भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४. क्रोध और शत्रुता
१. क्रोध न करो । शत्रुता को भूल जाओ। अपने शत्रुओं को मैत्री से जीत लो ।
२. यही बौद्ध जीवन - मार्ग हैं ।
३. क्रोधाग्रि शान्त होनी ही चाहिये ।

४. जो यही सोचता रहता है, उसने मुझे गाली दी, उसने मेरे साथ बुरा व्यवहार किया, उसने मुझे हरा दिया, उसने मुझे लूट लिया, उसका वैर कभी शान्त नही होता ।
५. जो ऐसे विचार नहीं रखता उसी का वैर शान्त होता है ।
६. शत्रु शत्रु की हानि करता है, घृणा करने वाला घृणा करने वाले की, लेकिन अन्त में यह किस की हानि होती है ?
७. आदमी को चाहिये के क्रोध को अक्रोध से जीते, बुराई को भलाई से जीते, लोभी को उदारता से जीते और झूठे को सच्चाई से जीते ।
८. सत्य बोले, क्रोध न करे, थोडा होने पर भी दे।
९. आदमी को चाहिये की क्रोध का त्याग कर दे, मान को छोड़ दे, सब बन्धनों को तोड दे, जो आदमी नाम रुप में आसक्त नहीं हैं, जो किसी भी चीज को "मेरी" नहीं समझता है, उसे कोई कष्ट नहीं होता ।
१०. जो कोई उत्पन्न क्रोध को उसी प्रकार रोक लेता है जैसे सारथी भ्रान्त रथ को, उसे ही मैं (जीवन - रथ का) सच्चा सारथी कहता हूँ, शेष तो रस्सी पकडने वाले ही है ।
११. जय से वैर पैदा होता है । पराजित आदमी दुखी रहता है । शान्त आदमी जय-पराजय की चिता छोड़कर सुखपूर्वक सोता है ।
१२. कामाग्नि के समान आग नहीं, घृणा के समान दुभाग्य नहीं । उपादान स्कन्धों के समान दुःख नहीं निर्वाण से बढकर सुख नही
१३. वैर से वैर कभी भी शांत नहीं होता, प्रेम से ही वैर शांत होता है । यही सनातन नियम है ।
५. मान, मन और मन के मैल
१. आदमी वही कुछ होता है, जो कुछ उसका मन उसको बना देता है ।
२. सन्मार्ग पर आगे बढने के लिये मन की साधना पहला कदम है ।
३. बौद्ध जीवन-मार्ग मे यह मुख्य शिक्षा है ।
४. हर बात में मन ही पूर्वगामी है, मन ही मुख्य है ।.
५. यदि कोई आदमी दुष्ट मन से कुछ बोलता है या करता है तो दुःख उसके पीछे पीछे ऐसे ही हो लेता है जैसे गाडी के पहिये गाडी खींचने वाले पशु के पीछे पीछे ।
६. यदि आदमी स्वच्छ मन से कुछ बोलता है या करता है तो सुख उसके पीछे पीछे ऐसे ही हो लेता है जैसे कभी न साथ छोड़ने वाली छाया आदमी के पीछे पीछे ।
७. इस चंचल, अस्थिर, दुःरक्ष्य, दुःनिवार्य मन को मेधावी आदमी ऐसे ही सीधा करता है जैसे बाण बनाने वाला बाण को ।
८. जिस प्रकार पानी से बाहर स्थल पर फेंकी हुई मछली तडपती है, उसी प्रकार मार के बंधन से मुक्त होता हुआ यह मन तडपता है ।
९. जिसे काबू में रखना कठिन है, जो चंचल है, जो हमेशा 'मौज' ही खोजता रहता है -- ऐसे मन को काबू में रखना अच्छा है । काबू में रखा हुआ मन सुख देने वाला होता है ।
१०. अपने आपको एक प्रदीप (या द्वीप) बनाओ, परिश्रम करो, जब तुम्हारे चित्त-मलो का नाश हो जायगा और तुम निर्दोष हो जाओगे तो तुम दिव्यभूमि को प्राप्त होवोगे ।
११. जिस प्रकार सुनार क्षण-क्षण करके, थोडा थोडा करे चाँदी के मैल को दूर कर देता है, उसी प्रकार बुद्धिमान आदमी को चाहिये कि क्षण-क्षण करके, थोडा थोडा करके अपने चित्त के मैल को दूर कर दे ।
१२. जिस प्रकार लोहे से उत्पन्न हुआ मोर्चा लोहे को ही खा जाता है, उसी प्रकार पापी के अपने कर्म उसे दुर्गती तक ले जाते है ।
१३. लेकिन सब मलों से भी बढकर मल है, अविद्या सबसे बढकर मल है । हे भिक्षुओ ! इस मल का त्याग कर निर्मल हो जाओ ।
१४. जो आदमी कौवे की तरह निर्लज्ज है, शरारती है, दुस्साहसी है, दुष्ट है--उसके लिये जीवन सुकर है ।
१५. लेकिन जो आदमी विनम्र है, सदैव पवित्रता की खोज में रहता है, अनासक्त है, शान्त है, निर्मल है, बुद्धी- युक्त है -- ऐसे आदमी के लिये जीवन सुकर नहीं होता ।
१६-१७. जो आदमी जीवहिंसा करता है, जो झूठ बोलता है, जो चोरी करता है, जो पर-स्त्री गमन करता है, जो आदमी शराब आदि नशीली चीजे पीता है -- वह यहीं इसी संसार में अपनी कबर अपने आप खोदता है ।
१८. हे आदमी! इस बात को जान ले कि असंयत की हालत अच्छी नहीं रहती । सावधान रह कि लोभ और पाप कर्म तुम्हें चिरकाल तक दुःख में ही न डाले रहें ।
१९. संसार किसी को कुछ देता है तो या तो श्रद्धा से देता है या खुशी से देता है; यदि आदमी दूसरे को मिलने वाले पानी या भोजन को देखकर जलता है तो उसको न दिन को शान्ति मिल सकती हैं न रात को ।
२०. जिसके मन में ऐसी भावना नहीं रहती है, जड-मूल से जाती रही है वह दिन को भी शान्ति से रहता है और रात को भी शान्ति रहता है।
२१. राग के समान आग नहीं और लोभ के समान ओघ (बाढ) नहीं ।
२२. दूसरों के दोष आसानी से दिखाई देते है, अपने कठिनाई से । आदमी दूसरों के दोषो को तो भुस की तरह उडाता है, किन्तु अपने दोषो को तो वैसे ही छिपाता है जैसे दुष्ट जुआरी गोटी को ।
२३. जो आदमी दूसरों के दोष ही देखता रहता है और अपने से सदा खिझा ही रहता है, उसके आसव बढते ही जाते है । वह चित्त- मलों के क्षय से बहुत दूर है । हैं ।
२४. सभी पापों से बचो, कुशल कर्म करो, अपने विचारों को शुद्ध रखो यही बुद्ध की शिक्षा है ।