से ऐसी लडकियों से भी जिनकी मंगनी हो गई है, जिनके गले में मंगनी की माला पडी है ।

७. जहाँ तक वाणी के दुराचरण की बात है कि (१) आदमी झूठ बोल सकता है जब उसे सभा के सामने या ग्राम-पंचायत के सामने या परिवार परिषद के सामने या राजकीय परिषद के सामने या अपनी श्रेणी के सामने साक्षी देने के लिये कहा जाय तो वह न जानते हुए कह सकता है कि मैं जानता हूँ, जानता हुआ कह सकता है कि मैं नही जानता, न देखते हुए कह सकता है कि देखा है और देखते हुए कह सकता है कि मैंने नहीं देखा, वह अपने हित में, किसी दूसरें के हित में अथवा किसी लाभ के कारण जानबूझ कर झूठ बोल सकता है ।अथवा (२) वह एक चुगल खोर हो सकता है, यहा सुनी और वहाँ जाकर कह दी ताकि यहाँ के लोगों और वहाँ के लोंगों का झगडा हो जाये, अथवा वहाँ सुनी और यहाँ कह दी ताकि वहाँ के लोगों और यहा के लोगों का झगड़ा हो जाय । वह शान्ति को भंग करने वाला और अशान्ति को उत्तेजित करने वाला होता है, झगडा लगाने की नीयत से ही वह बोलता है, झगडा लगाने में ही आनन्द आता है, मजा आता है, प्रसत्रता होती है । अथवा (३) वह जबान कडवा हो सकता है, जो कुछ वह बोलता है वह अप्रिय और कठोर होता है, दूसरों के दिलों को जख्मी करने वाला, दूसरों को दुःख पहुचाने वाला, क्रोध को उत्तेजित करने वाला और एकाग्रता को भंग करने वाला । अथवा (४) वह एक बकवासी हो सकता है, व्यर्थ बिना मतलब की बात करते रहने वाला कभी धम्म की बात न करने वाला, कभी नीति की बात न करने वाला, हमेशा ही तुच्छ, असामयिक, निराद्देशीय तथा निष्प्रयोजन बात करने वाला ।

८. जहाँ तक मन के दूराचरण की बात है एक आदमी (१) लोभी हो सकता है, वह यह इच्छा कर सकता है कि दूसरे सभी लोगों की सम्पति उसी की हो; अथवा (२) वह द्वेष - बहुल हो सकता है, वह यह इच्छा कर सकता है कि उसके आस-पास के प्राणी मारे जाये, नष्ट हो जायें, किसी तरह न रहें, अथवा (३) वह मिथ्या दृष्टि हो सकता है, मिथ्या धारणाओं वाला, वह यह सोच सकता है कि दान, त्याग (यज्ञ) और दक्षिणा जैसी कोई चीज नहीं, शुभाशुभ कर्मों के फल जैसी कोई चीज नहीं लोक-परलोक जैसी कोई चीज नहीं; माता-पिता या सम्बन्धी जैसी कोई चीज नहीं और संसार में कोई ऐसे श्रमण-ब्राह्मण नहि है जिन्होंने सम्यक् - मार्ग ग्रहण कर या सम्यक-मार्ग पर चलकर इस लोक तथा पर लोक का यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो और दूसरों को भी कराया हो ।

९. इनके विराद्ध तीन शरीर के सदाचरण है, चार वाणी के सदाचरण है और तीन मन के सदाचरण है ।

१०. जहाँ तक -शारीरिक सदाचरण की बात है, एक आदमी (१) जीव - हिंसा से विरत होता है, हर तरह की प्राणी-हिंसा से विरत रहता है, दण्ड-त्यागी, खड्ग-त्यागी, वह निरपराधी होता है, वह दयालु होता है, उसके मन में हर प्राणी के लिए करुणा और अनुकम्पा रहती है ।(२) वह चोरी का त्याग करता है, वह दूसरों की किसी ऐसी चीज का ग्रहण नहीं करता, जो उसे दी न गई हो । वह ईमानदारी का जीवन व्यतीत करता है । (३) वह काम - भोग सम्बन्धी मिथ्याचार से दूर रहता है । वह ऐसी लडकियों से सहवास नहीं करता जो माता-पिता भाई - बहन अथवा अन्य सम्बन्धियों की अधीनता में रहने वाली (अविवाहित) लडकियाँ हों और ऐसी लडकियों से भी जिनकी मँगनी हो गई है वा जिनके गले में मँगनी की माला पड गई है।

११. जहाँ तक वाणी के सदाचरण की बात है एक आदमी (१) झूठ का त्याग करता है, मृषावाद से विरत रहता है, जब उसे सभा के सामने या ग्राम-पचायत के सामने सा परिवार - परिषद के सामने या राजकीय परिषद के सामने या अपनी श्रेणी के सामने साक्षी देने के लिए कहा जाता है तो वह न जानते हुए कहता है कि मै नहीं जानता हूँ, जानते हुए कहता है कि मैं जानता हूँ, नहीं देखता होता तो कहता है कि मैंने नहीं देखा, देखा होता है तो कहता है कि देखा है, वह अपने हित में, वा दूसरे के हित में अथवा किसी लोभ कारण जान-बूझाकर झूठ नहीं बोलता । (२) वह चुगलखोरी नहीं करता, यहाँ सुनी ओर वहाँ कह दी ताकि यहाँ के लोगों और वहाँ के लोगो का झगडा हो जाय, अथवा वहाँ सुनी और यहाँ कह दी कि वहाँ के लोगों का झगड़ा हो जाय, वह शान्ति को भंग करने वाला और अशान्ति को उत्तेजित करने वाला नही होता, शान्ति कराने की नियत से ही वह बोलता है, मेल-मिलाप कराने में ही उसे आनन्द आता है, मजा आता है अथवा प्रसत्रता होती है । (३) वह जबान का कडुआ नहीं होता, जो कुछ वह बोलता है बिना कटुता के होता है, प्रिय होता है, मैत्री भाव लिये होता है, दिल से बोलता है, शि बोलता है, अनुकूल बोलता है तथा सब को अच्छा लगने वाला बोलता है । (४) वह बकवासी नहीं होता, बिना मतलब की व्यर्थ बात करने वाला नहीं होता । हमेशा धम्म की बात, नीति की बात करने वाला होता है, ऐसी बात जो समयनुकूल है, ऐसी बात जो याद रहे, ऐसी बात जो ज्ञान भरी हो, ऐसी बात जो ठीक से कही गई हो तथा ऐसी बात जो हितकर हो ।

१२. जहाँ तक मन के सदाचरण की बात है वह आदमी (१) निर्लोभी होता है, वह कभी भी यह नहीं चाहता कि दूसरे लोगो की सारी सम्पत्ति पर उसका अपना अधिकार हो जाय, (२) वह कभी अपने मन मे द्वेष को स्थान नहीं देता, उसकी यही इच्छा रहती है कि उसके आसपास के सभी प्राणी शान्ति और सुख के साथ रहें, हर प्रकार की शत्रुता और अत्याचार से सुरक्षित रहें । (३) उसकी दृष्टि सम्यक होती है तथा उसके संकल्प ओर धारणायें भी ठीक होती है ।

१३. "दुराचरण तथा सदाचरण से मेरा यही अभिप्राय है ।”


२. सदाचरण की आवश्यकता

१. तब तथागत ने पाटलिग्राम के उपासकों को सम्बोधित किया : --

२. “हे गृहपतियो! दुश्शील दुष्ट आदमी को यह दुष्टपरिणाम भुगतने पडते है ।

३. दुश्शील दुष्ट आदमी प्रमाद के कारण धन की बहुत हानि उठाता है ।

४. उसका अपयश होता है, जो उसे दुनिया की नजरों में गिरा देता है ।

५. वह किसी भी जमात में जाये, चाहे यह क्षत्रिय परिषद हो, चाहे ब्राह्मण परिषद हो चाहे गृहपति परिषद हो अथवा चाहे श्रमण परिषद हो, वह हर जगह बडे संकोच से जाता है, व्यग्र चित्त हो जाता है । वह निर्भय नहीं होता । यह तीसरी हानि है ।

६. फिर उसे मरते समय शान्ति नहीं होती, वह मरण - काल में दुःखी रहता है । यह चौथी हानि है ।

७. गृहपतियो बीष्ट आदमी को ये दुष्परिणाम भुगतने पडते है।

८. हे गृहपतियों! अब उन लाभों का विचार करो जो सज्जन शीलवान आदमी को प्राप्त होते है ।

९ "सज्ज्स्त शीलवान आदमी अप्रमाद के कारण बहुत धन- सग्रह कर लेता है।

१०. “उसका सुयश फैल जाता है। वह जहाँ जाता है सम्मानित होता है ।

११. “ वह किसी भी जमात में जायें, चाहे वह क्षत्रिय परिषद हो, चाहे ब्राह्मण परिषद हो, चाहे गृहपति-परिषद हो, अथवा चाहे श्रमण- परिषद हो -- वह हर जगह निस्संकोच जाता है, निर्भय हो प्रवेश करता है ।

१२. फिर उसे मानसिक शान्ति प्राप्त रहती है, मरते समय वह चित्त की शान्ति के साथ शरीर त्यागता है ।

१३. मूर्ख आदमी पाप करते समय यह तक नहीं जानता कि वह पाप कर रहा है । अग्नि के समान उसके पाप कर्म उसे जला देते है ।

१४. जो कोई ऐसे व्यक्ति को -- जो अहानिकर है, जो निर्दोष है--दुःख देता है, वह या तो किसी बडी दुर्घटना का शिकार हो जाता है या उसका चित्त ही विक्षिप्त हो जाता है या उसके धन की बड़ी हानि होती है ।"


३ सदाचरण और दुनिया की जिम्मेदारियाँ

१. एक बार जब भगवान बुद्ध राजगृह के वेळुवनाराम में उस जगह ठहरे हुए थे जहाँ गिलहारियो को दाना चुगाया जाता था उसी समय बहुत से भिक्षुओं को साथ लिये, आयुष्यान् सारिपुत्र दक्षिण की पहाडियों में चारिका कर रहे थे ।

२. रास्ते में उनकी एक भिक्षु से मुलाकात हुई जिसने राजगृह में वर्षावास किया था । शिष्टाचार की बात हो चुकि तब सारिपुत्र ने भगवान बुद्ध का तथा संघ का कुशल- समाचार पूछा । उन्हें बताया गया कि वे अच्छी तरह है । तब सारिपुत्र ने राजगृह तर्दुलपाल-द्वार के धानम्नानी ब्राह्मण का कुशल- समाचार पूछा । उन्हें बताया गया कि वह भी अच्छी तरह है ।

३. तब सारिपुत्र ने उस भिक्षु से प्रश्न किया:  - और क्या धानम्नानी ब्राह्मण अप्रमाद पूर्वक रह रहा है ?”

४. भिक्षु का उत्तर था: --”धानम्नानी ब्राह्मण अप्रमादपूर्वक कैसे रह सकता है? वह ब्राह्मणों और गृहपतियों को मूण्डने के लिये राजा का उपयोग करता है और राजा को मूण्डने के लिये ब्राह्मणों और गृहपतियो का उपयोग करता है । और बडे सुशील कुल से आई हुई जो उसकी सुशील पत्नि थी, वह भी मर गयी है । उसने अब एक दूसरी पत्नि रखी है जो न कुल से सुशील-कुल से आई हुई है, न स्वयं सुशील है ।"

५. सारिपुत्र बोले : --"धानम्नानी के प्रमाद के बारे में यह तो बुरा सचमुच बहुत बुरा समाचार सुनने को मिला । शायद ही कभी उससे भेंट हो तो मैं उससे बातचीत करना पसंद करूंगा ।"

६. दक्षिण की पहाडियों मे यथेच्छ रह चुकने के बाद सारिपुत्र चारिका करते करते राजगृह आये और वेळुवनाराम में निवास किया

७. दसरे दिन प्रात:काल चीवर पहन और पात्र हाथ में लें सारिपुत्र भिक्षाटन के लिये नगर में गयें। वह ऐसे समय गये जब धानम्नानी ब्राह्मण नगर से बाहर अपनी गौओं का दुहा जाना देख रहा था ।

८. भिक्षाटन के अनन्तर भिक्षा ग्रहण कर चुकने पर सारिपुत्र ने उस ब्राह्मण को ढूँढ लिया । सारिपुत्र को आता देख वह ब्राह्मण उन्हें मिलने के लिये आया और आते ही पहले दूध पीने का निमंत्रण दिया ।

९. ”ब्राह्मण! नहीं, आज का भौजन मैं समाप्त कर चुका और अब मध्याह के समय एक वृक्ष की छाया के नीचे विश्राम करुंगा । मुझे मिलने के लिये वहाँ आना ।"

१० धानम्नानी ने स्वीकार किया और अपना खाना खा चुकने के बाद सारिपुत्र के पास आया और अभिवादन कर बैठ गया ।

११. सारिपुत्र ने ही बात-चीत आरम्भ की--"धानम्नानी ! क्या मैं विश्वास करूँ कि तुम पहले जैसे ही अप्रमादी तथा सदाचरण की चिन्ता करने वाले हो ?"

१२. “यह कैसे हो सकता है जब अपनी खाने पीने की चिन्ता करने के अतिरिक्त मुझे अपने माता-पिता का पालन करना पडता है अपनी पत्नि और परिवार का पोषण करना पड़ता है; अपने दासो और नौकर चाकरों को खाना देना पडता है, अपने परिचितों, मित्रों, रिश्तेदारों और अतिथियो का आतिथ्य करना पडता है, अपने मृत पितरो का श्राद्ध भी करना पडता है, देवताओं को भी बलि देनी पडती है और राजा को भी कर चुकाना पडता है!"

१३. “धानख्तानी! तुम क्या सोचते हो? मान लो कि एक आदमी ने अपने माता-पिता के कारण न्याय और औचित्य का मार्ग छोड दिया है और अब वह पकड़ा जा रहा है, तो क्या इससे उसे कोई लाभ होगा, यदि वह कहे कि उसने अपने माता-पिता के लिए न्याय और औचित्य के पथ का त्याग कर दिया था और इसलिये, उसे न पकड़ा जाये ?"

१४. नहीं, सब प्रार्थनाओं के बावजूद, जेलर उसे जेल में डाल देगा ।"

१५. “क्या इससे उसे कोई लाभ होगा यदि वह स्वयं कहे अथवा उसकी पत्नी और परिवार के सदस्य कहे, कि उसने उनकी खातिर न्याय और औचित्य के पथ का त्यागे किया था?"

१६. "नहीं ।"

१७. “क्या इससे उसे कोई लाभ होगा यदि उसके दास या दूसरे नौकर-चाकर उसकी वकालत करें?”

१८. "बिल्कुल नहीं ।

१९. “अथवा उसके मित्रों वा परिचितों ने उसकी वकालत की?"

२०. कुन्नी

२१. “अथवा उसके रिश्तेदारों वा अतिथियों ने उसकी वकालत की?”

२२. "बिल्कुल नहीं।"

२३. "अथवा उसके मृत- - पितरों ने ही उसकी वकालत की कि इसने देवताओं को बलि देने के लिये या राजा को, कर देने के लिये न्याय और औचित्य के मार्ग का त्याग किया था?"

२४. "बिल्कुल नहीं।"

२५. “अथवा इससे उसे कोई लाभ होगा यदि या तो वह स्वयं कहे या उसकी ओर से दूसरे कहें कि इसने अपने खाने पीने के लिये ही न्याय और औचित्य का मार्ग छोड़ा है?"

२६. "नही ।

२७. धानम्नानी! ! तूम क्या सोचते हो? दोनो में से कौन अच्छा आदमी है? क्या वह जो अपने माता-पिता के लिये न्याय और औचित्य का पथ त्याग देता है अथवा वह जो उनकी चिन्ता न कर न्याय और औचित्य के पथ को नहीं त्यागता ?

२८. धानम्नानी का उत्तर था : --"दूसरा, क्योंकि न्याय और औचित्य के पथ को त्यागने से न्याय और औचित्य के पथ को न त्यागना अच्छा है ।"

२९. “और फिर धानम्नानी! दूसरे रास्ते हैं, जिनसे बिना न्याय और औचित्य का त्याग किये, बिना कुमार्ग पर चले वह अपने माता-पिता का पालन कर सकता है । तो क्या स्त्री, परिवार और सभी दूसरों के सम्बन्ध में यही बात नही है?”

३०. "सारिपुत्र! यही बात है

३१. तब सारिपुत्र के कथन से प्रसब हो धानम्नानी ब्राह्मण ने सारिपुत्र को धन्यवाद दिया और उठकर चला गया ।