भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
विभाग ४ - संसरण
आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना
१. भगवान् बुद्ध ने पुनर्जन्म की देशना की है । किन्तु भगवान् बुद्ध ने यह भी कहा है कि संसरण नहीं है ।
२. ऐसे लागो की कमी नहीं थी जो भगवान् बुद्ध पर यह दोषारोपण करते थे कि वे दो परस्पर विरोधी सिद्धान्तों की देशना करते हैं
३. आलोचक प्रश्न करते थे - बिना संसरण के पुनर्जन्म हो ही कैसे सकता है?
४. वे कहते थे - यह बिना संसरण के पुनर्जन्म की बात है। भला - क्या कभी यह सम्भव है?
५. इसमें कहीं कुछ भी विरोध नहीं है। बिना संसरण के पुनर्जन्म हो सकता है।
६. राजा मिलिन्द के प्रश्नों के उत्तर में भदन्त नागसन ने इसे अच्छी तरह समझा दिया है ।
७. बॅकट्रिया-नरेश मिलिन्द ने स्थविर नागसेन से प्रश्न किया- “क्या भगवान बुद्ध पुनर्जन्म (संसरण) मानते थे ?”
८. स्थविर नागसेन का उत्तर था - "हाँ"
९. 'तो क्या इसमें परस्पर विरोध नहीं ?"
१०. नागसेन - "नहीं।”
११. “क्या बिना ‘आत्मा' के पुनर्जन्म संभव है ।”
१२. स्थविर नागसेन बोले, "हाँ, ऐसा निश्चय से हो सकता है ।"
१३. “कृपया समझायें कि यह कैसे हो सकता है ?"
१४. राजा बोला - "नागसेन! जहाँ संसरण नहीं है, क्या वहां पुनर्जन्म हो सकता है ?”
१५. “हाँ, हो सकता है।”
१६. “लेकिन यह कैसे हो सकता है, मुझे एक उदाहरण देकर समझायें।”
१७. “राजन्! यदि एक आदमी एक दीपक से दूसरा दीपक जलाये तो क्या यह कहा जायेगा कि एक का संसरण दूसरी जगह हो गया ?"
१८. “निश्चय से नहीं ।"
१९. “राजन! इसी प्रकार बिना संसरण के पुनर्जन्म होता है ।”
२०. मुझे एक और उदाहरण दें।”
२१. “महाराज! क्या आपको कोई छन्द (= कविता का चरण ) याद है जो आपने बचपन में अपने आचार्य से सीखा हो ?”
२२. “हाँ, मुझे याद है ।”
२३. “तो क्या वह छन्द आप के आचार्य के मुंह में से निकलकर आपके मुंह में आया ?”
२४. “निश्चय से नहीं ।"
२५. "राजन् इसी प्रकार बिना संसरण के पुनर्जन्म होता है ।"
२६. “नागसेन! बहुत अच्छा ।"
२७. राजा बोला - “नागसेन ! क्या 'आत्मा' जैसी कोई चीज है ?"
२८. “यथार्थ दृष्टि से सोचा जाय तो 'आत्मा' जैसी कोई वस्तु नही है । "
२९. 'नागसेन ! बहुत अच्छा ।"
विभाग ५ गलत फहमी के कारण
१. तथागत बुद्ध ने जो उपदेश दिये वे श्रोताओं द्वारा सुने जाते थे जो कि अधिकांश में भिक्षु थे ।
२. किसी भी विषय में भगवान् बुद्ध का क्या कहना था, उसे जनसाधारण तक पहुँचाने वाले भिक्षुगण ही थे ।
३. लेखनकला अभी विकसित नहीं हुई थी । जो कुछ सुनते थे वह भिक्षुओं को कण्ठ कर लेना होता था । प्रत्येक भिक्षु जो जो वह सुनता था,उसे कण्ठ करने की चिन्ता न करता था । लेकिन कुछ भिक्षु थे, जिन्होंने कण्ठस्थ करना अपना काम ही बना लिया था । वे 'भाक' कहलाते थे ।
४. बौद्ध त्रिपिटक और उसकी अट्ठकथायें समुद्र की तरह विशाल हैं । उन्हें कण्ठस्थ कर सकना सचमुच एक बड़ी असाधारण बात थी ।
५. एक से अधिक बार ऐसा हुआ है कि भगवान् बुद्ध ने जो कुछ कहा उसकी 'रिपोर्ट' ठीक नहीं हुई ।
६. भगवान् बुद्ध के जीवन काल मे ही कई बार उनके वचनो की 'गलत रिपोर्ट' की बात उन तक पहुंची थी।
७. उदाहरण के तौर पर ऐसे पांच अवसरों का उल्लेख किया जा सकता है । एक उल्लेख तो अलगद्दुपम सुत्त में आया है, दूसरा महाकम्म विभंग सुत्त में, तीसरा कण्णकट्ठल सुत्त में, चौथा महातण्हा- संखय सुत्त में, पांचवाँ जीवक सुत्त में ।
८. शायद इस तरह के और भी अनेक अवसर आये हों जब तथागत के वचनो की ठीक 'रिपोर्ट' न हुई हो । क्योंकि हम देखते हैं कि भिक्षु भी भगवान् बुद्ध के पास गये हैं और प्रश्न किया है कि ऐसी परिस्थिति में उन्हें क्या करना चाहिये?
९. 'कर्म' और 'पुनर्जन्म' के बारे में जब जब गलत रिपोर्ट हुई है, उसके अनेक अवसर हैं ।
१०. इन सिद्धान्तों को ब्राह्मणी 'धर्म' में भी स्थान प्राप्त है । इसलिये भाणको के लिये अपेक्षाकृत सुगम था कि वह बौद्ध धम्म में ब्राह्मणी - धर्म की भी खिचड़ी पका दें।
११. इसलिये त्रिपिटक में भी जो 'बुद्ध वचन' करके माना गटग है, उसे भी 'बुद्ध वचन' स्वीकार करने में बड़ी सावधानी आवश्यकता है ।
१२. लेकीन इसकी एक कसौटी विद्यमान है ।
१३. भगवान् बुद्ध के बारे में एक बात बड़े ही विश्वास के साथ कही जा सकती है : वे कुछ नहीं थे, यदि उनका कथन बुद्धिसंगत, तर्कसंगत नहीं होता था । दूसरी बातों का यथायोग्य मूल्यांकन करते हुए यह बात कही जा सकती है कि जो बात बुद्धिसंगत हैं, जो बात तर्कसंगत है, वह 'बुद्ध वचन' है।
१४. दूसरी बात यह है कि भगवान् बुद्ध ने कभी ऐसी बेकार की चर्चा में नही पडना चाहा जिसका आदमी के कल्याण से कोई सम्बन्ध न हो । इसलिये कोई भी ऐसी बात जिसका आदमी के कल्याण से कोई सम्बन्ध नहीं, यदि भगवान बुद्ध के सिर मढी जाती है, तो उसे 'बुद्ध वचन' नहीं स्वीकार किया जा सकता ।
१५. एक तीसरी कसौटी भी है । वह यह कि भगवान बुद्ध ने सभी विषयों को दो वर्गों में विभक्त रखा था । ऐसे विषय जिनके बारे वे निश्चित थे और ऐसे विषय वे जिनके बारे में निश्चित नहीं थे। जो विषय पहली श्रेणी में आते हैं उनके बारे में उन्होंने अपने विचार निश्चयात्मक रुप से और अन्तिम रुप से व्यक्त किये हैं। जो विषय दूसरी श्रेणी में आते हैं उनके बारे में उन्होंने अपनी राय भर व्यक्त कर दी है। लेकिन उनके वे विचार ऐसे हैं जो बदल भी सकते हैं ।
१६. जिन तीन प्रश्नों के बारे में सन्देह है और मतभेद हैं उनके बारे में यह निश्चय करने से पहले कि भगवान बुद्ध का निश्चित मत क्या था, यह आवश्यक हैं कि हम इन कसौटियों को न भूलें ।