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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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विभाग ४ - निर्वाण सम्बन्धी प्रवचन

निर्वाण क्या है ?

१. एक बार भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे । वहीं सारिपुत्र भी थे।

२. तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित करके कहा--"भिक्षुओ! तुम्हें धम्म का दायाद (उत्तराधिकारी) बनना चाहिये, भौतिक वस्तुओं का नहीं । क्योकि मेरे मन में तुम सब के लिये अनुकम्पा है, इसलिये मै तुम्हें यह कह रहा हूँ ।

Nirvan kya hai - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. इतना कहा और तथागत उठकर अपनी कुटी में चले गये।

४. सारिपुत्र पीछे रह गये ।सब भिक्षुओं ने सारिपुत्र से प्रार्थना की कि वे बतायें कि निर्वाण क्या है?

५. तब सारिपुत्र ने भिक्षुओं को सम्बोधित करते कहा--भिक्षुओ! तुम जानते हो कि लोभ अकुशल-धम्म है, द्वेष अकुशल-ध - धम्म है।"

६. "इस लोभ और द्वेष से मोक्ष लाभ करने के हेतु मध्यम- म‍ -मार्ग है, जो हमें आंख देने वाला है, ज्ञान देने वाला है, शान्ति, प्रज्ञा, बोधि तथा निर्वाण की ओर ले जाने वाला है।

७. ”यह मध्यम-मार्ग क्या है? यह अष्टांगिक मार्ग के अतिरिक्त और कुछ नहीं, यही सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक्-वाणी, सम्यक्-कर्मांत, सम्यक्-आजीविका, सम्यक्-व्यायाम (चित्त की साधना ), सम्यक् स्मृति तथा सम्यक् समाधि । भिक्षुओं! यही मध्यम-मार्ग है!

८.हाँ भिक्षुओ! क्रोध अकुशल-धम्म है, पटिघ (विरोधी भाव) अकुशल-धम्म है, ईर्ष्या और मात्सर्थ्य अकुशल-धम्म है, कंजूसपन और लालच अकुशल-धम्म है, ढोंग ठगी और उद्धतपन अकुशल-धम्म है, अभिमान अकुशल-धम्म है तथा प्रमाद अकुशल-धम्म है।

९. अभिमान और प्रमाद के त्याग के लिये मध्यम मार्ग हैं जो आँख देने वाला है, ज्ञान देने वाला है तथा शान्ति, प्रज्ञा और बोधि की ओर से ले जाने वाला है।

१० आर्य अष्टांगिक मार्ग का ही दूसरा नाम निर्वाण है।,

११. इस प्रकार महास्थविर सारिपुत्र ने कहा तो सभी भिक्षुओं ने आनन्दित हो उनका अनुमोदन किया ।

 

२ निर्वाण का मुल

(क)

१. एक बार राध स्थविर तथागत के पास आये । आकर तथागत को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये । इस प्रकार बैठे हुए राध स्थविर ने तथागत से निवेदन किया--" भगवान्! निर्वाण किस लिये ?”

२. भगवान् बुद्ध ने उत्तर दिया--"निर्वाण का मतलब है राग-द्वेष से मुक्ति ।”

३. लेकिन भगवान्! निर्वाण का उद्देश्य क्या है?"

४. “राध ! श्रेष्ठ जीवन निर्वाणश्रित है ।निर्वाण ही लक्ष्य है ।निर्वाण ही उद्देश्य है ।

(ख)

१. एक बार तथागत श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम मे विहार कर रहे थे तब तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया-- भिक्षुओं!''' भदन्त!” कहकर भिक्षुओ ने प्रत्युत्तर दिया ।तब तथागत ने कहा : -

२. “भिक्षुओ, क्या तुम्हें मेरे बताये उन पांच बन्धनों का ध्यान है जो आदमी को नीचे की ओर घसीट ले जाते हैं?

३. इतना पूछने पर स्थविर मालुक्य - पुत्र ने तथागत से निवेदन किया : --

४. " भगवान्! मुझ उन पांच बधनो का ध्यान है।"

५. “मालुक्य पुत्र! तुझे उन पाँच बंधनो का कैसे ध्यान है ?

६. ” भगवान्! मुझे ध्यान है कि आपने बताया है कि (छोटे बालक को ) सक्काय- प-दिट्ठ (शरीरात्मक दृष्टि), विचिकित्सा, शील- व्रतों पर निर्भर रहने की दृष्टि, काम-राग तथा द्वेष--ये पांच बधन नीचे की ओर घसीट ले जाते है । भगवान्! इन पांच बंधनो का मुझे ध्यान है।"

७. “मालुक्य पुत्र! तु ये पांच बँधन किसके लिये बताये गये मानता है? क्या दूसरे मतो के अनुयायी छोटे बालक को ही उपमा दे तुझे यह कह कर दोष नहीं देगे कि --

८. “मालुंक्य पुत्र! पुत्र आकाश की ओर मुंह करके लेटे हुए अबोध छोटे बालक की अभी काया ही अविकसित होती है । उसमें सक्काय-- य- दिट्ठि कहाँ से उत्पज्ञ हो सकती है? हाँ! उसमें भी सक्काय- प - दिट्ठि का अंकुर तो मौजूद है ।

९. “इसी प्रकार मालुक्या पुत्र ! आकाश की ओर मुँह करके लेटे हुए अबोध छोटे बालक का अभी चित्त ही अविकसित होता है । तो फिर अभी उसमें चित्त की विचिकित्सा कहाँ से उत्पन्न होगी? हाँ, विचिकित्सा का अंकुर अवश्य मौजूद है ।

१०. “इसी प्रकार मालुक्य पुत्र !, अभी इस अवस्था में उसका कुछ शील ही नहीं हो सकता । तब शील व्रत पर निर्भरता कहाँ से
आयगी? हाँ शील व्रत सम्बन्धी निर्भरता का अकुर अवश्य मौजूद है ।

११. “इसी प्रकार मालुक्य पुत्र! उस अबोध बालक में अभी काम-राग ही अविकसित रहता है । तो उसमें काम-राग की उत्तेजना कहाँ से आयगी? हाँ! उसमें भी काम राग का अंकुर तो अवश्य रहता है ।

१२. "इसी प्रकार मालुक्य पुत्र ! उस अबोध बालक के लिये अभी प्राणियों का अस्तित्व ही नहीं है । तब उसके मन में प्राणियों का द्वेष कहा से आयेगा? हाँ, उसमें भी द्वेष का अंकुर तो अवश्य है ।

१३. "तो क्या मालुक्य पुत्र ! दूसरे मतो के अनुयायी छोटे अबोध बालक की ही उपमा देकर दोष नहीं देंगे? "

१४. जब यह कहा जा चुका तब महास्थविर आनन्द ने तथागत से निवेदन किया--"सुगत! अब आपके लिये विश्राम करने का समय है । सुगत! अब आपके लिये विश्राम करने का समय है ।"